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आंत स्वस्थ, जिंदगी मस्त

चारु बाहरी,
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Vineet Ahuja_620

 

माउंट आबू (राजस्थान): ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और एक नए अध्ययन, जिसमें पाया गया कि ग्रामीण भारत में अधिक स्वस्थ आंत वाले लोग हैं,’ के सह-लेखक विनीत आहूजा के अनुसार, संसाधित भोजन, अत्यधिक स्वच्छतापूर्ण वातावरण और शहरी जीवनशैली आपके आंत में दोस्त बैक्टीरिया को कम कर सकते हैं, जिससे भारत में जीवन शैली की बिमारियां महामारी का रूप ले रही हैं।

 

कम ऊंचाई में रहने वाले ग्रामीण भारतीयों के पास आस-पास रहने वाले शहरी भारतीयों और उच्च ऊंचाई पर रहने वाले ग्रामीण भारतीयों की तुलना में स्वस्थ आंत हैं। यह बात ‘जर्नल नेचर साइंटिफिक रिपोर्टस’ में प्रकाशित भारतीय और ब्रिटिश वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चलता है।

 

एक स्वस्थ आंत शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देता है। यह  कई आवश्यक शारीरिक कार्यों के लिए जरूरी है। जैसे संश्लेषण एंजाइम और विटामिन, रोग पैदा करने वाले विषाणु को दबाना और शरीर में बाहरी रासायनिक पदार्थों की विषाक्तता को कम करना । इसमें रहने वाले 90 फीसदी बैक्टीरिया शरीर के लिए सुरक्षात्मक हैं।

 

वैज्ञानिकों ने हरियाणा में बल्लभढ़ के ग्रामीण और शहरी और ग्रामीण लेह से स्वस्थ व्यक्तियों के तीन समूहों का अध्ययन किया। जिसे एक अध्ययन स्थल के रूप में चुना गया वह एक “इंसुलर क्षेत्र” है, जो शहरीकरण के प्रभाव से दूर है और जिसने देश के बाकी हिस्सों में आहार, जीवन शैली और बिमारियों के प्रोफाइल को प्रभावित किया है।

 

52 वर्षीय अहुजा ने इंडियास्पेंड को बताया, “हम परीक्षण करना चाहते थे कि इन बराबरी के लोगों के बीच पहला कौन आएगा।”

 

कुल मिलाकर देखा गया कि एक्टिनोबैक्टेरिया (5.2 फीसदी) और प्रोटीबैक्टेरिया (4.2 फीसदी) नामक खतरनाक बैक्टीरिया की कम मात्रा के साथ  इन समूहों के आंत पर अच्छे बैक्टीरिया का प्रभुत्व था, जिसे फर्मिक्यूट्स (62 फीसदी) और बैक्टीरॉयडेट्स (24 फीसदी) कहा जाता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने इन समूह के लोगों की आंतों के सूक्ष्मजीवों में महत्वपूर्ण अंतर पाया, जिसके लिए उन्होंने भौगोलिक स्थान और आहार को जिम्मेदार माना।

 

स्वस्थ आंतों वाले ग्रामीण निवासी कम से कम स्वस्थ आंत के साथ वाले शहरी आबादी के समीप रहते थे। इससे इस बात को बल मिलता है कि एक स्वस्थ आंत माइक्रोबायम को बनाए रखने में शारीरिक वातावरण, आहार और जीवन शैली एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

यह खोज महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले दशक के इस शोध ने बीमारी में आंत की भूमिका को बड़े अच्छे ढंग से सामने लाया है। अहुजा कहते हैं, “अब हम जानते हैं कि आंत शरीर के हर हिस्से को न केवल प्रभावित कर सकती है, बल्कि रोगजनकता या मधुमेह, कोरोनरी धमनी रोग और यहां तक ​​कि तंत्रिका संबंधी विकार जैसी पुरानी बिमारियों के विकास में भी योगदान दे सकती है।”

 

मधुमेह भारत की सबसे तेजी से बढ़ती बीमारी है, जैसा कि 2016 के ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट से पता चलता है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने सितंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है। वर्तमान में 2017 में अनुमानित 72 मिलियन मामलों के साथ दुनिया के मधुमेह के बोझ का 49 फीसदी भारत पर है।

 

इसी स्रोत के मुताबिक 2016 में दिल की बीमारी भारत में मौत का प्रमुख कारण रहा। इससे 2016 में 1.7 मिलियन भारतीयों की मौत हो गई।

 

