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केरल की बाढ़ 1924 के जलप्रलय से कम भयावह, नुकसान ज्यादा

भास्कर त्रिपाठी,
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नई दिल्ली: केरल में 88 दिनों में 2,378 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से चार गुना अधिक थी। लेकिन 1924 में हुए जल प्रलय से 30 फीसदी कम और 61 दिन अधिक बारिश हुई है। 1924 में आई बाढ़ राज्य के दर्ज इतिहास में सबसे भयावह बाढ़ है

 

केरल में आई 2018 की बाढ़ 94 साल पहले हुई 3,368 मिमी बारिश के समान ही विनाशकारी (स्थानीय रूप से ‘99 का जलप्रलय’ कहा जाता है, क्योंकि यह मलयालम कैलेंडर के वर्ष 1099 में हुआ था) क्यों थी ?

 

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि केरल ने पत्थरों के अवैध खनन, जंगलों और घास के मैदानों को काटने, नदी के तलों पर जल निकासी पैटर्न को बदलने और रेत खनन की अनुमति देकर इस तरह के चरम बाढ़ से निपटने के लिए अपनी क्षमता कम कर दी है।

 

बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में सेंटर फॉर इकोलोजिकल साइंस के संस्थापक और पारिस्थितिक विज्ञानी माधव गडगील ने इंडियास्पेंड को बताया कि, ” भूस्खलन के पीछे का कारण अत्यधिक पत्थर की खुदाई और गड्ढे खोदना है। इसने केरल में बाढ़ की स्थिति को और खराब किया है।ये खदान वनों की कटाई का कारण बनते हैं और प्राकृतिक धाराओं को अवरुद्ध करते हैं, जो बाढ़ की तीव्रता को बढ़ाता है। “

 

केरल में 373 लोगों की मौत मलाप्पुरम और वायनाड के उत्तरी जिलों और इडुक्की के केंद्रीय जिले में भूस्खलन के कारण हुई थी।

 

गडगिल, पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (डब्लूजीईईपी) द्वारा वर्ष 2011 में सरकार द्वारा संचालित अध्ययन के प्रमुख लेखक हैं (आम तौर पर गडगिल समिति की रिपोर्ट कहा जाता है, इस अध्ययन के वह प्रमुख थे।

 

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि पश्चिमी घाटों में विकास प्रतिबंधित हो, जो केरल समेत छह राज्यों में फैलता है।

 

भूमि उपयोग में परिवर्तन तेजी से अनिश्चित मौसम के समय शुरु हुआ था- तीव्र बारिश या सूखा।

 

पुणे के इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटेरोलोजी में जलवायु वैज्ञानिक रोक्सी मैथ्यू कोल ने इंडियास्पेंड को बताया, ” अत्यधिक वर्षा की हमारी संवेदनशीलता बढ़ रही है क्योंकि भूमि विकास जल निकासी पैटर्न बदल रहा है। जब मिट्टी के सोखने की तुलना में अधिक बारिश होती है, पानी जल्दी बहता है, धाराएं, नालियां और नदियां को भर देती हैं, जिससे बाढ़ आती है।”

 

 

गाडगील समिति द्वारा हाल के बाढ़ से जलप्लावित अधिकांश क्षेत्रों को ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जहां कोई निर्माण या वनों की कटाई नहीं होनी चाहिए।

 

वर्ष 2011 में, केरल समेत केंद्र सरकार और पश्चिमी घाट के राज्यों ने गडगिल समिति की रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

 

पश्चिमी घाट: सुपर स्पंज

 

हरियाणा के आकार से तीन गुना से अधिक 160,000 वर्ग किलोमीटर में फैले, भारत के पश्चिमी तट के साथ पश्चिमी घाट छह राज्यों- केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैले हैं।

 

घाटों की बारिश और उष्णकटिबंधीय जंगल, विश्व के 10 “जैव विविधता हॉटस्पॉट” में से एक है, और उपमहाद्वीप में जीवन की सबसे विविध श्रेणी का घर है। फूल पौधों की 7,402 प्रजातियां, गैर फूल वाले पौधों की 1,814 प्रजातियां, 139 स्तनपायी प्रजातियां, 508 पक्षी प्रजातियां, 179 उभयचर प्रजातियां, 6,000 कीड़े प्रजातियां और 290 ताजे पानी की मछली प्रजातियां।

