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अपने जनसांख्यिकी अवसर को खो रहा है पश्चिम बंगाल

पूजा भट्टाचार्यजी,
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( लगभग 15,000 लोग, जिनमें ज्यादातर ग्रामीण जिलों के प्रवासी हैं, कोलकाता उपनगरीय ट्रेन स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर दो पर इक्ट्ठा हैं। एक उदास सी अर्थव्यवस्था में ये किसी भी तरह के काम पाने के लिए बेताब हैं। इनमें ज्यादातर अकुशल और अर्ध-कुशल दिहाड़ी मजदूर हैं, जिनके लिए अब काम खोजना बहुत कठिन हो रहा है। )

 

कोलकाता: एक किसान के बेटे तपन दास ने, जिनके लिए अब खेती का कोई मायने नहीं है, 20 साल पहले घर छोड़ दिया था। आज वह 42 वर्ष के हैं। पढ़े-लिखे नहीं हैं और निर्माण स्थलों पर काम कर के हर महीने करीब 4,000 रुपये कमाते हैं। ( 3,000 रुपये तो आप अवैध झुग्गी में बिना बिजली और पानी के मिट्टी के घर के लिए किराए का भुगतान करते हैं) । कभी-कभी, उनकी पत्नी और वह फेना भात, पानीदार, उबले हुए चावल, पर जीवित रहते हैं। उनके दो बच्चों को भारत के 7 वें सबसे अधिक आबादी वाले शहर में स्थानीय सरकार द्वारा संचालित आंगनवाड़ी या क्रेच में दोपहर का कुछ पौष्टिक भोजन मिलता है। दक्षिणी कोलकाता के ढाकुरिया रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म नंबर दो पर बेताबी से काम मिलने की उम्मीद में कांट्रैक्टर की राह देखते हुए दास कहते हैं, “मैं और मेरी पत्नी, किसी तरह से गुजारा कर पाते हैं।”

 

तपन दास और उनकी पत्नी कभी-कभी पानीदार, उबले हुए चावल पर जीवित रहते हैं। 20 साल पहले जब खेती खत्म हो गई, तो एक किसान के अनपढ़ बेटे ने घर छोड़ दिया। आज, वह एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में प्रति माह 4,000 रुपये कमाते हैं।

 

ढाकुरिया के भीड़भाड़ वाले प्लेटफॉर्म नंबर-दो पर दास जैसे लगभग 15,000 अन्य लोग हैं, जिनमें से ज्यादातर 20 से 59 आयु वर्ग के ‘कामकाजी उम्र’ के पुरुष हैं और कुछ महिलाएं इससे अधिक उम्र की हैं। नवंबर 2016 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा के बाद, किसी भी तरह के काम के लिए अवसरों में गिरावट दिख रही है। यह पश्चिम बंगाल और पांच अन्य राज्यों के लिए भारत के जनसांख्यिकी लाभांश को भुनाने के लिए अवसर को बंद कर देता है, जो एक बड़ी कार्यबल-आयु की आबादी से उत्पन्न होता है। जनसांख्यिकीय लाभ  अर्थव्यवस्था में मानव संसाधन के सकारात्मक और सतत विकास को दर्शाता है। यह जनसंख्या ढांचे में बढ़ती युवा एवं कार्यशील जनसंख्या (15 वर्ष से 64 वर्ष आयु वर्ग) तथा घटते आश्रितता अनुपात के परिणामस्वरूप उत्पादन में बड़ी मात्रा के सृजन को प्रदर्शित करता है भारत का जनसांख्यिकीय अवसर किसी अन्य देश की तुलना में लंबा है, 2005-06 से 2055-56 तक, लेकिन गिरती प्रजनन दर का मतलब दो राज्यों (केरल और तमिलनाडु) के लिए ऐसे अवसरों की खिड़की बंद है। पश्चिम बंगाल, दिल्ली, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गुजरात और पंजाब के लिए, यह ‘अब बंद हो रहा है’ – 2021 अंतिम वर्ष है, जैसा कि 2018 में यूनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड की रिपोर्ट में बताया गया है।  देश में 2019 की गर्मियों के दौरान आम चुनाव हो रहे हैं और नौकरियों का संकट भारत के प्रमुख चुनावी मुद्दों में से एक है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 26 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में बताया है। विश्व बैंक की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल ने सात वर्षों से 2012 तक भारतीय राज्यों में सबसे अधिक नौकरियां उत्पन्न की है, लोकिन यह राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों और बिहार, झारखंड और उड़ीसा के गरीब पड़ोसी राज्यों से आने वाले लाखों अकुशल या अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार देने के लिए पर्याप्त नहीं था।

