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अधिक महिलाओं का प्रसव अस्पताल में, फिर भी प्रसव के समय हो रही है अधिक बच्चों की मृत्यु

देवानिक साहा और वीडियो वालंटियर्स,
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24 वर्षीय सुरुजमुनी मरांडी उत्तर-पूर्वी झारखंड के गोड्डा जिले में रहती हैं। मरांडी ने गोड्डा जिला अस्पताल में अपने बच्चे को जन्म देने का निर्णय लिया । कई अन्य महिलाओं की तरह वह भी जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) के तहत मिलने वाली सुविधाओं का लाभ लेना चाहती हैं। इस योजना के तहत गरीब गर्भवती महिलाओं को नि:शुल्क चिकित्सा सहायता, दवाइयां,  पोषण और प्रसव के बाद की देखभाल मिलती है। सरकार की इस योजना का लक्ष्य भारत में उच्च मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) को कम करना है।

 

मरांडी ने जेएसवाई प्रोफ़ाइल में सभी बक्से पर चिन्ह लगाया है जो अस्पताल में प्रसव कराने के लिए जरूरी कदम है। वह आदिवासी गरीब हैं, स्वास्थ्य सुविधाओं तक बहुत कम पहुंच है, और अगर योजना नहीं होती तो घर पर पारंपरिक ढंग से प्रसव कराना पसंद करती। अस्पताल में मरांडी ने अपने बच्चे को जन्म दिया है। लेकिन जैसा कि वीडियो वालंटियर्स द्वारा बनाए गए इस वीडियो में दिखाया गया है, जेएसवाई के तहत मिलने वाली सुविधाओं से वह वंचित रहीं।

 

 

प्रसव पीड़ा से छटपटाती सुरुजमुनी को छह घंटे तक इंतजार कराया गया क्योंकि ड्यूटी पर डॉक्टर नहीं आए थे। मरांडी को इलाज और दवाओं के लिए भुगतान करने कहा गया। उन्हें मिलने वाले पोषण से वंचित रखा गया। देखभाल का रवैया ढीला-ढाला था। जबकि यह सब उनकाअधिकार था। बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दी गई। यहां तक कि शौचालय का इस्तेमाल करने भी नहीं दिया गया। और अंत में एक नर्स की सहायता से सुरुजमुनी ने अपने बच्चे को जन्म दिया। मरांडी के मां ने जब नर्स से चिकित्सा सहायता के संबंध में पूछा तो उनका जवाब था, “हमें नहीं पता डॉक्टर कहां हैं, आप जाइए और खोज कर लाइए। ”

 

सुरुजमुनी की कहानी में भारत की मातृ मृत्यु दर पहेली का जवाब है। संस्थागत प्रसव में वृद्धि के बावजूद भारत में उच्च मातृ मृत्यु दर चिंता का कारण है।

 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़ों के आधार पर एक संस्था ‘ब्रूकिंग्स इंडिया’ की 2016 की इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक से वर्ष 2014 तक संस्थागत प्रसव की संख्या में 15 फीसदी की वृद्धि हुई है। इनमें से ज्यादातर जेएसवाई योजना के तहत हुए हैं।  सरकारी अस्पतालों में प्रसव के मामलों में  22 फीसदी वृद्धि हुई, निजी अस्पतालों में 8 फीसदी की गिरावट हुई है । घर में जन्म देने में मामले में 16 फीसदी की गिरावट हुई है। लेकिन ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब भी प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 167 महिलाओं की मृत्यु हो रही है। यह आंकड़े तब हैं, जब सदी के एक चौथाई के दौरान एमएमआर में 70 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

क्यों संस्थागत प्रसव का नतीजा जन्म के समय कम बच्चों की मृत्यु नहीं है?

 

‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ में फेलो अंबरीश डोंगरे ने अपने वर्ष 2014 के जेएसवाई विश्लेषण में कहा है, “एमएमआर और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करना ही पर्याप्त नहीं है। वह कहते हैं, मातृ स्वास्थ्य के लिए भौतिक और मानव बुनियादी ढांचे और देखभाल की गुणवत्ता में भी सुधार करना चाहिए।”

 

कई रिपोर्टों और अध्ययनों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि डोंगरे का विश्लेषण सही है। ऐसा प्रतीत होता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे, सरकार द्वारा प्रोत्साहित संस्थागत प्रसव की बढ़ती संख्या का साथ देने में असमर्थ है। और इससे संभवतः समझा सकता है कि भारत के एमएमआर क्यों श्रीलंका (30), भूटान (148) और कंबोडिया (161) और पूरे अरब जगत से भी बदतर है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2016 में विस्तार से बताया है।

 

गर्भवती महिलाओं के लिए दर्द रहित मुफ्त देखभाल ही काफी नहीं

 

