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कमजोर वर्ग के 80 फीसदी भारतीय बच्चे स्कूलों में करते हैं शारीरिक दंड का अनुभव

तिश संघेरा,
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मुंबई: एक नए अध्ययन में कहा गया है कि सरकारी स्कूलों में गरीबी का माहौल, कम वेतन वाले शिक्षक, प्रवासी बच्चों के प्रति पूर्वाग्रह और प्रशिक्षण की कमी के मेल के बीच बच्चों का शारीरिक दंड अनुभव करने की अधिक संभावना है।

 

शारीरिक दंड बच्चों के खिलाफ हिंसा का एक रूप है और भारत में अवैध है।

 

 एक गैर सरकारी संगठन, अग्रसर की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी 80 फीसदी हाशिए वाले बच्चे शिक्षकों द्वारा दंडित किए जाते हैं।

 

औसत 43 फीसदी ने बच्चों ने कहा कि उन्हें सप्ताह में तीन बार नियमित रूप से पीटा जाता है। कुछ स्कूलों में नियमित रूप से पीटे गए छात्रों की संख्या 88 फीसदी तक पहुंच गई है।ऐसे बच्चों के साथ दुर्व्यवहार स्कूल के दिन के साथ खत्म नहीं होता है। इन बच्चों में से अधिकांश ( 74 फीसदी ) ने घर पर पिटाई का अनुभव किया है,जबकि माता-पिता के एक समान अनुपात ( 71 फीसदी ) ने घर पर पिटाई करने की बात स्वीकार की है।

 

गुरुग्राम में 521 बच्चों और 100 माता-पिता के औचक सर्वेक्षण के निष्कर्ष हैं। गुरुग्राम एक क्षेत्र है जिसने 2000 और 2011 के बीच, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, जैसे गरीब राज्यों से प्रवासी आगमन में 29 फीसदी की वृद्धि का अनुभव किया है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि, “आर्थिक वंचितता और सामाजिक बहिष्कार के समान तंत्र पूरे देश में काम कर रहे हैं, इसलिए यह निष्कर्ष भारत में कहीं भी वंचित बच्चों पर लागू होता है।”

 

रिपोर्ट के मुताबिक शारीरिक दंड का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं मिलता है, जबकि यह स्थापित सत्य है कि शारीरिक और मानसिक दुर्व्यवहार का बाल स्वास्थ्य और कल्याण पर हानिकारक प्रभाव हो सकता है, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, व्यवहार संबंधी मुद्दों और संज्ञानात्मक क्षमता शामिल हैं।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि शारीरिक दंड से जुड़े भय और तनाव से ‘स्कूल-फोबिया’ पैदा हो सकता है, जिससे ड्रॉपआउट, कम प्रतिधारण दर और खराब अकादमिक स्कोर बढ़ते हैं, जो शिक्षा परिणामों पर काफी प्रभाव डालते हैं। जिन बच्चों ने इस तरह के दुर्व्यवहार का अनुभव किया है, वे आपराधिक व्यवहार प्रदर्शित करने और  वयस्क होने पर हिंसक अपराध करने की अधिक संभावना रखते हैं।

 

1992 में, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) बाल अधिकारों के सम्मेलन से सहमत होने पर भारत 128 देशों में से एक बन गया, जिसने स्कूल शारीरिक दंड को रोक दिया और अनुच्छेद 28 (2) के तहत सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया कि “स्कूल अनुशासन को बच्चे की मानव गरिमा के अनुरूप तरीके से प्रशासित किया जाए”।

 

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 स्कूलों में बाल सुरक्षा पर केंद्रित है, जिसमें कहा गया है कि कोई बच्चा “शारीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न” का पात्र नहीं बनेगा।

 

इस तरह के कानूनी सुरक्षा के बावजूद, हाल के सरकारी अध्ययनों में पाया गया है कि समस्या बनी हुई है। शारीरिक दंड की सामान्य स्थिति को लागू करने वाली सामाजिक संरचनाएं भारतीय समाज में व्यापक हैं।

 