 

यह 11 रिपोर्ट की श्रृंखला में पांचवी रिपोर्ट है, जो भारत के अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार को ट्रैक करने के लिए देश भर के श्रम केंद्रों से तैयार किया गया है। इससे पहले के रिपोर्ट आप यहां, यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं।  श्रम केंद्रों से हमारा मतलब ऐसे स्थान से है, जहां अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिक अनुबंध की नौकरियों की तलाश में जुटते हैं। ये श्रम केंद्र देश के अनपढ़, अर्ध-शिक्षित और योग्य-लेकिन-बेरोजगार लोगों को भारी संख्या में अवसर देते हैं। अगर आंकड़ों में देखें तो, भारत के 92 फीसदी कर्मचारियों को रोजगार देता है, जैसा कि सरकारी डेटा का उपयोग करके 2016 के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अध्ययन से पता चलता है।

 

अनौपचारिक श्रमिकों के जीवन और आशाओं को ध्यान में रखते हुए, यह श्रृंखला नोटबंदी और जीएसटी के बाद नौकरी के नुकसान के बारे में चल रहे राष्ट्रीय विवादों को एक कथित परिप्रेक्ष्य में देखती है। ‘ऑल इंडिया मैन्यफैक्चरर ऑर्गनाइजेशन’ के एक सर्वेक्षण के अनुसार, चार साल से 2018 तक  नौकरियों की संख्या में एक-तिहाई गिरावट आई है। सर्वेक्षण में 300,000 सदस्य इकाइयों में से 34,700 को शामिल किया गया था। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार केवल 2018 में, 1.1 करोड़ नौकरियां गायब हो गईं और इनमें से  ज्यादातर असंगठित ग्रामीण क्षेत्र में थे।

 

सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2016 में पश्चिम बंगाल की बेरोजगारी दर ( नोटबंदी के एक महीने बाद ) 7.3 फीसदी थी, जो फरवरी 2018 में 8.8 फीसदी हुई और फरवरी 2019 में कुछ ठीक होके 6.1 फीसदी तक हुई।

 

 ये डेटा काम की दैनिक खोज को पर्याप्त रूप से कैप्चर नहीं करते हैं। हर दिन ढाकुरिया स्टेशन पर जाने के बावजूद, दास जनवरी 2019 में केवल 11 दिनों के लिए 350 रुपये प्रति दिन के हिसाब से काम खोजने में कामयाब रहे। उनके आसपास की भीड़ में कुशल, अर्ध-कुशल और अकुशल श्रमिक शरीक थे, जिनमें से अधिकांश दास की तरह दक्षिण 24 परगना से हैं, जो कोलकाता से 60 किमी दक्षिण में स्थित है।

 

विकास के बाद भी पर्याप्त नौकरियां नहीं

 

हालांकि ढाकुरिया स्टेशन पर कुछ कुशल मजदूरों को अन्य श्रमिकों और श्रमिक ठेकेदारों के साथ कनेक्शन के माध्यम से रोजगार मिलता है, कुछ अन्य लोगों ने एक अलग रास्ता अपनाया- अपने औजारों को प्रदर्शित कर अपनी विशेषज्ञता को शिल्पकारों और राजमिस्त्री के रूप में प्रचारित करके वे कुछ काम पाने में सफल रहे।

