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अदालत को पेपरलेस बनाने से जल संकट में बड़ी राहत

चैतन्य मल्लापुर,
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New Delhi: Media persons wait outside the Supreme court during the hearing on petitions against Section 377 of the Indian Penal Code that makes homosexuality a crime; in New Delhi on July 10, 2018. (Photo: IANS)
 

मुंबई: सुप्रीम कोर्ट में अक्टूबर 2016 और सितंबर 2017 के बीच कम से कम 61,520 मामले दर्ज किए गए। अगर फाइलिंग पेपर पर दोनों तरफ प्रिंट किया जाता तो लगभग 2,953 पेड़ और 246 मिलियन लीटर पानी बचाया जा सकता था। (24,600 टैंकर – एक मानक टैंकर-ट्रक 10,000 लीटर पानी रखता है, यह मानते हुए )। यह जानकारी, नई दिल्ली स्थित एक वैचारिक संस्था, ‘सेंटर फॉर एकाउंटबिलिटी एंड सिस्टमिक चेंज’ (सीएएससी) द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आई है।

 

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष याचिका और फाइलिंग में पेपर के दोनों तरफ प्रिंट के उपयोग करने के निर्देशों की जानकारी की मांग के लिए  5 सितंबर, 2018 को सीएएससी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दायर किया गया था।

 

 8 अगस्त, 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय में सीएएससी द्वारा दायर एक अन्य पीआईएल ( उपर्युक्त उद्देश्य के साथ ) में कहा गया कि, देश भर में अधीनस्थ अदालतों और उच्च न्यायालयों के एक महीने पहले दायर मामलों की संख्या के आधार पर पेपर के दोनों तरफ प्रिंट करने से 27,000 पेड़ और 2,000 मिलियन लीटर पानी से बचाया जा सकता था।

 

अदालतों में याचिकाएं बड़े पैमाने पर कागज की खपत ( डबल-स्पेस टाइपिंग और विस्तृत मार्जिन ) से जुडी हैं।

 

 याचिकाओं में कहा गया है, “2 के बजाय 1.5 लाइन स्पेसिंग के उपयोग से कागज की 25 फीसदी बचत हो सकती है। इसी तरह, छोटे फोंट का उपयोग कागज से 30 फीसदी तक बचत हो सकती है।” आधिकारिक प्रारूपों और एक परंपरा के कारण टाइपराइटर का उपयोग अभी भी कई अदालतों में किया जाता है। कोर्ट, कागज के एक तरफ प्रिंट का उपयोग करती है।

 
दोनों तरफ प्रिंट करने से संसाधनों में  कैसे हो सकती है बचत

 

एक पेड़ 8,333 शुद्ध ( गैर पुनरावर्तित ) पेपर उत्पन्न करता है, जबकि कागज का एक टुकड़ा बनाने के लिए 10 लीटर (2.6 गैलन) पानी लगता है, जैसा कि रूथ ऐनी रॉबिन्स द्वारा 2010 के एक पेपर, ‘कंजर्विंग इन कैनवास: रेड्यूसिंग का एन्वार्यनमेंटल फुटप्रिंट्स ऑफ लिगल ब्रिंफ्स बाई रिइमैजिनिंग कोर्ट्स रुल्स एंड डॉक्यूमेंट डिजाइन स्ट्रैटिजिस ’ में कहा गया है।  प्रति मामले पर दो पार्टियों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट में 61,520 मामलों को देखते हुए फाइलों के आठ सेटों की आवश्यकता होगी – अदालत के लिए चार और पार्टियों और उनके वकील के लिए एक-एक। यदि प्रत्येक याचिका 100 पृष्ठों का है, तो कम से कम 49.2 मिलियन पेपर की आवश्यकता होगी। इसका मतलब है कि 5,906 पेड़ का उपयोग 49.2 मिलियन शीट पेपर बनाने के लिए किया जाएगा। इसलिए, दोनों तरफ प्रिंट करने से 2,953 पेड़ और 246 मिलियन लीटर पानी बचाया जा सकेगा। बचाए गए पानी की मात्रा 12 मिलियन लोगों ( बेंगलुरू की आबादी, एक शहर जो 12 साल में पानी की किल्लत झेल सकता है ) को खाना पकाने के लिए पानी मिल सकता है और पीने के लिए 20 लीटर प्रति दिन के हिसाब से उनकी जल की जरूरत पूरी हो सकती है।

