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क्रिकेट की तरह ही आपको अपनी नजर गेंद पर टिका कर रखनी है: मेलिंडा गेट्स

गोविंदराज एथिराज,
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मुंबई: क्या गरीबी को टाला नहीं जा सकता है ?यह महत्वपूर्ण सवाल, बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (बीएमजीएफ) के सह-अध्यक्ष बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स ने इस वर्ष अपने वार्षिक गोलकीपर डेटा रिपोर्ट में उठाया है। यह रिपोर्ट बीएमजीएफ द्वारा किए जा रहे कार्यों पर डेटा और रिपोर्ट का एक सार है।
 
 दोनों अनंत आशावादी हैं, जो बताते हैं कि गरीबी और बीमारी के खिलाफ लड़ाई में, पिछले 28 वर्षों से 2011 तक, 1.2 बिलियन लोग पूर्ण गरीबी से बाहर निकाले गए थे, जिसमें 162 मिलियन भारत के लोग भी शामिल थे। ( पूर्ण गरीबी यानी 1.90 डॉलर से नीचे या 138 रुपये प्रति दिन की आमदनी।) गोलकीपर की रिपोर्ट में कहा गया है, ” क्योंकि दुनिया भर में गरीबों की तादात बढ़ रही हैं इसलिए अधिक बच्चों का जन्म उन स्थानों पर हो रहा है, जहां स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीना मुश्किल है।” यदि ऐसा ही चलता रहेगा, तो दुनिया में गरीब लोगों की संख्या में कमी नहीं होगी – और उनकी संख्या बढ़ भी सकती है। रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी दी गई है।

लेकिन अच्छी खबर भी है।

 

स्वास्थ्य के कई संकेतकों पर, भारत, दुनिया के अन्य कई देशों की तरह, अच्छा कर रहा है। वैश्विक स्तर पर, टीकाकरण में सुधार हुआ है। मातृ मृत्यु दर, पांच वर्ष के अंदर के बच्चों में मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर कम हुई है।

 

54 वर्षीय मेलिंडा बीएमजीएफ में ‘परदे के पीछे’  की भूमिका को छोड़कर कई महत्वपूर्ण पहलुओं के साथ सामने आई हैं। विशेष रुप से लिंग असमानता के मुद्दे को लेकर और अफ्रीका जैसे महाद्वीपों और भारत जैसे देशों में फाउंडेशन के कुछ महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को लेकर।   हर साल, इस समय, बीएमजीएफ अपनी गतिविधियों को लेकर एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करता है और भविष्य के लिए योजनाएं बनाता है। यह रिपोर्ट फाउंडेशन के प्रयासों का एक व्यापक सर्वेक्षण है, लेकिन प्रगति है नहीं, इसे भी आसानी से समझा जा सकता है।

 

इंडियास्पेंड के गोविंदराज एथिराज के साथ एक विशेष साक्षात्कार में मेलिंडा गेट्स ने फाउंडेशन की सफलताओं पर बात की। दुनिया को एक सुरक्षित और स्वस्थ जगह बनाने के लिए विशेष रूप से भारत में, उन्होंने किस तरह चुनौतियों का सामना किया है, इस पर भी उन्होंने चर्चा की है।

 

गोलकीपर-2018 की रिपोर्ट कुछ हद तक निराशावादी ढंग से शुरू होती है, लेकिन फिर यह अधिक आशावादी हो जाती है,जब यह फाउंडेशन के काम को स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों तक लेकर जाती है। क्या कोई विशेष कारण है कि आपने यह आपने यह दृष्टिकोण चुना है?
 