 

कोलकाता के ढाकुरिया उपनगरीय ट्रेन स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर दो पर शिल्पकार और राजमिस्त्री के रूप में अपनी विशेषज्ञता को प्रदर्शित करते काम चाहने में जुटे दैनिक श्रमिक।

 

औसतन, अकुशल श्रमिक प्रतिदिन 350 रुपये से 400 रुपये के बीच कमाते हैं, जबकि कुशल कर्मचारी जैसे राजमिस्त्री और वेल्डर 500 रुपये से 600 रुपये तक कमाते हैं। हालांकि के बाद मजदूरी में बहुत बदलाव नहीं आया है और इसके लिए ट्रेड यूनियनों को धन्यवाद, जो कभी बहुत मजबूत थी, आज ऐसी हालत नहीं है, फिर भी यूनियन काम कर रही है।  हां, नौकरियों की संख्या जरूर कम हो गई है, जैसा कि जानकार कहते हैं।

 

वाणिज्य उद्योग ट्रस्ट इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (आईवीईएफ) सरकार के मेक इन इंडिया कार्यक्रम को बढ़ावा देता है। आईवीईएफ के द्वारा बताया गया है कि 2017-18 में 11 लाख करोड़ रुपये के सकल राज्य घरेलू उत्पाद के साथ, आर्थिक आकार के मामले में पश्चिम बंगाल भारत का छठा सबसे बड़ा राज्य रहा।

 

राज्य अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा उठाने के लिए उचित हकदार है – इसके 1.78 करोड़ युवा 15-24 वर्ष की आयु के हैं, और अधिक से अधिक श्रमिक गरीब, पड़ोसी राज्यों से जुड़ते हैं।

 

 

“हालांकि, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि हमेशा नौकरी में वृद्धि का कारण नहीं बनती है”, कोलकाता के ‘इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ मैनेजमेंट’  में पब्लिक पॉलिसी एंड मैनेजमेंट के सहायक प्रोफेसर, साइकत मैत्रा समझाते हैं। दरअसल, भारत में वास्तविक मजदूरी 30 साल से 2013 तक सालाना केवल 1 फीसदी बढ़ी, क्योंकि भारत ‘सभ्य नौकरियां’ बनाने और आय बढ़ाने में विफल रहा है, जैसा कि ‘ऑक्सफैम’ की मार्च 2019 की रिपोर्ट में कहा गया है। पश्चिम बंगाल में इससे इसलिए मदद नहीं मिलती कि उद्योग-धंधे पीछे चला गया है।

 
बाहर चले गए उद्योग
 

 2017 तक, पश्चिम बंगाल में 1.5 करोड़ असंगठित क्षेत्र के श्रमिक थे। इसमें सबसे आगे निर्माण क्षेत्र था और फिर श्रम प्रधान उद्योग में ज्यादा मजदूर काम करते थे। नोटबंदी के साथ, निर्माण क्षेत्र में मंदी और नए रियल एस्टेट नियमों के साथ, बुनियादी कौशल के साथ काम करने वाली आबादी सबसे ज्यादा पीड़ित हुई। आईआईएम कलकत्ता के मैत्रा कहते हैं,”कोलकाता में हाउसिंग मार्केट में गिरावट आई है। वर्तमान में, (रियल एस्टेट / कंस्ट्रक्शन) सेक्टर की मांग महीने में 10-15 दिनों में तब्दील हो जाती है, जो दिहाड़ी मजदूरों के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। एक दिन की मजदूरी का अंतर भी उनके लिए बहुत गंभीर हो सकती है। ”

 
उनके लिए हस्तक्षेप करने वाले यूनियनों के बिना, हजारों अनौपचारिक श्रमिक (बिना-पढ़े-लिखे दास जैसे कई) बाजार की दया पर हैं।
 

