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आखिर क्यों भारतीय श्रमशक्ति में शहरी महिलाओं की तुलना में ग्रामीण महिलाओं की संख्या तेजी से हो रही है कम?

प्राची सालवे,
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मुंबई: शहरी श्रमशक्ति में महिलाओं की मौजूदगी के मुकाबले ग्रामीण श्रमशक्ति में महिलाओं की संख्या तेजी से गिर रही है। यह जानकारी सरकारी आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आई है।

 

1990 के दशक की शुरुआत से निरंतर उच्च आर्थिक विकास ने भारत की महिलाओं के बीच शिक्षा और स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार किया है। फिर भी, 2011-12 में श्रम शक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी 25 फीसदी से अधिक नहीं है, जो 2005 में 33 फीसदी के आंकड़ों से कम है, जैसा कि रोजगार पर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट (2014) से पता चलता है। ये आंकड़े पड़ोसी बांग्लादेश (29 फीसदी), नेपाल (52 फीसदी) और श्रीलंका (34 फीसदी) की तुलना में कम है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 4 मई, 2017 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है।  सांख्यिकी मंत्रालय और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस), 2014 के आंकड़ों के अनुसार,यह गिरावट ग्रामीण महिलाओं में अधिक देखी गई है।

 

ग्रामीण महिलाएं खासकर शिक्षित महिलाएं अपने खेतों में पारंपरिक श्रम करने की बजाए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत भुगतान किए गए श्रम अवसरों के प्रति ज्यादा उन्मुख हुई हैं।

 

हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में औपचारिक क्षेत्र की पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं। श्रम मांग से संचालित कार्यक्रम मनरेगा, प्रति वर्ष सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं में केवल 100 दिनों के श्रम का भुगतान करने तक सीमित है। मनरेगा के अलावा कुछ औपचारिक नौकरियां उपलब्ध हैं, जो डिग्रीधारी पुरुषों और महिलाओं के पास जाते हैं। माध्यमिक विद्यालय स्तर तक शिक्षित महिलाएं अनिश्चिय की स्थिति में पड़े रहते हैं – उनका कौशल उन्हें गैर-कृषि कार्यों के योग्य बनाता है, लेकिन उनके लिए कुछ ही नौकरियां मौजूद हैं। यह बात मैरीलैंड विश्वविद्यालय के 2018 के एक अध्ययन में सामने आई है।

 

कृषि श्रम में घटती जरूरत और औपचारिक नौकरियों की कमी के कारण ग्रामीण कार्यबल में महिलाओं की संख्या में कमी आई है। श्रम बल भागीदारी दर ( एलएफपीआर ) प्रति 1,000 व्यक्तियों पर श्रम बल में व्यक्तियों की संख्या का एक माप है। पिछले18 साल से 2011 तक ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिला एलएफपीआर में बदलाव को दर्ज करने वाले एनएसएस के आंकड़ों से पता चलता है कि महिला एलएफपीआर में गिरावट आई है।हालांकि, एनएसएस डेटा पर एक करीबी नजर डालने से पता चलता है कि गिरावट ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिर है। जबकि शहरी क्षेत्रों में महिला एलएफपीआर 1993 में  प्रति 1,000 पर 165 से घटकर 2011 में 155 हो गई है। इसी अवधि के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में महिला एलएफपीआर 330 से 253 हो गई है।

 

श्रमशक्ति भागीदारी दर, 1993-2011


 

कृषि कार्यों में कम अवसर, इस गिरावट के लिए आंशिक रुप से जिम्मेदार है। कृषि आंकड़ों के अनुसार, कृषि भूमि का आकार परिवारों के भीतर सहवर्ती विभाजन के साथ सिकुड़ गया है। कृषि मंत्रालय की कृषि जनगणना 2011 के अनुसार औसत खेत का आकार 2000-01 में 1.23 हेक्टेयर से घटकर 2010-11 में 1.15 हेक्टेयर हो गया है। मशीनीकरण बढ़ने से संभवतः कृषि मजदूरी श्रम की मांग में गिरावट आई है, जैसा कि नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च ( एनसीएईआर ) और यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड द्वारा 2018 के संयुक्त अध्ययन से पता चलता है।

