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आईटी अधिनियम की ‘असंवैधानिक’ धारा 66- ए का उपयोग कर पुलिस कर रही है लोगों को गिरफ्तार, तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने किया था निरस्त

चारु बाहरी,
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Apar Gupta_620
 

माउंट आबू: 20 मार्च 2017 को अपने ऐतिहासिक फैसले में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गंगा और यमुना दोनों पवित्र नदियों को ‘जीवित मनुष्य’ का दर्जा देने का आदेश दिया था। उसी दिन, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर शहर के 18 वर्षीय जाकिर अली त्यागी ने फेसबुक पर एक टिप्पणी पोस्ट की कि, “क्या कोई गंगा में डूब जाता है तो उस पर आपराधिक मुकदमा चलेगा क्या?”

 

एक हफ्ते बाद उत्तर प्रदेश के नव निर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी को गुंडों से छुटकारा दिलाने की बात कही। उन्होंने कहा, “उनके पास यूपी छोड़ने का विकल्प है या नहीं तो वे अपने सही जगहों (जेल) पर जाएंगें।”


 

30 मार्च को, त्यागी ने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा कि मुख्यमंत्री के खिलाफ 28 मामले लंबित हैं, जिनमें से 22 गंभीर हैं।

 

(त्यागी ने अपनी जानकारी के स्रोत का जिक्र नहीं किया। 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए आदित्यनाथ के उम्मीदवार हलफनामे में एक दर्जन सेक्शन के तहत कई लंबित आपराधिक मामले सूचीबद्ध हैं। 2017 में, MyNeta.Info ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद में चुनाव के लिए जमा किए गए हलफनामे के आधार पर आदित्यनाथ के खिलाफ लंबित चार मामले सूचीबद्ध किए थे।)

 

इन पोस्ट के कुछ दिनों बाद त्यागी को गिरफ्तार कर लिया गया।  त्यागी के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी अधिनियम) की धारा 66-ए के तहत मामला दर्ज किया गया था। यह कानून आक्रामक/ अपमानजनक संदेशों को ऑनलाइन भेजने को अपराध मानता है। त्यागी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत अतिरिक्त मामला दर्ज किया गया ,क्योंकि त्यागी ने नोएडा के दादरी में एक संदिग्ध अपराधी को गिरफ्तार करने के दौरान मारे गए सब-इंस्पेक्टर, अख्तर अली, को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए फेसबुक प्रोफाइल में अली की तस्वीर लगा रखी थी।  हालांकि मार्च 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सेक्शन 66-ए को निरस्त कर दिया था, यानी पुलिस द्वारा त्यागी के खिलाफ इसे इस्तेमाल करने से दो साल पहले ही यह अक्षम कर दिया गया है, क्योंकि शीर्ष अदालत ने कानून को बनाए रखने के लिए स्थिति को अस्पष्ट पाया था।

 
आप कैसे निर्णय लेते हैं कि अपमानजनक क्या है?
 

 2015 में अपने ऐतिहासिक निर्णय (श्रेया सिंघल बनाम भारतीय संघ) में 66-ए को निरस्त करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “जो किसी एक के लिए आक्रमक या अपमानजनक हो सकता है वह किसी दूसरे के लिए नहीं भी हो सकता है। जो किसी के लिए परेशानी या असुविधा का कारण बन सकता है वह किसी अन्य के लिए परेशानी या असुविधा का कारण नहीं बन सकता है। एक ही सामग्री को देखने के बाद जब न्यायिक तौर पर प्रशिक्षित मस्तिष्क अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंच सकता है तो कानून लागू करने वाली एजेंसियों और दूसरों के लिए इस बात पर फैसला करना कितना कठिन होता होगा कि क्या अपमानजनक है और क्या बेहद अपमानजनक है।’

 
तो, त्यागी को एक निरस्त कानून के तहत कैसे गिरफ्तार किया जा सकता है?
 

पुलिस द्वारा धारा 66-ए का उपयोग कानून की अज्ञानता का नतीजा था, या क्या पुलिस जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वैधता को चुनौती दे रही थी जिसने इसे उलट दिया?