 कोलकाता के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (आईआईएफटी) में स्ट्रैटेजी के प्रोफेसर के. रंगराजन ने कहा, “यूनियनों ने सरकार पर सीपीआई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) और डब्ल्यूपीआई (थोक मूल्य सूचकांक) के आधार पर दरों को संशोधित करने का दबाव डाला। यदि यूनियन सक्रिय नहीं हैं, तो सरकारें आमतौर पर ऐसा करने की जहमत नहीं उठाती हैं।”

 

हालांकि एक हकीकत यह भी है कि यूनियनों ने पश्चिम बंगाल से उद्योगों की रवानगी में भूमिका निभाई। रंगराजन कहते हैं कि औद्योगिकीकरण की गति राज्य में निराशाजनक रही है। कुछ दशक पहले तक, बंगाल में ढेर सारे उद्योग थे, जैसे कि इंजीनियरिंग पार्ट, वस्त्र और रसायनों का निर्माण। हालांकि, बड़ी कंपनियां “नक्सलवाद,‘ 80 के दशक की औद्योगिक अशांति और 90 के दशक में भारत बंद संस्कृति के कारण बंगाल से बाहर हुई है।” जो कंपनियां रह गई, उनमें से कुछ हैं, ब्रुक बॉन्ड इंडिया, आईसीआई इंडिया, शॉ वैलेस, जेके टायर और फिलिप्स इंडिया। अब इसे अनौपचारिक, छोटे स्तर के क्षेत्र पर छोड़ दिया गया है, जहां वेतन कम होता है और रोजगार अधिक अनिश्चित होता है। पश्चिम बंगाल में 2017 में 52 लाख मध्यम और छोटे उद्यम (एमएसएमई) थे, जो राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा थे।

 

सरकार को एमएसएमई के महत्व का एहसास है, लेकिन इसके प्रयास रोजगार की समस्या के पैमाने से मेल नहीं खाते हैं। तृणमूल कांग्रेस 2011 से पश्चिम बंगाल पर शासन कर रही है, वाम मोर्चे का शासन राज्य में 34 वर्षों तक चला।

 

राज्य चुनाव जीतने से पहले, तृणमूल ने 2011 के अपने घोषणापत्र में एमएसएमई के विकास पर ध्यान केंद्रित करके, बंद किए गए सार्वजनिक उपक्रमों (सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों या उद्यमों) को फिर से शुरू करने और विनिर्माण, कपड़ा और अन्य क्षेत्रों में बड़े निवेश को आकर्षित करने के लिए पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने का वादा किया था। ।

 

2016 में, राज्य सरकार ने एमएसएमई को प्रोत्साहित करने और फंड देने के लिए स्टार्टअप बंगाल की शुरुआत की। लेकिन जनवरी 2016 से अप्रैल 2018 के बीच, राज्य ने 15 से अधिक स्टार्ट-अप को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान दिया है।

 

कोलकाता के प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख मौसमी दत्ता ने कहा, “अनौपचारिक क्षेत्र में, रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचे ने विकास के संकेत दिए हैं। लेकिन वे अर्ध-कुशल और अकुशल श्रमिकों की विशाल आबादी के लिए किसी भी तरह से पर्याप्त नहीं हैं।”

 

निर्माण में मंदी से स्थिति और बदतर हो गई है, जो पश्चिम बंगाल में अनपढ़, अशिक्षित या खेतों से आने वाले श्रमिकों की सबसे बड़ी संख्या को रोजगार देती है।

 

 एक रियाल्टार नाइट फ्रैंक द्वारा 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में नोटबंदी के बाद रियल एस्टेट में वृद्धि नहीं हुई है। कोलकाता में आवासीय बिक्री 2018 में कम थी, और दक्षिणी कोलकाता की इमारतें, जो कभी घर खरीदारों के बीच बहुत पसंद की जाती थीं, , अब खरीदारों की कमी के कारण बिक नहीं रही हैं।

 