 
निम्न आय वर्ग में गिरावट अधिक
 

एनएसएस के आंकड़ों से पता चलता है कि निम्न आय वर्गों में ग्रामीण महिलाओं के बीच श्रम शक्ति भागीदारी में गिरावट भी अधिक है।  एनएसएस के आंकड़ों के अनुसार, पहले तीन आय वर्ग ( ग्रामीण भारत में सबसे कम कमाई का प्रतिनिधित्व करने वाले ) का सबसे कम महिला कार्यबल जनसंख्या अनुपात (डब्लूपीआर) है (वर्तमान में प्रति 1000 जनसंख्या पर कार्यरत लोगों की संख्या के रूप में परिभाषित)। प्रति 1,000 पर 198 महिलाओं का सबसे कम प्रतिनिधित्व 20 फीसदी -30 फीसदी की तीसरी सबसे कम आय वर्ग में है, जबकि 288 में से सबसे अधिक 70 फीसदी -80 फीसदी की तीसरी उच्चतम आय वर्ग में है।

 

आय वर्ग के अनुसार श्रमशक्ति जनसंख्या अनुपात, 2011-12


 

ग्रामीण भारत में, बढ़ती श्रमशक्ति जनसंख्या का अनुपात उच्च आय वर्ग में है और यह स्पष्ट रूप से ग्रामीण महिलाओं की अधिक औपचारिक, भुगतान किए गए कार्यों के प्रति आकांक्षाओं को इंगित करता है। अहमदाबाद के ‘इंडियन इंस्टटूट ऑफ मैनेजमेंट’ द्वारा नीति आयोग के लिए 2015 के एक अध्ययन के अनुसार, जहां पारिश्रमिक रोजगार के विकल्प होते हैं, जैसे मनरेगा- ग्रामीण महिलाएं अवैतनिक श्रम की तुलना में इस तरह के विकल्प को पसंद करती हैं। अध्ययन में कहा गया है कि निम्न आय वर्गों में महिला डब्ल्यूपीआर में गिरावट के लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। बढ़ी हुई आय के कारण महिलाएं संकट से बाहर आ सकती हैं और परिवार के खेत का काम करने के बजाय इसे तरजीह देती हैं। कम आय वाले ग्रामीण परिवारों में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कुछ औपचारिक क्षेत्र के काम भी अप्रत्यक्ष होते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, महिलाएं और लड़कियां पुरुष रिश्तेदारों द्वारा अर्जित की गई मजदूरी में श्रम का योगदान करती हैं, विशेष रूप से निर्माण कार्य जैसे नौकरियों में, जैसा कि अध्ययन में कहा गया है।

 
ग्रामीण महिलाओं के बीच बेहतर शिक्षा से रोजगार में वृद्धि नहीं

 श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी में बाधा के रूप में पहचाने जाने वाले मुख्य कारकों में से एक निम्न शिक्षा है। एनएसएस के आंकड़ों के अनुसार, महिला शिक्षा के लिए प्रोत्साहन के साथ शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ है और साक्षरता का उच्च स्तर (2011 में 1983 में 55 फीसदी से 22 फीसदी) और प्राथमिक शिक्षा (2005 में 10 फीसदी से 2011 में 17 फीसदी) ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के बीच दर्ज किया गया है

 

हालांकि,  ग्रामीण महिलाओं के लिए बेहतर शिक्षा का नतीजा रोजगार में वृद्धि के रुप में नहीं दिख रहा है। शिक्षा के स्तर अनुसार श्रमशक्ति जनसंख्या दर पर एनएसएस डेटा ग्रामीण महिलाओं के बीच शिक्षा के स्तर में वृद्धि के बावजूद डब्ल्यूपीआर में गिरावट को दर्शाता है। शिक्षा में वृद्धि ( कुछ नहीं से पूर्ण माध्यमिक विद्यालय (कक्षा 12 तक) ग्रामीण श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी में गिरावट के साथ जुड़ी हुई है- 53.3 फीसदी से 22.4 फीसदी। डब्लूपीआर शिक्षा के स्तर में वृद्धि के साथ गिरता है: प्रति 1,000 ग्रामीण महिलाओं ( जो साक्षऱ नहीं हैं ) पर 445 से 121 उन महिलाएं के लिए जिन्होंने माध्यमिक शिक्षा और अधिक की शिक्षा पूरी की है।

 