 

घाट भारतीय प्रायद्वीप को पानी देने वाली लगभग 20 नदियों और सहायक नदियों का स्रोत हैं, और इसके जंगलों और घास के मैदान एक सुपर स्पंज के रूप में कार्य करते हैं, जो अतिरिक्त बारिश सोखता है।

 

जैव विविधता, जल सुरक्षा और प्रतिधारण विशेषताओं के साथ, गडगील समिति ने घाटों को तीन जोनों में वर्गीकृत करने का सुझाव दिया: पारिस्थितिक रूप से उच्च संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड 1), जहां कुछ प्रकार के क्षेत्र “नो-गो” होंगे, जिनमें जल पाठ्यक्रम, जल निकायों, विशेष आवास, जैव विविधता समृद्ध क्षेत्र और पवित्र ग्रोव शामिल हैं; पारिस्थितिक रूप से उच्च संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड 2), जहां “अत्यधिक आवश्यक” को छोड़कर, नई रेलवे लाइनों और प्रमुख सड़कों का निर्माण करने की अनुमति नहीं दी जाएगी; और पारिस्थितिक रूप से मामूली संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड 3), जहां “सख्त पर्यावरणीय नियम” के साथ, सड़कों जैसी नई ऊर्जा परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे की अनुमति दी जा सकती है।

 

समिति की सिफारिशों में, खनन और खनन पर प्रतिबंध, गैर वन प्रयोजनों के लिए भूमि का उपयोग और किसी तरह का उच्च निर्माण न होना शामिल है।

 

गडगिल कहते हैं, “हमने सभी स्थानीय सरकारी निकायों के परामर्श से क्षेत्र-विशिष्ट सिफारिशें की थी, लेकिन हमारी रिपोर्ट खारिज कर दी गई थी।”

 

Scribd पर इंडियास्पेंड द्वारा पश्चिमी घाटों के लिए क्षेत्र-वार सिफारिश

 

गडगिल समिति की रिपोर्ट में कहा गया है, “कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों समेत दक्षिणी क्षेत्र में एक अध्ययन से पता चला है कि 1920-1990 के बीच मूल वन कवर का लगभग 40फीसदी खो गया था या जमीन का उपयोग दूसरे रूप में परिवर्तित हो गया था।”

 

गडगिल कहते हैं, “जंगलों के भूमि उपयोग में परिवर्तन इस क्षेत्र को (केरल जैसी) आपदाओं के रूप में सामने लाता है, लेकिन सचेत रहते तो आपदा का स्तर कम हो सकता था।

 

सरकार का भ्रम

 

अन्य विशेषज्ञों की तरह, गडगिल समिति के सदस्य और केरल राज्य जैव विविधता बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वी के विजयन ने इंडियास्पेंड को बताया कि बाढ़ विनाश के कारणों में बांधों के पकड़ क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई, 30 डिग्री से अधिक ढलानों पर अवैध निर्माण और खेती शामिल हैं।

 

विजयन कहते हैं, “इनमें से कई गतिविधियां मिट्टी को ढीला कर देती हैं जिससे क्षेत्र भूस्खलन के लिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं। हमने गाडगील समिति की रिपोर्ट में इन सभी मानवीय गतिविधियों के खिलाफ सिफारिश की थी, लेकिन किसी ने नहीं सुनी।”

 

विजयन के मुताबिक, गडगील समिति की रिपोर्ट को अस्वीकार करने के मुख्य कारणों में से एक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों और पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्रों की परिभाषा के बीच सरकार का भ्रम था।

 

इकोलोजी फ्रैजल लैंड्स एक्ट केरल का 15 वर्ष पुराना कानून है, जो कहता है कि वन्यजीव अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उद्यानों जैसे संरक्षित क्षेत्रों से लोगों को बेदखल किया जा सकता है। सरकार ने सोचा कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र अनिवार्य रूप से वही थे। विजयन ने कहा, “वो मामला नहीं था।”