जेएसवाई एक 12 वर्षीय सरकारी कार्यक्रम है जो ऐसे 10 राज्यों पर विशेष ध्यान दे रहा है, जहां संस्थागत प्रसव की कम दर है। इन राज्यों को कम प्रदर्शन करने वाला राज्य (एलपीएस) कहा जाता है। इनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, राजस्थान, ओडिशा, और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं। अन्य 19 राज्यों को उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्यों (एचपीएस) के रूप में एक साथ जोड़ा गया है।

 

फोकस राज्यों में संस्थागत प्रसव की दर

Source: National Family Health Survey 2005-06 and 2015-16

 

कार्यक्रम के तहत, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली गर्भवती महिलाओं को उनकी उम्र और बच्चों की संख्या की परवाह किए बगैर नकद सहायता प्रदान की जाती है। यह नकद सहायता एचपीएस में 700 रुपए और एचपीएस में 1400 रुपए की है। इस सहायता का उदेश्य सरकारी या मान्यता प्राप्त निजी स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंच आसान बनाना है। इसके अलावा, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए यह कार्यक्रम महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, आशा या मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से भी समर्थन की उम्मीद करता है।

 

जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा जेएसवाई डेटा पर वर्ष 2014 के इस विश्लेषण के अनुसार जेएसवाई गरीब महिलाओं को सुविधा देने में नाकाम रही है।

 

कुछ फोकस राज्यों की एमएमआर दुनिया के सबसे गरीब देशों की रिपोर्ट से मेल खाती है – मॉरिटानिया (320), इक्वेटोरियल गिनी (290), गुयाना (250), जिबूती (230) और लाओस (220), जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2015 में बताया है।

 

राज्य अनुसार भारत में मातृ मृत्यु दर

Source: Ministry of Health & Family Welfare

 

वर्ष 2013 की इस रिपोर्ट के अनुसार, एमएमआर और संस्थागत जन्मों में वृद्धि के बीच तालमेल की कमी है। इस रिपोर्ट में नौ फोकस राज्यों के 284 जिलों के अलग-अलग सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह संभावना है कि मातृ मृत्यु दर इसलिए ज्यादा है कि कमजोर महिलाओं को जेएसवाई का लाभ नहीं मिल रहा है।

 

सुरुजमुनी की कहानी भारत भर के अस्पतालों में देखने मिलती है। पश्चिमी ओडिशा के सोनपुर जिला में बंकेडा गांव की भी यही कहानी है। रोगियों के परिवारों को सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर निजी वाहनों को किराए पर लेने, चेक-अप और प्रसव के लिए भुगतान करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उन्हें नकद प्रोत्साहन प्राप्त नहीं है। हम बता दें कि जेएसवाई के तहत 1,400 रुपए और राज्य के ममता योजना के तहत 5,000 रुपए दिए जाते हैं। “ हमें क्यों सरकार द्वारा संचालित स्वास्थ्य सुविधाओं में जाना चाहिए?” पूछती हैं वहां की महिलाएं।

 

 

वर्ष 2012 में बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा आयोजित जेएसवाई के एक आकलन के अनुसार, जैसा सुरुजमुनी के मामले में हुआ, वैसा इन राज्यों में भी हो रहा है। उत्तर प्रदेश की 60 फीसदी महिलाओं ने बताया कि उन्होंने सार्वजनिक मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कुछ भुगतान किया था। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने सितंबर 2015 में विस्तार से बताया है।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा किया है कि यदि गर्भवती महिलाएं संस्थागत प्रसव के लिए जाती हैं और बच्चों का पूरा टीकाकरण कराती हैं तो उन्हें बैंक खाते में 6,000 रुपए सीधा हस्तांतरित किया जाएगा। लेकिन जैसा कि FactChecker ने पाया, गर्भवती महिलाओं को 6000 रुपये देने का विकल्प पहले से ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 से ही अस्तित्व में है । यह सिर्फ सरकार द्वारा लागू नहीं किया गया था।

 

डॉक्टरों की संख्या पर्याप्त नहीं, स्वास्थ्य सुविधाओं नहीं, शौचालय भी नहीं

 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार, देश भर में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) 77 फीसदी प्रसूति और स्त्री रोग विशेषज्ञों की कमी है। और 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सीएचसी में 90 फीसदी से भी ज्यादा प्रसूति, स्त्रीरोग विशेषज्ञ की कमी है।

 

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य की आधारभूत सुविधाओं को तीन स्तरों में बांटा गया है। पहला है उपकेंद्र। उप केंद्र सबसे नजदीकी और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और समुदाय के बीच पहला संपर्क बिंदु है। प्रत्येक उप केंद्र में एक सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम) और एक पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता होता है। इसके बाद आता है प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी पीएचसी। इसके तहत कम से कम छह उप केंद्र आते हैं। और तीसरा है सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र यानी सीएचसी।

 

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्त्रीरोग विशेषज्ञ की कमी

Source: Rural Health Statistics, 2016

 