 

 वकील अभिनव सेखरी और अपार गुप्ता के एक नए पेपर ‘सेक्शन 66-ए एंड अदर लीगल जोंबी’ के मुताबिक इसके जवाब में थोड़ा दोनों शामिल है।  इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक और सह-लेखक गुप्ता ने इंडियास्पेंड को बताया, ” सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस तरह के उल्लेखनीय निर्णय को प्रभावकारी ढंग से रखने का कोई तंत्र विकसित नहीं है। न्यायपालिका और कार्यकारी के बीच आपसी तालमेल की कमी मौजूद है। कार्यकारी के पक्ष में जो पॉवर  है, उससे कानून के दुरुपयोग पर खुद को अलग रखने का मौका मिलता है।” गुप्ता ने बताया कि यह समझना महत्वपूर्ण है कि अदालतें दुरुपयोग की संभावना पर कानूनों को अक्षम नहीं करती हैं। ” एक दुर्लभ घटना है ‘सब्स्टन्टिव पीनल लेजिस्लेशन’। ऐसा इसलिए नहीं कि  विधायिका हमेशा अपराध और ऐसा करने के तरीके पर बुलेटप्रूफ विकल्पों के साथ आता है, बल्कि एक प्रथा के कारण कि अदालत उस क्षेत्र में विधायी विकल्पों पर लगातार सवाल नहीं उठा सकती हैं। कोर्ट कानून बनाने में हस्तक्षेप या अस्वीकार करने से दूर रहकर, राज्य की शाखाओं ( कार्यकारी, न्यायपालिका और विधायिका ) के बीच शक्तियों का संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा, कल्पना करें कि यदि कानून की वैधता हमेशा के लिए संदेह में थी तो कानून प्रवर्तन कितना चुनौतीपूर्ण होगा? ” गुप्ता कहते हैं, धारा 66-ए के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कानून ने अनुच्छेद-14, जो समानता प्रदान करता है, अनुच्छेद -19 जिसमें भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और अनुच्छेद 21, जिसमें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार शामिल है, सभी संवैधानिक मौलिक अधिकार हैं, उनका उल्लंघन किया है।

 

राज्य की अन्य शाखाओं की स्थिति का सम्मान करने पर यह माना जाएगा कि जब न्यायपालिका समीक्षा के उस कठिन काम में संलग्न होती है, तो इसका निर्णय बेहद सम्मानित होता है। जाहिर है, ऐसा नहीं हुआ है। सेखरी और गुप्ता के मुताबिक धारा 66-ए और धारा 303, आईपीसी जैसे अन्य निरस्त किए गए धाराओं का इस्तेमाल जारी है।

 

 गुप्ता ने इंडियास्पेन्ड को बताया कि यह प्रभावी रूप से मौजूदा प्रतिवादियों और जो लोग अब निष्क्रिय धारा के तहत गिरफ्तार किए गए हैं, उन पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करने के लिए प्रेरित करता है।

 
उनसे साक्षात्कार से संपादित अंश नीचे हैं:
 

 जाकिर अली त्यागी का उदाहरण सामने है, जिन्हें आईपीसी की आईटी अधिनियम की धारा 66-ए और धारा 420 के तहत गिरफ्तार किया गया और जिसके तहत उन्होंने 42 दिन जेल में बिताए। आपने निष्कर्ष निकाला कि मेनस्ट्रीम मीडिया यानी राष्ट्रीय समाचार पत्रों में कवरेज के कारण, पुलिस द्वारा धारा 66-ए के गलत इस्तेमाल की जानकारी लोगों तक पहुंचजाने की संभावना स्पष्ट हो गई होगी,” और धारा 66-ए के तहत आरोप को धारा 66 में परिवर्तित कर दिए गए । एक बार त्यागी को जमानत पर रिहा कर दिया गया, पुलिस ने राजद्रोह का अपराध जोड़ा। क्या धाराओं को बदलना कानून की अज्ञानता नहीं दर्शाता है?  

