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एक तरफ भारत का विकास, दूसरी तरफ रिकॉर्ड संख्या में तेंदुओं की मौत

बनिता चाको,
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बेंगलुरु: भारत ने 2019 के पहले चार महीनों में कम से कम 218 तेंदुए खो दिए हैं। यह आंकड़ा पिछले साल की मृत्यु संख्या, 500 से 40 फीसदी ज्यादा है। गैर-लाभकारी संस्था ‘वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया’ (डब्ल्यूपीएसआई) के द्वारा 2009 में रिकॉर्ड रखने की शुरुआत करने के बाद पिछले साल का आंकड़ा सबसे ज्यादा रहा था।

 

डब्ल्यूपीएसआई डेटा के अनुसार, भारत में 2018 में, हर दिन कम से कम एक तेंदुए की मौत हुई है – कुओं में फंसकर, लोगों के द्वारा पीटे जाने पर या गोली मारकर या फिर रेल की पटरियों पर और सड़कों पर। डब्लूपीएसआई के आंकड़े विश्वसनीय सरकारी डेटा की अनुपस्थिति में एक प्राथमिक स्रोत है, जो उपलब्ध होने पर तेंदुए की मृत्यु दर को कम कर सकता है।

 

भारत में अब तक सबसे आराम से रह रहे तेंदुए की मृत्यु का रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ा है तो अब कुछ विशेषज्ञ चिंतित होने लगे हैं कि तेंदुओं को अब बाघों की तुलना में विलुप्त होने का खतरा हो सकता है।

 

2019 के पहले चार महीनों में, अवैध शिकार के बाद, रेलवे और सड़कें तेंदुए की मौत के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार थीं ,16 फीसदी या 35। जैसा कि तेंदुए के आवासों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की अनुमति दी गई, ट्रेन या वाहन से होने वाली मौतों में तेजी से वृद्धि हुई है: 2014 में 41, 2015 में 51, 2016 में 51, 2017 में 63 और 2018 में 80। एक हकीकत और भी है कि तेंदुए की मौतों में वृद्धि का कारण अधिक भारतीयों का बिजली ग्रिड से जुड़ना भी है।

 

Source: Wildlife Protection Society of India, 2019
Note: Data for 2019 are as of May 1

 

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जरवेश्न ऑफ नेचर द्वारा बनाए गए एक रेड लिस्ट में ‘असुरक्षित’ के रूप में सूचीबद्ध पैंथेरा पार्डस (तेंदुए का वैज्ञानिक नाम) को भारतीय कानून द्वारा संरक्षित किया गया है और इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत उच्चतम संरक्षण की आवश्यकता के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

 

विशेषज्ञों ने कहा कि तेंदुए की उपस्थिति जंगली क्षेत्रों, जंगलों और जल स्रोतों की भलाई से जुड़ी है, जो न केवल वन्यजीव, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को बनाए रखते हैं।

 

वाइल्डलाइफ कन्जरवेशन ट्रस्ट ( डब्लूसीटी ) के अध्यक्ष, पीएचडी अनीश अंधेरिया, कहते हैं, “तेंदुए जंगल के स्वास्थ्य का एक संकेतक हैं। हमारे पास मानव-तेंदुए के संघर्ष की कई कहानियां हैं, क्योंकि जंगल कम हो रहे हैं, और उन्हें (तेंदुए) भोजन के लिए बाहर आना पड़ता है। जिन क्षेत्रों में जंगल स्वस्थ हैं, वे बंदर और हिरणों का शिकार करते हैं, उनकी आबादी को भी नियंत्रित करते हैं।

 

विशेषज्ञों ने कहा कि विकासशील देशों के लिए बुनियादी ढांचा परियोजनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन तेंदुओं के लिए वनों का संरक्षण जरूरी है। हालांकि संरक्षण की कहानी अलग है, क्योंकि सरकारों पर दबाव है कि वे मानव बुनियादी ढांचे के लिए अधिक जंगली क्षेत्रों का इस्तेमाल करें।

 

जून 2014 और मई 2018 के बीच ‘नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस’ (एनडीए) सरकार के चार साल के दौरान, ‘नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ’ ने भारत के संरक्षित क्षेत्रों और उनके ‘ईको-सेंसिटिव जोन’ में 519 परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है ( जहां वाणिज्यिक शोषण और निर्माण गतिविधियां निषिद्ध हैं और कानून द्वारा कड़ाई से विनियमित हैं ), जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2018 में रिपोर्ट किया है। ऐसी विकाससे जुड़ी परियोजनाओं में तेजी, भारत के अंतिम जंगली क्षेत्रों के नुकसानदायक और देश के जल संसाधनों और स्थानीय और ग्लोबल वार्मिंग को तेज करता है।

