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कौशल और नौकरी की गारंटी महिला श्रम स्थिति में ला सकता है बदलाव

लावण्या गर्ग और स्निग्धा शाही,
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बेंगलुरु के एक कारखाने महिला परिधान श्रमिक। नवीनतम उद्योग सर्वेक्षण के मुताबिक परिधान उद्योग भारत में महिला श्रम की स्थिति में बेहतर सुधार कर सकता है, जैसा कि यह प्रति लाख निवेश पर 8.2 महिला रोजगार उत्पन्न करता है।

 

गुलबर्गा, कर्नाटक: शाम के साढ़े छह बजे हैं। एक महिला, जिसका नाम निर्मला है, अपने रसोईघर से एक प्लेट और चाकू लेकर आती है। यह एक किस्म के प्रयोग का समय है।

 

निर्मला कच्चे चावल, मैसूर पाक ( एक मिठाई ) और सेब अपने परिवार के पांच सदस्यों में बांटती है। जब उनसे पूछा गया कि वह इन वस्तुओं को किस क्रम में देगी तो उनका जवाब था कि पहले वे अपने पति, फिर बेटे, फिर पोते को देंगी, फिर स्वयं लेंगी और उसके बाद अपनी बहू को देंगी। भाग उसी क्रम में दिए जाएंगे – सबसे बड़ा भाग पति को और सबसे छोटा भाग बहू को दिया जाएगा।

 

गांव बलवाड़ में कई अन्य महिलाओं की तरह निर्मला का दिन बुवाई के दौरान कृषि क्षेत्रों में श्रमिकों की तरह बीतते हैं और शेष वर्ष के लिए घर पर बेरोजगार रहती हैं। हालांकि भोजन की खपत और घरेलू व्यय के पैटर्न से पता चलता है कि आय के अतिरिक्त स्रोतों का स्वागत किया जाएगा, कई बाधाएं महिलाओं को औपचारिक श्रम-शक्ति में प्रवेश करने से रोकती हैं।

 

सर्वेक्षण किए गए परिवारों में से आधे से थोड़े अधिक ( 54.4 फीसदी ) परिवारों ने कर्नाटक में 53 तालुकों (जिलों के उप-विभाजन) के 1,300 से अधिक गांवों में एक महिला सदस्य की जनवरी 2017 में  कार्यकर्ता कल्याण गैर लाभ  गुड बिजनेस लैब द्वारा आयोजित ‘पार्टिसिपेटरी रुरल अप्रेजल’ (पीआरए) में घर के बाहर काम करने की सूचना दी है। इनमें से 57 फीसदी महिलाओं की प्राथमिक गतिविधि परिवार के खेत पर काम करने की थी।

 

विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार, जब लड़कियां और महिलाएं कमाती हैं, तो उसका 90 फीसदी वह परिवारों और समुदायों में निवेश करती हैं। लेकिन क्या महिलाओं का काम करने और निर्मला के घर में भोजन के वितरण के तरीके को बदलने के बीच संबंधों को पहचानने और प्रभावित करना संभव है?

 

बेंगलुरु और नई दिल्ली में स्थित ‘गुड बिजनेस लैब’ (जीबीएल), कर्मचारियों के कल्याण के साथ-साथ व्यवसायिक रिटर्नों को सक्षम करने के लिए मूल्यांकन और सूचित करने के लिए काम करता है। इसके सह-संस्थापकों और मुख्य अनुसंधान अधिकारी अच्युत अधोरेयू (यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन) और अनंत न्याशाधाम (बोस्टन कॉलेज) के मार्गदर्शन में, जीबीएल महिला श्रम शक्ति भागीदारी पर कपड़ा उद्योग में तकनीकी कौशल और नौकरियों के प्रभावों, महिलाओं के समय का उपयोग , और महिलाओं और उनके परिवारों के कल्याण की जांच कर रहा है। (इंडिया स्पीड की राष्ट्रव्यापी जांच है कि क्यों महिलाओं को रोजगार के नक्शे से गिर रही हैं आप भाग 1, भाग 2, भाग 3, भाग 4, भाग 5, भाग 6, भाग 7 और भाग 8 पढ़िए में पढ़ सकते हैं।)

 

बेतरतीब ढंग से चुने गए ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए 10 गारमेंट-सेक्टर स्किलिंग या कौशल केंद्रों के द्वारा हमारे अध्ययन का उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर कौशल और नौकरी सृजन नीति के रिश्ते को जानना है।

 

अधिक भारतीय महिलाएं घर के बाहर क्यों नहीं करती हैं काम?

