Home » Cover Story » आईआईटी में दलित प्रोफेसरों की संख्या ज्यादा होती तो क्या अनिकेत अंभोर की जान बच सकती थी?

आईआईटी में दलित प्रोफेसरों की संख्या ज्यादा होती तो क्या अनिकेत अंभोर की जान बच सकती थी?

चारु बाहरी,
Views
3256

iit_620

22 वर्षीय अनिकेत अंभोर आईआईटी मुबंई में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का दलित छात्र था। सितंबर 2014 में संस्थान छात्रावास की छठी मंजिल से गिरने से उसकी मौत हो गई थी। जाति के आधार पर भेदभाव से दलित छात्रों में उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए अयोग्य होने की भावना आ सकती है। यह तस्वीर सुनीता अंभोर के सौजन्य से।

 

मार्च 2012 में सुनीता और संजय अंभोर को आईआईटी मुबंई से एक चिट्ठी मिली। चिट्ठी में लिखा था कि उनके बेटे अनिकेत अंभोर अपने कॉलेज के दो पाठ्यक्रमों में विफल रहा है। अनिकेत अंभोर को इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में अनुसूचित जाति कोटे में दाखिला मिला था।

 

अनिकेत के पिता संजय अंभोर बैंक में मैनेजर हैं और अकोला के दलित जाति से हैं, जबकि अनिकेत की मां, सुनीता, एक जूनियर कॉलेज में व्याख्याता हैं । सुनीता दलित नहीं हैं। चिट्ठी मिलने के बाद अनिकेत के माता-पिता ने उसके एक प्रोफेसर से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि उनका बेटा आईआईटी के विशाल कोर्स के बोझ को सहन नहीं कर सकता है और वह एक “सामान्य” इंजीनियरिंग कॉलेज में खुश रहेगा, जहां कम मानकों के साथ पढ़ाई होती है । उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति के छात्रों को चार साल में पूरा होने वाले कोर्स के लिए आठ साल का समय लगता है। प्रोफेसर ने अनिकेत को पढ़ाई में ध्यान लगाने के लिए परामर्श का सुझाव भी दिया।

 

प्रोफेसर से मिली इस तरह की टिप्पणियां संजय और सुनीता के लिए आघात के समान थे, जो अब तक उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के साथ इस तरह के होने वाले व्यवहारों से लगभग अनजान थे।

 

वर्ष 2007 में शिक्षाविद् कुरमना  सिंह चालम की लिखी किताब ‘चैलेंज ऑफ हाईयर एजुकेशन’ आई है। इस किताब में वह लिखते हैं, “कुछ उच्च जाति के प्रोफेसर दलित छात्रों को शिक्षा के योग्य नहीं समझते हैं।”

 

अनिकेत के संदर्भ में देखें तो जाति के आधार पर भेदभाव और उपहास से दलित छात्रों में यह भावना घर कर सकती है कि वे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए योग्य नहीं हैं। ऐसी ही बात वर्ष 2013 में भारतीय विश्वविद्यालय पर ‘किंग्स कॉलेज लंदन’के इस अध्ययन के निष्कर्ष में देखी गई है। यह अध्ययन अब‘फेसस ऑफ डिस्क्रिमनेशन इन हाईयर एजुकेशन इन इंडिया: कोटा पॉलिसी, सोशल जस्टिस एंड द दलितस ’ नाम से किताब के रुप के उपलब्ध है।

 

इंडियास्पेंड से बात करते हुए सुनीता ने यह भी बताया कि प्रोफेसर ने जो कुछ भी कहा, वह अनिकेत को गलत नहीं लगा, क्योंकि शायद वह सब सुझाव के रुप में कही गई बातें थीं।”

 

अनिकेत ने सीबीएससी की 10वीं बोर्ड परीक्षा में 93 फीसदी और  महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में 86 फीसदी अंक प्राप्त किए थे। अनिकेत ने कुछ अच्छा करने के उद्देश्य से अपने माता-पिता से कहा था कि वह आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा दोबारा देना चाहता है, जो उसने वर्ष 2011 में पास की थी।

 

चिट्ठी मिलने से लेकर अगस्त 2014 के बीच अंभोर दंपत्ति ने अपने बेटे के आत्मविश्वास को फिर से हासिल करने में मदद करने के लिए तीन मनोचिकित्सकों से सलाह ली। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं आया। धीरे-धीरे, प्रतिभाशाली अनिकेत (आईआईटी मुंबई समारोह में गायन सुनने के लिए यहां क्लिक करें) ढहते आत्मविश्वास वाला एक चेहरा बन कर रह गया।

