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अडानी पावर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आदिवासी और दलित ग्रामीणों ने झारखंड उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया

चित्रांगदा चौधुरी,
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( अडानी समूह द्वारा इस आगामी बिजली संयंत्र के लिए राज्य सरकार की ओर से भूमि अधिग्रहण के खिलाफ पूर्वी झारखंड के गोड्डा जिले के सोलह ग्रामीणों ने झारखंड हाई कोर्ट का रुख किया है। )

 

नई दिल्ली: झारखंड के पूर्वी जिले गोड्डा में चार गांवों के सोलह निवासियों ने 4 फरवरी, 2019 को झारखंड हाई कोर्ट का रुख किया। ग्रामीणों ने भारत के सबसे बड़े समूह, अडानी समूह के लिए 1,032 फुटबॉल मैदानों का आकार के बराबर उपजाऊ भूमि के विवादास्पद अधिग्रहण को रद्द करने की मांग की है।

 

16 ग्रामीणों की याचिका में आरोप लगाया गया है कि पूरी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया ‘अवैध और अनियमितताओं से भरी’ हैं। चल रहा भूमि अधिग्रहण और स्थानीय लोगों की ओर से ताजा कानूनी चुनौती झारखंड ( भारत के सबसे गरीब राज्यों में से एक ) और शेष भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पहली बार है, जब राज्य सरकार ने निजी उद्योग के लिए 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को लागू किया है। इस बीच, दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘एनवायरनिक्स ट्रस्ट ’के एक वैज्ञानिक राममूर्ति श्रीधर ने इस भूमि पर आने वाले अडानी समूह की थर्मल पावर परियोजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती देते हुए ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ (एनजीटी) का रुख किया है।

 

याचिका में कई आधारों का हवाला दिया गया है, जिसमें क्लीरन्स  के बाद प्लांट के लिए पानी के स्रोत को चीर नदी से गंगा नदी तक स्विच करना शामिल है।

 

 गोड्डा के डीसी किरण कुमारी पासी, जिनके कार्यालय में भूमि का अधिग्रहण किया गया है, ने हाई कोर्ट में ग्रामीणों के मामले में प्रशासन की प्रतिक्रिया के लिए 11 फरवरी, 2019 को इंडियास्पेंड के कॉल और एक टेक्स्ट संदेश का जवाब नहीं दिया है।भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी के लिए कानूनी चुनौतियों पर जानकारी के लिए इंडियास्पेंड ने 11 फरवरी, 2019 को अडानी समूह के प्रतिनिधियों को ई-मेल किया था लेकिन हमें अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। अगर हमें कोई प्रतिक्रिया मिलती है तो हम रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

 

विवादास्पद परियोजना

 

मई 2016 में,  भारत के सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली पुरुषों में से एक, गौतम अडानी के नेतृत्व में अडानी समूह ने झारखंड सरकार से गोड्डा के 10 गांवों से 2,000 एकड़ के करीब जमीन का अधिग्रहण करने के लिए कहा, ( मुंबई के डाउनटाउन नरीमन पॉइंट व्यापार जिले से 95 गुना ज्यादा ) जिससे आयातित कोयले से 1,600 मेगावाट बिजली प्लांट का निर्माण किया जा सके। अडानी समूह गोड्डा में उत्पादित बिजली बांग्लादेश को बेचेगा। मार्च 2017 में, सरकार ने कहा कि वह छह गांवों: माली, मोतिया, गंगा, पटवा, सोंडीहा और गायघाट में 917 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करेगी।  अब तक, सरकार ने 16 याचिकाकर्ताओं में से चार के गांवों ( माली, मोतिया, गंगटा और पटवा ) में 500 एकड़ निजी भूमि का अधिग्रहण किया है।

 

अडानी समूह को जमीन देने के अनिच्छुक ग्रामीणों से जमीन के अधिग्रहण के लिए झारखंड सरकार ने एक ऐतिहासिक नए कानून, भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनर्स्‍थापन अधिनियम, 2013, में कई सुरक्षा उपायों को काट कर निकाला है, जैसा कि 1 दिसंबर, 2018 की इंडियास्पेंड की जांच से पता चलता है। कानूनी सुरक्षा उपायों का संबंध ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ के तर्क, सामाजिक प्रभाव आकलन, सहमति और मुआवजे’ से हैं। ये सुरक्षा उपाय हिंसक भूमि अधिग्रहण की भारत की सदियों पुरानी परंपरा को समाप्त करने और  इसे एक ‘मानवीय, पारदर्शी और सहभागी’ प्रक्रिया के साथ बदलने के लिए पेश किए गए थे।