ग्रामीण महिलाएं श्रमशक्ति जनसंख्या अनुपात और शिक्षा स्तर, 2011-12

हालांकि,ग्रामीण भारत में अधिकांश लड़कियों ने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की है, माध्यमिक विद्यालय में नामांकन भी बढ़ा है। यह ग्रामीण कार्यबल से माध्यमिक स्कूल जाने वाली उम्र की छोटी महिलाओं की वापसी के लिए जिम्मेदार हो सकता है। इस आयु से परे महिलाओं के लिए ( 20-64 वर्ष से ) स्कूल में नामांकन… श्रम में भागीदारी का कारक नहीं है। ग्रामीण महिलाओं के लिए डब्ल्यूपीआर में गिरावट, हालांकि, सभी उम्र की महिलाओं को प्रभावित करती है, जैसा कि एनएसएस आंकड़ो से पता चलता है। इससे यह पता चलता है कि स्कूल में बिताए गए समय और काम करने में लगने वाले समय के बीच दुविधा होने से ज्यादा गहरी समस्या है।

 

माध्यमिक विद्यालय जाने वाली आयु के ऊपर वाली महिलाओं के लिए शहरी महिलाओं के लिए कार्यबल की जनसंख्या बढ़ी है, जबकि ग्रामीण महिलाओं के लिए इसमें गिरावट आई है, जो शहरी क्षेत्रों में औपचारिक नौकरियों की अधिक उपलब्धता को दर्शाता है।

 

ग्रामीण महिलाओं में, केवल उच्च शैक्षणिक योग्यता वाली महिलाएं गैर-कृषि रोजगार पा रही हैं। माध्यमिक स्कूल-जाने की उम्र के अलावा, महिलाओं की कार्यबल जनसंख्या अनुपात में गिरावट उतनी नहीं है जितनी कि मध्यवर्ती शिक्षा वाली महिलाओं के लिए है।

 

 मैरीलैंड विश्वविद्यालय के 2018 के एक अध्ययन के अनुसार, 28.1 फीसदी तक ग्रामीण महिलाएं, जो कॉलेज ग्रेजुएट हैं, कार्यरत हैं। अध्ययन के अनुसार, “शिक्षित महिलाएं मुख्य रूप से बेहतर गुणवत्ता वाली नौकरियों, विशेष रूप से वेतनभोगी कार्यों में दिखती हैं। निष्कर्ष यह हो सकता है कि यदि सभी या अधिकांश उपलब्ध नौकरियों में वेतनभोगी थीं, तो भारतीय महिलाएं अधिक शिक्षा के साथ रोजगार की उच्च दरों के सामान्य सकारात्मक संबंध को दर्शाएंगी।” अध्ययन में आगे कहा गया है कि, “हालांकि, इस तरह की नौकरियां सीमित हैं और शिक्षा के उच्च स्तर के साथ मुख्य रूप से सुलभ हैं। अगर शिक्षा के मध्यवर्ती स्तरों वाली महिलाओं के लिए उपयुक्त नौकरियां उपलब्ध थीं, तो हम उनकी श्रम शक्ति भागीदारी के उच्च स्तर की उम्मीद कर सकते हैं।”

 
बेहतर परिवहन व्यवस्था से ग्रामीण महिलाओं की कार्य सहभागिता में वृद्धि
 

 ज्यादातर वेतन वाली नौकरी शहरों, कस्बों और बड़े गांवों में हैं। इसलिए, परिवहन और संबद्ध बुनियादी ढांचे की उपलब्धता का कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी पर प्रभाव पड़ता है, जैसा कि मैरीलैंड विश्वविद्यालय द्वारा 2017 के एक अध्ययन में कहा गया है, जिसमें संयुक्त रूप से मैरीलैंड विश्वविद्यालय और एनसीएईआर द्वारा संचालित 2004-05 और 2011-12 के भारत मानव विकास सर्वेक्षण ( आईएचडीएस ) दौर के आंकड़ों को भी देखा गया है। अध्ययन में कहा गया है, “विशेष रूप से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा जोर दिए जाने के कारण, परिवहन के बुनियादी ढांचे की स्थितियों में भी नाटकीय रूप से बदलाव आया है। 2005 के मुकाबले 2012 में ज्यादा गांवों तक कच्चे और पक्के सड़कों द्वारा पहुंच बनी। सात साल के अंतराल के दौरान सड़क से न जुड़ पाए गांवों का प्रतिशत 6 फीसदी से गिरकर 1 फीसदी हो गया है। “

