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कैसे बंद जेलों में भीड़ का असली समाधान है खुली जेलें !

चारु बाहरी,
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34 वर्षीय दीपक लालप्रसाद हत्या के दोषी हैं। वह 2014 से उदयपुर में खुली जेल में रह रहे हैं । लालप्रसाद ने परंपरागत जेल में भी 10 साल तक रहे हैं।खुली जेल में 24 कैदियों में से एक, दीपक अब उदयपुर केंद्रीय बस डिपो के पास एक स्टॉल चलाते हैं। राजस्थान में 29 खुली जेलों में कम से कम 1,127 कैदी अकाउंटेंट, स्कूल शिक्षक, घरेलू सेवक और सुरक्षा गार्ड के रूप में काम कर रहे हैं।

 

उदयपुर: गंभीर दिखने वाला 35 वर्षीय कालू तुलसीराम*,  उदयपुर केंद्रीय बस डिपो के पास एक स्टॉल पर चाय बना रहा था। दोपहर होने को था और मुख्य सड़क पर चाय स्टालों के लिए एक व्यस्त समय था। कुछ मीटर दूर, भारी सा दिखने वाला 33 वर्षीय  दीपक लालप्रसाद*, ज्यादा तनावमुक्त दिख रहे हैं। वह पास ही एक और स्टॉल चला रहे हैं । उनको ग्राहकों का इंतजार है।

 

आने-जाने वाले यात्री या ग्राहक कभी अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं कि ये दोनों शख्स हत्या के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।

 

2014 से, कालू और दीपक उदयपुर में खुली जेल में रह रहे हैं। इन दोनों ने पारंपरिक जेलों में 10 वर्ष बिताए हैं। खुली जेल में कैदियों को अपने परिवारों के साथ रहने और दिन के दौरान जीवन यापन करने के लिए कमाई करने की अनुमति दी जाती है। राजस्थान में 29 खुली जेलों में कम से कम 1,127 कैदी अकाउंटेंट, स्कूल शिक्षक, घरेलू सेवक और सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करते हैं। यहां तक कि इनमें हत्या के दोषी और अन्य सजा काटने वाले कैदी भी शामिल हैं।

 

उदयपुर खुली जेल में कैदियो के लिए कमरे। इस जेल में कैदियों को अपने परिवारों के साथ रहने और जीवन यापन करने के लिए दिन के दौरान कमाई करने की अनुमति दी जाती है।

 

इन जेलों में कैदियों के लिए न केवल सुधार और समाज में पुनर्वास के लिए प्रारंभिक अवसर मौजूद है, बल्कि पैसे और कर्मचारियों के मामले में इसकी लागत भी कम है, जैसा कि  राजस्थान के खुले जेलों पर 2017 की एक रिपोर्ट में कहा गया है।  जिसके बाद मई, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को खुली जेलों की क्षमता का पूरी तरह से उपयोग और विस्तार करने के साथ-साथ अधिक खुली जेलों की स्थापना करने का आदेश दिया था। 
 
क्यों हो खुली जेलें?

 

संकल्पनात्मक रूप से इस तरह की खुली जेलें उन कैदियों के पुनर्वास के लिए विकसित किए गए थे, जिन्होंने लगभग अपनी सजा पूरी कर ली थी। 19वीं शताब्दी में अमरीका में विकसित सबसे पुरानी खुली जेलों में, रिहाई के करीब कैदियों के व्यवहार का मूल्यांकन करने के लिए, उन्हें मजदूरों के रूप में काम करने के लिए उनके भेजा जाता था।

 

भारत में, उत्तर प्रदेश में 1953 में स्थापित सबसे पुरानी खुली जेल में कैदियों को रखा गया था, जिनसे वाराणसी के पास चंद्रप्रभा नदी पर एक बांध बनाने के दौरान सहायता ली गई थी।

 

1955 में जयपुर के पास दुर्गापुर में स्थापित एक फार्म, राजस्थान की पहली खुली जेल में थी, जहां कैदियों को पहले अपने परिवारों के साथ रहने और खेत या नजदीक में काम करने की इजाजत थी।

 