 

लेकिन गोड्डा में, जैसा कि कई ग्रामीणों ने इंडियास्पेंड को बताया, निरंतर विरोध और दलीलें जारी हैं और यहां तक ​​कि भूमि अधिग्रहण के खिलाफ पारित ग्राम सभा प्रस्तावों को 2016 के बाद से अधिकारियों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया है। 31 अगस्त, 2018 को संथाल जनजाति की महिला किसान अडानी कर्मियों के चरणों में गिर गईं, उनसे अपनी जमीन को जब्त नहीं करने की भीख मांगती रही और स्थानीय पुलिस देखती रही। इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कैसे कुछ आदिवासी और दलित किसानों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे, जिन्होंने अपने पुश्तैनी खेतों के अधिग्रहण का विरोध किया था।

 

संथाल आदिवासी किसान 31 अगस्त, 2018 को अडानी कर्मियों के चरणों में गिर गए थे और कंपनी से अपनी जमीन नहीं लेने की भीख मांग रहे थे। साभार: अभिजीत तन्मय / कशिश न्यूज

 
ग्रामीणों ने जमीन अधिग्रहण पर सवाल उठाए

 

16 ग्रामीण, जिन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया है, वे संथाल आदिवासी, दलित और अन्य पिछड़ी जाति के समुदायों से हैं और इनमें सेवानिवृत्त शिक्षक, किसान, बटाईदार और कृषि कर्मचारी शामिल हैं।

 

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने और अन्य प्रभावित ग्रामीणों ने ‘भूमि अधिग्रहण में अवैधता को उजागर करते हुए अलग-अलग अधिकारियों को कई पत्र लिखे थे और भूमि के अधिग्रहण का विरोध किया था, लेकिन एक भी प्रतिक्रिया / जवाब नहीं मिला था।” दुखी होकर अब वे अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं।

 

याचिकाकर्ताओं में गंगटा के संताली किसान सूर्यनारायण हेम्ब्रम शामिल हैं। जब हेम्ब्रम और अन्य ग्रामीणों ने जुलाई 2018 में अपनी भूमि के जबरन अधिग्रहण का विरोध किया, तो अडानी समूह के कर्मियों ने उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए – जिनमें दंगा करने, आपराधिक आपराधिक अतिचार और सार्वजनिक शांति भंग करने के आरोप शामिल थे।

 

सूर्यनारायण हेम्ब्रम और अन्य किसानों को अपनी भूमि के अधिग्रहण का विरोध करने के लिए आपराधिक मामलों का सामना करना पड़ रहा है। हेम्ब्रम उन याचिकाकर्ताओं में से एक हैं जिन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया है।

 

हेम्ब्रम ने इंडियास्पेंड को बताया, “राज्य सरकार अडानी की है। प्रधानमंत्री अडानी के हैं। (मुख्यमंत्री) रघुबर दास अडानी के हैं। हमारी कौन सुनता है? हमारे पास अदालत जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।मुझे उम्मीद है कि अदालत हमें न्याय देगी, क्योंकि हमारी लड़ाई वैध है। यह लड़ाई हमारी जमीन और हमारी आजीविका को बचाने के लिए है।”

 

अपनी याचिका में, ग्रामीणों ने कहा कि वे चाहते हैं कि अदालत जमीन अधिग्रहण को कई आधारों पर रद्द कर दे, जिसमें शामिल हैं:

 

  • राज्य सरकार अडानी समूह के लिए किसानों से भूमि प्राप्त कर रही है, इसे ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ परियोजना कह रही हैं, लेकिन यह वर्गीकरण त्रुटिपूर्ण है। चूंकि समूह गोड्डा में उत्पन्न पूरी बिजली बांग्लादेश को बेच देगा, इसलिए भूमि अधिग्रहण अडानी समूह के निजी लाभ के लिए है।

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  • भूमि अधिग्रहण की लागत और लाभों का आकलन करने के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA), “मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण” है। इनमें से कुछ त्रुटियां हैं, जैसे कि  प्रभावित लोगों की संख्या को कम करके ‘गलत तरीके से दावा करना’ कि कोई विस्थापन नहीं होगा। ग्रामीणों की लागत का विश्लेषण नहीं करना, जैसे कि भूमि और खेती की आजीविका का नुकसान और गांवों में सामुदायिक संपत्ति, जिसमें चारागाह और जल निकाय शामिल हैं और ग्रामीणों के राय की अनदेखी करना, जिन्होंने भूमि अधिग्रहण परियोजना के बारे में महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। जबकि एसआईए स्वतंत्र एजेंसी द्वारा चलाया जाता है, मुंबई स्थित परामर्शदाता फर्म, एएफसी इंडिया लिमिटेड, जिसे यह कार्य दिया गया था। एसआईए को तैयार करने के लिए प्रभावित लोगों के साथ विस्तृत साइट का दौरा और बैठकें नहीं की गई, और एक तरीके से कंपनी का समर्थन करने के लिए काम किया गया।

