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“कांग्रेस ने दिल्ली पर कई साल शासन किया, लेकिन शिक्षा के लिए कुछ नहीं किया !”

श्रीहरि पलियथ,
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बेंगलुरु: 2018 में, दिल्ली के सरकारी स्कूल के 90.6 फीसदी छात्रों ने 12 वीं कक्षा पास की । यह दर निजी स्कूलों की तुलना में दो प्रतिशत अंक ज्यादा है और पिछले वर्ष की तुलना में कई प्रतिशत ज्यादा और माध्यमिक शिक्षा के केंद्रीय बोर्ड की तुलना में अधिक है।

 
V‘आम आदमी पार्टी’ ने 2015 में भारत की राजधानी की 70 विधान सभा सीटों में से 67 पर जीत हासिल की। (हालांकि यह 2014 में दिल्ली में लड़ी गई किसी भी संसदीय सीट को नहीं जीत सकी) इसके बाद से इन्फ्रास्ट्रक्चर और शिक्षा के तरीकों को नया रूप दिया गया है।

 

दिल्ली के शिक्षा मंत्री के सलाहकार और आम आदमी पार्टी (आप) से पूर्वी दिल्ली के लिए लोकसभा उम्मीदवार, 37 वर्षीय अतिशी, 2019 के लोकसभा, के लिए आप के छह उम्मीदवारों में से एकमात्र महिला हैं। अतिशी को दिल्ली सरकार के स्कूलों के परिवर्तन का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने बच्चों के सीखने के स्तर के आधार पर कक्षा 6 से 8 में शिक्षण प्रथाओं में सुधार सहित बदलाव में एक “महत्वपूर्ण भूमिका” निभाई है। इसे अब कक्षा 3 तक बढ़ा दिया गया है।

 

आतिशी ने कहा कि दिल्ली के कई शैक्षिक हस्तक्षेप देशव्यापी हो सकते हैं। जो बच्चे स्कूल में पिछड़ जाते हैं, वे वर्षों तक पीछे छूट जाते हैं, यदि उन्हें उनके सीखने के स्तर के अनुसार पढ़ाया न जाए।

 

उन्होंने कहा कि राजनीति में उनके कनेक्शन ने दिल्ली में “16 लाख बच्चों के जीवन को बदलने” में मदद की है और यह संख्या 2000 के दशक में समाजिक कार्यकर्ता के रुप में काम करने के दौरान की संख्या से ज्यादा है।

 

 आतिशी के पास दो मास्टर्स डिग्री हैं। दोनों ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से, एक रोड्स स्कॉलर के रूप में, शैक्षिक अनुसंधान पर। एक कार्यकर्ता के रूप में, उन्होंने मध्य प्रदेश के गांवों में “प्रगतिशील शिक्षा प्रणाली” पर काम किया है। इंडियास्पेंड के साथ एक साक्षात्कार में, आतिशी ने अपनी राजनीतिक दृष्टि के बारे में बात की। वह भारत की राजधानी के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा और शिक्षा में सुधार की मांग करती हैं।

 

एक युवा उम्मीदवार के रूप में, देश के लिए आपका दृष्टिकोण क्या है और दिल्ली सरकार के साथ आपके कार्य ने इस दृष्टि को कैसे प्रभावित किया है? एक कार्यकर्ता से एक राजनीतिज्ञ होना कितना अलग है?
 
 

दृष्टि एक ही है, फिर चाहे आप एक कार्यकर्ता हैं या एक राजनीतिज्ञ हैं। हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें अधिक से अधिक इक्विटी के लिए प्रयास कर रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि एक कार्यकर्ता के रूप में, एक बड़े सामाजिक आंदोलन या एक गैर-लाभकारी संस्था के साथ काम करने के बावजूद, प्रभाव एक पैमाने पर सीमित हो सकता है। यदि आप चुनावी राजनीति में शामिल हैं, तो बदलाव को बड़े पैमाने पर लाया जा सकता है। दिल्ली सरकार के सलाहकार के रूप में काम करने का मेरा अनुभव रहा है। एक निर्वाचित सरकार का हिस्सा होने के नाते, मैं 16 लाख बच्चों के जीवन को करीब से देखने में सक्षम थी। यह वास्तव में वह पैमाना है, जो राजनीति ला सकती है।

 
 
आप पूर्वी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से लड़ रही हैं, जहां 2014 में लगभग 67 फीसदी मतदाता महिलाएं थीं। पार्टी की एकमात्र महिला उम्मीदवार के रूप में, क्या आपको लगता है कि आपकी उम्मीदवारी का यहां प्रभाव पड़ेगा? महिलाओं के लिए आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी, यह देखते हुए कि भारत की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 12.6 फीसदी है, जो कि वैश्विक औसत 24.3 फीसदी से नीचे है?
 