 

2005 और 2011 के बीच सड़क पहुंच में परिवर्तन


 

अध्ययन में कहा गया है कि, ” बिना बस सेवाओं वाले गांवों का प्रतिशत भी 2005 में 47 फीसदी से घटकर 2012 में 38 फीसदी हो गया है। 2005 की तुलना में 2012 में अधिक गांवों में एक दिन में एक से छह बार बस सेवा थी। लेकिन 2005 की तुलना में 2012 में कुछ ही गांवों में एक दिन में सात या अधिक बार बस सेवाएं थीं। “

 

गांवों में बस सेवाओं की आवृत्ति, 2005-2012


 

आईएचडीएस के सर्वेक्षण में पाया गया कि कच्ची या पक्की सड़क के निर्माण से महिलाओं की गैर-कृषि कार्यों में क्रमशः 1.5 और 1.4 गुना की वृद्धि हुई है। अध्ययन के अनुसार महिलाओं का लाभ पुरुषों की तुलना में अधिक था। पुरुष कच्ची सड़कों के लिए 1.2 गुना और पक्की सड़कों के लिए 1.4 गुना तक लाभान्वित हुए हैं।

 

कार्यबल में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाएं बेहतर परिवहन बुनियादी ढांचे से लाभ प्राप्त करने के लिए खड़ी हैं। गैर-कृषि रोजगार दर सात साल से 2012 तक पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए काफी बढ़ गई है, हालांकि यह दर पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए बहुत कम रह गई है। 2005 में केवल 10 फीसदी महिलाओं ने गैर-कृषि कार्यों में भाग लिया, जो 2012 में बढ़कर 17 फीसदी हो गया है। पुरुषों के लिए गैर-कृषि रोजगार दर 2005 में 47 फीसदी से बढ़कर 2012 में 55 फीसदी हुआ है।

 

पुरुषों और महिलाओं के लिए गैर कृषि कार्य, 2005-12


 
मनरेगा  का काम पुरुषों के लिए बाजार मजदूरी बढ़ाता है, लेकिन महिलाओं के लिए नहीं

 

 

महिलाओं के कार्यबल की भागीदारी पर प्रभाव डालने वाला एक अन्य कारक मनरेगा  है। आईएचडीएस के आंकड़ों से पता चलता है कि 2011-12 (50 फीसदी) की तुलना में 2011-12 में कम (46 फीसदी) महिलाओं ने ‘कोई काम नहीं’ किया है। 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम बनाया गया था।

 

आईएचडीएस के आंकड़ों के अनुसार, 2004-05 से 2011-12 तक कृषि कार्य में 6 फीसदी से अधिक महिलाएं (9 फीसदी) गैर-कृषि कार्यों में लगी हुई थीं। इससे पता चलता है कि मनरेगा के कारण अवसरों का विस्तार उन महिलाओं को भुगतान वाले श्रम में खींचता है, जो अन्यथा केवल परिवार के खेतों पर काम करती रहती हैं। इसके अलावा, आईएचडीएस डेटा पर शोध से पता चलता है कि 2004-05 में आईएचडीएस की पहली लहर के दौरान लगभग 45 फीसदी महिला मनरेगा श्रमिकों ने परिवार के खेतों पर अवैतनिक श्रम के रूप में काम किया।

 

मनरेगा में काम मिलने की वजह से श्रमिकों के लिए बाजार मजदूरी (मनरेगा से परे औपचारिक काम के लिए)में बढ़ोतरी देखी गई है, लेकिन लेकिन महिलाओं के लिए एक समान वृद्धि सांख्यिकीय रूप नहीं देखी गई है, जैसा कि एनसीएईआर द्वारा एक 2018 के अध्ययन से पता चलता है। यह औपचारिक कार्य के लिए लिंग के पूर्वाग्रह को रेखांकित करता है। जहां मनरेगा से परे औपचारिक रोजगार ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध हैं, वे ज्यादातर पुरुष मनरेगा श्रमिकों को जाते हैं, जिससे महिला मनरेगा कार्यकर्ता अनौपचारिक क्षेत्र तक सीमित हो जाती हैं।

 
( सालवे वरिष्ठ नीति विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 09 जनवरी, 2019 पर indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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