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  • परियोजना के लिए 2016 में आयोजित सार्वजनिक सुनवाई ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ नहीं थी। कई ग्रामीणों को इसमें शामिल होने से रोक दिया गया था और पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया।

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  • विभिन्न अधिग्रहण प्रक्रियाओं और सुरक्षा उपायों के इर्द-गिर्द दस्तावेजों और अधिसूचनाओं का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया गया है, और प्रभावित लोगों को उपलब्ध नहीं कराया गया है, जैसा कि सरकार को कानून के तहत करना आवश्यक है

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  • 80 फीसदी भूमिधारकों की सहमति नहीं ली गई है, जैसा कि इसे एलएआरआर (LARR) अधिनियम के तहत होना चाहिए। याचिका में भूमि अधिग्रहण का विरोध करने वाले 400 भूस्वामियों द्वारा प्रतिनिधित्व का उल्लेख किया गया है; 2017 में ये प्रतिनिधित्व राज्य सरकार और झारखंड के राज्यपाल को सौंपे गए थे।

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  • राज्य सरकार ने ग्राम सभा की ‘सहमति के बिना’ अडानी समूह के लिए गांवों की सामुदायिक भूमि का अधिग्रहण किया है।

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  • अधिग्रहण ‘संताल परगना टेनेंसी एक्ट-1949’ का उल्लंघन करता है, इस कानून  को लक्ष्य किसानों से भूमि के हस्तांतरण पर कई प्रतिबंध लगाकर आदिवासियों के हक की रक्षा करना था।

 

पिछले अक्टूबर में, मोतिया गांव की एक दलित किसान, सुमित्रा देवी ने इंडियास्पेंड को बताया था कि सरकार ने फरवरी 2018 में उसकी जमीन जबरन अधिग्रहित कर लिया था और तब से उसकी जमीन अडानी समूह के कब्जे में है। साक्षात्कार देने के कुछ दिनों बाद  उनकी मृत्यु हो गई। उनके पति रामजीवन पासवान अब याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं।पासवान ने कहा, “भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में जालसाजी, झूठ और धमकी शामिल हैं। इसके लिए कुछ जवाबदेही होनी चाहिए।”

 

उनकी जमीन का जबरन अधिग्रहण कैसे हुआ, इसके बारे में बातचीत के कुछ दिनों बाद दलित किसान सुमित्रा देवी का निधन हो गया। उनके पति रामजीवन पासवान अब याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं।

 

याचिकाकर्ता अदालत से कृषि और सामान्य भूमि के अधिग्रहण पर रोक लगाने के लिए कह रहे हैं और किसान मालिकों के लिए अब तक अधिगृहीत भूमि की वापसी का आदेश चाहते हैं, जिनमें से कई के लिए जमीन आजीविका का एकमात्र स्रोत है। वे अडानी समूह द्वारा वर्तमान में चल रही सभी निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं।

 

रांची में रहने वाली वकील सोनल तिवारी ने ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा, “कंपनी को ग्रामीणों से सीधे संपर्क करना चाहिए था और अगर वे अपनी जमीन बेचना चाहते हैं तो वे फैसला करते।” तिवारी ने कहा कि सरकार ने अडानी समूह को लाभ पहुंचाने के लिए 2013 के कानून का ‘दुरुपयोग’ किया था। तिवारी ने कहा, “जबकि अधिकारी सरकारी जमीन को पट्टे पर दे रहे हैं, किसानों की जमीन के मामले में, वे कंपनी को मालिकाना हक दे रहे हैं, जिससे ग्रामीणों को जमीन वापस न मिल सके।”

 

ग्रीन क्लीयरेंस पर भी सवाल उठाए

 

इस बीच, एनजीटी में 6 फरवरी, 2019 को दायर एक याचिका में, जैसा कि हमने कहा, वैज्ञानिक श्रीधर ने पर्यावरण मंत्रालय, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा अगस्त 2017 में पावर प्लांट को दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती दी है।

 