करीब 62 फीसदी सरकारी अस्पतालों में, जिनमें सीएचसी, जिला अस्पताल और उप-जिला अस्पताल भी शामिल हैं, स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं हैं। उप-केन्द्रों में से एक अनुमान के अनुसार 22 फीसदी सहायक नर्स-दाइयों (एएनएम) की कमी है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2016 में विस्तार से बताया है। इसके अतिरिक्त, 30 फीसदी भारत के जिलों में उप-केंद्र अपनी क्षमता से दोगुने मरीजों की सेवा करते हैं।

 

सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्र, जहां महिलाओं का प्रसव होता है, वहां स्वच्छता सुविधाएं अपर्याप्त हैं। वीडियो में सुरुजमुनी प्रसव के लिए दवाई लेने के बाद शौचालय खोजते हुए देखी जा सकती है।

 

गोड्डा के लिए यह कोई नई बात नहीं है। छह राज्यों के 343 स्वास्थ्य संस्थानों में ‘वाटरएड इंडिया’ द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, पीएचसी के आधे प्रसव के बाद के लिए वार्ड में शौचालय सुविधा नहीं है। मध्य प्रदेश के सीएचसी में ये आंकड़े 60 फीसदी हैं।  इस संबंध में इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 में विस्तार से बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, ओडिशा के गंजम जिले में 38 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में खुले में शौच और 60 फीसदी में खुले में पेशाब के लिए लोग जाते हैं।इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। देश में 938 करोड़ रुपये का कुल निवेश स्वास्थ्य के क्षेत्र में है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2015 में बताया है।

 

अच्छी देखभाल की कोई गारंटी नहीं

 

विश्व बैंक में अर्थशास्त्री जिश्नु दास ने 2014 में अपने ब्लॉग में लिखा है, “संस्थागत प्रसव के लिए सरकार द्वारा दिए जाने वाला प्रोत्साहन इस विचार पर आधारित है कि गरीब लोग या तो अज्ञानता में या फिर सही निर्णय न ले पाने की असमर्थता से या फिर घर में पुरुषों द्वारा दिए गए दवाब की वजह से घर पर प्रसव कराना चुनते हैं। लेकिन सच यह भी है कि लोग संस्थानों का उपयोग इसलिए नहीं कर रहे थे, क्योंकि स्वास्थ्य संस्थानों में गुणवत्ता की कमी थी। गुणवत्ता में सुधार हो तो लोग इसमें आएंगे। ”

 

प्रसव पूर्व देखभाल की गुणवत्ता मृत प्रसव और गर्भावस्था की जटिलताओं के जोखिम को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। इसका अभाव यह बताता है कि अधिक महिलाओं अस्पताल में प्रसव को चुन रही हैं, फिर भी मातृ मृत्यु कम क्यों नहीं हो रही है?

 

वर्ष 2015-16 के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों (एनएफएचएस-4) के अनुसार, ओडिशा में केवल 23 फीसदी महिलाओं को प्रसव पूर्व पूर्ण देखभाल मिलती है जो फोकस राज्यों में सबसे ज्यादा है। तमिलनाडु, जो मां के लिए सबसे अच्छा राज्य माना जाता है, वहां के लिए आंकड़े 45 फीसदी हैं। बिहार से केवल 3.3 फीसदी महिलाओं की प्रसव पूर्व पूर्ण देखभाल मिलने की रिपोर्ट दर्ज हुई है। वर्ष 2005-06 में ये आंकड़े 4.2 फीसदी थे।

 

प्रसव पूर्व पूर्ण देखभाल में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा कम से कम चार प्रसव पूर्व जांच, कम से कम एक टिटनेस टॉक्साइड इंजेक्शन, 100 दिनों के लिए आयरन फोलिक एसिड की गोलियां या सिरप लेना शामिल है।

राज्य अनुसार प्रसव पूर्व देखभाल

Source: National Family Health Survey 2005-06 and 2015-16

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रसव से जुड़ी अधिकांश जटिलताओं को रोका जा सकता है यदि बच्चे के जन्म के समय महिलाओं का कुशल जन्म ‘परिचर’ ( डॉक्टर, नर्स, दाई ) तक पहुंच हो। विभिन्न सरकारी आंकड़ों के इस 2014 विश्लेषण के अनुसार भारतीय महिलाओं में मातृ मृत्यु की आशंका को कुशल परिचर कवरेज में वृद्धि से कम किया जा सकता है।

 

(यह रपट वीडियो वालंटियर्स के सहयोग से तैयार की गई है। वीडियो वालंटियर्स एक वैश्विक पहल है, जो आंकड़ों और तस्वीरों के द्वारा वंचित समुदायों की स्थिति से हमें आगाह कराती है।)

 

(साहा स्वतंत्र पत्रकार हैं। वह ससेक्स विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज़ संकाय से वर्ष 2016-17 के लिए जेंडर एवं डिवलपमेंट के लिए एमए के अभ्यर्थी हैं।)

 
आप वीडियो वालंटियर्स की वीडियो पूरी प्ले लिस्ट यहां देख सकते हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 15 फरवरी 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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