 

दिल्ली में महिलाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा है। इससे इक्विटी में बाधा आती है। यदि आप अपने घर से सुरक्षित बाहर नहीं निकल सकते हैं, तो यह शिक्षा और रोजगार तक पहुंच को कम कर देता है। यह एक कारण है कि आप ने राज्यसत्ता का मुद्दा उठाया है। दिल्ली पुलिस को चुनी हुई सरकार के तहत आना है। केंद्र के लिए, यह कोई भी पार्टी हो, सुरक्षा और कानून व्यवस्था का अर्थ कश्मीर के मुद्दे, या उत्तर-पूर्व में उग्रवाद या छत्तीसगढ़ नक्सलवाद जैसे राज्यों में मुद्दे होंगे, न कि दिल्ली में स्थानीय कानून और व्यवस्था के मुद्दे। पुलिस के प्रति जवाबदेह होने के लिए, उसे निर्वाचित राज्य सरकार के अधीन आना होगा।

 

क्या आप कहेंगी कि हमें राजनीतिक दलों में और महिलाओं की जरूरत है?
 

हां, 100 फीसदी। यह तभी होता है जब किसी भी सामाजिक समूह को प्रतिनिधित्व मिलता है कि मुद्दों को बड़े पैमाने पर उठाया जाए।

 

स्कूली शिक्षा के पांच साल बाद, 10-11 साल की उम्र में, भारत में छात्रों के आधे से अधिक (51 फीसदी) ग्रेड II स्तर के पाठ पढ़ सकते हैं, जैसा कि ‘एनुअल स्टेटर ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट-2018’ से पता चलता है। आपको दिल्ली में सरकार द्वारा संचालित स्कूलों में शिक्षा और स्कूल के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन का श्रेय दिया गया है। यदि आप संसद के लिए चुनी जाती हैं तो क्या आपके पास नियोजित शिक्षा में विशिष्ट राष्ट्रीय नीति-स्तर के हस्तक्षेप हैं?

 

ठीक वही स्थिति है, जिसका सामना दिल्ली ने किया। हमने पाया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 75 फीसदी बच्चे अपनी पाठ्यपुस्तकों को नहीं पढ़ सकते हैं। पिछले पांच वर्षों से हम जिन मुद्दे पर संघर्ष कर रहे है, उसमें से यह एक है। हमने पाया है कि ऐसे हस्तक्षेप हैं जो सीखने के स्तर को सुधारने में सहायक हो सकते हैं और यह महसूस करते हैं कि कई हस्तक्षेप राष्ट्रीय स्तर पर लागू किए जा सकते हैं। हमने जिन तरीकों को अपनाया है, उनमें से एक स्तर-वार ग्रुपिंग है। एक कक्षा में ऐसे बच्चे होते हैं जो अलग-अलग सीखने के स्तर पर होते हैं, और हमने पाया कि शिक्षक उन बच्चों को पढ़ाते हैं, जो बेहतर हैं। जो बच्चे पीछे पड़ जाते हैं, वे वर्षों तक पीछे रहते हैं। जब तक बच्चों को अपने स्वयं के सीखने के स्तर पर संबोधित नहीं किया जा सकता, तब तक वे तेजी से प्रगति नहीं कर सकते।

 
कांग्रेस ने पांच वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6 फीसदी शिक्षा को आवंटित करने का वादा किया है। शिक्षा में आपके अनुभव को देखते हुए आप इस चुनावी वादे का आकलन कैसे करती हैं?
 