ढाकुरिया स्टेशन पर भीड़ के बीच लोगों की एक आम राय यह सामने आई कि नौकरी का बाजार छह महीने से दो साल के बीच धीमा रहा है। सुबह 10 बजे तक, प्लेटफार्म लगभग खाली है। “अगर हमें सुबह 9 बजे तक काम नहीं मिलता है, तो हम घर वापस जाते हैं,” एक ने कहा। इसका मतलब दिहाड़ी तो नहीं ही मिली, आने-जाने पर खर्च व्यर्थ गया। वैसे बहुतों के पास रेलवे पास हैं, जो यात्रा करने की दूरी के आधार पर 100 रुपये से 300 रुपये प्रति माह है।

 

अधिक उम्र और कार्यबल
 

 पश्चिम बंगाल की प्रजनन दर प्रति महिला 1.6 बच्चे है । ( भारत में सबसे नीचे, केरल की 1.8 से कम और प्रतिस्थापन दर 2.2 से कम ) जिसका मतलब है कि राज्य जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए पर्याप्त बच्चे पैदा नहीं कर रहा है। प्रवासी अंतरालों को भर सकते हैं, लेकिन जैसा कि हमने कहा, वे गरीब राज्यों से हैं, इसलिए पश्चिम बंगाल की आर्थिक वृद्धि अस्थिर होने की संभावना है। करीब 60 साल की उम्र में मोनरा बीबी, ढाकुरिया की कुछ महिलाओं में से एक थीं। उनकी साड़ी, पहले सफेद रही होगी, जो लंबे समय तक इस्तेमाल के कारण धूसर रंग के धब्बों से अटी पड़ी थी। उसका पति नहीं था, और उसके तीन बेटे और एक बेटी है।

 

अपने परिवार का समर्थन करने के लिए, बीबी पिछले 20 वर्षों से प्लेटफार्म दो पर आती रही हैं। वह रेलवे स्टेशन से लगभग 50 किलोमीटर दूर, जॉयनगर में मिट्टी के एक घर में रहती है और सप्ताह में तीन दिन ट्रेन से आती-जाती है। मासिक पास के लिए उसे हर महीने 200 रुपये का भुगतान करना पड़ता है।

 

जबकि उनके बेटे घर के वित्तिय जरुरतों में हाथ बटाते हैं लेकिन बीबी अभी भी काम की तलाश में ढाकुरिया का दौरा करती है। बीबी ने कहा, “मैं अपनी बेटी की आर्थिक मदद करने के लिए ऐसा करती हूं।” उनका दामाद कोई काम नहीं करता है।

 

उन्होंने कहा कि उन्हें पता नहीं कि वह कितने साल तक काम कर पाएगी – शायद एक और डेढ़ साल। एक पेंटर और राजमिस्त्री के रूप में, उन्होंने प्रतिदिन 500-600 रुपए तक कमाए हैं, लेकिन कोई सुनिश्चित काम नहीं है।

 

बीबी ने कहा, “कई बार, लेबर कॉन्ट्रैक्टर्स यह सोचकर मुझे हतोत्साहित कर देते हैं कि मैं बूढ़ी और कमजोर हूं।” पहले महीने में 25 दिनों तक काम मिलता है, अब उसे अब 10-12 दिन काम मिलता है, और प्रति माह लगभग 5,000-6,000 रुपये कमाती हैं। बीबी के पास झारीबाला मंडल भी थीं। वह भी पेंटर और राजमिस्त्री काम करती हैं। करीब 60 वर्षीय मंडल पिछले 20 सालों से आ रही हैं। उन्होंने बताया कि उसे महीने में अब 10 दिन काम मिलता है। पहले 25 दिन मिलता था। वह अपने परिवार में एकमात्र मजदूरी कमाने वाली है। उन्होंने अपने विकलांग पति और बेटे के बारे में बात की और कहा कि  “जब तक वह कर सकती है, तब तक काम करेगी।”