 बिल्कुल! अगर आप उन लक्ष्यों को देखते हैं, जो निर्धारित की गई थी, तो हम देखते हैं कि प्रगति की गई है। लेकिन हम चाहते हैं कि लोग उन लक्ष्यों पर नजर रखें। क्रिकेट की तरह, आपको अपनी नजर गेंद पर रखनी होती है या जब भी हम खेल खेलते हैं तो गेंद पर नजर रखते हैं। अगर हम गेंद पर नजर नहीं रखते हैं तो जारी प्रगति स्थिर नहीं रहेगी। हम यही चाहते हैं कि लोग इसे देखें। हम चाहते हैं कि वे देखें कि प्रगति संभव है। हमें विभिन्न देशों की तरह भारत के निर्माण में निवेश करना जारी रखना है।

 
इस रिपोर्ट को पढ़ने से प्रतीत होता है कि बेहद गरीब अफ्रीका में परिवर्तिन हो रहा है। क्या यह सही मूल्यांकन होगा?
 

रिपोर्ट में हमने जो बात की है, वह यह है कि अफ्रीका में ऐसे दो देश हैं, जहां अगर हम निवेश नहीं करेंगे तो हम विकास नहीं देख पाएंगे।

 

लेकिन हम इसे ‘अफ्रीका में कनवर्जिंग’ नहीं कह सकते हैं, क्योंकि हम अफ्रीका के दूसरे सबसे बड़े देश इथियोपिया को भी देखना चाहते हैं जो भारी प्रगति कर रहा है, इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि फोकस अफ्रीका पर है-जो मुश्किलों का केंद्र भी है- लेकिन ऐसे दो देश हैं, जिनको लेकर हम विशेष रूप से चिंतित हैं । हम जो करने की कोशिश कर रहे हैं,  उससे यह पता चलता है कि अगर आप वियतनाम जैसे देश में निवेश करते हैं या जैसे हमने ब्राजील में किया है, जहां लोगों की आमदनी बहुत कम थी, तो हमें तब वांछित परिणाम मिलेंगे यदि हम मानव पूंजी में निवेश करते हैं।

 

जहां तक बात भारत की है तो यहां बहुत कम राज्य हैं। मैं कहूंगा कि यहां चीजें संतुलन में हैं।  दो बहुत बड़े राज्य हैं, इसलिए हम नहीं चाहते हैं कि दुनिया अपनी नजर हटाए या भारत अपने ही देश में गेंद पर से नजर हटाए।

 

 आपने इथियोपिया में विशुद्ध रूप से आर्थिक विकास को संदर्भित किया है, लेकिन चीन और भारत या चीन से आगे, भारत और इथियोपिया लगभग एक ही रेस में हैं।
 
 सही बात है यह। चीन और भारत जैसे देशों के मॉडल का पालन कर रहा है अभी इथियोपिया । वे मातृ और शिशु स्वास्थ्य में निवेश कर रहे हैं और नवाचार में निवेश कर रहे हैं। पिछले कुछ सालों में भारत ने वास्तव में परिवार नियोजन के क्षेत्र में इथियोपिया की तरह कदम बढ़ाया है क्योंकि वे देख रहें हैं कि माताएं दो बच्चों के जन्म में अंतर रखती हैं, तो महिलाएं खुद को शिक्षित कर सकती हैं और परिवार के लिए गरीबी से बाहर निकलना आसान हो जाता है।

 

इसलिए  चीन और भारत दुनिया के लिए रोल-मॉडल की तरह बन गए हैं और हम निवेश से काफी उत्साहित हैं कि भारत सरकार पूरे देश में नवाचार, मातृ और शिशु स्वास्थ्य पर ध्यान दे रही है। और, दूसरे देश यह देख रहे हैं कि क्या काम कर रहा है, जिससे वे इसे अपने देशों में भी इस तरह की व्यवस्था कर सकें।

 
आप बिहार और उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। 2016 और 2017 में इन क्षेत्रों में किए गए प्रयासों और फिर अपनी रिपोर्टों को देखने के बाद आगे आपके मुख्य कदम क्या होंगे?