 

संरक्षित क्षेत्र महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं: वे मूल्यवान जैव विविधता के अंतिम भंडार हैं, वाटरशेड के रूप में सेवा करते हैं और कार्बन के पुनर्गठन से जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद करते हैं।

 

प्रत्येक अवसंरचना परियोजना इसे तेंदुओं, अन्य वन्यजीवों और उनके निवास स्थान पर ले जाती है।

 

अंधेरिया कहते हैं, “हमारे संरक्षित क्षेत्रों में या उसके आसपास वर्तमान में, देश भर में हर दिन 21 किमी सड़कें बिछाई जा रही हैं, और यह जल्द ही 45 किमी तक पहुंचने की उम्मीद है।”

 

एक और उदाहरण: भारत के ग्रामीण इलाकों में बिजली पहुंचाने की मुहिम है, जहां 83.3 करोड़ भारतीय रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014 में, 70 फीसदी भारतीय परिवारों के पास बिजली थी, जो 2019 तक लगभग 100 फीसदी तक फैल गई है।

 

बिजली से मौत

 

देशव्यापी विद्युतीकरण में वृद्धि को तेंदुए की मृत्यु में वृद्धि के साथ जोड़ा गया है, क्योंकि इससे तेंदुओं की मौत का अनुपात बढ़ा है, 2017 में 0.9 फीसदी से 2018 में 1.2 फीसदी और 2019 के पहले चार महीनों में 2.3 फीसदी तक ( डब्ल्यूपीएसआई के आंकड़ों के अनुसार )। हालांकि यह रूढ़िवादी अनुमान हो भी सकता है, जैसा कि विशेषज्ञ कहते हैं।

 

शाकाहारी जानवरों की घुसपैठ को रोकने के लिए जब ग्रामीण ओवरहेड बिजली लाइनों को टैप करते हैं, तो कई जंगली जानवर मारे जाते हैं।  अंधेरिया ने कहा, “इन मामलों का दसवां हिस्सा भी सामने नहीं आता है। चूंकि तेंदुए संरक्षित जानवर हैं, इसलिए लोग ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट करने से डरते हैं।” इनके शवों को आसानी से छिपाया जा सकता है, क्योंकि तेंदुए बाघ या शेर से छोटे होते हैं।

 

अन्य जानवरों को भी इसी तरह मारा गया है।

 

उदाहरण के लिए, राजस्थान के ‘डेजर्ट नेशनल पार्क’ में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के अंतिम निवास स्थान पर लगी हुई बिजली की लाइनें उस शक्तिशाली पक्षी की मौत का एक महत्वपूर्ण कारण है और अब तक यह पक्षी  90 फीसदी तक विलुप्त हो गई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जनवरी 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

जैसे बिजली की लाइनें, रेलवे या सड़कें बिछने से जंगल कम होते हैं या विभाजित होते हैं, तेंदुए की अनुकूलन क्षमता अक्सर भोजन की तलाश में मानव बस्तियों के करीब ले जाती हैं।

 

2019 के पहले चार महीनों में मानव-तेंदुए के संघर्ष में 18 तेंदुओं (सभी तेंदुओं की मृत्यु का 8.3 फीसदी) की जान गई है, जबकि 2014 में 27 (8.13 फीसदी), 2015 में 33 (8.27 फीसदी), 2016 में 31 (7.04 फीसदी),  2017 में 28 (6.49 फीसदी) और 2018 में 35 (7 फीसदी) तेंदुओं की मौत हुई है।

 

वाइल्डलाइफ कंजरवेशन सोसाइटी (डब्ल्यूसीएस) के साथ इकॉलोजिस्ट विद्या अथरेया कहती हैं, “भारत में दुनिया का सबसे अधिक पशुधन घनत्व है, इसलिए जंगलों से बाहर तेंदुए को शिकार के लिए अपेक्षाकृत आसान पहुंच मिलती है।”

 

टकराव को रोकना

 

“तेंदुओं को बचाने की कुंजी मानव-तेंदुए के संघर्ष को रोकने में निहित है”, अथरेया कहती हैं, “इसका मतलब है कि बेहतर प्रबंधन हो कचरे का, तेंदुए की ओर से हमलों के लिए मुआवजा हो और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की योजना बनाते समय वन्यजीवों के लिए भी जगह हो।