 

भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी (FLFP) दर 2005-06 में 36 फीसदी से गिर कर 2015-16 में 24 फीसदी तक हुआ है, जैसा कि भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 से पता चलता है। श्रमिक बाजार में महिला श्रमिकों लाभ के मामले में अत्यधिक वंचित है। वे कम-उत्पादकता, कम-भुगतान वाले कार्य में लगे कम-कुशल अनौपचारिक श्रमिकों में बड़े हिस्से में हैं। पूर्णकालिक कर्मचारियों की औसत कमाई में भारत का लिंग अंतर दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चिली की तुलना में बड़ा है, जिसका मतलब है कि इन देशों में ज्यादातर महिलाएं पुरुषों की तुलना में बहुत कम कमाती हैं।

 

एफएलएफपी दर इतनी कम क्यों है, और पिछले दशक में गिरावट का अर्थ क्या है, जो कि तेजी से विस्तार कर रहा है? रूढ़िवादी सामाजिक मानदंड, जागरूकता की कमी और गतिशीलता की कमी स्पष्ट कारणों में से कुछ एक हैं।

 

जीबीएल के सहभागिता ग्रामीण मूल्यांकन में, एक साधारण दिन महिलाओं ने खाना पकाने में दो घंटे देने की सूचना दी, जबकि पुरुषों ने आधे से भी कम समय खर्च किया, करीब  52 मिनट। ओईसीडी के अनुमान के मुताबिक, मैक्रो स्तर पर, भारतीय पुरुष औसतन प्रति दिन लगभग 50 मिनट अवैतनिक काम पर खर्च करते हैं। जबकि इसी काम में भारतीय महिलाएं छह घंटे खर्च करती हैं। हमारा डेटा आगे बताता है कि लिंग असंतुलन जीवन के अन्य क्षेत्रों में बनी रहती है, जैसे कि बच्चों की देखभाल करना, गांव की राजनीति में भाग लेना और इंटरनेट पर सर्फिंग में भी।

 

इसके अलावा, यदि घर की महिला मौजूद नहीं है, तो दो-तिहाई मामलों में खाना पकाने, सफाई और बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी मां या सास के लिए होती है।

 

सिर्फ 22 फीसदी मामलों में ही पति यह जिम्मेदार खुद पर लेता है, और 5 फीसदी मामलों में पिता या ससुर यह काम करते हैं। दूसरे शब्दों में, महिलाएं वैतनिक कार्य नहीं करती हैं क्योंकि उनके पास समय नहीं है।

 

समय उपयोग पैटर्न: औसत समय (मिनट में) एक दिन में एक गतिविधि पर खर्च

दूसरी आम चुनौती जिसका महिलाएं सामना करती हैं, वह है एजेंसी और गतिशीलता की कमी। हमारे आंकड़ों के मुताबिक, केवल 17 फीसदी महिलाओं के नाम जमीन है। सिर्फ 16 फीसदी ने काम के लिए शहर के बाहर पलायन करने की सूचना दी है और केवल 5 फीसदी ने ऐसा अकेले किया है। यह भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण (आईएचडीएस) 2012 के आंकड़ों में भी परिलक्षित होता है, जिसमें 34 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 34,000 महिलाओं ने सर्वेक्षण किया गया और 80 फीसदी ने कहा कि उन्हें स्वास्थ्य केंद्र जाने के लिए परिवार के किसी सदस्य से अनुमति की आवश्यकता है।

 

हमारे क्षेत्र दौरे में हमें कई ऐसी महिलाएं मिली, जिन्होंने बताया कि घर के पुरुष सदस्यों ने समय बाधा को उनके बाहर न जाने का तर्क दिया है। जब महिलाएं परिवार की जमीन पर काम करती हैं, तब भी पैसा पति द्वारा नियंत्रित होता है। हमें कई ऐसी महिलाएं मिली जो अकेले यात्रा नहीं कर सकती थी – उन्हें हमेशा एक पुरुष परिवार के सदस्य के साथ रहने की जरूरत होती है।

 

आईएचडीएस 2012 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में केवल 5 फीसदी महिलाओं का कहना है कि पति चुनने पर उनका नियंत्रण है। शादी और प्रसव के समय कम आयु भी श्रमशक्ति में शामिल होने वाली महिलाओं के लिए एक चुनौती के रूप में उभरा है।

 