 

एक अक्षर हटाने से जकीर अली त्यागी के मामले को अधिक वैधता नहीं मिली, क्योंकि धारा 66 और धारा 66-ए काफी अलग हैं। पहले वाले का संबंध हैकिंग और मौद्रिक नुकसान से है, और दूसरा भाषण के अपराध से संबंधित है और अकॉर्डियन की तरह कम या बढ़ाया जा सकता है। अक्सर ऐसा होता है कि पुलिस पहले 66-ए के तहत किसी को गिरफ्तार करती है, फिर अगर मामले को मीडिया का ध्यान मिल जाता है, तो वे कानून की अमान्यता के बारे में पता लगाते हैं और गिरफ्तारी को न्यायसंगत साबित करने के लिए दूसरे धारा की तलाश करते हैं। संयोग से, त्यागी का मामला अभी भी चल रहा है। चूंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2016 में धारा 66-ए के मामलों का रिकॉर्ड करना बंद कर दिया था,  हमें धारा 66 (कंप्यूटर से संबंधित अपराध) और धारा 67 (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री संचारित) के उपयोग की ज्यादा घटनाएं मिलीं, बावजूद इसके कि धारा 66 और 67 के कानूनी उद्देश्य धारा 66-ए से अलग है। यह संभव है कि ये प्रावधान धारा 66-ए पर निरंतर निर्भरता के लिए केवल प्रॉक्सी के रूप में कार्य कर रहे हैं, जो सुझाव देते हैं कि श्रेया सिंघल ने केवल फॉर्म को प्रभावित किया था, अस्तित्व नहीं।मुंबई स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ द्वारा नवंबर 2017 में जारी एक शोध रिपोर्ट में पूछा गया है कि क्या धारा 66-ए के लिए एक विकल्प के रूप में धारा 67 का उपयोग किया जा रहा है। समान रुप से परेशान करने वाली बात यह देखना था कि यह कानून को लेकर अज्ञानता का मुद्दा है। 1983 में, सुप्रीम कोर्ट ने मिथु बनाम पंजाब राज्य मामले में आईपीसी की धारा 303 को निरस्त किया था [जो भी कोई आजीवन कारावास के दण्डादेश के अधीन होते हुए हत्या करेगा, तो उसे मॄत्युदण्ड से दण्डित किया जाएगा।] । 2012 में, लगभग दो दशक के बाद, राजस्थान हाई कोर्ट ने एक सत्र न्यायाधीश द्वारा उस अपराध के तहत दोषी एक व्यक्ति को फांसी से बचाने के लिए हस्तक्षेप किया था। 

 

आपने निष्कर्ष निकाला है कि धारा 66-ए का उपयोग जारी है, क्योंकि प्रासंगिक अधिकारियों को यह नहीं पता है कि इसे निषक्रिय किया गया है, क्योंकि अन्य हितधारकों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रति प्राप्त करने के लिए कोई सिस्टम नहीं है, जैसे कि आपराधिक न्याय प्रणाली का सबसे निचला पायदान। ऐसी स्थिति के लिए आप किस समाधान का प्रस्ताव देते हैं? 

 