 

हम हमेशा डेटा देखते हैं और फिर इस पर विचार करते हैं कि डेटा हमें क्या बता रहा है। इसलिए, बिहार और यूपी में मातृ और शिशु स्वास्थ्य, पोषण और  परिवार नियोजन के आसपास निवेश किए गए हैं । वहां आबादी के बीच कुछ बड़ी बीमारियों में लिम्फैटिक फिलीरियासिस और विस्सरल लीशमैनियासिस हैं, हम यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि वहां की हालत क्या है और कितनी प्रगति हो रही है।  प्रगति को देखने या मापने के लिए भी रास्ते हैं। बिहार में, यदि हम बहुत पहले की अवधि में वापस जाते हैं, और हम पांच वर्ष की उम्र के अंदर के बच्चों में मृत्यु दर को देखते हैं, तो 2005-06 में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 85 बच्चों की मौत हो रही थी। अब यदि आप 2015-16 के बीच की अवधि देखते हैं, तो अब प्रति 1000 जीवित जन्मों पर मरने वाले बच्चों की संख्या 58 है। हालांकि यह अभी भी बहुत अधिक है,  लेकिन हमने काफी प्रगति है। 10 वर्षों में 45 फीसदी की गिरावट !  ऐसी रिपोर्ट मुझे किसी भी देश में देखना अच्छा लगेगा। यूपी के संदर्भ में भी  हम शिशु मृत्यु दर में कमी देखते हैं। वहां 2005-06 के बीच, प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 46 बच्चों की मौत हो रही थी । अब 2015-16 में यह 43 है, इसलिए यूपी में वे 7 फीसदी की गिरावट आई है। इसके अलावा, मातृ मृत्यु दर में भी दोनों राज्यों में बहुत सुधार हुआ है।

 
दो या तीन वे प्रमुख कारण क्या हैं, जिसने प्रेरित किया है?
 

 बिल्कुल ! मुझे लगता है कि पहला है टीकों में निवेश। वास्तव में निमोनिया से होने वाली मौतों और  दस्त से होने वाली मौतों के बाद देश ने इस ओर ध्यान देना शुरु किया है। इन दो कारणों से ज्यादा बच्चों की मौत होती है, खासकर उन राज्यों में।

 

दोनों राज्यों में लिम्फैटिक फिलीरियासिस और विस्सरल लीशमैनियासिस जैसी दो बीमारियों के बाद स्वास्थ्य प्रणाली में निवेश हो रहा है।

 

महिलाओं को बताना भी जरूरी है कि घरों पर बच्चों को जन्म देना सही नहीं है, बल्कि जन्म देने के लिए क्लीनिक में आना है और यह सुनिश्चित करना कि उन क्लीनिकों (स्वास्थ्य केंद्रों) में सामानों की सही ढंग से आपूर्ति हो रही है और उनका सही ढंग से भंडारण हो रहा है और वहां सेवाकर्मियों को प्रशिक्षित किया जाना भी जरूरी है।  अगर वह रक्तस्राव रोकने के लिए दवाएं लेती है, तो उच्च गुणवत्ता वाले स्वास्थ्य सुविधाओं में भारी अंतर आता है। केवल बच्चे के जीवन बचाए नहीं जा रहे हैं, बल्कि मातृ मृत्यु दर में भी जो पिछले दस वर्षों में यूपी में लगभग 30 फीसदी कम है।

 

आपने अक्सर व्यक्तिगत रूप से इन क्षेत्रों का दौरा किया है। क्या पिछले सालों में कोई व्यक्तिगत अनुभव सामने आया है?

