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…और 157 साल पुराना कानून खत्म हो गया

एलिसन सलहानहा एवं प्राची सालवे,
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Section377

 

मुंबई: सुप्राम कोर्ट के एक फैसले के बाद 157 साल पुराना कानून खत्म हो गया। इस फैसले के साथ ही भारत 72 देशों के उस लीग या कुनबे से अलग हो गया, जहां समलैंगिक यौन संबंध एक अपराध था। अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भारत को याद दिलाया, “बहुमत की नैतिकता पर नहीं, बल्कि संवैधानिक नियमो पर चलता है देश।” हम बता दें कि 124 देशों के दूसरे लीग के लिए समलैंगिक यौन संबंध अभी भी एक अपराध है।

 

अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया कि यह समलैंगिकों या विषमलैंगिक लोगों के बीच वयस्क यौन संबंधों को अपराध के रूप में देखता है। हालांकि, गैर-सहमति वाले सेक्स और पाश्विकता, या जानवरों के साथ यौन संबंध रखने के मामले को अपराध ही माना जाएगा।

 

6 सितंबर, 2018 को अपने फैसले की शुरुआत में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा, “जो भी जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।” साथ ही सीजेआई मिश्रा ने न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर के साथ अपने फैसले में लिखा, “आत्म अभिव्यक्ति से इनकार करना मृत्यु को आमंत्रित करना है।”

 

जस्टिस फली नरीमन, डीवाई चंद्रचुद और इंदु मल्होत्रा ​​ने अन्य तीन फैसले दिए।

 

लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर (एलजीबीटीक्यू) समुदाय के लोगों को भी देश के अन्य नागरिकों की भांति ही संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जैसा कि न्यायमूर्ति चंद्रचुड ने अपने फैसले में कहा। उन्होंने कहा, ” साझेदार का चुनाव करना, यौन सुख की पूर्ति निजी मामला है।”

 

‘ ये धरती पर दंडनीय नहीं हैं…’

 

सीजीआई मिश्रा ने कहा, समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है। एलजीबीटी समुदाय को कलंक न मानें। न्यायमूर्ति नरीमन ने अपने फैसले में कहा, ” ये पृथ्वी पर दंडनीय नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि पृथ्वी पर केवल अपराध दंडनीय हैं।

 

न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का उद्देश्य सरकारों की पहुंच से परे किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है। ऐसा इसलिए है कि संवैधानिक नैतिकता “अलग और अनौपचारिक” अल्पसंख्यकों के अधिकारों को आश्वस्त कर सकती है।

 

न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा, “ये मौलिक अधिकार चुनाव के नतीजे पर निर्भर नहीं हैं।” न्यायमूर्ति चंद्रचुड ने कहा, “जैसा कि हमारा देश लोकतांत्रिक है, हमारा संविधान अनुरूपता की मांग नहीं करता है, न ही यह संस्कृति की मुख्यधारा पर विचार करता है। “

 

29 अगस्त, 2018 के अपने हालिया आदेश को याद करते हुए, जिसमें भीम कोरेगांव हिंसा के संबंध में पुणे पुलिस द्वारा पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया गया था, न्यायमूर्ति चंद्रचुड ने कहा, ” सामाजिक संघर्ष के लिए सेफ्टी वॉल्व के रूप में असहमतियों को पोषित किया जाता है।”

 

न्यायमूर्ति चंद्रचुड ने आगे कहा, “दूसरों को पहचानने की हमारी क्षमता अलग है जो हमारे स्वयं के विकास का संकेत है। हम केवल संकट के अवसर पर मानवीय समाज के प्रतीक याद करते हैं।”

 

न्यायमूर्ति चंद्रचुड ने कहा कि यौन प्राथमिकताओं को 377 के ज़रिए निशाना बनाया गया. राज्य का काम किसी नागरिक की निजता में घुसपैठ करना नहीं है।”

 