 

बेंगलुरू प्रति दिन, प्रति व्यक्ति 100 लीटर पानी की आपूर्ति करता है, जिसमें से केवल 20 लीटर खाना पकाने और पीने के उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। शेष 80 लीटर गैर-पीने योग्य प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है जैसे कि फर्श की सफाई, शौचालयों को फ्लश करना और कार धोना।

 

एशियाई विकास बैंक द्वारा 2010 के इस अध्ययन के मुताबिक 2030 तक भारत में ताजा पानी की जरूरत में से 50 फीसदी तक कमी होने की आशंका है।

 

याचिकाओं में कहागया है कि , “पेपर उत्पाद नगरपालिकाओं के लिए ठोस अपशिष्ट का सबसे बड़ा घटक बनाते हैं।भारत सबसे बड़ा अपशिष्ट उत्पादनकर्ता है, और हर दिन एक लाख मीट्रिक टन अपशिष्ट कागज उत्पन्न होता है। भारत में केवल 27 फीसदी अपशिष्ट पेपर का उपयोग किया जाता है, जो दर्शाता है कि शेष 73 फीसदी को अप्रयुक्त छोड़ दिया जाता है। “

 

भारत भर में, 4 जुलाई, 2018 और 4 अगस्त, 2018 के बीच अधीनस्थ अदालतों (1,391,426) और उच्च न्यायालयों (113,102) सहित 1,504,528 मामले दर्ज किए गए थे।

 

 प्रति मामले 50 पृष्ठों और छह सेटों को ध्यान में रखते हुए, एक तरफ प्रिंट पेपर के उपयोग से 451 मिलियन से अधिक पृष्ठों का उपयोग किया गया होगा, यानी 54,165 पेड़ों की खपत।

 

दोनों तरफ प्रिंट पेपर के उपयोग से 27,083 पेड़ और 2,257 मिलियन लीटर पानी बचाया जा सकता था। यानी मुंबई की दैनिक जल आपूर्ति आवश्यकता का 58 फीसदी-प्रति दिन 3,900 मिलियन लीटर।

 


 

कानून और न्याय और कॉर्पोरेट मामलों के राज्य मंत्री पी पी चौधरी ने लोकसभा को 25 जुलाई, 2018 को एक उत्तर में बताया, “सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया को पेपरलेस बनने पर विचार हो रहा है।”

 

“सुप्रीम कोर्ट में ई-ऑफिस के के माध्यम से पेपरलेस वर्क 2013 में शुरू किया गया था।भारत के सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल फाइलिंग को तरजीह देने के साथ 2017 में एकीकृत केस प्रबंधन सूचना प्रणाली (आईसीएमआईएस) लॉन्च की थी। “

 

मंत्री ने बताया कि, आईसीएमआईएस के कार्यान्वयन के बाद अब डिजिटाइज्ड केस रिकॉर्ड उच्च न्यायालयों से एससी को भेजे जा सकते हैं। हालांकि, ताजा याचिकाओं सहित मामले के रिकॉर्ड स्कैनिंग जैसे डिजिटलीकरण अभी भी प्रगति पर हैं।

 

हालांकि, मई 2017 में सुप्रीम कोर्ट में ई-फाइलिंग का उद्घाटन किया गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में दायर पीआईएल में कहा गया है, “उच्च न्यायालयों में रिकॉर्ड के गैर-डिजिटलीकरण के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।” सीएएससी के महासचिव गौरव पाठक इंडियास्पेंड को बताया, “यह कहा गया था कि कोई भी अपील के आधार पर केवल सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर सकता है और सर्वोच्च न्यायालय को डिजिटल माध्यमों से सीधे उच्च न्यायालयों से पूरा पूर्व रिकॉर्ड प्राप्त होगा। उच्च न्यायालय अपने सभी रिकॉर्ड / केस पेपर को डिजिटाइज करने में सक्षम नहीं है, क्योंकि कई मामलों में हजारों पृष्ठों को स्कैन करना और अपलोड करना मुश्किल भरा काम है।”

 
(मल्लापुर विश्लेषक है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)
 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 17 अक्टूबर 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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