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वैश्विक चिंताओं से जेटली को मिलेगी बड़े बिल चुकाने में सहायता

अभिषेक वाघमारे,
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बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) फसाड पर वार्षिक बजट का प्रसारण देखते लोग। हर किसी के लिए वित्तीय वर्ष में बजट एक महत्वपूर्ण मोड़ होती है।

 

तेल की कम कीमतों और उत्पाद शुल्क में वृद्धि के कारण यह अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत 1.2 लाख करोड़ रुपये (17.6 बिलियन डॉलर) की बचत कर सकती है।

 

इससे, प्रत्यक्ष कर राजस्व के कम होने की संभावनाओं के बावजूद वित्त मंत्री, अरुण जेटली को  5.56 लाख करोड़ रुपये (81.8 बिलियन डॉलर) के राजकोषीय घाटा (सरकार के खर्च में से आमदनी घटाना) या सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.9 फीसदी के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।

 

इससे सरकार को मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद के 1.3 फीसदी के चालू खाते के घाटे (वस्तुओं, सेवाओं का आयात और निवेश में से निर्यात घटाना) का लक्ष्य प्रप्त करने में भी मदद मिलेगी, जो पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर 2015-16) में सकल घरेलू उत्पाद का 1.4 फीसदी था।

 

विश्व भर में ये महत्वपूर्ण आर्थिक घटनाएं हो रही हैं:

* तेल की कीमतें गिरकर प्रति बैरल 30 डॉलर पर पहुंच गई हैं, जो 11-वर्ष का निचला स्तर है।

* चीन की आर्थिक वृद्धि दर गिरकर 7 फीसदी के नीचे चली गई है।

* डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर 68.10 पर चला गया है, जो दो वर्षों का निचला स्तर है।

* बाल्टिक ड्राई इंडेक्स- प्रमुख धातु, अनाज और जीवाश्म ईंधनों को समुद्र के रास्ते भेजने की कीमत का एक मापक- 30 वर्ष के निचले स्तर पर है।

 

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तेल की कीमतों में गिरावट से भारत को 18 बिलियन डॉलर का लाभ

 

तेल की कीमतों में कमी से सरकार को 2.7 लाख करोड़ रुपये (39.7 बिलियन डॉलर) की बचत होगी, हालांकि, निर्यात गिरने से 1.7 लाख करोड़ रुपये (25 बिलियन डॉलर) निकल जाएंगे- सरकार के लिए 1 लाख करोड़ रुपये (14.7 बिलियन डॉलर) का शुद्ध लाभ होगा।

 

अगर दिसंबर में एकत्र किए उत्पाद शुल्क का स्तर वित्तीय वर्ष 2015-16 के अंतिम तीन महीनों में समान रहता है तो उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी से अतिरिक्त 20,000 करोड़ रुपये (3 बिलियन डॉलर) की आमदनी होगी।

 

1.2 लाख करोड़ रुपये के अप्रत्याशित लाभ से – सातवें वेतन आयोग के तहत – 10 मिलियन सरकारी कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि- और वन-रैंक-वन-पेंशन की मांग के हिस्से के तौर पर 3 मिलियन पूर्व सैनिकों और युद्ध में मारे गए सैनिकों की विधवाओं की पेंशन में वृद्धि के लिए भुगतान होगा। वित्त मंत्रालय के इस दस्तावेज के अनुसार, दोनों योजनाओं से मिलाकर सरकारी खजाने से 1.1 लाख करोड़ रुपये की मांग है।

 

तेल की वैश्विक कीमतों में गिरावट के बिना, जेटली को 13 मिलियन सैनिकों और सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन में इस वृद्धि का भुगतान करने के लिए धन खोजना बहुत मुश्किल हो जाता।

 

तेल (ब्रेंट क्रूड) गिरकर प्रति बैरल 30 डॉलर से नीचे चला गया है। यह कीमत अंतिम बार 2004 में और 2008 के वित्तीय संकट के दौरान देखी गई थी।

 

भारत के लि कच्चे तेल की कीमत (सावर ग्रेड दुबई और ओमान तेल और स्वीट ग्रेड ब्रेंट कच्चे तेल का एक आनुपातिक मिश्रण) 2013 में प्रति बैरल 110 डॉलर के मुकाबले जनवरी 2016 में प्रति बैरल 26 डॉलर तक गिर गई है।

 

एक दशक के दौरान तेल की कीमत

 

 

राज्य सभा टेलीविजन पर चर्चा के दौरान एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री सौगत भट्टाचार्य ने कहा कि मौजूदा कीमतों में गिरावट का कारण विकसित बाज़ारों और चीन से मांग में भारी कमी होना है, जबकि प्रति बैरल 100 डॉलर से 60 डॉलर तक  की शुरुआती गिरावट आपूर्ति की अधिकता के कारण थी।

 

तेल की कीमत में गिरावट – 2008 के संकट और 2015 गिरावट की तुलना

 

2008 के संकट के दौरान तेल कीमतों में गिरावट तीव्र थी; और पुनः प्राप्ति भी उतनी ही तेज़ थी।

 

भट्टाचार्य ने कहा, “2008 का आर्थिक संकट बेहद तीव्र था- तेज़ गिरावट और तीव्र उछाल, ऐसा इस बार नहीं होने जा रहा है। 2016 में निरंतर धीमापन दिखेगा, जे-कर्व की तरह न कि वी-कर्व की तरह जो कि हमने 2008 में देखा था।”

 

विश्व व्यापार धीमा है, भारतीय व्यापार गति भी धीमी है, लेकिन भारत अभी बढ़ रहा है

 