संविधान खंडपीठ पर एकमात्र महिला न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​ने कहा, ” सदियों से हो रहे भेदभाव, यातना से इंसाफ़ मिलने में जो देरी हुई है उसके लिए एलजीबीटी  समुदाय से, उनके परिवारों से माफ़ी मांगनी चाहिए । इस समुदाय के सदस्य डर का जीवन जीने के लिए मजबूर किए गए हैं। बहुसंख्यक समाज ने मान्यता देने में नासमझी की कि समलैंगिकता पूरी तरह से प्राकृतिक है और इंसानी यौन प्राथमिकताओं के विशाल दायरे का एक हिस्सा है। “

 

उन्होंने आगे कहा कि “धारा 377 का ग़लत इस्तेमाल अनुच्छेद 14 से मिले समानता के मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 15 से मिले बिना किसी भेदभाव के मौलिक अधिकार और अनुच्छेद 21 से मिले निजता के अधिकार से वंचित कर रहा था। एलजीबीटी लोगों को बिना किसी शिकंजे के जीने का अधिकार हासिल है।”

 

न्यायमूर्ति मल्होत्रा ​​ने कहा, “ किसी भी तरह के अपराधबोध से मुक्त होकर एलजीबीटी लोग जिंदगी जीने के हकदार हैं।”

 

भारतीय संविधान एक ‘जीवित दस्तावेज’ है!

 

इस बात पर जोर देते हुए कि संविधन ‘एक ‘जीवित दस्तावेज’ है, जिसमें बदलाव की गुंजाइश है, सीजेआई मिश्रा ने कहा कि न्यायपालिका “इस तथ्य से अनजान नहीं रह सकती है कि समाज लगातार विकसित हो रहा है”।

 

न्यायमूर्ति चंद्रचुड ने पूछा, “क्या संविधान अपने नागरिकों को डर से घिरे रहने की अनुमति देता है, जो उनकी पहचान को परिभाषित करता है? धारा 377 जो त्रासदी और पीड़ा पहुंचाती है, उसका समाधान जरूरी है।  “

 

‘समलैंगिकता एक मानसिक विकार नहीं…’

 

न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा, “मानसिक बीमारी किसी व्यक्ति के समुदाय में नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, काम या राजनीतिक मूल्यों या धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप गैर-अनुरूपता के आधार पर निर्धारित नहीं की जाएगी।  समलैंगिकता को मानसिक विकार के रूप में नहीं देखा जा सकता है। “

 

यह निर्णय भारतीय मनोचिकित्सा सोसाइटी (आईपीएस) द्वारा 6 जून, 2018 को जारी बयान के साथ है,  जिसमें कहा गया था कि “भारतीय मनोवैज्ञानिक सोसाइटी यह बताना चाहती है कि इस विश्वास को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि समलैंगिकता मानसिक बीमारी या बीमारी है “।

 

वर्तमान में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) बीमारियों के वर्गीकरण के बाद भारत की मेडिकल काउंसिल, बीमारी के अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण के एफ 66 के तहत मानसिक विकार के रूप में समलैंगिकता को सूचीबद्ध करती है। वर्गीकरण के अनुसार, एक रोगी जो एलजीबीटीक्यूआई के रूप में पहचानता है, उसे पहचान संकट का सामना करना पड़ता है, जिसके समाधान की आवश्यकता होती है।

 

1990 में, डब्ल्यूएचओ ने अपने वर्गीकरण में संशोधन किया, मानसिक विकारों की सूची से समलैंगिकता को हटाकर निदान की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि “स्वयं द्वारा यौन अभिविन्यास को विकार नहीं माना जाना चाहिए”। फिर भी, समलैंगिकता एफ-66 के तहत शामिल है, जैसा कि हमने कहा था।

 

डब्ल्यूएचओ ने कहा, “समलैंगिकता अभी भी मनोवैज्ञानिक निदान के लिए आधार प्रदान कर सकती है, लेकिन केवल तभी जब व्यक्ति इसके बारे में परेशान हो।”

 