मुझे एक बात हट कर कहने की अनुमति दें कि हमने निष्कर्ष निकाला कि धारा 66-ए का उपयोग जारी है क्योंकि संबंधित अधिकारियों को यह नहीं पता है कि इसे निरस्त किया गया है, सिर्फ इसलिए कि हम यह नहीं मान सकते कि पुलिस, अभियोजक और अदालत धारा 66-ए के तहत मामलों को रोकने से इनकार कर सक्रिय रूप से अवमानना ​​कर रही है, या वे निर्णय को ऐसे देखते हैं  कि उन्हें लंबित मामलों के प्रतिवादियों को राहत देने के लिए कार्य करने की आवश्यकता नहीं है। हमने पाया है कि अधिकारियों को धारा 66-ए के फैसले के बारे में पता नहीं है, क्योंकि जब एक कानून असंवैधानिक घोषित किया जाता है, तो यह कानून की पुस्तकों से स्वत: रूप से हटाया नहीं जाता है। कानून केवल एक संशोधन के माध्यम से बदला जा सकता है, और यदि संसद सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावी बनाने के लिए एक सक्षम संशोधन पास नहीं करती है, तो असंवैधानिक प्रावधान टेक्स्ट में रहेगा। इसलिए, यदि कोई भारत कोड का उपयोग करता है ( केंद्रीय कानूनों के टेक्स्ट के लिए आधिकारिक स्रोत ) तो वहां धारा 66-ए अभी भी मौजूद है। यूनिवर्सल, लेक्सिसएक्सिस और कमरसिया जैसे प्रकाशक, जो कानून के आधिकारिक टेक्स्ट को ईमानदारी से प्रिंट करते हैं, वह भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अक्सर एक फुटनोट के साथ असंवैधानिक प्रावधान देते हैं।  निचली अदालतों और पुलिस बल को और कैसे पता चलेगा कि धारा 66-ए को निष्क्रिय किया गया था? सरकार के आधिकारिक राजपत्र के माध्यम से, जिसमें नए कानून या नियमों पर अपडेट होते हैं? इसमें हालिया न्यायिक निर्णयों का विवरण नहीं है। सरकारी सलाहकारों या अधिसूचनाओं के माध्यम से? मुकदमे के दौरान मुख्य सचिवों और निदेशक जनरलों को एक सलाह जारी की गई थी, जबकि उन्हें धारा 66-ए का उपयोग संयम के साथ और प्रशासनिक वरिष्ठों की पूर्व स्वीकृति के बाद करने के लिए कहा गया था। किसी भी तरह की सलाह  या अधिसूचना को निर्णय के बारे में सूचित करने वाले व्यक्तियों के एक ही समूह को संबोधित नहीं किया गया था। हाई कोर्ट के नियम (हमने दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रावधानों का अध्ययन किया) सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को अपने अधिकार क्षेत्र के तहत निचली अदालतों को सूचित करने की अनुमति नहीं देते हैं। इसी प्रकार, अन्य अधिकारियों के नोटिस में नए सुप्रीम कोर्ट के फैसले लाने के लिए परिपत्र जारी करने के लिए जिला न्यायाधीशों के लिए अनिवार्य कोई नियम नहीं है। महत्वपूर्ण निर्णयों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए, अधीनस्थ न्यायपालिका के सदस्यों को न्यायपालिका या वाणिज्यिक घरों द्वारा प्रकाशित इसी तरह की डाइजेस्ट संदर्भित करने की उम्मीद की जाती है। 

 

धारा 66-ए को समाप्त करने से भारत के लोगों और उसके न्यायिक तंत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? असंवैधानिक कानून के निरंतर लागू होने से धारा 66-ए के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है?   

 

जब श्रेया सिंघल के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसले आया था, तो हमलोगों ने सोचा कि पूरे देश में अभियोजन एजेंसियां और मजिस्ट्रेट लंबित मामलों की जांच करके और उनको वापस लेने के लिए सक्रिय हो जाएंगे, जहां प्रतिवादी को धारा 66-ए के तहत पूरी तरह से बुक किया गया था। ऐसा करके, वे न्याय प्रणाली के बोझ को प्रभावी ढंग से कम कर सकते थे। हम सभी जानते हैं कि पुलिस संसाधनों की कमी और लंबित मामलों से घिरा हुआ है। जैसा कि हमने पाया, ऐसा कुछ नहीं हुआ। इससे बहुत दूर रहा। पुलिस ने एक निरस्त कानून के तहत लोगों को गिरफ्तार करना जारी रखा (और वे ऐसा करते रहेंगे; हालिया मामला गुरुग्राम और गुवाहाटी में में हुआ था)।  ऐसा करने में, नए गिरफ्तार किए गए और मौजूदा प्रतिवादी पर कानूनी परिवर्तन लागू करने के बोझ रहा। इसका मतलब यह है कि अधिकांश प्रतिवादी कानूनी वकीलों पर नेविगेट करने के लिए अपने वकीलों पर निर्भर करते हैं। इसलिए, यदि वकील धारा 66-ए के रोलबैक से अवगत है और अदालत के सामने अवैधता की व्याख्या करने में सक्षम है तो प्रतिवादी के लिए अच्छा है। यदि नहीं, तो प्रतिवादी अनिवार्य रूप से पीड़ित होगा। हमें इस बात का सबूत मिला है। श्रेया सिंघल के मामले में आए फैसले का इस्तेमाल केरल हाई कोर्ट में एक ही प्रेसीडिंग अधिकारी के समक्ष लंबित 66-ए मामलों में से कुछ को रद्द करने के लिए किया गया था। जहां वकील ने अमान्यता का दावा नहीं किया था, अदालतों ने इस मामले को कुछ इस तरह से देखा, मानो धारा 66-ए वैध हो। भारत में, कितने प्रतिवादी के पास वित्तीय साधन हैं जो सर्वश्रेष्ठ वकीलों के पास जा सकें और अच्छी सलाह ले पाएं। जिनके पास इन साधनों की कमी है, उन्हें संविधान से परे निराश छोड़ दिया गया है। यह उनका न्याय है। 

 

आपके अध्ययन का आधार कौन से आंकड़े रहे हैं? किस हद तक वे आंकड़े सुझाव देते हैं कि देश में धारा 66-ए के तहत केस दर्ज किए जा रहे हैं?  