दिसंबर 2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से 2017 की एक रिपोर्ट के आधार पर प्रत्येक जिले में एक खुली जेल स्थापित करने के लिए कहा, जो राजस्थान की खुली जेल प्रणाली की सफलता का विस्तार है। 8 मई, 2018 को आदेश के साथ इस सुझाव का पालन किया गया,  जिसमें राज्यों को ‘इन खुली जेलों की क्षमता का प्रयास करने और उपयोग करने’ के लिए कहा गया। इसकी संख्या 63 है और इसकी क्षमता 5,370 है, लेकिन 30 फीसदी सीटें अप्रयुक्त हैं । कोर्ट ने कहा था कि “राज्यों को मौजूदा खुली जेलों की क्षमता में वृद्धि करने पर विचार करना चाहिए और “जितना संभव हो सके उतने स्थानों में खुली जेलों की स्थापना की व्यवहार्यता पर गंभीरता से विचार करें।”

 

खुली जेल बनाने में कैदियों का पुनर्वास उस दिन से शुरू हो सकता है जब उन्हें कैद किया जाता है, न कि अपनी सजा का बड़ा हिस्सा काट लेने के बाद। रिपोर्ट में दिखाया गया है कि इससे भारत की सुरक्षा कम नहीं होगी।

 

राजस्थान राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा 2017 के राष्ट्रीय कानून दिवस ( 26 नवंबर ) पर जारी रिपोर्ट से पता चलता है कि खुली जेलें ‘खजाने पर बोझ कम करती हैं और जेलों में अत्यधिक भीड़ को कम करती हैं” और  “कानून के खिलाफ गए व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा लाने में मदद करता है”, जैसा कि रिपोर्ट कमीशन में शरीक प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष कल्पनाश सत्येंद्र झावेरी कहते हैं।

 
समाज के लिए खतरा नहीं

 

इस परिदृश्य पर विचार करें: एक शख्स की बेटी के साथ बलात्कार किया जाता है। वह शख्स बलात्कारी की हत्या कर देता है। उस शख्स को आजीवन कारावास की सजा के तहत जेल में रखा जाता है। वह शख्स हत्यारा है लेकिन अब वह समाज के लिए कितना बड़ा खतरा है? अब किसी को मारने के पीछे उसका मकसद क्या है?

 

जेल शोधकर्ता स्मिता चक्रवर्ट्टी के अनुसार, “सभी कैदियों को एक ही चश्मे से देखने पर जेलों के लिए उपलब्ध सीमित धन का उपयोग करने में मदद नहीं मिलती है।”

 

इस कहानी को देखें कि कालू जेल तक कैसे पहुंचा? ” जमीन के टुकड़े को लेकर एक आदमी से मेरी लड़ाई हुई,” कालू ने इंडियास्पेंड को बताया। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ तहसील में घोसुंडा गांव के मूल निवासी कालू ने कहा, “मेरे हाथ में लकड़ी का एक टुकड़ा था, और मैंने उससे वार कर दिया। हम एक-दूसरे को मार रहे थे।”

 

घबराहट में,  कालू ने प्रतिद्वंद्वी के सिर पर मारा और वह मर गया, और कालू एक हत्यारा बन गया। कालू ने कहा, “मैं उस आदमी को जान से नहीं मारना चाहता था।”
 

35 वर्षीय कालू तुलसीराम की जमीन के टुकड़े को लेकर एक आदमी से लड़ाई हुई। उस लड़ाई में उस आदमी की मौत हो गई थी। इस तरह के आकस्मिक या अनियोजित घटनाओं ने 428 कैदियों में से 57 फीसदी (244) को हत्यारा बनाया है, जिनसे शोधकर्ता स्मिता चक्रवर्ती ने राजस्थान के 29 खुली जेलों में से 15 जेलों के दौरे के दौरान मुलाकात की है।

 