 

अगस्त 2014, अनिकेत के विभाग के प्रमुख और शैक्षणिक पुनर्वास कार्यक्रम के प्रमुख (एआरपी) के बीच एक मीटिंग की गई थी, जो अच्छी नहीं रही। एआरपी प्रमुख ने कहा कि एक और परीक्षा में विफल होना अनिकेत के लिए घातक हो सकता है। इससे लिए अच्छा होगा कि वह खुद ही कोर्स छोड़ दे और किसी गैर सरकारी संगठन में शामिल हो जाए या एक शिक्षक के रूप में कैरियर पर विचार करे।

 

4 सितंबर, 2014 को, अनिकेत आईआईटी-बी छात्रावास की छठी मंजिल से गिर गया, जिससे उसकी मौत हो गई। यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि यह एक दुर्घटना थी या फिर उसने छठी मंजिल से छलांग लगाई थी।

 

परिसर में दिखते हैं पूर्वाग्रह : आईआईटी मुंबई के निदेशक

 

मीडिया ने अनिकेत की मौत को (जैसा कि टाइम्स ऑफ इंडिया के सितंबर 6, 2014 की रिपोर्ट में बताया गया है) पढ़ाई के साथ संघर्ष के रुप में दिखाया है, लेकिन इस बात जिक्र नहीं किया गया है कि अनिकेत के माता-पिता ने एचओडी को बार-बार अनिकेत पर शैक्षणिक भार को कम करने के लिए कहा है, जैसा कि अनिकेत की मृत्यु के बाद आईआईटी-बी को प्रस्तुत अपने 10 पन्ने की गवाही में कहा गया है।

 

दोहरे एमटेक डिग्री प्रोग्राम को परिवर्तित करने की संभावना के संबंध में उन्हें सूचित करने की बजाय अनिकेत को एक छोटी बीटेक कार्यक्रम के लिए नामांकित किया गया था।

 

रिपोर्ट में अनिकेत की मौत को एक दुर्घटना के रूप में वर्णित किया गया और रिपोर्टिंग में अनाम मित्रों से टिप्पणी शामिल की गई, जिन्होंने बताया कि अनिकेत आत्महत्या नहीं कर सकता है।

 

धर्म और आध्यात्मिकता की ओर अनिकेत की बढ़ते रूझान का उल्लेख भी मीडिया रिपोर्टिंग में नहीं किया गया है। हालांकि वह एक नास्तिक माहौल में पला-बढ़ा था।

 

आईआईटी प्रणाली जाति शिकायतों के निवारण के लिए एक अनुसूचित जाति / जनजाति सलाहकार प्रदान करती है और यह सुविधा आदिवासी छात्रों के लिए भी है, जिनके लिए अतिरिक्त 7.5 फीसदी सीटें आरक्षित हैं।

 

इंडियास्पेंड से बात करते हुए आईआईटी मुंबई के निदेशक देवांग खख्खर ने बताया कि, “परिसर में कुछ जातिगत पूर्वाग्रह दिखते हैं, ज्यादातर सवर्ण छात्र आरक्षण प्रणाली के साथ अपने असंतोष व्यक्त करते हैं।”

 

जाति शिकायतों के निवारण की उपयोगिता के उपर भी सवाल खड़े हुए हैं। वर्ष 2011 में बने एक वृत्तचित्र ‘डेथ ऑफ मेरिट’ के फिल्मकार अनूप कुमार कहते हैं  कि वर्ष 2007 से 2011 के बीच आईआईटी में किए गए आत्महत्याओं में से 80 फीसदी दलित थे और इन संस्थानों में से कहीं भी जाति आधारित भेदभाव पर शिकायत निवारण तंत्र नहीं था।

 

सुनीता समझ नहीं पा रही है कि आईआईटी-बी में दलित छात्र के रुप में दाखिला लेने से अनिकेत की प्रतिभा का ग्राफ नीचे की ओर कैसे चला गया ? क्या महीने भर में उसका शैक्षणिक संकट इतना बड़ा हो गया कि वह उसे अपने दलित होने से जोड़कर देखता रहा और फिर उसमें अयोग्य होने की भावना घर कर गई। कुछ उसी तरह,जैसा कि ‘किंग्स कॉलेज लंदन’ का यह अध्ययन कहता है? क्या अनिकेत के लिए यह परिस्थिति मददगार होती कि अगर कुछ प्रोफेसर उसकी ही पृष्ठभूमि से होते? भारत के 23 आईआईटी में दलित प्रोफेसरों की संख्या बहुत कम है।

 

1.1 फीसदी आईआईटी में दलित वर्ग के फेकल्टी, क्या संख्या में वृद्धि होने से पड़ेगा दलित छात्रों पर फर्क?