हमारे आंकड़ों में, न्यूनतम उम्र ( 16 वर्ष ) के नीचे गिरने के साथ महिलाओं के लिए शादी में औसत उम्र 18.5 साल है और अधिकतम 23 वर्ष है।

 

युवा महिला परिधान श्रमिकों से बात करने के हमारे अनुभव से शादी करने के लिए काम शुरू करने के कुछ महीनों के भीतर महिलाओं को छोड़ना असामान्य नहीं है। एक ध्यान देने की बात है कि जो महिलाएं को प्रसव के बाद, विवाह के बाद काम पर जाना चालू रखती हैं वे एक ही समय में व्यावसायिक और घरेलू मांगों को प्रबंधित करने में असमर्थ हैं। हमारे आंकड़ों में, , अधिकतम 25 साल के साथ प्रसव के समय औसत उम्र 20.5 साल है।

 

कौशल और रोजगार के बीच की खाई

 

भारत का श्रम बल, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा है। हालांकि, भारत की 90 फीसदी श्रमशक्ति औपचारिक रूप से प्रशिक्षित नहीं है, जबकि चीन के लिए यह आंकड़े 47 फीसदी है। स्किल इंडिया पहल का उदेश्य रोजगार को बढ़ाने और नौकरियों का सृजन करना है। वर्तमान में, केंद्र सरकार के कुल 22 मंत्रालयों और विभागों द्वारा कौशल विकास कार्यक्रम (एसडीपी) लागू किए जा रहे हैं। नई शिक्षा नीति का प्रारूप (2016) 25 फीसदी स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रम के साथ कौशल विकास कार्यक्रमों को एकीकृत करने का प्रस्ताव है।

 

लेकिन कौशल और रोजगार के बीच की खाई कहां है?

 

कुल 63 फीसदी नौकरी में योग्यता कौशल टेस्ट लेने वाले नियोज्य हैं, जैसा कि ऑनलाइन प्रतिभा मूल्यांकन कंपनी व्हीबॉक्स द्वारा भारत कौशल रिपोर्ट 2016 से पता चलता है। श्रम ब्यूरो द्वारा रोजगार और बेरोजगारी सर्वेक्षण (ईयूएस) 2016 के अनुसार हालांकि, 58 फीसदी बेरोजगार स्नातक और 62 फीसदी बेरोजगार स्नातकोत्तर ने कहा कि उनकी बेरोजगारी का मुख्य कारण उनके कौशल और शिक्षा के स्तर से मेल खाती नौकरियां उपलब्ध न होना है।

 

ग्रामीण इलाकों के दौरे के दौरान, हमने महिलाओं से मुलाकात की, जो सिलाई में प्रशिक्षण ले रही थीं। उन्हें ये पता नहीं था कि इस नए कौशल के साथ क्या करना है, क्योंकि गांव में पहले से ही कई दर्जी मौजूद हैं।

 
2022 तक भारत को 100 मिलियन कुशल श्रमिकों की आवश्यकता है, लेकिन कुशल नौकरी तलाशने वालों के सामने बेरोजगारी एक उदास तस्वीर सामने लाती है। उदाहरण के लिए, 2016-17 में, केंद्र सरकार के दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना के तहत 160,000 से अधिक व्यक्ति कुशल थे; लेकिन केवल आधे को नौकरी मिली थी।
 

संभव समाधान

 

हमने अनुमान लगाया है कि परिधान उद्योग में महिलाओं के लिए और अधिक नौकरियां बनाने ( जहां महिलाएं पहले से ही 35 फीसदी कर्मचारियों की संख्या का निर्माण करती हैं ) का काम हो सकता है।

 

कपड़ा और परिधान क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 119 मिलियन से ज्यादा का रोजगार देता है और यह भारत में दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है।राष्ट्रीय उद्योग संघ के पूर्व अध्यक्ष और कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, अरविंद पानगहरिया के अनुसार “परिधान उद्योग मॉडल भारत की रोजगार सृजन आवश्यकताओं की कुंजी रखता है। यह क्षेत्र भारत में अर्थव्यवस्था-भर में रोजगार में लिंग अंतर को बंद करने का एक अवसर प्रस्तुत करता है, जैसा कि नीचे दिए गए टेबल से स्पष्ट है।”

 

रोजगार निर्माण क्षेत्र संचालन और महिला श्रम बल भागीदारी वृद्धि

हमारे पिछले शोध से पता चलता है कि व्यावहारिक कौशल में में कम आय वाली महिला परिधान श्रमिकों को प्रशिक्षण देने से उन्हें अधिक वित्तीय एजेंसी और और कार्यस्थल और घर में अधिक आर्थिक शक्ति प्राप्त होती है। परिधान क्षेत्र के विस्तार के कारण बांग्लादेश में, महिला शिक्षा, कुल प्रजनन दर और महिला श्रम बल की भागीदारी में सुधार हुआ है।

 

यह क्षेत्र भारत में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का एक वाहन कैसे बन सकता है?

