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उत्तर प्रदेश में 5 वर्षों में हिंसा में 5 गुना वृद्धि, राज्य में आपसी सदभाव और राजनीति पर सांप्रदायिक धब्बे

एलिसन सलदनहा के साथ सौरभ शर्मा और सचिन जौहरी,
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उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि स्थल के बाहर बाजार में एक दुकान पर सीमा चौधरी (बाएं) और खातून बेगम। बेगम और चौधरी सहेलियां हैं, लेकिन जब बात राजनीति और धर्म की होती है तो अलगाव दिखाई देता है। इससे स्पष्ट होता है कि किस प्रकार उत्तर प्रदेश में धार्मिक मतभेद जीवन और राजनीति की नींव हैं।

 

अयोध्या (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में रहने वाली 50 वर्षी खातून बेगम सरयू नदी के तट पर अपने गुलाबी दुकान के ऊपर बने मचान में रहती है। खातून बेगम रोज सुबह पांच बजे उठ जाती हैं। सुबह के धुंधलके में, वह अपनी हल्के पीले रंग की रेशमी साड़ी पहनती है। सर पर दुपट्टा बांधती हैं। इसके बाद मक्का की दिशा में पश्चिम की ओर एक चटाई बिछाती हैं और अपने अल्लाह से प्रर्थना करती है। तब तक खातून के पति और बच्चे सो रहे होते हैं।

 

जैसे ही सूरज कुछ उपर चढ़ता है, 43 वर्षीय सीमा चौधरी सुबह की पूजा से पहले प्लास्टिक का गिलास पकड़ कर बाहर आती है। उनके साथ बेगम खातून भी बाहर आती है । दोनों आपस में बतियाती हुई नदी तक चली जाती हैं। दोस्ती और अपनत्व की यह कहानी 14 पुरानी है।बेगम और चौधरी बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि स्थल के विवादित क्षेत्र के मुख्य बाजार में रहते हैं, जहां 1992 में 16 वीं सदी के एक मस्जिद गिराने से भारत भर में दंगे शुरु हो गए थे। हिंदू धर्म के सात पवित्र केंद्रों में से एक माना जाने वाले इस इलाके में अब हिंदू श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। 1950 में शुरु हुआ कानूनी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में अपने 24 वें साल में प्रवेश कर गया है। यह पूरा इलाका विवादित है और 100 के करीब दुकानें और भगवे रंग से पुते हुए आसपास के घरों में नियमित ढंग से बिजली नहीं है। हमेशा से ही। यहां या तो  बाजार क्षेत्र के बाहर से या तीर्थयात्रियों के लिए बने सार्वजनिक शौचालय से बिजली चोरी कर लाई जाती रही है।

 

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अयोध्या में भगवा रंग में रंगे इस बाजार में करीब 100 दुकानें हैं जहां स्कार्फ, प्रार्थना माला, खिलौने और अन्य धार्मिक सामग्री की बिक्री होती है।

 

भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में बिजली, रोजगार और साफ पानी की उपलब्धता मतदाताओं के लिए मुख्य मुद्दे हैं। यह बात फोर्थलायन और इंडियास्पेंड द्वारा किए गए सर्वेक्षण में सामने आई है और इंडियास्पेंड ने इसे फरवरी 2017 में विस्तार से बताया है। हालांकि इस दशक के दौरान हिंसा में वृद्धि से विकास की गति धीमी हुई है । यहां के निवासियों के पास दो समुदायों के बीच बढ़ते तनाव का कोई हल शायद ही है। लेकिन इससे उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई को जरूर बल मिल रहा है।खातून बेगम और चौधरी के बीच की बातचीत में आपको शायद ही कोई तनाव के संकेत नजर आए। वे दोनों चाय पीते हुए, किसी सब्जी की रेसिपी पर बात कर रही होती हैं या रोजमर्रा की मुश्किलों पर। तब उनके बच्चे आस-पास ही खेल रहे होते हैं।

 

खातून का परिवार हिन्दू बहुल आबादी के बीच रहने वाले कुछ एक मुसलमान परिवारों में से एक है। बेगम कहती हैं, “जब आप इतने साल साथ रहते हैं तो दोस्ती स्वाभाविक है और जरूरी भी। हम सब-कुछ साझा करते हैं । रात का खाना साथ खाते हैं, एक साथ खरीददारी करते हैं, एक-दूसरे के यहां शादी-ब्याह में भी शरीक होते हैं। हिंसा अब बीते दिनों की बात है।”

 

खातून का परिवार 1993 में हुई हिंसा के बाद यहां से चला गया था। लेकिन अन्य कोई विकल्प न होने के कारण ये लोग एक महीने के बाद वापस आ गए। बेगम कहती हैं, “जब हम वापस आए तब से हमें किसी ने परेशान नहीं किया है। ”