 

हमने धारा 66-ए मामलों के लिए दो ऑनलाइन डेटाबेस खोजे – इंडियनकानून, (एक लोकप्रिय सार्वजनिक पहुंच मंच) और सुप्रीम कोर्ट केसेज ऑनलाइन( सदस्यता-आधारित मंच।)जनवरी और सितंबर 2018 के बीच, इंडियन कानून ने 45 मामले सूचीबद्ध किए, जबकि सुप्रीम कोर्ट केसेज ऑनलाइन में मार्च 2015 से सितंबर 2018 तक 21 मामलों को सूचीबद्ध किया गया था। ये किसी भी तरह से संपूर्ण सूची नहीं थे। ये डेटाबेस इंटरनेट और इंडेक्स जानकारी देते हैं। हम जानते हैं कि वे मुख्य रूप से हाई कोर्ट के मामलों को सूचीबद्ध करते हैं और डिजिटल रूप से काम-काज में सक्षम कुछ जिला अदालतों से डेटा एकत्र करते हैं। पुलिस स्टेशनों में प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) के माध्यम से पंजीकृत डेटा ( अपराधों का मुख्य स्रोत ) इन डेटाबेसों के दायरे से बाहर पूरी तरह से बना हुआ है। साथ ही, हमारे सामने यह स्पष्ट नहीं हैं कि वे कौन से मामलों को छोड़ देते हैं, क्योंकि उनके एल्गोरिदम और दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं। संयोग से, त्यागी का मामला सूचीबद्ध नहीं था। हमने एनसीआरबी द्वारा रिपोर्ट किए गए साइबर अपराधों को भी संदर्भित किया, जो पुलिस स्टेशनों से प्राप्त आंकड़ों को जोड़ता है। 2015 और 2016 के लिए एनसीआरबी डेटा से पता चला कि श्रेया सिंघल के मामले में आदेश आ जाने के बावजूद व्यापक गिरफ्तारी जारी रही। हालांकि, एनसीआरबी ने 2016 में एक ‘शुद्धिपत्र’ जारी किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि आंतरिक डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम में एक त्रुटि के कारण ये संख्या गलत थी और यह भी कहा कि वह धारा 66-ए पर बाद की रिपोर्ट में डेटा प्रकाशित नहीं करेगा। इन डेटा सीमाओं के कारण, हमने आपराधिक प्रक्रिया में धारा 66-ए के सामान्य निरंतर उपयोग की जांच के लिए हमारे अध्ययन को सीमित कर दिया।  कई मामले श्रेया सिंघल के फैसले और परीक्षण के बाद दर्ज की गई,जो आज तक चल रही हैं।  प्रत्येक ऑर्डर को पढ़ने के बाद, हम आत्मविश्वास से एक निष्क्रिय किए गए क़ानून के निरंतर दुरुपयोग के विश्लेषण और साक्ष्य के लिए एक उपकरण के रूप में अपने डेटा सेट की उपयोगिता पर जोर दे सकते हैं। अहमदाबाद में एक पुलिस इंस्पेक्टर की इस टिप्पणी से अधिक खुलासा क्या हो सकता है, कि जब उनसे पूछा गया कि उसने अगस्त 2018 में खंडित धारा 66-ए के तहत अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम कर रहे एक वकील कार्यकर्ता को क्यों गिरफ्तार किया तो इंस्पेक्टर ने पहले कहा था कि शीर्ष अदालत ने ऐसा कोई फैसला नहीं दिया है, फिर बाद में कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने कहा होगा कि केवल एक विशेष मामले में और धारा अधिनियम में बनी हुई है। पठान को इस अधिनियम के धारा 66-ए बुक किया गया था, क्योंकि उन्होंने सेलफोन के माध्यम से संदेशों को प्रसारित किया था। “

 
( बाहरी स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं और राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं। )
 
यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 3 दिसंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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