 

भारत में सबसे बड़ा परिधान निर्यातक, शाही एक्सपोर्ट के सहयोग से हमारा हस्तक्षेप कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने के अलावा इसमें अद्वितीय है कि यह प्रशिक्षण पूरा होने के बाद भी नौकरी की गारंटी देता है। इसक अलावा, यह समझने के लिए कि क्या विशेषताएं है जो श्रमिकों को नौकरियां लेने और नौकरियों में रहने की संभावना बनाता है, हम साइकोमेट्रिक व्यक्तित्व परीक्षण कर रहे हैं।

 

वर्तमान में, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में 20 तालुकों में आधारभूत सर्वेक्षण शुरू किया जा रहा है।

शाही एक्सपोर्ट के परिप्रेक्ष्य से, उद्योग की एक बड़ी चुनौती श्रम, विशेष रूप से प्रवासी श्रम को बनाए रखना है। वे कहते हैं, “पहले छह महीनों को यह निर्धारित करने में सबसे महत्वपूर्ण हैं कि नौकरी में कौन रहता है और कौन नहीं करता है। इस प्रकार, हम कार्यक्रम में बेहतर चयन करने के लिए तंत्र पर भी विचार कर रहे हैं ताकि जो लोग साइन अप करें, उनके रहने की संभावना रहे, साथ ही हम कमजोर समूहों की पहचान कर सकते हैं जो नौकरी से बहुत लाभान्वित हो सकते हैं।”

 

इसलिए इस परियोजना, न केवल लोगों को कौशल बनाने और उन्हें रोजगार देने नियोक्ताओं की भूमिका को समझता है, बल्कि श्रमिकों को भी बनाए रखने कs महत्व को भी समझाता है। इससे जो अंतर्दृष्टि पैदा होगी, उससे क्षेत्र- और अर्थव्यवस्था-विस्तृत प्रभाव पड़ सकता है।

 

हमारे प्रयोग के माध्यम से हम यह देखना चाहते हैं कि एक महिला को प्रशिक्षण और नियोजित करने से न केवल अतिरिक्त आय उत्पन्न होती है बल्कि परिवार और समुदाय पर बहुत प्रभाव पड़ता है।  क्या यह एक महिला का समय-उपयोग पैटर्न बदलता है और घरेलू कार्यों की लिंगीय प्रकृति को बदलता है? क्या वह घरेलू शिक्षा व्यय के बारे में फैसले में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं? प्रजनन संबंधी फैसलों के संबंध में उसके घर में सौदेबाजी की शक्ति कैसे प्रभावित हुई है? सामान्य परिवर्तन में महिलाओं की उसके परिवार के सदस्यों की धारणा क्या है? क्या जो महिलाएं नौकरी करती हैं  और नौकरी पर रहती हैं,  उनकी नौकरी न करने वाली महिलाओ से मानसिक रूप से उनके मनोचिकित्सा विशेषताओं में अलग हैं? अंततः, निर्मला के घर में भोजन वितरण का आदेश और मात्रा क्या है, अगर वह प्रवासी रोजगार के अवसरों को बदलती है, तो परिवर्तन होगा?

 

भारत की महिला श्रम बल की भागीदारी में गिरावट पर देश भर में चल रहे इंडियास्पेंड की जांच में यह नवीनतम लेख है। आप यह श्रृंखला यहां पढ़ सकते हैं।

 

(लावाण्या गर्ग वरिष्ठ अनुसंधान और नीति प्रबंधक है। और स्निग्धा शाही गुड विजनेस लैब में वरिष्ठ अनुसंधान और संचार एसोसिएट है। इनपुट मैरिएना कल्लेन्टिनोस ने भी दिया है। मैरिएना मिशिगन विश्वविद्यालय में डिजाइन साइंस में पीएचडी की छात्र हैं और ग्रामीण भारतीय महिलाओं के सामने आर्थिक गतिविधि में बाधाओं को समझने के लिए एक परियोजना पर गुड बिजनेस लैब में काम करती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 12 मार्च 2018 को indiaspend.com प्रकाशित हुआ है।

 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
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