 

उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिकता की नींव पर राजनीति की इमारत, सामाजिक सदभाव बेमानी

 

बेगम और चौधरी वास्तव में सहेली हैं, लेकिन जब बात राजनीति और धर्म की होती है तो दोनों के बीच एक किस्म की दूरी भी दिखाई देती है। साफ है कि उत्तर प्रदेश में धार्मिक मतभेद जीवन और राजनीति की नींव है।

 

अपने 20 करोड़ लोगों के साथ, राज्य में 19 फीसदी मुस्लमान हैं और 80 फीसदी हिंदू हैं। लोगों के बीच का मतभेद, सात-चरण के चुनाव में और बढ़ रहे हैं।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कट्टर बयानबाजी के साथ से जिस ढंग अपने विकास मंत्र को अलंकृत किया है, उससे भी दो धर्मो को मानने वालों के बीच की दूरी बढ़ी है।

 

चौधरी, जो वर्ष 2003 में बाजार में आई, कहती हैं, “यह एक हिंदू बहुल क्षेत्र है, इससे यहां शांति है।” लेकिन खातून बेगम अपनी सहेली की इस बात से सहमत नहीं। वह कहती हैं “मुस्लिम क्षेत्रों में भी शांति है। ”

 

बातचीत के दौरान चौधरी ने जोर देकर कहा कि पड़ोस के सारे लोग भारतीय जनता पार्टी को ही वोट देंगे। अब तक शांत बैठी खातून बेगम ने समाजवादी पार्टी की तरफ अपनी वफादारी बताई। उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी मुस्लिम और अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के हितेषी क रूप में जानी जाती है।

 

उत्तर प्रदेश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के सदभाव में कुछ भी असामान्य नहीं है, लेकिन अब यह सदभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले से कहीं ज्यादा दुर्लभ बात है। यह इलाका अब भी वर्ष 2013 में, मुजफ्फरनगर में हुए जाट और मुस्लिमों के बीच के दंगों से उबरने का प्रयास कर रहा है।

 

मुजफ्फरनगर में एक मुस्लिम बहुल गांव कवाल की रहने वाली 35 वर्षीय जैनब कहती है, “अब हम सब साथ रहते हैं। ” 27 अगस्त 2013 को  दो युवा जाटों ने कथित तौर पर उनकी बहन को परेशान करने के लिए इस गांव के एक मुस्लिम को मार डाला। बाद में मुस्लमानों ने उन लड़कों को पीट-पीट कर मार डाला। जिस कारण पूरे क्षेत्र में हिंसा फैल गई। 50,000 से अधिक मुसलमान अपना घर छोड़ भाग खड़े हुए थे और हजारों अब भी शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं।

 
जैनब के दावे के बावजूद, जब हमने कवाल से कुछ किलोमीटर आगे स्थित जाट बहुत गांव मालिकपुरा तक दौरा किया तो वहां हमें तनाव दिखा। जिस दिन इंडियास्पेंड ने वहां का दौरा किया, उस दिन वहां 15 साल के एक किशोर के गुमशुदा होने की सूचना मिली थी। गुमशुदा लड़के की 40 वर्षीय मां, प्रमिला कहती हैं, “कल जब वह स्कूल से रात तक वापस नहीं आया तो हमें पता चला कि वह गुम हो गया है। ” इस संबंध में पुलिस अधिकारी ने कहा कि, “यह पहली बार नहीं हुआ है कि वह गायब है।” लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता है कि उसे ढूंढ़ने में देरी की जानी चाहिए
 
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एक नई घुमावदार सड़क, जो मुजफ्फरनगर में मुस्लिम बहुल गांव कवाल (बायें) और हिंदू-जाट बहुल गांव मलिकापुरा को अलग करता है।

 

हम नई घुमावदार सड़क का उपयोग कर मलिकपुरा से बाहर आए। यहां ग्रामीणों का कहना था कि यह भाजपा द्वारा कवाल में मुसलमानों के साथ बातचीत और तनाव कम करने के लिए बनाई गई है। हमने चुनाव से पहले मुजफ्फरनगर जिले में 50 अर्धसैनिक कंपनियां (प्रत्येक कंपनी में 140-150 फौजी) भी तैनात देखीं।

 

ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश के लिए शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य गंभीर मुद्दे हैं, उनपर विस्तार से यहां, यहां और यहां पढ़ें । सांप्रदायिक हिंसा के ताजा आंकड़े बताते हैं कि क्यों उत्तर प्रदेश की राजनीति धर्म, जाति और पहचान पर ही केंद्रित होती जा रही है।

 

सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि से भाजपा की उंगली राज्य की नब्ज पर

 

उत्तर प्रदेश की पुलिस महानिदेशक के कार्यालय से इंडियास्पेंड और 101reporters.com द्वारा जमा किए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 और 2015 के बीच मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा में पांच गुना वृद्धि हुई है। यह राज्य में 90 फीसदी तनाव की प्रवृति दर्शाती है। वर्ष 2015 में, मेरठ में  इस तरह की 200 घटनाएं दर्ज की गई हैं।

 

भाजपा की ओर से चुनाव में नया नारा-विकास से पहचान की कहानी- प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भाषण (यहां और यहां) और कई दूसरे उम्मीदवार, जो अक्सर “लव जिहाद” ( यह मामला इस थ्योरी पर टिका है कि इसमें युवा मुस्लिम हिंदू महिलाओं से शादी कर लुभाने और उन्हें इस्लाम में बदलने की कोशिश करते हैं ) की बात करते हैं या फिर आतंकवाद और बूचड़खानों को अपने भाषणों में लाते हैं, वे कहीं न कहीं से मुसलमानों पर सवाल खड़े करते हैं। इस बीच, सत्तारूढ़ सपा, उसकी सहयोगी कांग्रेस पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अल्पसंख्यकों की आशंकाओं और गरीब हिन्दू जातियों पर अपना खेल खेल रहे हैं।

 

वर्ष 2010 में, उत्तर प्रदेश की 75 जिलों में सांप्रदायिक हिंसा की लगभग 600 घटनाएं दर्ज की गई हैं। वर्ष 2015 तक राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो में इस तरह की 3601 हिंसक घटनाएं दर्ज की गई हैं।  हालांकि, इन आंकड़ों को वार्षिक राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में जगह नहीं मिली है, जो राज्य के रिपोर्टों से संकलित होते हैं।

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Data sourced from the office of the director general of police, Uttar Pradesh

 

वर्ष 2014 तक एनसीआरबी ने दंगों को सांप्रदायिक या अन्यथा औद्योगिक, कृषि या जाति आधारित हिंसा के रुप में वर्गीकृत नहीं किया था। वर्ष 2014 में, जब पहली बार उत्तर प्रदेश के लिए ‘सांप्रदायिक दंगों ” इस्तेमाल हुआ तो इनमें 51 के दंगों को सूचीबद्ध किया गया था। इसकी तुलना में वर्ष  2014 के लिए राज्य में 2802 ‘सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं” दर्ज की गई थीं।

 

उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने इंडियास्पेंड को बताया कि कई सांप्रदायिक घटनाएं “मामूली” थीं और ज्यादातर ” महिलाओं के सम्मान की रक्षा करने के ” मामलों में शुरु हुई थी। नियम और नियमावली के लिए महानिरीक्षक, अभिताभ ठाकुर ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “ज्यादातर मामलों में इन घटनाओं का कारण निहित स्वार्थों के साथ राजनीतिक दलों का विभिन्न समुदायों को खुश करने की कोशिश है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में साइकिल से लगी छोटी चोट का अंत चार या पांच व्यक्तियों के बीच एक बड़ी लड़ाई में खत्म हो सकता है।”

 

मामूली घटनाएं भी  राज्य स्तर पर छोड़ती है असर

 

इन ‘छोटी-मोटी घटनाओं ” का असर जिसे राज्य पुलिस रिकॉर्ड तो करती है, लेकिन एनसीआरबी में शामिल नहीं होती, उत्तर प्रदेश में चल रहे तनाव को दर्शाती है।

 

कवाल से 10 किलोमीटर से कम की दूरी पर मुजफ्फरनगर में जनसत पुलिस स्टेशन के उपाधीक्षक एस.के.एस.प्रताप कहते हैं, “एक छोटी सी घटना होने पर भी हमें तुरंत हमारे बलों को इसे शांत करने भेजना पड़ता है। डर रहता है कि यह भड़क कर कोई बड़ी घटना का रुप न ले ले। हम नेताओं को इसका लाभ उठाने का मौका नहीं देते हैं।” छोटी घटनाओं को बड़ा बनने के पहले रोकने की रणनीति हमें अन्य पुलिस स्टेशनों में भी देखने को मिली।

 

 

इन घटनाओं के शुरू होने और रोकने के तरीकों का महत्वपूर्ण असर पड़ोस, जिला और राज्य के परिदृश्य पर होता है। पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश भर के 75 जिलों में से आठ को छोड़ कर हर जगह सांप्रदायिक घटनाओं में वृद्धि हुई है।

 