 

यह सुनिश्चित करने के लिए कि उच्च शिक्षा संस्थानों में मौजूद सीटों में से दलित छात्रों के लिए  15 फीसदी सुरक्षित रहे, 1950 के दशक में कोटा प्रणाली नियम आया था। इसी अनुपात में इस पृष्ठभूमि से फैकल्टी के भी आने की उम्मीद की गई थी।

 

-फेसस ऑफ डिस्क्रिमनेशन इन हाईयर एजुकेशन इन इंडिया: कोटा पॉलिसी, सोशल जस्टिस एंड द दलितस

 

जुलाई 2016 में, इंडियास्पेंड ने बताया है कि किस प्रकार सकारात्मक कार्रवाई से वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों को कॉलेज में प्रवेश मिलने में मदद मिलती है।

 

वंचित जातियों द्वारा अनुमानित इंजीनियरिंग कॉलेज के नमांकन

Source: American Economic Review
Hover over the chart for more details.
BC-A, BC-B, BC-C, BC-D refer to sub-categories A, B, C, D of Backward Caste. SC: Scheduled Caste, ST: Scheduled Tribe.

 

वर्ष 2008 में सरकार ने आईआईटी को सहायक प्रोफेसर और विज्ञान और प्रौद्योगिकी विषयों में व्याख्याता के प्रवेश स्तर के पद और अन्य विषयों में सभी संकाय पदों पर 15 फीसदी, 7.5 फीसदी और 27 फीसदी क्रमश: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति के फैकल्टी नियुक्त करने का आदेश दिया है।

 

लगभग एक दशक के बाद भी आईआईटी में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शिक्षकों की संख्या आप अपनी उंगलियों पर गिन सकते हैं।

 

वर्ष 2012 में लोकसभा में दिए गए एक बयान के अनुसार आईआईटी शिक्षकों के पदों में से 1.12 फीसदी से अधिक पर दलित शिक्षक तैनात नहीं हैं। आईआईटी फैकल्टी के 0.12 फीसदी आदिवासी थे,  जबकि अन्य पिछड़े वर्ग के फैकल्टी 1.84 फीसदी थे। 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का अनुपात 16.6 फीसदी और 8.6 फीसदी था।

 

आईआईटी में फैकल्टी आरक्षण

Source: Lok Sabha; *Based on the sanctioned strength of 5,706

 

जून 2015 में  एक पूर्व छात्र द्वारा एक सूचना के अधिकार अनुरोध द्वारा प्राप्त एक जवाब के अनुसार, आईआईटी मद्रास में 2.42 फीसदी शिक्षक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के थे, जबकि आईआईटी बॉम्बे के लिए ये आंकड़े 0.34 फीसदी थे, जैसा कि 26 जून 2015 को हिंदू की इस रिपोर्ट में उद्धृत किया है।

 

अनुसूचित जाति / जनजाति संकाय की यह कमी परंपरागत रूप से वंचित समूहों से आए छात्रों को प्रभावित कर सकता है।तेजपुर विश्वविद्यालय के एमिनेंस के प्रोफेसर समाजशास्त्री वर्जिनियन जोजो कहते हैं, “विचारशील और सहायक फैकल्टी, जो छात्र की समस्याओं के साथ सही मायने में सहानुभूति रखते हैं, उनकी संख्या कम है। ” प्रोफेसर ने दिल्ली विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के छात्रों के प्रति प्रतिकूल रवैया का अध्ययन किया है, जैसा कि इस टिप्पणी में देखा जा सकता है। जोजो कहते हैं कि, ” प्रचलित रवैया तो यही है कि कोटा के माध्यम से आने वाले छात्र अयोग्य होते हैं।”

 

आईआईटी में क्यों अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़े वर्ग के फैकल्टी हैं कम?