” प्राचीन पारंपरिक ज्ञान हमें बताते हैं कि सभी बीमारियां पेट से शुरू होती हैं। इसे हमने कभी भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है, हालांकि आंत माइक्रोबायम अध्ययन निश्चित रूप से इस विचार का सुझाव दे रहे हैं कि अधिकांश बिमारियों में सूक्ष्म जीवों में बदलाव के साथ एक रिश्ता होता है, जो आंत को अपना आवास बनाते हैं।” प्रोफेसर विनीत आहूजा के साथ साक्षात्कार के अंश:

 

आपके अध्ययन में संक्रामक से गैर संक्रामक बिमारियों में संक्रमण का उल्लेख है। रोग महामारी विज्ञान के इस परिवर्तन में गट बैक्टीरिया क्या भूमिका निभाता है?

 

आम तौर पर, एक गैर-संक्रमणीय बीमारी की शुरुआत को आनुवांशिक कारणों, एक अपरिवर्तनीय प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और शारीरिक वातावरण, जिसमें आहार और जीवन शैली शामिल है,  में देखा जा सकता है। आपके आंत माइक्रोबायम की गुणवत्ता आपके द्वारा खाए जाने वाले भोजन और आपके द्वारा रहने वाले भौतिक वातावरण पर निर्भर करती है। प्रसंस्कृत भोजन आंत में अच्छे बैक्टीरिया के प्रसार के लिए अनुकूल नहीं है और न ही अत्यधिक स्वच्छता वाले वातावरण में रहना। एक स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली को बनाए रखने में गट बैक्टीरिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शोध के दौरान बल्लभगढ़ के ग्रामीण निवासी अपने शहरी समकक्षों के समीप रहने वालों की तुलना में काफी स्वस्थ आंत वाले थे, जिससे शारीरिक पर्यावरण के प्रभाव के साथ-साथ आहार संबंधी आदतों का भी बड़ा योगदान है। भारत में  पश्चिमी आहार की लोग बढ़ती अभिरूचि और शहरीकरण से जुड़ा जीवन शैली आंत माइक्रोबायम में परिवर्तन और गैर-संक्रमणीय बिमारियों के प्रमुख कारण हैं।

 

आंत और उसकी संरचना को कैसे भोजन प्रभावित करता है? आपके अध्ययन के निष्कर्ष हमें आदर्श आहार के बारे में क्या बताते हैं? एक स्वस्थ आंत माइक्रोबाइम बनाए रखने के लिए किस तरह का आहार बेहतर है?

 

विभिन्न प्रकार के भोजन सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को अलग-अलग ढंग से प्रोत्साहित करते हैं। अपने अध्ययन से मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा। लेह में व्यक्ति डेयरी उत्पादों को आम तौर पर आहार में शामिल नहीं करते। हमने पाया कि उनके आंत माइक्रोबायम में डेयरी उत्पादों से जुड़े खराब बैक्टीरिया ‘स्यूडोमोनास’ की कमी है।

 

हमने खाना पकाने के तेल और आंत संरचना के बीच के संबंध को देखा। ‘रोजबूरिया’  एक प्रकार का सुरक्षात्मक बैक्टीरिया है। जो लोग सूरजमुखी तेल का इस्तेमाल खाना पकाने में करते थे, उनमें इस बैक्टीरिया की प्रचुरता थी। निष्कर्ष यह है कि एक निश्चित प्रकार का भोजन कुछ बैक्टीरिया के विकास को प्रोत्साहित करता है। ‘रोजबूरीया’ से संबंधित प्रजातियों के पास हमारे आंत माइक्रोबायम में पॉली-असंतृप्त फैटी एसिड (पुफा), विशेष रूप से लिनोलेइक एसिड को तोड़ने की क्षमता दिखाई देती है। हमने ‘कोलिंसेला’ को विशेष रूप से घी लेने वाले व्यक्तियों के आंत माइक्रोबायम में प्रचुर मात्रा में पाया। दिलचस्प बात यह है कि ‘कोलिंसेला’ को पहले उच्च सीरम कोलेस्ट्रॉल और लक्षण एथेरोस्क्लेरोसिस के साथ जोड़ा गया है। हमारे अध्ययन में, सूरजमुखी तेल लेह की आबादी का मुख्य खाना पकाने माध्यम विकल्प था, जबकि बल्लभढ़ व्यक्तियों ने सरसों का तेल, सोयाबीन तेल और घी (स्पष्ट मक्खन) पसंद किया था।

 