 

मुझे परिवारों से मिलने और वास्तव में महिलाओं से बात करना अच्छा लगता है कि उनके लिए जीवन कैसा है। हाल ही में मैंने उत्तर प्रदेश के कमरवा में दो महिलाओं से मुलाकात की। एक अनीता थी और दूसरी थी सुशीला।

 

 वे अद्भुत थीं। मैंने उन्हें लगभग 10 महिलाओं के एक समूह में रखा था। उनके साथ मैं उनके बच्चों और  उनके जीवन के बारे में बात करने के लिए वहां गई थी कि क्या वे गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं? – यह सब जानना बहुत दिलचस्प है… क्योंकि अनीता केवल 40 वर्ष की थी। हालांकि मुझे लगता है कि वह उससे छोटी थी, लेकिन उसने बताया कि वह 40 की है और उसकी किशोरावस्था में ही शादी हुई थी । उसने पांच बार गर्भधारण किया था।  हमने उससे बच्चों की बढ़ती संख्या के बारे में पूछा तो उसने कहा, “यह मुश्किल है, बहुत मुश्किल है। मैं लगातार काम कर रही हूं।”वहां एक बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया। हमने जिस दूसरी महिला सुशीला से मुलाकात की,  वह 28 वर्ष की एक मां है और वह शिक्षक थी। उसने कहा, ” मुझे पता है कि हमारे दो बच्चे हैं। मेरे पति और मैंने यही फैसला किया है। “उसके बच्चों की उम्र पांच वर्ष और दो वर्ष है। उसने कहा कि जब उसके छोटे बच्चे की उम्र पांच साल हो जाएगी, तो वह वापस स्कूल में पढ़ाने लगेगी।

 

तो उसका भविष्य उसके सामने था। और जब उसने बात की, तो उससे अनीता थोड़ी दुखी हो गई। क्योंकि अनीता ढेर सारे बच्चों के लालन पालन में लगी हुई थी। सुशीला और उसके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है, क्योंकि उसने दो बच्चों के जन्म में अंतर रखा है और केवल दो बच्चों का ही निर्णय लिया है।

 

उस अवधि में यह मेरे लिए एक बहुत ही आकर्षक उदाहरण था। दो महिलाएं थीं, जो गर्भनिरोधक लेने या न लेने के कारण अलग-अलग जिंदगी जी रही थीं।

 
आपके जो उद्देश्य हैं, उसे प्राप्त करने के दौरान भारत सरकार के साथ काम करने में आपका अनुभव क्या है?  क्या आपको किसी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

 

हम फाउंडेशन के रूप में भारत सरकार के साथ कई सालों से काम कर रहे हैं  और मुझे लगता है कि वे मेरी बात सुनते हैं और उसके प्रति जिम्मेदारी दिखाते हैं। भारत ने वास्तव में निमोनिया और दस्त से मौतों को देखा है। वे ये जानने के लिए इच्छुक रहते हैं कि भारतीय संदर्भ को ध्यान में रखते हुए सही तरीके से इन मौतों को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है।

 

 उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कई सालों से काम किया है कि जनसंख्या के लिए टीके पूरी तरह से सुरक्षित हैं। उन्होंने पहले कुछ स्थानों को मॉडल मानकर टीके लगाए और फिर उन्हें पैमाने पर दूसरी जगहों पर लागू किया। वे हमेशा भारतीय संदर्भ के साथ सोच रहे हैं और मुझे लगता है कि यह सही बात है। हम जो भी देख रहे हैं उसमें प्रगति तो हुई है। बाल मृत्यु दर पर काम करने के बाद भारत सरकार मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए अधिक निवेश करने के इच्छुक है, और यह ‘स्मार्ट डिसिशन’ है। सच यह है कि उन्होंने कदम उठाए हैं और गर्भ निरोधकों के लिए मजबूत प्रतिबद्धता दिखाई है। क्योंकि उन्हें पता है कि मानव पूंजी विकास में क्या अंतर बनाती है। यदि कोई महिला अपने बच्चों का जन्म में अंतर देती है और संख्या को सीमित कर सकती है तो वह दोनों बच्चों को शिक्षित कर सकती है। यानी मौलिक बात यह कि गर्भ निरोधकों में निवेश हो।

 