यह यकीन करना मुश्किल है। उन्होंने कई सालों तक शासन किया और कुछ भी नहीं किया है। आप कांग्रेस के 15 साल के शासन के बाद सत्ता में आई और हमने सरकारी स्कूलों की स्थिति देखी है।

 

जीडीपी का 6 फीसदी एक अच्छा शुरुआती बिंदु है। यह सिर्फ बजट का सवाल नहीं है, बल्कि इरादे का भी है। ऐसा नहीं है कि सरकारें शिक्षा पर पैसा खर्च नहीं कर रही हैं। लेकिन खर्च के बावजूद सिस्टम काम नहीं कर रहा है। यही वह राजनीतिक मंशा है, जिस पर सरकारों को काम करने की जरूरत है।

 
 

आपने कहा है कि अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाता है तो आपकी सरकार नए कॉलेज खोलेगी और “85 फीसदी सीटें दिल्ली के बच्चों के लिए आरक्षित होंगी”। स्कूल-स्तरीय परिवर्तनों के साथ आपकी सफलता के बावजूद अब आपको किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?

 

 दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम (1922) दिल्ली में किसी भी कॉलेजिएट विश्वविद्यालय के खोलने पर प्रतिबंध लगाता है। राज्य सरकार नए कॉलेज नहीं खोल सकती है। कॉलेजिएट विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के विस्तार का सबसे तेज़ तरीका है, लेकिन वर्तमान संसदीय प्रावधान नए को रोकते हैं। हर साल, आपके पास दिल्ली में 12 वीं कक्षा के 450,000 बच्चे हैं और हमारे पास केवल 100,000 सीटें हैं, जिनमें से कई दिल्ली के बाहर के छात्रों द्वारा ली जा रही हैं। दिल्ली के सरकारी स्कूलों से पास होने वाले अधिकांश बच्चे पत्राचार के माध्यम से अपना ग्रैजुएशन कर रहे हैं, और, हम पैसे और इरादे के बावजूद, अन्य विश्वविद्यालयों को नहीं खोल सकते हैं।

 

दूसरा मुद्दा यह है कि जब दिल्ली के बच्चे दूसरे राज्यों में जाते हैं, तो वे केवल कुछ निश्चित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं क्योंकि वे उस विशेष राज्य के छात्रों के लिए आरक्षित होते हैं। लेकिन दिल्ली में आपके पास देश भर से छात्र आते हैं। दिल्ली के बच्चे उच्च शिक्षा के लिए कहां जा रहे हैं? हम बाहर से आने वाले लोगों के खिलाफ नहीं हैं। इस मामले में विधान एक मुद्दा है और यह केवल संसदीय स्तर पर किया जा सकता है।

 

“पूर्ण राज्य बनाओ झाड़ू का बटन दबाओ” के नारे के साथ आप चुनाव लड़ रही है। आपकी सरकार और केंद्र के बीच के भारयुक्त संबंधों को देखते हुए इस उद्देश्य को प्राप्त करने की आपकी क्या योजना है?

 
 

जब हम यह कहते हैं, हम उम्मीद कर रहे हैं कि परिवर्तन होगा। अगर मोदी-सरकार सत्ता में वापस आती है, तो वे दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं देंगे, क्योंकि उन्होंने पिछले पांच वर्षों में ऐसा करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

 

 हमें अन्य क्षेत्रीय दलों से समर्थन देखेंगे। हमारा दृष्टिकोण यह नहीं है कि यदि हमारे सांसद, संसद के लिए चुने जाते हैं तो वे अपने दम पर इस वादे को पूरा कर पाएंगे। हमें तेलंगाना या छत्तीसगढ़ के मामले में आम सहमति बनाने की जरूरत होगी। यहां तक ​​कि सीएम (अरविंद केजरीवाल) ने भी कहा है कि हम पूर्ण राज्य का दर्जा पाने की दिशा में काम करेंगे।

 

2014 में, पूर्वी दिल्ली से आप के लिए खड़े राजमोहन गांधी उपविजेता थे। आप क्या करने की योजना बना रही हैं, यह देखते हुए कि निर्वाचन क्षेत्र में एक मिश्रित समुदाय है, जिसमें दलित और मुस्लिम बहुल हैं? क्या आप सत्ता विरोधी लहर देखती हैं?