इस तरह के आकस्मिक या अनियोजित घटनाओं ने 428 कैदियों में से 57 फीसदी (244) को हत्यारा बनाया है, जिनसे शोधकर्ता स्मिता चक्रवर्ती ने राजस्थान के 29 खुली जेलों में से 15 जेलों के दौरे के दौरान मुलाकात की है। उन्होंने 90 फीसदी कैदियों से बात की, केवल वे कैदियों से नहीं मिल पाई जो काम पर बाहर गए थे। इसलिए 57 फीसदी का एक प्रतिनिधि आंकड़ा है।   कैदियों में से 81 फीसदी (428 में से 347) पहली बार अपराध करने वाले थे, जिनका कोई पिछला पुलिस रिकॉर्ड नहीं था। यह स्थिति पूरे देश में जेलों में प्रतिबिंबित होती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के जेल आंकड़ों के मुताबिक 2015 के दौरान पूरे देश में जेलों में भर्ती 186,566 अभियुक्तों में से केवल 3 फीसदी आदतन अपराधी थे या बार-बार अपराध करते देखे गए। उदयपुर सेंट्रल जेल अधीक्षक सुरेंद्र सिंह ने इंडियास्पेंड को बताया, ” जो बार-बार अपराध करते हैं, वे असल में ‘आपराधिक दिमाग’ वाले होते हैं, जो समाज के लिए खतरनाक हो सकते हैं और इसलिए उन्हें बंद जेलों में रखा जाना चाहिए, लेकिन उन्हें भी सुधार और पुनर्वास की आवश्यकता है।”

 

उदयपुर सेंट्रल जेल अधीक्षक सुरेंद्र सिंह ने इंडियास्पेंड को बताया, ” जो बार-बार अपराध करते हैं, वे असल में ‘आपराधिक दिमाग’ वाले होते हैं, जो समाज के लिए खतरनाक हो सकते हैं और इसलिए उन्हें बंद जेलों में रखा जाना चाहिए।”  2015 के दौरान पूरे देश में जेलों में भर्ती 186,566 अभियुक्तों में से केवल 3 फीसदी आदतन अपराधी थे या बार-बार अपराध करते देखे गए

 

चक्रवर्ती कहते हैं, अक्सर, कानून के बारे में जागरूकता की कमी के कारण लोगों को कैद कर लिया जाता है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान में अफीम लेने के लिए लोगों को जेल में कैद किया गया। यह उनके अपराध की प्रकृति की समझ की कमी को दर्शाता है। उन्होंने  आगे बताया, “क्योंकि प्राचीन काल से उनके समुदायों के पास अफीम तक पहुंच है, और उन्हें मौजूदा कानूनों का कोई अंदाजा नहीं है।” किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन 1985 के नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस एक्ट के तहत एक गैर-जमानती अपराध है। हालांकि, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में लाइसेंस के तहत अफीम की खेती की अनुमति है।

 

चक्रवर्ती कहते हैं कि अपराधियों के अलावा जो मनोरोगी हैं या जिन्होंने असाधारण क्रूर अपराध किए हैं, उनमें से अधिकांश कैदियों को समाज से हटाने की जरूरत नहीं है। उन्हें उनके किए अपराध पर और पुनर्वास के बारे में जागरूक बनाने की जरूरत है।

 

चक्रवर्ती कहते हैं,”न्याय बदला लेना नहीं है। इसे पीड़ित के लिए भी उतना ही काम करना चाहिए जितना कि अपराधी के लिए। अगर समाज अधिक हिंसा के साथ प्रतिक्रिया देता है, तो कैदियों के मन में समाज के प्रति प्रतिशोध की भावना विकसित होती है। वह अधिक क्रूर बनता है। अगर हम अपने परिवार के लिए आजीविका कमाने की कैदी की जरूरत को अनदेखा करते हैं, तो एक आदमी जो जेल में बलात्कारी के रूप में प्रवेश करता है, वह एक गैंगस्टर के रूप में बाहर आ सकता है। “

 

खुली जेलें और कैदियों का व्यवहार
 

 कैदियों के लिए उदयपुर के ओपन एयर कैंप में प्रत्येक सुबह और शाम एक रोल-कॉल कैदियों की गिनती होती है।  कुल मिलाकर, राजस्थान की खुली जेलों में 45 कैदियों में से 1 कैदी  पैरोल से फरार हो गया या भाग गया। अखिल भारतीय स्तर पर बंद जेलों के लिए आंकड़े 481 में से 1 कैदी का है, जैसा कि  2015 के जेल डेटा से पता चलता है।  चक्रवर्ती की रिपोर्ट ने खुले जेलों से कैदियों के भागने के लिए ‘पैरोल और ढीलेपन’ को जिम्मेदार ठहराया है। या दूसरे शब्दों में, कहा जाए तो कैदियों की जमानत बांड प्रस्तुत करने में विफलता, या पुलिस कर्मियों द्वारा प्रतिकूल रिपोर्ट को कारण बताया गया है।