आईसीडी -10 में समलैंगिकता रखने के लिए डब्ल्यूएचओ में कुछ लोगों द्वारा उद्धृत कारणों में से एक यह था कि दुनिया के कुछ हिस्सों में समलैंगिकता के अपराध पर मृत्यु का दंड दिय जाता है। ऐसे मामलों में, इसे मानसिक विकार के रूप में पेश करने से ऐसे व्यक्तियों की सहायता मिलती है।

 

इस दृष्टिकोण के तहत, भारत में, रूपांतरण चिकित्सा, जो कि कणों को इलेक्ट्रो-कंसलसिव थेरेपी / हार्मोन थेरेपी का उपयोग करके हेटरोसेक्सुअल में परिवर्तित कर सकती है, की अनुमति है।

 

2022 में लागू होने वाले आईसीडी-11 संशोधन के लिए, समलैंगिकता को पूरी तरह से हटाने की सिफारिश की गई है।

 

सहमति पर बात: धारा 377 और 375

 

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने धारा 377 और धारा 375 (जो योनि, गुदा या मौखिक प्रवेश के माध्यम से किसी महिला के बलात्कार से संबंधित) के बीच प्रमुख अंतर का विश्लेषण किया, और पूर्व में इसे “कानूनी रूप से अस्थिर” समझा।

 

जबकि धारा 375 व्यापक रुप से सहमति की अनुपस्थिति पर विस्तार से बताता है कि बलात्कार आपराधिक अपराध कैसे है, जानबूझकर और सूचित सहमति / स्वैच्छिक शारीरिक संभोग की यह समझ समलैंगिकों और विषमलैंगिक के लिए धारा 377 में अनुपस्थित है।

 

यदि आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के कारण विषमलैंगिक आबादी के बीच सहमतिपूर्ण शारीरिक संभोग की अनुमति दी गई है, तो सीजेआई मिश्रा ने कहा, “एलजीबीटी समुदाय समेत किसी भी दो व्यक्तियों के बीच इस तरह के मामले को अपराध तब तक नहीं माना जा सकता , जब तक कि उनके बीच सहमति न हो। “

 

समलैंगिकता ‘प्रकृति के खिलाफ नहीं’

 

सुनवाई के दौरान जस्टिस रोहिंग्‍टन ने कहा कि प्रकृति का नियम क्या है? क्या प्रकृति का नियम यही है कि सेक्स प्रजनन के लिए किया जाए? अगर इससे अलग सेक्स किया जाता है तो वो प्रकृति के नियम के खिलाफ है? रोहिंग्टन ने कहा कि हमने एनएएलएसए फैसले में सेक्स को ट्रांसजेंडर तक बढ़ा दिया है. वहीं चीफ जस्टिस ने कहा कि आप सेक्स और यौन प्राथमिकताओं को मत जोडिए. ये एक निरर्थक प्रयास होगा।

 

अब आगे का रास्ता

 

न्यायमूर्ति नरीमन ने केंद्र को नियमित अंतराल पर “यह निर्णय सुनिश्चित करने के लिए सभी उपायों को सार्वजनिक मीडिया के माध्यम से व्यापक प्रचार” करने का निर्देश दिया है और और ऐसे लोगों से जुड़े कलंक को कम करने और अंततः समाप्त करने के लिए कार्यक्रम शुरू करने” की बात भी कही है।

 

न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि सभी सरकारी अधिकारियों-विशेष रूप से पुलिस अधिकारियों को ऐसे व्यक्तियों की दुर्दशा के लिए आवधिक संवेदनशीलता और जागरूकता प्रशिक्षण दिया जाना है।

 

न्यायमूर्ति चंद्रचुड ने कहा, “पूर्वाग्रह, कलंक और भेदभाव का असर धारा 377 से प्रभावित व्यक्तियों के मनोविज्ञान को प्रभावित करता है। कानून में हुए अस बदलाव पर मोनचिकित्सक समलैंगिकता पर अपने विचारों पर मंथन का एक मौका मान सकते हैं।  “

 

 

(सलनदाहा सहायक संपादक हैं और सालवे विश्लेषक हैं। दोनों इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 6 सितंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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