 
बाजार के साथ राजनीति
 

 जीवित रहने के लिए काम पाने के प्रयास में, कुछ श्रमिकों ने शहर के भीतर संचालित विभिन्न सिंडिकेट्स के साथ संपर्क स्थापित किया है।  चुनाव विश्लेषक और कोलकाता के रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर बिस्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार ये सिंडिकेट आमतौर पर सत्ताधारी पार्टी और प्रशासन के कनेक्शन वाले स्थानीय मजबूत लोगों द्वारा चलाए जाते हैं। चक्रवर्ती ने कुछ इस तरह से समझाया, “1990 के दशक में, विभिन्न किसानों और ज़मींदारों को आय के स्रोत के बिना छोड़ दिया गया था, जब वाम मोर्चा सरकार ने शहर के उत्तर-पूर्वी किनारे पर राजारहाट टाउनशिप के लिए भूमि का अधिग्रहण किया था। मुआवजे के अलावा, उन्हें दिलासा देने के लिए सरकार ने उन्हें एक सिंडिकेट के रूप में रोजगार की पेशकश की। इन सिंडिकेट्स को अनौपचारिक सहकारी समितियों के रूप में डिजाइन किया गया था, जो रियल एस्टेट डेवलपर्स को निर्माण सामग्री की आपूर्ति करते थे।” चक्रवर्ती ने कहा कि “जब तृणमूल कांग्रेस 2011 में सत्ता में आई थी, तो गुंडों और सहकारी मानदंडों द्वारा चलाए जा रहे सिंडिकेट प्रणाली को बेकार कर दिया गया था, जो किसी भी मामले में नए भूमिहीन किसानों और सरकार के बीच अनौपचारिक व्यवस्था थी । आमतौर पर, रियाल्टार ने स्थानीय सिंडिकेट से सामग्री खरीदी और उनके द्वारा आपूर्ति किए गए मजदूर को नियुक्त किया। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उन्हें प्रति वर्ग फुट कमीशन देना पड़ता है। पैसे का एक हिस्सा पार्टी फंड में जाता है।” सिंडिकेट से जुड़े स्थानीय पेंटर और प्लास्टर के ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि सिंडिकेट प्रणाली वजह से काम मिलने के कारण वह तृणमूल कांग्रेस सरकार के प्रति आभारी है। उनके सभी मजदूर ( लगभग पांच से 15 आदमी ) ढाकुरिया स्टेशन पर आते हैं और प्रत्येक को प्रतिदिन 400 रुपये का भुगतान किया जाता है। आईआईएम के मैत्री ने कहा, “अनौपचारिक क्षेत्र में, राजनीतिक या शक्तिशाली व्यक्तियों के साथ नेटवर्क होना बहुत महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि कमजोर श्रमिकों का एक बड़ा प्रतिशत बाहर रह गया है। जो लोग रोजगार पाते हैं, वे अभी भी असुरक्षित हैं,क्योंकि उनके पास कोई मोलभाव करने की शक्ति नहीं है। इस प्रकार के संरक्षक-ग्राहक संबंध निर्माण क्षेत्र में व्याप्त हैं।  “

 

पश्चिम बंगाल के श्रम राज्य मंत्री निर्मल माजी ने सिंडिकेट सिस्टम के भ्रष्टाचार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को फर्जी कहते हुए खारिज कर दिया।  उन्होंने कहा कि 2017 में असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए शुरू की गई तृणमूल सरकार की सामाजिक सुरक्षा योजना, “एक ऐतिहासिक कानून” था। यह योजना विभिन्न तरह के लाभ प्रदान करती है, जिसमें भविष्य निधि, श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य कवरेज और उनके आश्रितों को मुआवजा देना शामिल है। विकलांगता या मृत्यु के मामले में, श्रमिकों के बच्चों के लिए शिक्षा, और असंगठित क्षेत्र के सभी पंजीकृत मजदूरों के लिए सुरक्षा और कौशल विकास में प्रशिक्षण। लाभार्थियों की संख्या स्पष्ट नहीं है।

 