 

क्योंकि लोगों को गुस्सा आता है, जब उनके पशुधन पर हमला किया जाता है, और इसलिए उनके नुकसान को अच्छी तरह से मुआवजा देने की आवश्यकता होती है। भारतीय कानून इस तरह के मुआवजे की अनुमति देते हैं, लेकिन “इसे और अधिक निष्पक्ष और न्यायसंगत बनाने की आवश्यकता है।”

 

चूंकि तेंदुए शेरों और बाघों से छोटे होते हैं, वे मनुष्यों के पास रहने के लिए अनुकूल होते हैं । तेंदुए मुंबई जैसे बड़े शहरों, गांवों, कस्बों में नियमित रुप से आ जाते हैं, जिसमें 47 तेंदुओं के साथ एक राष्ट्रीय उद्यान है। तेंदुए घरों और स्कूलों, गेटेड कॉलोनियों और सरकारी कार्यालयों में भटकते हुए और बसों के नीचे पाए गए हैं।

 

डब्ल्यूसीटी के अंधेरिया ने कहा कि संघर्ष को रोकने का एक और तरीका तेंदुए के आवास के पास कचरा प्रबंधन करना है। कचरा कुत्तों, सूअरों और पशुधन को आकर्षित करता है, तेंदुओं के लिए अधिक भोजन प्रदान करता है और उनकी आबादी को अविभाज्य प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों की तुलना में अधिक दर पर बढ़ाता है।

 

बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की योजना बनाते समय सरकारे वन्यजीवों को ध्यान में “शायद ही कभी रखकर विचार करती हैं,” जैसा कि अंधेरिया कहती हैं, जिन्होंने महाराष्ट्र में “कुछ बदलाव” की ओर इशारा किया।

 

उन्होंने महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में ताडोबा टाइगर रिजर्व के आसपास प्रस्तावित कम से कम सात बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के मामले का हवाला दिया, जहां डब्ल्यूसीटी ने राज्य के वन विभाग के साथ मिलकर कई तरह के उपाय सुझाए, जैसे कि उन क्षेत्रों में अंडरपास का निर्माण जहां पशु क्रॉसओवर अधिक है। जानवरों को सही दिशा देने के लिए इन अंडरपासों के दोनों ओर चेन लाइन की बाड़ प्रदान करना और वाहनों की ध्वनि और प्रकाश से जानवरों को बचाने के लिए पुलों पर ध्वनि अवरोध प्रदान करना।

 

उन्होंने कहा, एक राज्य समिति ने मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान और शहर के बाहर तुंगेश्वर वन्यजीव अभयारण्य के बीच सभी सड़क परियोजनाओं को एक साथ रखने और वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही की अनुमति देने के लिए कहा है। एक अन्य उदाहरण उन्होंने दिया कि पेंच बाघ अभयारण्य का बताया, जहां से दो साल पहले राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगभग 10 अंडरपासों का निर्माण किया गया था।

 

उन्होंने कहा कि वन्यजीव क्षेत्रों के करीब या आसपास की बिजली लाइनों को हटा दिया जाना चाहिए।

 

फिर भी, भले ही देशव्यापी स्तर पर तेंदुओं को बचाने के उपाय किए जाएं, लेकिन तेंदुओं को सबसे बड़े हत्यारे से बचाने का कोई रास्ता दिख नहीं रहा है।

 

अवैध शिकार और सही आंकड़े नहीं  

 

तेंदुओं की मौत का एक बड़ा कारण शिकारी हैं। जनवरी और अप्रैल 2019 के बीच 26 फीसदी (57 तेंदुओं) की मौत हुई है।

 
 

डब्ल्यूपीएसआई के आंकड़ों के मुताबिक, 2018 में शिकारियों ने 169 तेंदुओं को मार डाला, जो 2011 में 188 के बाद सबसे ज्यादा था।

 

डब्ल्यूपीएसआई के प्रोग्राम मैनेजर टिटो जोसेफ ने कहा कि तेंदुए के अंगों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार की  वजह से उन्हें मारा जाता है। जोसेफ ने कहा, “चीन और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में इसकी त्वचा, पंजे और हड्डियों की भारी मांग है। स्थानीय रूप से, इसके पंजे और कैनाइन की छोटी मांग है, जो कि काला जादू करने के लिए भी उपयोग किया जाता है।”