 चाइल्डलाइन और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के एक संयुक्त 2007 के अध्ययन के अनुसार, अनुमानित 65 फीसदी बच्चों को शिक्षकों द्वारा शारीरिक रूप से दंडित किया जाता है। नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स द्वारा 2009 के अध्ययन में पाया गया है कि यदि मानसिक उत्पीड़न शामिल किया जाए तो स्कूलों में शारीरिक दंड का सामना करने वाले बच्चों का यह आंकड़ा 99.9 फीसदी तक बढ़ता है।

 
स्कूल और घर पर पिटाई: एक दैनिक घटना
 

 जब शारीरिक दंड की बात आती है तो शिक्षक आयु के आधार पर भेदभाव नहीं करते हैं। रिपोर्ट में पाया गया कि छोटे और बड़े बच्चे दोनों ने, दंड को ‘लगभग दैनिक आधार पर’ अनुभव किया है।एकमात्र अंतर यह है कि छोटे बच्चों को शारीरिक दंड मिलने की संभावना है जबकि बड़े बच्चों की दंड के रूप में मौखिक दुर्व्यवहार से सामना करने की अधिक संभावना होती है।

 

आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक लड़की उत्तरदाता ने कहा, “जब हम छोटे थे, तब शारीरिक दंड हमें दिए जाते थे। अब हमें ज्यादातर मौखिक दंड मिलते हैं। उदाहरण के लिए कक्षा के सामने गलतियों के लिए हमारा मजाक उड़ाया जाता है। “

 

हाशिए के परिवारों से आने वाले बच्चे अक्सर शारीरिक दंड का अनुभव करते हैं।सर्वेक्षण में शामिल 88 फीसदी बच्चों ने बताया कि उन्हें स्कूल में नियमित रूप से सप्ताह में तीन बार पीटा जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह “औसत से काफी अधिक है और इसमें मौखिक दुर्व्यवहार भी शामिल नहीं है।”कम से कम दिन में दो बार, कम से कम एक बच्चे के शारीरिक दंड के अनुभव सूचना दी। कई बच्चों ने दैनिक आधार पर मौखिक और शारीरिक दुर्व्यवहार की सूचना दी है। नतीजतन, बहुत सारे बच्चे स्कूल के दिनचर्या के रूप में ऐसे अनुभवों के आदी हो गए हैं। 71 फीसदी बच्चों का मानना ​​था कि ‘किसी कारण के लिए’ पीटा जाना ठीक है। इसे वे ‘अपने स्वयं के लिए अच्छा’ और ‘जरूरी’ मानते हैं और यह धारणा प्रचलित है।

 

शिक्षकों द्वारा दी जाने वाली शारीरिक और मानसिक दंड के प्रकार दर्द के स्तर में भिन्न होते हैं, थप्पड़ मारने, कान खींचने, बाथरूम के उपयोग से इनकार करने और देर तक खड़े रखने की सजा को ‘गैर गंभीर’ सजा रूपों के रूप में वर्णित किया गया है।

 
 

सजा के और भी कई दर्दनाक प्रकार हैं, जैसे कि हाथों पर बेंत की छड़ी से मारना या डस्टर या स्केल से मारना। ये सभी शारीरिक दंड के सबसे आम रूप हैं।

 

रिपोर्ट में पाया गया है कि कई स्कूलों में पिटाई के लिए एक छड़ी अलग से रखी जाती है।

 

 सर्वेक्षण में शामिल किए गए कई बच्चों ने मनोवैज्ञानिक यातना के साथ क्रूर दंड के मामलों का भी वर्णन किया। एक शिक्षक के लिए बच्चों के सिर को दीवार पर मारना एक खेल बन गया था। कई बच्चों ने बताया कि शिक्षक दीवार पर माथा टकराने से पहले तीन-चार बार चेतावनी देता था।

 

मानसिक दुर्व्यवहार का अनुभव भी अक्सर किया जाता है,जो गुरुग्राम में प्रवासी श्रमिकों के बच्चों के लिए अक्सर अपमानजनक और नस्लवादी उपेक्षा की तरह होते हैं, जिसे कई बच्चे शारीरिक दंड के एक रूप में नहीं पहचानते हैं।

 

उनकी कम सामाजिक आर्थिक स्थिति का संदर्भ देते हुए, इन बच्चों को ‘बिहारी’ या ‘बंगाली’ के रूप में लेबल किया जाता है। इन उपेक्षा में अक्सर ‘गधे’, ‘किसी काम के नहीं’, ‘अनपढ़’,जैसे अपमानजनक टिप्पणियां शामिल हैं, जो कि बड़े बच्चों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं।