 

विजयन कहते हैं, “हमने स्पष्ट रूप से पूरे घाटों को अपनी पारिस्थितिकी और सुरक्षा की जरूरतों के आधार पर तीन जोनों में विभाजित किया है। इसका मतलब यह नहीं था कि मनुष्यों को संवेदनशील क्षेत्रों से बेदखल किया जाना था।”

 

उन्होंने कहा कि अत्यधिक बारिश की घटनाओं को रोका नहीं जा सकता है, लेकिन अगर जंगलों और प्राकृतिक परिवेश का ढाल के रूप में उपयोग किया जाता है तो बाढ़ के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

 

जलवायु परिवर्तन से भारी बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी

 

जब पश्चिमी घाटों तक पश्चिम से तेज हवाएं आती हैं तो बादल बनते हैं और बारिश होती है। पुणे के ‘इंडियन मेट्रोलोजिकिल डिपार्टमेंट’ के जलवायु पूर्वानुमान समूह के प्रमुख, डी शिवानंद पई ने इंडियास्पेंड को बताया, “आम तौर पर, तेज हवाओं में अधिक तीव्र बारिश होती है।  2018 के मानसून में, भूमि और अरब समुद्र के बीच ‘दबाव ढाल’ ( जो दबाव में परिवर्तन और बदले में, वर्षा निर्धारित करता है ) बहुत मजबूत था, जिससे भारी बारिश हुई। बंगाल की खाड़ी में विकसित एक कम दबाव और चलने वाला अंतर्देशीय हवाओं ने भारी बारिश में योगदान दिया। “

 

केरल ने जो देखा, वह एक छोटी सी अवधि में उच्च तीव्रता की वर्षा की घटना थी। भारत में भारी बारिश की घटनाओं की तीव्रता बढ़ रही है। पिछले 110 वर्षों से 2010 तक, भारत में भारी बारिश की घटनाओं में प्रति दशक 6 फीसदी की बढ़ती प्रवृत्ति दिखाती है, जैसा कि नवंबर 2017 के एक अध्ययन में कहा गया है। इस अध्ययन के सह-लेखक पई थे, जो यह कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से उच्च तीव्र वर्षा होती है।

 

इन घटनाओं को बाढ़ के लिए भी जिम्मेदार माना गया है।

 

19 मार्च, 2018 को राज्यसभा को प्रस्तुत केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 1953 और 2017 के बीच 64 वर्षों के दौरान देश भर में 107,487 मौत के आंकड़ों के साथ बाढ़ और भारी बारिश के कारण भारत की विश्व में होने वाले मौतों में पांचवी हिस्सेदारी है।

 

फसलों, घरों और सार्वजनिक उपयोगिताओं को नुकसान 365,860 करोड़ रुपये है, जो भारत के मौजूदा सकल घरेलू उत्पाद का 3 फीसदी है, जैसा कि आंकड़ों से पता चलता है।

 

आंकड़ों के मुताबिक, औसतन, बाढ़ में हर साल 1,600 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं, जो लगभग 32 मिलियन लोगों के जीवन को बाधित करते हैं। इंडियास्पेंड ने 17 जुलाई, 2018 को बताया कि हर साल 9 2,000 से अधिक मवेशी खो जाते हैं, सात मिलियन हेक्टेयर जमीन या केरल के लगभग दोगुने आकार का क्षेत्र प्रभावित होता है और लगभग 5,600 करोड़ रुपये का नुकसान होता है।

 

भारत 2040 तक गंभीर बाढ़ के खतरे के संपर्क में आने वाली आबादी में छह गुना वृद्धि देख सकता है ( 1971 और 2004 के बीच 3.7 मिलियन से 25 मिलियन लोगों को इस तरह के जोखिम का सामना करना पड़ा है , जैसा कि पत्रिका ‘साइंस एडवांस ‘में प्रकाशित 2018 के एक अध्ययन का हवाला देते हुए, इंडियास्पेंड ने फरवरी 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 अगस्त, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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