मुझे लगता है कि केंद्र सरकार से राज्यों में पैसे ले जाने में, कुछ चुनौतियां हैं, जो स्पष्ट हैं। राज्य हमेशा स्वास्थ्य में उस पैसे को खर्च करने में सक्षम नहीं होते हैं।

 

और मुझे लगता है कि वे अभी भी काम कर रहे हैं, लेकिन हमें भारत सरकार के कई अलग-अलग प्रशासनों के साथ काम करने में काफी प्रोत्साहन मिला है। हमें यह देखकर काफी खुशी होती है कि वे समस्याओं को भारतीय संदर्भ में कैसे देख रहे हैं, सुन रहे हैं और समाधान लागू कर रहे हैं।

 

और अंत में… नए समाधान और दृष्टिकोण में, कुछ काम कर सकते हैं और कुछ नहीं कर सकते हैं। मैंने एक रिपोर्ट पढ़ी, बिहार में दस्त और निमोनिया पर एक उपाय काफी काम नहीं कर रहा था और एक अलग तरह के उपाय की जरूरत थी। तो, आप इन असफलताओं या सापेक्ष विफलताओं को कैसे देखते हैं ? आप रणनीति कैसे बदलते हैं?

 

फाउंडेशन के बारे में सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक यह है कि हम हमेशा सीख रहे हैं और मूल्यांकन कर रहे हैं । हम पारदर्शी भी हैं, इसलिए हम उन चीज़ों को छिपाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, जिनमें सफल नहीं हो पाते।

 

जब हम कुछ कोशिश करते हैं तो हम जोखिम लेते हैं और यह मानवता की दिशा में एक कदम है । जोखिम से हम सीखते हैं और फिर देखते हैं कि क्या तरीका काम करेगा। हम हमेशा डेटा और संख्याओं का रिकार्ड रखते हैं और फिर इसे प्रकाशित करते हैं, ताकि सभी इससे सीख सकें। आप जो उद्धरण दे रहे हैं, वह बिल्कुल सही है । हमें वैसे नतीजे नहीं मिले थे, जो हम चाहते थे।

 

मुझे लगता है कि हमारा इरादा सही था। हम डॉक्टरों के साथ उच्च गुणवत्ता वाले स्वास्थ्य देखभाल से मरीजों को बामारियों से ऊपर उठाना चाहते थे। लेकिन उन विशिष्ट तरीकों ने काम नहीं किया। तो, हम उससे सीख रहे हैं। सही लक्ष्य  और गलत रणनीति, के बाद आगे क्या होगा, इसे देखने की जरूरत है।

 

लेकिन अगर हम जोखिम लेने के इच्छुक नहीं हैं तो हम समस्याओं से लड़ने के नए तरीकों को कभी नहीं सीख पाएंगे। हमारे पास डिजिटल तकनीक है, जिससे हम लोगों को लाभान्वित कर रहे हैं। लेकिन हमें यह भी देखना है कि वे ज्यादा से ज्यादा कैसे लाभ उठा सकते हैं और हम इसे और अधिक लागत प्रभावी कैसे बना सकते हैं।

 

हम 15 वर्षों तक भारत सरकार के साथ काम कर रहे हैं, जिसमें सस्ती टीका करण की योजना भी है। भारत सस्ती टीकों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा टीका निर्माता बन गया है ।

 

इससे केवल एक देश को ही नहीं, बल्कि इथियोपिया और दुनिया भर के लोगों को भी फायदा हुआ है। मैं भारत को देखती हूं ! मैं भारतीय महिला को देखती हूं और मैं उस बाजार की अर्थव्यवस्था को भी देखती हूं और कैसे यह सिर्फ भारत के लिए नहीं बल्कि बाकी दुनिया भी काम करता है – मेरे लिए वास्तव में यह सब रोमांचक है, और निजी क्षेत्र में भारत सरकार के साथ साझेदारी अद्भुत है।

 

(एथिराज इंडियास्पेन्ड के संस्थापक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 19 सितंबर, 2018 को को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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