हालांकि, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ जिले में सबसे ज्यादा 234 घटनाएं दर्ज की गई हैं जबकि 130 किमी पूर्व सम्भल जिले में पांच वर्षों में हिंसा में वृद्धि की उच्चतम दर दर्ज की गई है। वर्ष 2010 में जहां सिर्फ एक घटना दर्ज हुई थी, वर्ष 2015 में सम्भल जिले सांप्रदायिक घटनाओं के 192 मामले दर्ज किए गए।

 

हमारे विश्लेषण के अनुसार जिन 20 जिलों में हिंसा के अधिक मामले दर्ज हुए, उनमें से 14 जिले पश्चिम उत्तर प्रदेश में स्थित थे। हिंसा में यह वृद्धि गांवों, कस्बों और शहरों में स्पष्ट है।

 

ध्रुवीकरण से राजनीति और राजनीति से ध्रूवीकरण को बढ़ावा

 

हमने देखा कि विधानसभा चुनाव के दौरान सांप्रदायिक हिंसा में लगातार वृद्धि की वजह से लोगों के बीच क्षोभ मुजफ्फरनगर या अयोध्या तक ही सीमित नहीं था। पश्चिम से पूर्व की ओर, शहरी और ग्रामीण जीवन में भी हिंदू और मुसलमानों के बीच अविश्वास साफ है  । गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, शामली, गोरखपुर, वाराणसी और लखनऊ में भी हिंदू और मुसलमानों के बीच बढ़ चुकी दूरी को आसानी से महसूस किया जा सकता है।

 

 

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उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा तट के अस्सी घाट पर प्रार्थना करते लोग। यहां वर्ष 2010 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं शून्य थीं, वर्ष 2015 में वाराणसी में 31 घटनाएं हुई हैं।

 

वाराणसी से 2014 में संसदीय सीट जीतने वाले मोदी के प्रति सिंह गर्व के साथ अपनी निष्ठा को प्रगट करते हैं, “मेरे पड़ोसी केवल हिंदू हैं।”वह कहते हैं, “हम हिंदू और मुस्लिम शांति के साथ रहते हैं लेकिन हम मुस्लिमों को करीबी दोस्त नहीं बना सकते हैं। उनकी जीवन शैली और संस्कृति अलग है। ”

 

कुछ मुस्लिमों से भी हमने बात की। वे कहते हैं कि सामाजिक और आर्थिक सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने में हिंदु हमारा विरोध करते हैं। मिठाई की दुकान के मालिक 52 वर्षीय फिरोज-उल हसन कहते हैं, “सवर्ण हिंदु हिंसक हो गए हैं क्योंकि वे हमें उनसे थोड़ा बेहतर करते देख बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।” बुनकर अबू सईद कहते हैं, “वे हमारा सर काट सकते हैं लेकिन हम उन्हें ऐसा करने देंगे नहीं। ”दोनों समुदायों ने कहा कि वे उस पार्टी को वोट देंगे, जो उनका समर्थन करते हैं। उन्हें डर है कि अगर उनकी समर्थन देने वाली पार्टी हार गई तो उनके लिए मुश्किल हो सकती है।

 

‘हर कोई मुस्लिम पीड़ितों को प्यार करता है: एक मरता है और 100 सामने आते हैं…’

 

मेरठ बाईपास रोड पर सुनहरे सरसों के खेतों से सटे घिसे चिनार के पेड़ की पंक्तियों के बीच,  मुजफ्फरनगर में कुतबा गांव की सुबह कोहरे में डूबी है। यह भाजपा से सांसद संजीव बालियान का निर्वाचन क्षेत्र है, जो जल संसाधन राज्य मंत्री हैं। उनपर वर्ष 2013 में जाट-मुस्लिम दंगों के दौरान हिंसा भड़काने का आरोप है। यह समझने में कोई दिक्त नहीं है कि इनके लिए किस समुदाय के लोग वोट करेंगे।

 

36 वर्षीय किसान राजीव सैनी कहते हैं, “दंगें के समय में इन्होंने हमारी काफी मदद की है। अगर ये नहीं होते तो सपा सरकार हमारे लिए काफी परेशानी खड़ी कर सकती थी। इस गांव के मुस्लिम अपने रिश्तेदारों के पास चले गए। हम पहले सौहार्द के साथ रहते थे। एक-दूसरे के यहां शादियों में शरीक होते थे। अगर वे चाहें तो अब भी वापस आ सकते हैं। ”

 

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मुजफ्फरनगर जिले के कुतबा गांव में मुस्लिम का एक घर, जो अब सुनसान है। यहां कोई नहीं रहता। वर्ष 2013 के दंगों के दौरान 50,000 से अधिक मुसलमान घर छोड़ कर चले गए और अधिकांश अभी भी शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं।

 