 

आईआईटी-बॉम्बे, आईआईटी-कानपुर और आईआईटी- मद्रास के निदेशकों ने इंडियास्पेंड को बताया कि पर्याप्त अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के पर्याप्त फैकल्टी न होने के मुख्य कारण यही है कि आवेदक कम हैं।

 

आईआईटी-बॉम्बे के खाखर कहते हैं, “हमारे पास अनुसूचित जाति के बहुत कम फैकल्टी हैं, क्योंकि इस श्रेणी से बहुत कम आवेदक मिलते हैं।”

 

आईआईटी कानपुर के निदेशक इंद्रनील मन्ना कहते हैं, “हमें अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति से बहुत कम ऐसे उम्मीदवार मिलते हैं जो आईआईटी संकाय के लिए न्यूनतम योग्यता को पूरा करते हों। हालांकि, हम कानून और अपने सामाजिक दायित्व के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम आईआईटी ब्रांड की रक्षा करने के लिए उत्सुक भी हैं, जो एक विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त भारतीय ब्रांड है और जिसे बनाने में 50 साल लगे हैं।”

 

क्या ऐसे पूर्वाग्रह वंचित समुदायों से आए फेकल्टी के रोजगार में बाधा डाल सकते हैं?

 

अगस्त 2016 में मद्रास उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला है कि आईआईटी मद्रास ने पिछड़ी जाति से एक संकाय सदस्य एसोसिएट प्रोफेसर डब्लू बी वसंत के प्रमोशन के लिए वर्ष 1995 में और उसके बाद फिर वर्ष 1997 में कम योग्य उम्मीदवारों के लिए ” भारी अनियमितता ” की है।

 

आईआईटी खड़गपुर के पूर्व सदस्य और गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के वरिष्ठ प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बडे कहते हैं,“भारत में ऐसी कोई जगह नहीं, जहां दलितों के खिलाफ पूर्वाग्रह मौजूद नहीं है।”

 

भारत के संविधान के लेखक बी आर अम्बेडकर के पौत्र तेलतुम्बडे कहते हैं, “दलितों को प्रबंधकीय स्तर पर रोजगार दिलाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र को कई वर्ष लगे हैं। भारत में आईआईटी में दलित छात्रों को स्वीकार करने का फैसला किया गया है, लेकिन दलित फैकल्टी को स्वीकार करने के मामले में प्रतिरोध अभी भी बहुत तगड़ा है।”

 

कुछ आईआईटी अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के फैकल्टी बढ़ाने के लिए नरम, लेकिन बाकी कुछ नहीं कर रहे

 

इंडियास्पेंड से बातचीत में पता चला कि कुछ आईआईटी अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के शिक्षकों की संख्या में वृद्धि करने के लिए नियमों में ढील दे रहे हैं, लेकिन अन्य कुछ नहीं कर रहे हैं। खखर कहते हैं, “हमने अनुसूचित जातियों से संबंधित फैकल्टी सदस्यों की संख्या को बढ़ाने के लिए कोई विशेष कदम नहीं उठाए हैं।”

 

आईआईटी दिल्ली के रोल पर लगभग सभी अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के फैकल्टी एक विशेष भर्ती अभियान के दौरान नियुक्त किए गए थे। यह जानकारी एक वरिष्ठ संकाय सदस्य ने नाम न बताने की शर्त पर इंडियास्पेंड को दी।

 

आईआईटी मद्रास ने छह माह के लिए या इससे उपर की अवधि के लिए अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के फैकल्टी के लिए एक विशेष भर्ती अभियान आयोजित करने पर विचार किया है।

 

आईआईटी मद्रास के निदेशक भारस्कर राममूर्ति कहते हैं, “ जरूरी नहीं कि विशेष अभियान से हमें हमेशा उम्मीदवार मिलेंगे ही। हम नियमित रूप से भर्ती के दौरान अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों की तलाश लगातार कर रहे हैं।”

 

आईआईटी कानपुर के मन्ना एक अलग भर्ती अभियान की तुलना में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के फैकल्टी भर्ती के लिए वेबसाइट पर रोलिंग विज्ञापन को बेहतर विकल्प मानते हैं। वह कहते हैं, “अभियान से केवल दिए गए समय में मौजूद प्रतिभा तक पहुंच बनेगी।”

 

अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के आवेदक नियमित भर्ती में सामान्य वर्ग के आवेदकों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे क्या उनके खिलाफ अधिक बाधा उत्पन्न होती है?