बाल्टिक ड्राई इंडेक्स (बीडीआई), जिसे पूर्व में बाल्टिक फ्रेट इंडेक्स भी कहा जाता था, ने फरवरी 2016 में 290 के अपने सबसे निचले स्तर को छुआ। मिंट में प्रकाशित एक लेख में शिपिंग उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि बीडीआई का निचले स्तर पर पहुँचना वैश्विक अर्थव्यवस्था में संकट का संकेत है।

 

परिणामस्वरूप भारत का निर्यात और आयात गिरा है, लेकिन यह घरेलू आर्थिक संकट के पूर्व लक्षण है या नहीं, ये स्पष्ट नहीं है, कई आर्थिक विकास में कमी की भविष्यवाणी कर रहे हैं, लेकिन मानते हैं कि भारत की जीडीपी विकास 7 फीसदी, अब दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है।

 

न्यूयॉर्क की हॉफस्ट्रा यूनिवर्सिटी के वैश्विक अध्ययन और भूगोल विभाग के जीन पॉल रॉड्रिग ने  लिखा है कि बीडीआई में अचानक और तेज गिरावट मंदी की संभावित भविष्यवाणी हो सकती है क्योंकि उत्पादक लगातार उनकी मांग में कटौती कर रहे हैं, इस कारण जहाज मालिक माल को आकर्षित करने के लिए भाड़ा कम कर रहे हैं।

 

बीडीआई का सर्वोच्च स्तर 11,793 था, जो कि 2008 के आर्थिक संकट से ठीक पहले दर्ज किया गया था।

 

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Rodrigue, J-P et al. (2013) The Geography of Transport Systems, Hofstra University, Department of Global Studies & Geography.

 

चीन के धीमेपन से विश्व को झटका। क्या भारत पर भी पड़ेगा प्रभाव?

 

चीन की अर्थव्यवस्था अभी 6.8 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जो कि पिछले दो दशक में सबसे धीमी है, और चीन से बड़ी मात्रा में पूंजी भी निकली है। भारत के भी इससे प्रभावित होने की संभावना है। जैसा कि इंडियास्पेंड ने बताया था कि 2015-16 के पहले दो महीनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने लगभग 23 करोड़ डॉलर निकाले थे।

 

पिछले दशक में चीन का विकास दर

 

 

2015 में, पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना ने चीनी युआन का 6 फीसदी अवमूल्यन किया है। 1 अप्रैल 2015 से भारतीय रुपया 6.62 फीसदी कमजोर हुआ है।

 

रुपए कमज़ोर होने से विदेशी निवेश को नुकसान संभव

 

इंटरनेशनल जरनल ऑफ़ कॉमर्स बिजनेस एंड मैनेजमेंट में छपे इस शोध पत्र में कहा गया है कि रुपये के पिछले एक वर्ष से रुपए में गिरावट होने से, निवेशकों के मनोभाव पर असर पड़ने के साथ आयात बिल में वृद्धि और महंगाई पर असर पड़ा है, हालाँकि रुपये में गिरावट से निर्यात में सहायता मिली।

 

अमरीका के डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट, 2015-16

 

 
तेल, व्यापार, चीन और डॉलर ने तैयार किया है भारत के बजट के लिए मंच

 

इंडियन एक्सप्रेस में हरीश दामोदरन और शाजी विक्रमन ने लिखा है कि भारत को चीन के कमज़ोर होने से जागरूक होने की आवश्यकता है क्योंकि ये पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत को अधिक प्रभावित करता है।

 

इस पेपर में संघटित एशियाई उभरते बाज़ारों पर चीन के असर का भी वर्णन किया गया है।

 

चेतावनी के अन्य संकेत:

 

* इकॉनोमिक टाइम्स के इस पोल और अन्य स्थानों पर, विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि डॉलर 70 रुपए का स्तर तोड़ सकता है।

 

* प्रत्यक्ष करों से राजस्व वसूली और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विनिवेश से जुटाई रकम का बजट में लगाए 70,000 करोड़ रुपए के अनुमान से कम रहने की संभावना है।

 

हालाँकि, जैसा हमने कहा है कि सरकार मंदी से लाभ के लिए खड़ी होती है। ये सरकार को पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी और वित्तीय घाटे के वित्त पोषण का अवसर देती है, जबकि तेल कीमतों में कमी के कारण 2015-16 (अप्रैल-दिसंबर) में चालू खाते घाटे में कमी आई है और ये सकल घरेलू उत्पाद के 1.4 फीसदी के स्तर पर आ गया है, जो कि 20-15-16 में 1.8 फीसदी था।

 

क्या सरकार इस रकम का इस्तेमाल राजकोषीय घाटा कम करने के लिए ऋण को संतुलित करने में करेगी या सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा खड़ा करने के लिए राजकोषीय घाटे का विस्तार करने में करेगी, या संकट में चल रहे कृषि क्षेत्र को सब्सिडी देने में करेगी, ये देखने की बात है।

 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर डॉक्टर रघुराम राजन ने वित्तीय विस्तार (उधार लेकर खर्च बढ़ाने) के प्रति आगाह किया है और वित्तीय समेकन (संयम के साथ खर्च) करने की सलाह दी है।

 

आरबीआई के इस बयान में कहा गया है, “भारतीय अर्थव्यवस्था को वर्तमान में स्थिर अवस्फीति, मामूला चालू खाता घाटा और राजकोषीय शुद्धता के कारण स्थिरता के संकेत दीप के रूप में देखा जा रहा है।”

 

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*नोट: अमेरिका डॉलर गणना करने के लिए सभी भारतीय रुपया, 68 रुपये के लिए 1 अमरीकी डालर की विनिमय दर के साथ किया गया है।

 

(वाघमरे इंडियास्पेंड के साथ एक विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 28 फरवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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