   

राजस्थान जेल के पूर्व महानिरीक्षक और 1982-83 के जेल सुधार पर बनी न्यायमूर्ति मुल्ला कमेटी के निदेशक, आरके सक्सेना कहते हैं, “पैरोल के संबंध में प्रशासनिक मुद्दे पूरे भारत में जेलों में एक आम समस्या है, और इसे हल किया जाना चाहिए। एक कैदी के लिए पैरोल एक सशर्त रिलीज और कैदियों के लिए समाज में आत्मसात करने का अवसर है।  ” रिपोर्ट ने कई सुझाव भी दिए गए हैं, जिससे पैरोल प्रशासन में सुधार होगा और इस तरह से भागने वाले कैदियों की संख्या कम हो जाएगी। ये हैं: बॉन्ड राशि को कम करना; गारंटीकर्ताओं की आवश्यकता के बजाय व्यक्तिगत बंधन को प्रोत्साहित करना (जब तक कि एक कैदी दुर्व्यवहार करने वालान हो); और पैरोल के बाद पुलिस रिपोर्टों की बजाय सामाजिक कल्याण विभाग के बयान के आधार पर कैदी के व्यवहार पर विचार करना।कैदी सुधार में खुली जेलों की भूमिका पर अपने हिस्से में पुलिस संवेदनशील हो सकती है, जिससे पैरोल आवेदन आने पर वे निष्पक्ष जांच रिपोर्ट कर सकें। एक कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता अजय चोपड़ा कहते हैं, “कैदियों के अधिकारों को संबोधित करने में एक सक्रिय दृष्टिकोण बहुत जरूरी है। “ अजय चोपड़ा को भ्रष्टाचार के आरोपों पर 2017 में जेल भेजा गया था, लेकिन तीन महीने बाद जमानत पर रिहा कर दिया गया। अब वह खुली जेलों की अधिक स्वीकृति के लिए अभियान चलाते है, खासकर सुप्रीम कोर्ट के समर्थन के बाद। वह कहते हैं, “कैदी सुधार के लिए कैदियों को लेकर एक सकारात्मक मानसिकता जरूरी है।”  चक्रवर्ती ने इंडियास्पेंड को बताया कि, राजस्थान की खुली जेल के वातावरण को आम तौर पर कैदियों ने अच्छी तरह से आत्मसात किया है। उपरोक्त रिपोर्ट के लिए एक प्रमुख जेल शोधकर्ता और मानद जेल आयुक्त, चक्रवर्ती आगे कहती हैं, “राजस्थान में खुली जेलें कुछ सही कर रही हैं। ” वर्तमान में उदयपुर खुली जेल में रह रह 24 कैदियों में से कालू और दीपक ने इंडियास्पेंड के साथ बातचीत में जोर देते हुए बताया कि अपराध अब उनके दिमाग से बहुत दूर है। अपने चाय के स्टॉल को होटल व्यवसाय मानते हुए कालू ने कहा कि यहां से मुक्त होने के बाद वह यही काम जारी रखना चाहता है। दीपक ने जेल की अवधि के बाद अपनी योजनाओं के बारे में बताते हुए कहा, “मैं शांति से और काम करना चाहता हूं।”

 
खतरे के स्तर पर विभाजन
 

राजस्थान की खुली जेल प्रणाली को एनसीआरबी के 2015 के जेल आंकड़ों में कैदियों के कल्याण और पुनर्वास के लिए सबसे अच्छा अभ्यास माना जा रहा है।  इसे अंतिम रिहाई से पहले कैदियों की “सामाजिक समायोजन और वित्तीय आजादी की सुविधा” के लिए प्रशंसित किया गया है। यह प्रस्ताव आम तौर पर उन ‘कैदियों’ के लिए है, जिन्होंने कुल सजा का अपना एक तिहाई हिस्सा पूरा कर लिया है और जेल में जिसका आचरण अच्छा पाया गया था, ” संकलन नोट्स “राज्य सरकार द्वारा गठित समिति की सिफारिश” के अधीन है। चक्रवर्ती ने देश भर में खुले जेल नेटवर्क का विस्तार करने का प्रस्ताव रखा है, जिससे इसे अपवाद के बजाय आदर्श बना दिया जा सके, खासकर महिला कैदियो; वृद्ध और शारीरिक रूप से कमजोर कैदियों; एक बार अपराध के लिए सजा पाए कैदियों, आकस्मिक अपराध, छोटे अपराधों और जेल में किसी भी हिंसक विशेषता को दिखाने के लिए कम जोखिम के रूप में वर्गीकृत लोगों के लिए दोषी ठहराये गए कैदियों; आत्मसमर्पण करने वाले आरोपी व्यक्तियों; और जिन कैदियों को प्रत्यर्पण अनुरोधों से गुजरना पड़ता है।