 

आधिकारिक आंकड़ों में तेंदुओं का क्षय परिलक्षित नहीं होता है। दिसंबर 2018 में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री, महेश शर्मा ने राज्य प्रवर्तन एजेंसियों के आंकड़ों का हवाला देते हुए संसद को बताया था कि 2015 और अक्टूबर 2018 के बीच 260 तेंदुओं का शिकार किया गया था।

 

इन आंकड़ों की सूची में 2015 में 64 तेंदुए, 2016 में 83, 2017 में 47 और अक्टूबर 2018 तक 66 तेंदुए मारे गए हैं। डब्ल्यूपीएसआई के आंकड़ों में 2015 में शिकारियों द्वारा मारे गए 127, 2016 में 154 और 2017 में 159 तेंदुए मारे गए है।

 

शर्मा ने संसद को दिए अपने बयान में कहा, “तेंदुए सहित वन्यजीवों का प्रबंधन और संरक्षण मुख्य रूप से संबंधित राज्य / केंद्र शासित प्रदेश सरकारों की जिम्मेदारी है।”

 

डब्ल्यूसीटी के अंधेरिया कहती हैं, “आज हम बाघों की तुलना में कहीं अधिक तेंदुए खो रहे हैं। पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार हम हर चार दिनों में पांच तेंदुए खो रहे हैं। फिर भी, हमारे पास राष्ट्रीय डेटाबेस नहीं है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तराखंड जैसे राज्यों में डेटा हो सकता है, लेकिन सभी राज्य ऐसा नहीं करते हैं। ”

 

कुछ मौतों की सूचना नहीं दी जाती है, क्योंकि वन अधिकारी, जो ऐसा करते हैं, वे भी तेंदुओं की रक्षा के लिए जिम्मेदार हैं।

 

वन्यजीव उत्साही लोगों का एक स्वतंत्र मंच, सीएलएडब्ल्यू के संस्थापक सदस्य, सरोश लोधी कहते हैं, “हमने हाल के वर्षों में देखा है कि अधिकांश मौतों को प्राकृतिक या क्षेत्रीय मौतों के रूप में रिपोर्ट किया जाता है, और बहुत कम लोगों को अवैध शिकार के रूप में रिपोर्ट किया जाता है। यदि जानवरों की रक्षा करने में उनकी विफलता (वन अधिकारी) जगजाहिर हो जाए, तो यह उनकी छवि को धूमिल करेगा।इसलिए वे घटनाओं को छुपाते हैं।”

 

तेंदुए जैसी प्रजातियों को बचाने के लिए 46 वर्षीय केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट टाइगर का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि, “हमें उनकी रक्षा के लिए एक तेंदुआ परियोजना की जरूरत है।”

 

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा आयोजित 2014 की जनगणना के अनुसार 2,226 बाघ जंगल में रहते हैं। तेंदुए की गिनती करना आसान नहीं है, क्योंकि वे पूरे भारत में हैं और कई संरक्षित क्षेत्रों से बाहर हैं। हालांकि 2014 में आयोजित टाइगर जनगणना ने एक मोटे अनुमान में 12,000 से अधिक तेंदुओं के बारे में कहा, जैसा कि उन्होंने बाघों के लिए किए गए कैमरा ट्रैपिंग अभ्यास के दौरान देखा था।

 

अथरेया तेंदुओं को लेकर आशान्वित हैं।

 

वह कहती हैं, “हमारे देश की सुंदरता यह है कि हम एक बहुत पुरानी सभ्यता हैं और हम अपने जानवरों के साथ एक सांस्कृतिक संबंध साझा करते हैं। हम सांस्कृतिक रूप से उनकी उपस्थिति के लिए खुले हैं। अच्छे संरक्षण प्रथाओं के साथ, हमने पिछले कुछ वर्षों में बाघों और शेरों जैसे बड़े जानवरों की संख्या देखी है। इससे मुझे विश्वास हो जाता है कि तेंदुओं की भी संख्या बढ़ेगी। हमें केवल मानव और तेंदुए के बीच के टकराव को रोकने के लिए अपना काम करने की जरूरत है।”

 

(चाको, पत्रकारिता में पोस्ट-ग्रैजुएट हैं। वह बेंगलुरु के ‘माउंट कार्मेल कॉलेज’ में पत्रकारिता की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

 

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 08 जून, 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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