हमें आंत संरचना पर मांसाहारी भोजन का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं मिला। वास्तव में, हमने गैर-शाकाहारी भोजन वाले व्यक्तियों में सुरक्षात्मक ‘प्रोटेटेला’ बैक्टीरिया की उच्च मात्रा देखा। यह दिलचस्प था, क्योंकि ‘प्रोडोटेला’ परंपरागत रूप से फाइबर समृद्ध शाकाहारी आहार वाले व्यक्तियों से जुड़ा हुआ बताया गया है।

 

लेह के अधिकांश लोगों में ‘प्रोटीबैक्टेरिया’ नामक दुश्मन बैक्टीरिया कम से कम देखा गया था, और अच्छे बैक्टीरिया जैसे ‘फिकैलिबैक्टीरियम’ और ‘लैचनोस्पिरैसीए’ की प्रचुरता थी,  जो आपसे में लड़ते रहते हैं।

 

एक सामान्य नियम के रूप में, संसाधित भोजन आंत में अच्छे बैक्टीरिया के प्रसार के लिए अनुकूल नहीं है। भारतीय शहरों में ऑटोम्यून्यून विकारों और सूजन संबंधी विकारों में वृद्धि के लिए शहरीकरण और पश्चिमी आहार को जिम्मेदार माना गया है। माना जाता है कि शाकाहारी आहार मित्रवत बैक्टीरिया फर्मिक्यूट पेश करता है।

 

मैं ये भी कहना चाहता हूं कि इस अध्ययन में हमारे पास 84 नमूने थे। यह एक छोटा सा अध्ययन था। आहार और आंत संरचना के बीच संबंध को समझने के लिए हमें बड़े अध्ययन की आवश्यकता है।

 

अध्ययन में सहयोगी संस्थान फरीदाबाद के ‘ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट’ के सह लेखक डॉ भबातोश दास कहते हैं, इस अध्ययन की एक बड़ी खोज यह है कि हमें ग्राम पॉजिटिव बैक्टीरिया (फर्मिक्यूट्स) भारतीय लोगों की आंतों में प्रचुर मात्रा मिले जबकि पश्चिमी देशों के लोगों की आंतों में सबसे प्रचुर मात्रा में बैक्टीरॉयडेट जीवाणु होते हैं।

 

आंत माइक्रबायोम में परिवर्तन क्यों मनुष्यों को बिमारियों की ओर धकेलता है? आंत माइक्रोबायम के कारण किस तरह की बिमारियां हो सकती हैं?

 

पिछले दशक में चिकित्सा अनुसंधान ने मानव शरीर की संरचना की हमारी समझ को विकसित किया है। अब हम जानते हैं कि शरीर अतिसंवेदनशील है, हर एक मानव कोशिका नौ जीवाणु कोशिकाओं से बना होते हैं जो आंत में रहते हैं। यह नई सोच बन रही है कि हम आंत माइक्रोबायम और बीमारी के बीच संबंध कैसे देखते हैं। आंत माइक्रोबायोम से आंत या आंत के रोग की बात लोग कहते थे,  लेकिन अब हम जानते हैं कि यह कई स्क्लेरोसिस (एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी) या मधुमेह (अंतःस्रावी तंत्र का विकार) जैसे बिमारियों के कारण भी हो सकते हैं।

 

बेशक गट बैक्टेरिया के कारण होने वाली बिमारी इस पर निर्भर करेगा कि क्या डायबिओसिस,  ( मतलब  माइक्रोबियल असंतुलन ) तीव्र या पुरानी है। आंत बैक्टीरिया में एक अचानक परिवर्तन से दस्त की तरह एक गंभीर बीमारी हो सकती है। हालांकि इससे क्रोनिक डिस्बिओसिस किसी व्यक्ति को कुपोषण, सूजन आंत्र रोग, फैटी यकृत, मोटापे, चयापचय और न्यूरोनल रोग, कोलोरेक्टल कैंसर, कोरोनरी हृदय रोग, रूमेटोइड गठिया और ऑटोम्यून और मनोवैज्ञानिक विकार जैसे गैर-संक्रमणीय बीमारियां भी हो सकती हैं।

 

बल्लभढ़ में रहने वाले ग्रामीण समुदाय में आपको उच्चतम माइक्रोबियल विविधता मिली। माइक्रोबियल विविधता क्यों आवश्यक है? आपने पाया कि आंत-कोहोर्ट भिन्नता लेह आबादी में आंत माइक्रोबायम के भीतर सबसे कम थी। यह हमें क्या बताता है?