 

छात्रों की तुलना में छात्राओं की अपेक्षाकृत अधिक मौखिक उत्पीड़न होने की संभावना होती है, जिनमें अक्सर यौनवादी भाषा और ‘विषाक्त लिंग रूढ़िवादी’ टिप्पणी शामिल है। शिक्षक अक्सर उनके चेहरे , उम्र और वजन के बारे में टिप्पणियां करते हैं।  शिक्षा के बजाय छात्राओं की शादी की सिफारिश करना और छात्रों की तुलना में उनकी क्षमताओं और कौशल को कम आंकना आम है। गंभीरता और उनके द्वारा लागू की गई सजा की आवृत्ति में मामूली अंतर के साथ पुरुष और महिला दोनों शिक्षकों द्वारा सामन रुप से दंड दिए जाते हैं। लगभग सभी माता-पिता (91 फीसदी) शिक्षकों द्वारा शारीरिक दंड को स्वीकृति देते हैं और घर पर भी इसका इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, यह आंकड़ा अधिक होने की संभावना है, क्योंकि माता-पिता शारीरिक दुर्व्यवहार और शारीरिक दंड के रूप में मौखिक उत्पीड़न के ‘हल्के’ रूपों पर आम तौर पर विचार नहीं करते हैं।

 
अपमानजनक वातावरण का जाल
 

रिपोर्ट में पाया गया, “सामाजिक और संरचनात्मक कारकों का एक जटिल मिश्रण हमारे कक्षाओं में शारीरिक दंड को कायम रखता है।”

 

वंचित बच्चों को कई प्रभावशाली जोखिम कारकों से अवगत कराया जाता है जो शारीरिक दंड का अनुभव करने की संभावना को बढ़ाते हैं।कम आय वाले परिवार, खराब परिस्थितियों में रहते हैं। अनौपचारिक क्षेत्र में लंबे समय तक काम कर रहे अशिक्षित माता-पिता दोनों अक्सर अपने बच्चों की शिक्षा का समर्थन करने में असमर्थ हैं।दिन के दौरान अनुपस्थिति और बाद में शाम को थकावट का मतलब है कि माता-पिता के ‘भावनात्मक संसाधन’ जीवित रहने के संघर्ष में खर्च हो जाते हैं। ‘गरीबी और उत्साहहीन ’ होने के कारण, एक परेशान वातावरण में बच्चों को अपने होमवर्क और स्कूल की गतिविधियों को स्वयं प्रबंधित करना पड़ता है। पाया गया है कि यहां तक कि गुरुग्राम की घर में रहने वाली माताएं भी स्कूल के मामलों पर अपने बच्चों के साथ बहुत कम बातचीत करती हैं। वे मानते हैं कि अगर कोई गंभीर बात होगी तो बच्चा उन्हें बताएगा।

 

होमवर्क जमा करने में विफलता, खराब परीक्षण प्रदर्शन और स्कूल की अनुपस्थिति शारीरिक दंड प्राप्त करने के प्रमुख कारण हैं और जो कम सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि से बच्चों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।

 

भले ही वो चाहते हों,  माता-पिता अक्सर अपने बच्चे को मुफ्त स्थानीय सरकारी स्कूल से दूसरे स्थानांतरित करने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि अन्य विकल्पों के लिए वित्तीय साधनों की कमी होती है।

 

प्रवासी बच्चे अक्सर सहानुभूति और समर्थन न देने वाले शिक्षकों द्वारा अपमान और अवमानना का लक्ष्य बन जाते हैं।

 

शिक्षकों की ‘अपेक्षाओं’ के अनुसार खुद को व्यक्त करने में असमर्थता के लिए बच्चे दंडित किए जाते हैं, जैसा कि बुरी भाषा (आमतौर पर माता-पिता और बच्चों दोनों द्वारा घर पर उपयोग किया जाता है) और खराब भाषा कौशल के साथ बच्चे कक्षा में प्रवेश करते हैं और कोप के भागी बनते हैं।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुपस्थिति की अवधि(प्रवासी बच्चे लंबे समय के लिए अपने मूल राज्य में लौटते हैं, या यहां तक ​​कि अपने माता-पिता के साथ काम करते हैं) से शिक्षकों का गुस्सा बढ़ता है। बच्चों के स्कूल वापस लौटने पर उन्हें गलत तरीके से दंडित किया जाता है। इस तरह के शिक्षक दृष्टिकोण प्रशिक्षण की कमी को दर्शाते हैं।