 

दुर्भाग्य से, यहां ज्यादातर लोग, नहीं जानते कि उनका सांसद कौन है, हालांकि वे अपने विधायक या पार्षद को जानते हैं। जबकि यहां दलितों और मुसलमानों की एक महत्वपूर्ण आबादी है, अनधिकृत कॉलोनी मतदाता भी हैं जो हमारी नीतियों के सबसे बड़े लाभार्थी हैं जैसे कि पानी की पाइपलाइन और सीवर लाइन और अन्य बुनियादी सुविधाएं जो उन्हें प्रदान की गई हैं। इससे पहले कि पार्टियां कहें कि कॉलोनियां अवैध हैं और इसलिए सरकार आप पर खर्च नहीं कर सकती है। हमारी सरकार ने दिल्ली भर में अनधिकृत कॉलोनियों के लिए एक अलग बजट बनाया है जहां 10,000 नई सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। 400 से अधिक कॉलोनियों को पाइप्ड पानी की सुविधा दी गई है।

 

हमारी सरकार के सत्ता में आने से पहले जनसांख्यिकी को व्यवस्थित रूप से छोड़ दिया गया था। इसलिए, हमारे पास निम्न आर्थिक वर्ग के बीच एक मजबूत आधार है। इसके अलावा, दिल्ली सरकार के स्कूलों और मुहल्ले (पड़ोस) के क्लीनिकों में सुधार के लाभार्थी दलित और मुस्लिम हैं जो सबसे अधिक हाशिए पर हैं। यह सब देखते हुए, मैं कहूंगी कि यहां सत्ता विरोधी भावना है।

 

यमुना, जो आपके निर्वाचन क्षेत्र के कुछ हिस्सों से बहती है, भारी प्रदूषित है। इस जल गुणवत्ता संकट से निपटने के लिए आपकी क्या योजना है?

 

दिल्ली जल बोर्ड, जो कि सीएम के अधीन है, वजीराबाद औद्योगिक क्षेत्र के पास एक बड़े पैमाने पर सीवेज प्लांट पर काम कर रहा है, जहां कई सहायक नदियां यमुना में मिलती हैं। हम उम्मीद कर रहे हैं कि एक बार तैयार होने के बाद यहां नदी की स्थिति में काफी सुधार करेगा। यह कुछ समय की बात है। हम दिल्ली की झीलों को पुनर्जीवित करने पर भी काम कर रहे हैं।

 

जबकि आप पार्टी चुनाव लड़ने के लिए क्राउडफंडिंग कर रही हैं। जनवरी और मार्च 2019 के बीच लगभग 1,716 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बेचे गए। आप इस विकास और भारत में चुनावी बॉन्ड के उपयोग को कैसे देखते हैं?

 

आप ने अपनी स्थापना के बाद से राजनीतिक दलों के लिए स्वच्छ धन का बीड़ा उठाया है।  2013 में हमारा पहला चुनाव हमारी वेबसाइट, आयोजनों के माध्यम से वित्त पोषित किया गया था और 20 करोड़ रुपये जुटाए थे। हमने हमेशा यह माना है कि यदि चुनाव आम लोगों द्वारा वित्त पोषित किया जाता है, तो आप उन्हें बेहतर सेवा देंगे। आप इस दृष्टिकोण को देख सकते हैं, जब हम सुनिश्चित करते हैं कि निजी स्कूलों को फीस और बिजली की दरों को बढ़ाने की अनुमति नहीं है जो कि चार साल से एक ही दर पर बनाए रखी गई हैं। निहित स्वार्थों के खिलाफ जाने वाले ये फैसले तभी संभव हैं, जब पार्टी को साफ-सुथरा पैसा मिले। हमने उसी दर्शन का अनुसरण किया है और पिछले कुछ महीनों में 53 लाख रुपये (आतिशी के लिए) जुटाए हैं और अधिकांश योगदान 100 रुपये से 500 रुपये तक के हैं। चुनावी बांड राजनीतिक भ्रष्टाचार का सबसे खराब रूप है और संस्थागत रूप से हमें हमेशा संदेह होता है कि यहां पारदर्शिता की कमी है। बीजेपी को इस प्रक्रिया के माध्यम से 95 फीसदी पैसा मिला है और हमारे पास कोई जानकारी नहीं है कि वे लोग या संगठन कौन हैं।

 
( पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। )
 
यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 21 अप्रैल, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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