अडानी समूह ने 36 मिलियन क्यूबिक मीटर प्लांट की वार्षिक आवश्यकता के लिए जल स्रोत के रूप में गोड्डा की चीर नदी का हवाला देते हुए परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त की। अब यह कहता है कि इसके बजाय यह साहिबगंज जिले से सटे गंगा नदी से पानी खींचेगा। यह 92 किलोमीटर की पानी की पाइपलाइन के लिए 460 एकड़ से अधिक भूमि पर उप-सतही अधिकार भी चाहता है।श्रीधर की याचिका में कहा गया है कि, “गंगा नदी से पानी की निकासी का उल्लेख कभी भी ईआईए (पर्यावरण प्रभाव आकलन) में नहीं किया गया था या सार्वजनिक सुनवाई के दौरान या ईएसी (पर्यावरण मूल्यांकन समिति) से पहले किसी भी बैठक में, जहां परियोजना मूल्यांकन के लिए विचार किया गया था, जनता के सामने नहीं रखा गया। इसलिए, पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) के बाद परियोजना के प्रस्तावक ने परियोजना के एक महत्वपूर्ण पहलू का दायरा पूरी तरह से बदल दिया है।” याचिका में तर्क दिया गया कि यह दिखाने के लिए कि गोड्डा की चीर नदी में ‘पर्याप्त पानी’ है, कंपनी ने ‘गलत आंकड़े’ दिए, ताकि परियोजना के लिए ‘शीघ्र स्वीकृति’ सुरक्षित हो सके। परियोजना के ईआईए रिपोर्ट में किए गए दावों का विश्लेषण और सत्यापन करने के लिए नियामक अपने कर्तव्य में विफल रहे।

 

याचिका में कहा गया है कि मंत्रालय के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन नियमों के प्रावधान 8.1.vi के अनुसार पर्यावरणीय मंजूरी को खारिज कर दिया जाना चाहिए, जो कि गलत या भ्रामक आंकड़ों को दिखाने और प्रस्तुत करने से संबंधित है।

 

याचिका में परियोजना को चुनौती देने के लिए अन्य आधार भी शामिल हैं, जिसमें थर्मल पावर प्लांट लगाने के लिए सरकार के अपने दिशानिर्देशों का उल्लंघन भी शामिल है; ये बताते हैं कि कोई भी कृषि भूमि को औद्योगिक स्थल में नहीं बदला जाएगा।

 

गोड्डा में, प्लांट उपजाऊ, सिंचित, बहु-फसल भूमि पर आ रहा है, और 97 फीसदी ग्रामीण अपनी आजीविका के लिए साल भर कृषि पर निर्भर हैं। याचिका में कहा गया है, ईआईए रिपोर्ट  स्थानीय समुदायों और कृषि उत्पादकता पर थर्मल पावर प्लांट के प्रभाव के बारे में चुप है। याचिका में आगे कहा गया है कि, ईआईए और निकासी प्रक्रिया वायु प्रदूषण, संयंत्र उत्सर्जन, भूजल और फ्लाई ऐश भंडारण और निपटान के साथ बिजली प्लांट के अन्य प्रभावों का पर्याप्त रूप से विश्लेषण करने में विफल रहे हैं। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि परियोजना के संबंधित पहलुओं के कई पर्यावरणीय प्रभाव हैं, जिनकी ईआईए और मंजूरी ने अनदेखी है। इनमें शामिल हैं:

 

  • प्लांट से बांग्लादेश तक बिजली पहुंचाने के लिए 120 किलोमीटर की ट्रांसमिशन लाइन, जो वन भूमि को काटेगी।
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  • मौजूदा रेल नेटवर्क से प्लांट के लिए कोयले का परिवहन करने के लिए 45 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन।
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  • कोयले की ढुलाई के लिए रेलवे लाइन से प्लांट तक 10 किलोमीटर की सड़क।

 

ग्रामीणों ने इस महीने इंडियास्पेंड से बात करते हुए आरोप लगाया कि पिछले साल से चल रहा प्लांट निर्माण में पहले ही क्षेत्र के भूजल को लिया जा रहा था, और इससे उनके जलस्रोत सूख रहे थे। इंडियास्पेंड ने सोमवार को पर्यावरण मंत्रालय में निदेशक (इम्पैक्ट असेसमेंट डिवीजन) एस केरकेट्टा को बार-बार कॉल किया, लेकिन वह टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं थे।

 
(चित्रांगदा चौधुरी एक स्वतंत्र पत्रकार और शोधकर्ता हैं, जो स्वदेशी और ग्रामीण समुदायों, भूमि और वन अधिकारों और संसाधन न्याय के मुद्दों पर काम कर रही हैं। ट्विटर @ChitrangadaC पर फॉलो करें।)

 

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 12 फरवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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