 

जबकि मौजूदा प्रणाली में केवल दोषी कैदियों को खुली जेलों में रखने की बात  है, चक्रवर्ती ने ट्रायल चल रहे कैदियों के लिए भी यह सुविधा प्रदान करने की भी सिफारिश की है ( जिनकी आज भारत के जेलों में तीन में से दो की हिस्सेदारी है ) ताकि जेलों में अत्यधिक भीड़ और अमानवीय रहने की स्थिति को कम किया जा सके।  लेकिन हर कोई इस विचार से सहमत नहीं है।दिल्ली स्थित ‘ कॉमनवेल्थ ह्युमन इनिशिएटिव’ में जेल सुधार कार्यक्रम के वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी सुगंधा माथुर कहती हैं, “एक व्यक्ति को जमानत से वंचित कर दिया जाता है और केवल तभी न्यायिक हिरासत में भेजा जाता है जब एक मजिस्ट्रेट ने मूल्यांकन किया है कि अगर कैद नहीं किया जाता है, तो साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है या जांच में बाधा आ सकती है, या भागने का जोखिम होता है, इस प्रकार जांच प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।“

 

उन्होंने कहा, “यदि इनमें से कोई भी कारण मौजूद नहीं है, तो अभियुक्त को स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखने के लिए जमानत पर रिहा कर दिया जाना चाहिए, मूल रूप से, यदि परिस्थितियों में जमानत वारंट है, तो  मुक्त किया जाना चाहिए, और यदि नहीं, तो कैदी होना चाहिए सलाखों के पीछे रखना चाहिए, खुली जेल में नहीं।”

 

खुले सुधार संस्थानों के प्रशासन के लिए मॉडल समान नियमों का मसौदा तैयार करने के लिए, फरवरी 2018 में पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो द्वारा संचालित उप-समिति की सदस्य भी हैं सुगंधा माथुर ।

 

आर्थिक अर्थ, सामाजिक लाभ
 

 भारत में 63 खुली जेल हैं, जिनकी क्षमता 5,370 है, जो पूरे देश में 419,623 कैदियों में से 1.28 फीसदी को रखने के लिए पर्याप्त है। हालांकि, 30 फीसदी सीटें अप्रयुक्त हैं, जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स ने 12 दिसंबर, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।जेल सांख्यिकी 2015 के अनुसार, जबकि राजस्थान में 29 खुली जेल हैं, महाराष्ट्र में 13, केरल और तमिलनाडु में तीन हैं, और गुजरात और पश्चिम बंगाल में दो-दो खुली जेलें हैं।

 

राजस्थान की रिपोर्ट ने प्रति जिले में दो खुली जेल खोलने की वकालत की क्योंकि वे कैदी सुधार के लिए बेहतर अनुकूल हैं और राज्य पर वित्तीय बोझ कम करते हैं। कैदियों पर मासिक खर्च की तुलना करके, यह दिखाया गया कि संगानेर शहर में खुली जेल की तुलना में जयपुर का केंद्रीय जेल 14 गुना महंगा था।

 

रिपोर्ट में खुले कैदियों के लिए कानूनी सहायता और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की भी सिफारिश की गई और उन्हें संभावित नियोक्ताओं के साथ कामकाजी घंटों पर बातचीत करके लाभकारी रोजगार प्राप्त करने में मदद करने की बात की गई है।

 

कैदियों को अपने घर के जिले में रखते हुए और राज्य खेतों और सुविधाओं पर नियोजित लोगों के लिए पारिश्रमिक में सुधार कुछ अन्य सिफारिशें थीं।

 

चक्रवर्ती ने इंडियास्पेंड को बताया, “आप ये उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि आप लोगों को जेल में डालें और वे सात (या फिर भी कई) वर्षों के बाद गांधी के रूप में बाहर आएं। मौजूदा बंद जेल प्रणाली ऐसा उपाय नहीं है। खुली जेलें भविष्य की आदर्श जेलें बननी चाहिए।”

 

तत्काल जेल सुधार की जरूरत क्यों ?
 

 जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, जेलों में अत्यधिक भीढ़ की वजह से मानव अधिकारों का उल्लंघन एक बड़ा मुद्दा है।  एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में, दादरा और नगर हवेली (276.7 फीसदी), छत्तीसगढ़ (233.9 फीसदी) और दिल्ली (226.9 फीसदी) में जेल अधिभोग दर 200 फीसदी से अधिक हो गई। 13 अन्य राज्यों में जेल क्षमता से परे थे।

 

2015 में कैदी रखने की क्षमता से परे राज्य

Source: Prison Statistics 2015, National Crime Records Bureau

 

हाल ही में टेडक्स टॉक में, चक्रवर्ती, जिन्होंने बिहार में बंद जेलों में 30,070 कैदियों के साथ बातचीत की है,  उन्होंने जेलों की भीड़ को इस तरह से वर्णन किया कि कैदियों ने सोने के लिए खुद को सलाखों से बांध लिया था, क्योंकि लेटने के लिए जगह नहीं थी।

 

खुली जेलों की अवधारणा को अपनाने ( या “अर्द्ध खुले जेल” जहां योग्य अभियुक्तों को दिन के दौरान जेल परिसर में काम करने की अनुमति दी जा सकती है, या अपने सुरक्षित परिवहन के लिए विशेष व्यवस्था करने के बाद कारखाने में, जो माथुर ने प्रस्तावित किया है ) से धन और कर्मचारियों के मामले में प्रशासन को मदद मिलेगी।  चक्रवर्ती की रिपोर्ट में कहा गया है कि संगानेर ओपन जेल की तुलना में जयपुर सेंट्रल जेल 14 गुना अधिक खर्च करता है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक महीने प्रत्येक कैदी पर 500 रुपये के मुकाबले 7,094 रुपये खर्च करता है।

 

चक्रवर्ती बताती हैं, सांगानेर खुली जेल में, राजस्थान की 400 की क्षमता वाला सबसे बड़ी जेल, एक कर्मचारी- 80 कैदियों का प्रबंधन करता है जबकि जयपुर सेंट्रल जेल में, एक कर्मचारी छह कैदियों का प्रबंधन करता है (अनुशंसित संख्या चार कैदियों के लिए एक कर्मचारी है)।

 

कर्मचारियों की कमी जेलों में एक वास्तविकता है।

 

 राजस्थान में, 4,426 स्वीकृत जेल विभाग के कर्मचारियों की पदों में लगभग आधा या 2,129 खाली हैं।

 

उदयपुर सेंट्रल जेल के सिंह ने कहा, “हम 155 गार्डों के साथ लगभग 1,250 कैदियों का प्रबंधन कर रहे हैं, जबकि 1 9 70 के दशक में हमारे पास 250 कैदियों का प्रबंधन करने के लिए 165 गार्ड थे।”

 

कर्मचारियों की कमी जेलों में एक वास्तविकता है। उदयपुर सेंट्रल जेल के अधीक्षक सुरेंद्र सिंह ने कहा, “हम 155 गार्डों के साथ लगभग 1,250 कैदियों का प्रबंधन कर रहे हैं, जबकि 1 9 70 के दशक में हमारे पास 250 कैदियों का प्रबंधन करने के लिए 165 गार्ड थे।”

अधिक खुली जेल होने से हम बंद जेलों के बेहतर प्रबंधन में भी सक्षम होंगे।

 

माथुर कहते हैं, “अगर केवल हर राज्य पैरोल अनुप्रयोगों के लिए समय-समय पर दिशानिर्देश निर्धारित करे, और कैदियों को इन अधिकारों से अवगत कराए और सक्रिय रूप से उन्हें लागू करे तो संभवतः कम कैदी पैरोल से फरार होगें और कैदियों के सुधार के बाद खुली जेलों को मजबूत आधार मिलेगा।”

 
(बाहरी स्वतंत्र लेखक और संपादक है । राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 21 सितंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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