 

शिक्षकों का मानना ​​है कि प्रवासी बच्चों को पढ़ाना उचित नहीं है क्योंकि वे ” हर हाल में बाद में किसी के घर की सफाई ही करेंगे”, जैसा कि रिपोर्ट में पाया गया है।

 

उनका मानना ​​है कि बच्चे स्कूल में अच्छा प्रदर्शन करने में असमर्थ हैं। शिक्षक गरीबी को ‘पूर्वाग्रह’ के रूप में देखते हैं, जिसका अर्थ है कि बच्चे शिक्षा के योग्य नहीं हैं। वे यह समझने में नाकाम रहे कि अवसरों और संसाधनों तक पहुंच की कमी के कारण ही वे औपचारिक शिक्षा के साथ संघर्ष कर रहे हैं।

 

सामाजिक विभाजन माता-पिता और शिक्षकों को बातचीत करने और एक कामकाजी रिश्ते की स्थापना करने, बच्चों की शिक्षा को और अधिक प्रभावित करने से भी रोक रहा है।

 

 बद्तर भुगतान, अत्यधिक काम और बद्तर काम करने की स्थितियों में संचालन करने वाले अंडर-रिसोर्स शिक्षक समस्या को आगे बढ़ाते हैं, जैसा कि शिक्षक ” छात्रों के प्रति आक्रामक तरीके से कार्य करते हैं” और “शायद ही कभी वे पेशेवर आचरण के लिए जागरूकता दिखाते हैं।” बद्तर शासन, जैसे कि शारीरिक दंड निगरानी समिति की कमी ( शारीरिक अधिकार संरक्षण के लिए राष्ट्रीय आयोग द्वारा स्थापित किया गया, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि शारीरिक दंड पर प्रतिबंध लागू किया गया है ) का मतलब है कि अनैतिक शिक्षक आचरण से हमेशा सही तरीके से निपटा नहीं जाता है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।  खतरा यह है कि उपरोक्त सभी कारकों के एक जहरीले संयोजन का मतलब है कि बच्चों को मनमाने ढंग से हिंसा के रूपों के अधीन किया जाता है, और कम निरीक्षण के साथ पहले से ही शिक्षकों को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं है।

 

बच्चों को बाथरूम में जाने, कक्षा में और ब्रेक के दौरान बातें करने, स्कूल यार्ड के चारों ओर दौड़ने और अन्य बच्चों के साथ लड़ने जैसे “सामान्य बाल-व्यवहार व्यवहार” के लिए दंडित किया जाता है।

 
शारीरिक दंड की कीमत

 

सर्वेक्षित 53 फीसदी बच्चों ने अपने माता-पिता को कभी नहीं बताया कि उन्हें स्कूल में दंडित किया गया है, जिसने माता-पिता और बच्चे के बीच के भरोसेमंद रिश्ते को भी कमजोर कर दिया है।

 

इसका मतलब यह भी है कि कई बच्चे अपने दर्दनाक अनुभवों से खुद जूझ रहे हैं और इसका उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है।

 

 यह देखते हुए कि सीखना और शारीरिक दंड एक साथ ही चलता है, बच्चे रोजाना हिंसा को देख निराश हो जाते हैं और यहां तक ​​कि हल्के प्रकार के शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न की पहचान करने की क्षमता भी खो देते हैं।

 

हिंसा का अनुभव करने वाले बच्चे भी ‘हिंसक अपराधी बनने’ की संभावना रखते हैं।

 

 रिपोर्ट में कहा गया है कि शारीरिक दंड के प्रसार के माध्यम से, स्कूल बड़े पैमाने पर भारतीय समाज में हिंसा के स्तर में योगदान दे रहे हैं।

 
(संघरा लेखक और शोधकर्ता है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)
 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 22 नवंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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