राजीव सैनी के बगल में खड़े 67 वर्षीय बोपाल सिंह बालियान धीरे से कहते हैं, “उन्होंने लालच में घर छोड़ा है। अखिलेश सरकार ने दंगा पीड़ितों के लिए बड़ा मुआवजा देने की बात कही थी। अब वो वापस क्यों आएंगे। ”

 

बिसरा गांव में, जहां वर्ष 2015 में कथित तौर पर गाय का मांस रखने के आरोप में भीड़ ने अखलाख की हत्या कर दी थी, वहां का माहौल उपर से शांत जरूर था। लेकिन अंदर की कहानी कुछ और थी।

 

एक 25 वर्षीय युवक ने अपनी बात कहनी शुरु की।अपनी पहचान नहीं बताने वाले इस युवक का कहना था कि, “हर कोई मुस्लिम पीड़ितों को प्यार करता है। एक मर जाता है, मदद के100 आते हैं। लेकिन जब हिसारत में किसी हिदू की मौत होती है तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। ”

 

बिसरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का गढ़ है, जो भाजपा का वैचारिक संरक्षक है। हम बता दें कि दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन पर उत्तर-औपनिवेशिक भारत में तीन बार प्रतिबंध लगा है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद पहली बार 1948 में प्रतिबंध लगा था।

 

ग्रामीणों ने कहा, हत्या के बाद में  केवल राष्ट्रीय सत्ताधारी पार्टी उनके समर्थन में खड़ी थी। फरवरी 2017 में मतदान के शुरू होने से पहले, केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने यहां एक रैली का आयोजन किया था। युवक ने बताया कि, “यह गांव हमेशा भाजपा को वोट देता है। केवल हम ही हैं जो हिंदुस्तान को बचा रहे हैं और हम इसे बार-बार बचाते रहेंगे।”

 

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर के दादरी में स्थित बिसरा गांव, जहां वर्ष 2015 में कथित तौर पर गाय का मांस रखने के आरोप में मोहम्मद अखलाक की हत्या कर दी गई थी।

 

यहां युवा बेरोजगारों में काफी नाराजगी झलकती है। एक बुजुर्ग मुन्नीदेवी कहती हैं, “अखलाक प्रकरण के बाद, जब भी नौकरी देने वाले यह सुनते हैं कि आवेदक बिसरा से हैं तो वे उनकी नियुक्ति नहीं करते हैं। अगर सरकार ने हमारी परवाह की होती तो हमारे बच्चे बेरोजगार नहीं रहते, यहां-वहां फिरते नहीं होते। ”

 

25 वर्षीय नितिन पटेल सुल्तानपुर का रहने वाला है और ड्राइवर है। नितिन भाजपा का समर्थक है । वह हमें सवर्ण हिंदुओं के मनोविज्ञान के बारे में बताता है। वह बताता है कि, “सपा मुसलमानों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए है, पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बसपा दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए काम करती है। केवल भाजपा ही हमारी सुनती है। तो हम क्या कर सकते हैं। ”

 

भाजपा ने मुस्लिम के बीच पसरे डर को शांत करने के लिए कुछ खास किया?

 

गाजियाबाद के कैला भट्टा में एक बेरोजगार युवक आसिफ सैफी कहते हैं, “एक भी भाजपा प्रत्याशी इस क्षेत्र में नहीं आए हैं।” हम बता दें कि यह एक ऐसा क्षेत्र है, जो उत्तर प्रदेश में कहीं भी सांप्रदायिक हिंसा की सूचना मिलने पर विस्फोट का रूप ले सकता है। आसिफ आगे कहते हैं, “अगर उन्हें हमारे वोट की परवाह है, उन्होंने कम से कम एक टिकट मुस्लिम को दे दिया होता।” मुस्लिम उम्मीदवार की कमी एक मुद्दा है। भाजपा के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी, जो उत्तर प्रदेश से मुसलमान समुदाय से हैं, वे कहते हैं:

 

 

मुजफ्फरनगर से 56 किलोमीटर पश्चिम में स्थित कांधला में दंगा पीड़ितों के पुनर्वास कालोनियों में, जो 300 से अधिक मुस्लिम परिवारों के लिए अब घर है, वहां सपा के लिए समर्थन एकमत से दिखा। 40 वर्षीय इमरान कहते हैं, “यहां किसी और पार्टी ने आने की जहमत नहीं उठाई और हमारी परवाह करने की कोशिश नहीं की है।”

 

 