 

गट बैक्टीरिया भोजन को पचाने में मदद नहीं करता है। वे एंजाइम, विटामिन, न्यूरोट्रांसमीटर और अन्य मेटाबोलाइट्स जैसे फोलिक एसिड और शॉर्ट चेन फैटी एसिड को संश्लेषित करते हैं। ये स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं और प्रतिरक्षा को बढ़ावा देते हैं।

 

माइक्रोबायोम पित्त लवण चयापचय, आंतों रोगजनक (रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया) की विषाणु को दबाता है और शरीर में बाहरी रासायनिक पदार्थों की विषाक्तता को कम करता है। और भी वे बहुत कुछ करते हैं। बात यह है कि आंत बैक्टीरिया के विभिन्न परिवार विभिन्न कार्यों का प्रदर्शन करते हैं। तो आदर्श स्थिति में अत्यधिक विविध आंत बैक्टीरिया और एक समृद्ध जीन पूल होना है।

 

लेह में हमारे नमूने में आंत माइक्रोबायम में उच्च समानता से पता चलता है कि कम लोग बाहर से उस स्थान पर आए हैं। एक परिवार के सदस्य (या एक अत्यधिक अनौपचारिक समुदाय) के लिए समान वातावरण होता है। माइग्रेशन एक समुदाय के लिए नए आंत माइक्रोबायोम पेश करता है। संयोग से, इस कारण से लेह को एक अध्ययन स्थल के रूप में चुना गया था। इसे ऑटोम्यून्यून विकारों के साथ-साथ सूजन प्रतिरक्षा विकारों से भी इन्सुलेट किया गया है ,जो भारत के प्रमुख शहरों में अधिक लोगों को प्रभावित कर रहे हैं।

 

‘फैकेल माइक्रोबायोटा प्रत्यारोपण’ सूजन आंत्र रोग के लिए अपेक्षाकृत नया उपचार है, जिससे रोगी के आंत में पूरे आंत पर्यावरण को प्रत्यारोपित किया जाता है, ताकि उसे स्वस्थ आंत संरचना प्राप्त हो सके। इस प्रकार, यह प्रोबियोटिक, या केवल अच्छे बैक्टीरिया को प्रशासित करने से अलग है। प्रत्यारोपण प्रक्रिया में एक सलीन  सौल्यूशन के साथ एक दाता से फिकल पदार्थ मिश्रण को रोगी में कोलोनोस्कोपी, एंडोस्कोपी, सिग्मोइडोस्कोपी या एनीमा द्वारा रखना शामिल है। पश्चिमी देशों में, फिकल माइक्रोबायोटा प्रत्यारोपण आवर्ती क्लॉस्ट्रिडियम डिफिसिल संक्रमण वाले रोगियों के लिए देखभाल के मानक के रूप में उभरा है और इन रोगियों के लिए एक नए चिकित्सा के रूप में उभर रहा है। भारत में इस प्रत्यारोपण प्रक्रिया के तरीके पर आपके निष्कर्षों का क्या असर हो सकता है?

 

क्लॉस्ट्रिडियम डिफिसाइल बैक्टीरिया के साथ संक्रमण अभी भी भारत में अपेक्षाकृत असामान्य है, लेकिन उस गति को देखते हुए जिस गति से जीवन शैली बदल रही है, इसकी घटनाएं बढ़ने लगी हैं। इन्फ्लैमेटरी बाउल रोग भारत में काफी आम है । हमने 2013 में फिकल माइक्रोबायोटा प्रत्यारोपण की पेशकश शुरू की और वर्तमान में, इसे 10 सूजन आंत्र रोगियों में से एक पर आजमा रहे हैं, जो परंपरागत उपचारों से ठीक नहीं हो पाते हैं। फिकल माइक्रोबायम प्रत्यारोपण की अनौपचारिक अपील के बावजूद, आश्चर्यजनक रूप से, हमारे रोगी इसे काफी स्वीकार कर रहे हैं। जब हमने शुरू किया, हम मरीज के पति या करीबी रिश्तेदार से आंत माइक्रोबायम का इस्तेमाल करते थे। धीरे-धीरे हमने पाया कि उनके आंत माइक्रोबायम आमतौर पर रोगी के समान ही थे, और इसलिए उपचार की सफलता में बाधा आ गई। इसलिए हमने उनके परिवारों से अलग अज्ञात दाता का उपयोग करना शुरु किया। हमारे अध्ययन निष्कर्ष हमें बताते हैं कि इस उपचार के लिए सबसे अच्छा दाता कौन हो सकता है, वे हैं ग्रामीण भारत के स्वस्थ वयस्क।

 

(बाहरी एक स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं। राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 05 अगस्त, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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