राजमिस्त्री अमित सिंह भाग्यशाली लोगों में से एक हैं। वह हावड़ा से 20 किमी की दूरी पर स्थित रूबी अस्पताल बस स्टैंड के पास के एक श्रम हब पर एक स्थानीय सिंडिकेट के साथ काम करने के लिए आते हैं। पिछसे चार साल से वह नियमित रूप से काम करते हैं,लेकिन  आने-जाने और भोजन पर 100 रुपये की खपत होती है (दैनिक कमाई का एक चौथाई ) और जीवन में एक नई शुरुआत करने के लिए बहुत कम बचता है।

 

अस्थिर आय वाले एक वैन चालक का बेटा,  सिंह 32 वर्ष के हैं, जो बेहतर जीवन की कुछ संभावनाओं के साथ काम कर रहे हैं।  ढाकुरिया स्टेशन पर, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) के सचिव मदन सुनार ने गर्व के साथ घोषणा की कि उनकी एआईटीयूसी इकाई में 5,000 सदस्य थे और स्वास्थ्य आपात स्थिति, अपराधों और अधिक के दौरान सहायता प्रदान करके मंच पर “प्रत्येक कार्यकर्ता” की देखभाल की। मजदूरों ने विरोध किया और कहा कि सदस्यता को मजबूर किया गया। नाम न बताने की शर्त पर एक कार्यकर्ता ने कहा, ” हमें संघ के खजाने में नियमित रूप से मौद्रिक योगदान देना होता है। वे 50 रुपये मांगते हैं, लेकिन अगर हम काम नहीं करते हैं तो हम कैसे भुगतान कर सकते हैं?” अन्य लोगों ने कहा कि वे छोटे लाभ उठाने के लिए पंजीकरण करते हैं और संघ के ‘गुड बुक’ में बने रहते हैं। इससे पहले एक मजदूर ने कहा कि अगर उन्होंने योगदान नहीं दिया तो यूनियन ने स्टेशन पर किसी को भी खड़े होने से मना कर दिया।

 

2014 के अपने लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र में, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने पूरे भारत में ग्रामीण और शहरी युवाओं के लिए नेशनल युवा विस्टा योजना की बात की थी। इसने गरीबों के लिए आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और रोजगार कार्यक्रमों का वादा किया था।

 

यह 2019 है, और जैसा कि पश्चिम बंगाल में 17, 24 और 30 अप्रैल को आम चुनाव की तैयारी है, और 7 और 12 मई को जनसांख्यिकीय लाभांश को पुनः प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं दिखता है।

 

चक्रवर्ती ने कहा, “पश्चिम बंगाल में, बाहुबल आर्थिक समृद्धि की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।”

 

ढाकुरिया स्टेशन पर, अधिकांश मजदूरों ने कहा कि वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में भेजने के लिए तरस रहे हैं। सिर्फ दो समय का भोजन करते हैं और रहने के लिए जगह होती है। दास ने कहा, “मेरे सपने आसान से थे। सोचा था यदि कभी कुछ खरीद पाया तो अपने लिए जमीन का एक टुकड़ा खरीदूंगा और अपने परिवार के लिए एक छोटा सा घर बनाऊंगा। यह पूछे जाने पर कि वह आगामी आम चुनाव में किसे वोट देंगे, उन्होंने कहा. ” उसे जो यात्रा के लिए भुगतान करता है और मुझे भोजन देता है।”

 
यह 11 रिपोर्टों की श्रृंखला में यह पांचवी रिपोर्ट है। कुछ अन्य शहरों इंदौर, जयपुर, पेरम्बूर और अहमदाबाद से रिपोर्ट पढ़ने के लिए।
 

भट्टाचार्जी कोलकाता के एक स्वतंत्र लेखक और 101Reporters.com की सदस्य हैं, जो एक अखिल भारतीय स्तर पर जमीन से जुड़े पत्रकारों का नेटवर्क है।)

 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 8 अप्रैल, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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