वाराणसी में एक स्थानीय संवाददाता, अतीक अंसारी का मानना है कि ‘लव जिहाद’, ‘गौ-संरक्षण’ और ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और और उनके सहयोगियों द्वारा दिए गए भाषणों से मुस्लिमों में डर उत्पन्न हुआ है। वह कहते हैं, “हमें लगता है कि अगर हमने उन्हें जीतने दिया तो फिर से दंगे होने सी संभावना हो सकती है, जिससे हमारे अस्तित्व को खतरा हो सकता है। पूरे उत्तर प्रदेश के मुस्लमानों को लगता है कि मोदी को रोकने की जरुरत है।”

 

अंसारी कहते हैं, ऐसा करने के लिए मुस्लिमों को एक ऐसे मजबूत दावेदार को वोट देना होगा, जो भाजपा को हरा सके। ऐसे में कई लोगों को लगता है कि सपा-कांग्रेस एक स्पष्ट विकल्प है, लेकिन इस इस दृष्टिकोण से बसपा का वोट बंट सकता है।

 

कुछ ऐसे मुस्लिम भी हैं, जिन्हें लगता है कि राष्ट्रीय सत्ताधारी पार्टी के लिए मतदान करना सुरक्षित है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक निर्माण साइट प्रबंधक नारु अंसारी राष्ट्रीय सत्ताधारी पार्टी को जीतते देखना चाहते हैं।

 

हम बता दें कि यह भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का निर्वाचन क्षेत्र है। अक्सर वह खुले तौर पर हिंदूत्तव और मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर बात करते हैं। अंसारी कहते हैं, “योगी आदित्यनाथ 1998 से सासंद हैं। वह हमारी सुरक्षा करते है। नेता विवादास्पद नहीं रहेंगे तो वे प्रासंगिक कैसे रहेंगे।”वापस अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बाजार में चलते हैं जहां तांबा, चांदी और सोने के बर्तनों के दुकानदार 55 वर्षीय श्रवणकुमार पांडे पूजा के सामानों के बीच बैठे अपनी उंगलियों थिरका रहे थे।

 

वह पूछते हैं, “क्या आपने नारंगी देखी है? उपर से नारंगी रंग की परत में एक पूरा फल लगता है। लेकिन जब हम नारंगी छिलका हटाते हैं, एक पूरा फल आसानी से अलग-अलग हिस्से में निकल आता है। ठीक इसी तरह उत्तर प्रदेश के हिंदू और मुस्लमान भी हैं। ”

 

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दुकानदार श्रवणकुमार पांडे अयोध्या में राम जन्मभूमि बाजार में पूजा के लिए तांबा, चांदी और सोने के सामान बेचते हैं।

 

हमारी इस यात्रा से पता चला है कि यहां न केवल हर कोई एक-दूसरे का विरोधी है, बल्कि छिपी जातियों और संप्रदायों की अलग अलग कहानी है, उन्हें अलग करने की कोशिशें भी हैं।

 

शिया बनाम सुन्नी, बंटे मतों का उलझन और नोटबंदी की जटिलताएं

 

पुराने लखनऊ के पथरीले सड़कों पर, बड़ा इमामबाड़ा परिसर के पास हमने हुसैनाबाद के शिया से मुलाकात की। यह एक ऐसे क्षेत्र है जो शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा के मामले में ‘बारुद का डब्बा’ है। यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि ईद और मुहर्रम के दौरान इलाके के पूरे पुलिस बल को तैनात करना पड़ता है।

 

लाल प्लास्टिक की कुर्सियों पर दोपहर की धूप सेंकते हुए अफजल हैदर (70), अर्चन हैदर (62), और नौशाद अली (60) भाजपा के लिए स्पष्ट समर्थन देने की बात कहते हैं। अफजल हैदर कहते हैं, “हम 2014 से भाजपा को वोट दे रहे हैं और इस बार फिर हमारे मौलाना ने उन्हें ही वोट देने कहा है। जब से वे सत्ता में आए हैं हम शांतिपूर्ण ढंग से मुहर्रम मना पाए हैं, बिना सुन्नियों और सपा सरकार के हस्तक्षेप के। यह सुकून कुछ ऐसा है, जो मायावती की बसपा सरकार के समय भी देखने के नहीं मिला।”

 

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पुराने लखनऊ के हुसैनाबाद में शिया मुसलमान अर्चन हैदर, अफजल हैदर और नौशाद अली, भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने की बात कहते हैं।

 

हुसैनाबाद के युवा शियाओं ने कहा कि वे बसपा के लिए मतदान करेंगे। 19 वर्षीय राहिल, 20 वर्षीय शरीफ और मिर्जा कहते हैं कि वर्ष 2002 में गुजरात में मोदी की निगरानी में “हमारे लोगों को दिए गए दहशत” भूल नहीं सकते हैं।

 