 

मन्ना को ऐसा नहीं लगता है। वह कहते हैं, “इससे अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के चयन में बाधा नहीं पहुंचेगी, क्योंकि उनसे एक अलग स्तर की अपेक्षा हमें होती है और उन्हें हम एक अलग श्रेणी में देखते हैं।”

 

मन्ना कहते हैं, “प्रवेश स्तर पर  आवेदकों के पास एक ‘असाधारण रिकार्ड’ की जरूरत नहीं होती। एक उचित विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की डिग्री, एक अच्छा शैक्षिक पृष्ठभूमि, कुछ अच्छे प्रकाशन और कार्य अनुभव के वर्ष..बस।”

 

मन्ना कहते हैं आईआईटी कानपुर एक “असाधारण” अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के डॉक्टरेट उम्मीदवार के लिए काम करने के अनुभव की आवश्यकता को कम कर सकता और पाठ्यक्रम में नियमितीकरण के लिए गुंजाइश के साथ कांट्रेक्ट के आधार पर इस तरह के एक उम्मीदवार की नियुक्ति कर सकता है।

 

आईआईटी मद्रास के रामामूर्ति कहते हैं, “साक्षात्कार के लिए बुलाए गए उम्मीदवारों में से अधिक को ले पाने के लिए हम अन्य पिछड़ा वर्ग / अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए उम्र और काम के अनुभव के मानदंडों को कम कर सकते हैं। जब हमारे पास ओबीसी/एससी/ एसटी आवेदक होते हैं तो हम आरक्षित श्रेणियों से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हैं।”

 

सीखने के माहौल में सुधार, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के फैकल्टी की संख्या में वृद्धि के लिए प्रशिक्षण

 

13 दिसम्बर, 2016 को, परंपरागत रूप से पिछड़े समुदायों से फैकल्टी बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम, भारत के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों की श्रृंखला जहां सरकार ने फैकल्टी कोटा का आग्रह किया है) के निदेशकों की बैठक की गई। आईआईएम काशीपुर के प्रतिनिधि ने अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के छात्रों को डॉक्टरेट के लिए प्रबंधन में विशेष फेलो कार्यक्रम का वर्णन किया, जो एक साथ फैकल्टी के अलग-अलग पदों के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।

 

यह पूछे जाने पर कि क्या वह अपने संस्थान से अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ वर्ग से डॉक्टरेट किए छात्रों को फैकल्टी के पदों के लिए लेंगें, आईआईटी कानपुर के मन्ना कहते हैं, “अपने परिसर में तैयार हुए छात्रों को लिए हमारी नीति कुछ अलग है। हम चाहते हैं कि हमारे डॉक्टरेट कुछ वर्ष के लिए बाहर जरूर काम करें,  और फिर अगर वे चाहें तो हमारे यहां लौट सकते हैं।”

 

मन्ना का सुझाव है कि अनुसूचित जाति / जनजाति डॉक्टरेट का प्रशिक्षण सरकार हाथ में ले जिससे वे आईआईटी मानक तक पहुंच सके।

 

वह कहते हैं, “कानून बनाना और आईआईटी में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के शिक्षकों की एक निश्चित संख्या की नियुक्ति करना पर्याप्त नहीं है।”

 

अनुसूचित जाति / जनजाति डॉक्टरेट विद्वानों को आईआईटी मद्रास ने बाहर जाने से रोकने के लिए नियमों में ढील दी है। राममूर्ति कहते हैं, “सामान्य वर्ग से हमारे पीएचडी विद्वानों की तरह अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के हमारे स्नातक विद्वान भी अक्सर अन्य केंद्रीय वित्त पोषित तकनीकी संस्थानों, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, उद्योग, विदेशी विश्वविद्यालयों आदि के साथ जुड़ जाते हैं।”सीखने के माहौल में सुधार और संभावित उम्मीदवारों के आंतरिक प्रशिक्षण से अनुसूचित जाति / जनजाति के डॉक्टरेट विद्वानों को जोड़े रखने में मदद मिल सकती है। तेजपुर विश्वविद्यालय के जोजो कहते हैं, “शैक्षिक प्रगति आपके वातारण पर भी निर्भर करती है।” जाहिर हैं अनिकेत के लिए वातावरण सुकून भरा नहीं था।

 

(बाहरी स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं। राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 17 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
__________________________________________________________________

 

“क्या आपको यह लेख पसंद आया ?” Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

code