2009 में ‘प्यू रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में मुस्लिम आबादी में शिया की 10 से 13 फीसदी की हिस्सेदारी है। और कहा जाता है कि ईरान के बाद भारत में शिया मुस्लमानों की आबदी सबसे ज्यादा है। यहां उप संप्रदाय विभाजन भी है – जैसे कि बरेलविस, देवबंदी, और सलाफिस के बीच।

 

इतिहासकार क्रिस्टोफर जफ्फ्रेलोट और लौरेंत गेयर की  2012 की किताब – ‘मुस्लिमस इन इंडियन सिटिज: ट्रजेक्टरी ऑफ मार्जिनलाइजेशन’ के अनुसार अलीगढ़ शहर में अकेले 24 मुस्लिम जाति संगठन हैं। वे लिखते हैं, “ ये मतभेद चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।”

 

वर्ष 2013 मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान सिया-शुन्नी के बीच का विभाजन स्पष्ट था । शिया कहते हैं वे सुन्नियों के खिलाफ हिंदुओं के साथ लड़े हैं।

 

मुस्लिमों के साथ लड़ाई में शियाओं ने जाटों को बचाने में मदद की है। पूर्व मुजफ्फरनगर में जाउली गांव से इंडियास्पेंड से टेलीफोन पर बात करते हुए एक हकीम शाह आलम जैदी कहते हैं, “हमने देखा है कि अगर हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे तो हिंदू मर जाएंगे। हिंसा शांत होने तक हमने उन्हें घर में छुपाए रखा। ” उन्होंने बताया कि इसके बाद 200 वर्षों में पहली बार जाटों के समर्थन के साथ शिया गांव में मुहर्रम जुलूस निकाल पाए।

 

हालांकि, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शिया समुदायों की इस चुनाव में भाजपा को समर्थन देने की संभावना नहीं है। वजह सवर्ण हिंदुओं से उनका मोहभंग, जो भाजपा के परंपरागत वोट बैंक हैं। 8 नवंबर 2016 को मोदी की नोटबंदी नीति से 86 फीसदी प्रचलन में नोटों को अमान्य घोषित किया गया था। इसका प्रभाव व्यापक पैमाने पर पड़ा है। राष्ट्रीय राजधानी से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में किसान काफी नाराज हैं। भाजपा से जाट और गुर्जर लिए आरक्षण के वादे को पूरा करने के लिए प्रतीक्षा करते हुए उनके लिए राष्ट्रीय लोक दल एक बड़े विकल्प के रूप में उभरा है।

 

मुजफ्फरनगर के कुतबा के कश्यप कबीले के किसान राजीव कश्यप कहते हैं, “हमने हमेशा भाजपा को समर्थन दिया है। लेकिन विकास कहां है, जो हमसे वादा किया गया था।”

 

उत्तर प्रदेश चाहता है विकास, लेकिन संघर्ष के कारण पिछड़ा

 

उत्तर प्रदेश भारत के सबसे कम विकसित राज्यों में से एक है। राष्ट्रीय औसत की तुलना में यहां के औसत बद्तर हैं और देश में सबसे कम हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है। ( यहां और यहां पढ़ें ) 1990 के दशक के बाद से, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के बीच की खाई चौड़ी हुई है, जैसा कि उदारीकरण के बाद आर्थिक सुधारों से भारत भर में देश की निवेश प्रसार करने की क्षमता कम हुई है। क्रेग जेफ़री ने 2014 में अपनी किताब ‘डेवल्पमेंट फेलयर एंड आईडेटीटी पॉलिटिक्स इन उत्तर प्रदेश’ में कुछ ऐसी ही बातें लिखी हैं।

 

जेफरी लिखते हैं, “भारत में निवेश करने करने की चाहत रखने वाले अपराध और भ्रष्टाचार के मामले में अच्छे रिकॉर्ड वाले राज्यों को प्रथमिकता देते हैं।”

 

वर्ष 2000 के बाद से वहां कुछ सुधार हुए हैं लेकिन यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश उन जिलों में हुए हैं जो या तो दिल्ली के करीब हैं या भारत के सबसे अमीर क्षेत्र, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का हिस्सा हैं। गेयर और जेफ्फ्रेलोट दोनों ने पाया कि कम विकास के इस परिदृश्य में मुसलमान हाशिए पर हैं। हालांकि, विकास संकेतकों पर वर्ष 2011 की जनगणना से धार्मिक डेटा के साथ सही रुप से अ-समान विकास के स्तर का पता लगाना मुश्किल है।

 

उत्तर प्रदेश में लोगों का संघर्ष कम नहीं हुआ है। हिंसा के साथ देशों में आर्थिक विकास दर गिर जाता है, बिजली और इंटरनेट नहीं मिलती, स्कूल छोड़ने वाले छात्रों का दर बढ़ जाता है, जैसा कि प्रशासन और सुरक्षा पर वर्ष 2017 की विश्व बैंक की इस रिपोर्ट का उल्लेख किया गया है।

 

उत्तर प्रदेश में यह प्रवृति विशेष रुप से दिखा,  जब हमने पश्चिम उत्तर प्रदेश के शामली जिले के शरणार्थी शिविरों का दौरा किया। लड़कियों की शादी कम उम्र में हो रही थी और सुरक्षा कारणों से उन्हें घर में रहने पर मजबूर किया जा रहा था।

 

शरणार्थी शिविरों में राशन कार्ड के लिए 32 दिन के बदले 42 महीने

 

हालांकि, कुछ कालोनियों को नई शुरुआत के लिए राज्य सरकार से पर्याप्त मुआवजा प्राप्त हुआ है, लेकिन उन्हें रोजगार नहीं मिल पाया है। शामली जिले में हमजा के दंगा पीड़ित कालोनी कांधला में 32 वर्षीय गृहणी बुरिया कहती हैं, “पुराने गांव की तरह यहां हमारे पतियों को आसानी से रोजगार नहीं मिलता है। लोग हमें यहां जानते नहीं, इसलिए काम मिलने में परेशानी है।”

 

दंगा पीड़ितों को मुआवजे के पैसे मिलने के बाद वहां जमीन की कीमतों में वृद्धि हुई है और कई हजार परिवारों में से केवल 1,200 परिवारों को 42 महीनों में राशन कार्ड प्राप्त हुआ है जबकि राशन कार्ड की यह प्रक्रिया 30 दिनों में हो जानी चाहिए।

 

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शामली जिले में हमजा के दंगा पीड़ित कालोनी, कांधला में 32 वर्षीय गृहणी बुरिया कहती हैं कि यहां काम मिलने में परेशानी है।

 

मुस्लिम दंगा-पीड़ितों की सहायता करने वाली गैर लाभकारी संगठन, ‘अफकार इंडिया फाउंडेशन’ के अकरम अख्तर कहते हैं, “लगता है अधिकारी यह भूल गए हैं कि ये लोग अपना घर छोड़ वहां से भाग कर आए हैं।”

 

वे  प्रशासन की असंवेदनशीलता पर हिंदू मानसिकता का आरोप लगाते हैं। अक्तर कहते हैं, “वह असंवेदनशील बयान दे कर सहयोग करने से मना करते हैं। वह कहते हैं, हमें कैसे पता चलेगा कि आप वास्तव में पाकिस्तान से नहीं हैं? ”

 

समस्याओं के बावजूद, पीड़ित पैतृक गांवों में लौटने को तैयार नहीं

 

अब्दुल सत्तार के भाई और भतीजे की मुजफ्फरनगर के कुतबा गांव में हत्या होने के बाद वे वहां से भाग कर आए। वे कहते हैं, “हम कभी-कभी सड़क पर हमारे पुराने हिंदू पड़ोसियों से मिलते हैं। वे हमसे अच्छी तरह से बात करते हैं और कहते हैं कि सब कुछ शातिपूर्ण तरीके से चल रहा है। वे हमें वापस आने भी कहते हैं, लेकिन हम वापस नहीं जाएंगे – हाथ मिलाने से यह आश्वासन नहीं मिलता कि वे हमारी पीठ पर हमला नहीं करेंगे।”

 

तो, शरणार्थी शिविरों में जिंदगी बिजली, जल आपूर्ति, और शिक्षा के बिना आगे बढ़ रही है। वर्ष 2013 के दंगों के बाद लिसरा के गांव से भागकर आने वाले मोहम्मद अयूब शेख कहते हैं, “हमें अपने बच्चों के स्कूल भेजने की हिम्मत नहीं है। हम मुश्किल से जिंदा है। ”

 

अयोध्या के बाजार में वापस देखें तो दुकानदार पांडेय कहते हैं, “मंदिर-मस्जिद विवाद पर कानूनी नतीजे को भूल जाईये तो क्षेत्र में एक और दंगा होने की संभवना नहीं है।” पांडेय का विश्वास है कि किसी भी कीमत पर तनाव हाथ से बाहर नहीं जा सकता- “भगवान के नाम पर रोटी चलती है।”वह कहते हैं, “अब हम उस तरह नहीं सोचते हैं। हम वैसा सोचने की हिम्मत भी नहीं कर सकते। पिछले बार हमें बहुत नुकसान हुआ था। अब हमने कान पकड़ लिए हैं,ऐसा कभी नहीं होगा। ”

 

(सलदनहा सहायक संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। शर्मा और जौहरी 101Reporters.comके सदस्य हैं। 101Reporters.com जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का राष्ट्रीय नेटवर्क है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 28 फरवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुई है।

 

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