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खेती में संकट के सवाल पर एक किसान दंपति के जवाब

ग्रीष्मा हेगड़े और चांदनी सिंह,
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तीसरी कक्षा तक पढ़े श्यामराव पाटिल और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई को जलवायु परिवर्तन से प्रभावित भारत के एक शुष्क और गरीब क्षेत्र में मुकाबला करने और लाभ प्राप्त का तरीका मिल गया है – खेती की तकनीक को जलवायु के अनुकूल करना, सरकारी सब्सिडी का उपयोग करना और पानी और वित्त के लिए दूसरों के साथ सहयोग करना।

 

कलाबुरागी जिला (कर्नाटक): 55 वर्षीय श्यामराव पाटिल कहते हैं, “” साल दर साल, वर्षा की मात्रा घट रही है।” पाटिल एक मजबूत किसान हैं, जिन्होंने बदलते मौसमों को पढ़ना सीखा है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उस देश में वह अपनी खेती को लगातार बदल रहे मौसम के अनुकूल बना रहे हैं, जहां जलवायु परिवर्तन ने जनसंख्या के पांचवें, या 263 मिलियन लोगों की आजीविका को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, जो खेती पर निर्भर करता है।

 

कर्नाटक के तूर दाल के क्षेत्र में, पाटिल और उनकी 50 वर्षीय पत्नी लक्ष्मीबाई, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक चुनौती के रूप में विभिन्न फसलें पैदा करते हैं, जहां खेती जोखिम में पानी की कमी, तेजी से अनियमित बारिश, बढ़ते तापमान और मिट्टी की गुणवत्ता में कमी शामिल है, जैसा कि हमने हमने 419 कृषक परिवारों पर किए गए 2018 के एक अध्ययन में पाया है।

 

इसके अलावा, कलाबुरागी में सर्वेक्षण किए गए 91 फीसदी किसानों ने 2016 में एक दशक में बारिश में कमी दर्ज की, और 61 फीसदी ने खेती के लिए पानी की नियमित कमी की सूचना दी है। हमें इस शुष्क, गरीब उत्तरी कर्नाटक जिले में चार ब्लॉक मिले, जहां कई मानव-विकास संकेतक भारत के सबसे गरीब राज्य बिहार से मेल खाते हैं।

 

पाटिल और उनकी पत्नी ( दोनों ने 65 फीसदी की साक्षरता दर वाले जिले में तीसरी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की है, यह दर बिहार के कई जिलों से कम है ) भारत के शुष्क भूमि में उस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके पास जलवायु जोखिमों के साथ मुकाबला करने और योजना बनाने का इतिहास है। कुछ उदाहरण: राजस्थान में जल संचयन और दक्षिण भारत में टैंक सिंचाई।

 

विविधता उत्पन्न करके जोखिमों को कम करना, अपनी कुछ फसलों को संसाधित करना, सरकारी सब्सिडी का उपयोग करना और फसलों और पानी के भंडारण के सामूहिक प्रयासों में भाग लेना – ये कुछ तकनीकें हैं जिन्हें पाटिल ने सीखा है और अब वे दूसरों को सिखाते हैं। वे एक टेम्पलेट पेश करते हैं, जिसका उपयोग भारत के कई हिस्सों में भूमि अधिग्रहण, पानी की कमी, जलवायु परिवर्तन और कृषि संकट में कमी की समय में किया जा सकता है।

 

आज की खेती में जिस तरह की बाधाओं का सामना किसान कर रहे हैं, उसके समाधान के समान उदाहरणों को देखने के लिए, हमने कर्नाटक के गुलबर्गा और कोलार जिलों में आठ किसानों का अध्ययन किया। उन सभी को राज्य सरकार प्रगतिशील किसान मानती है। वे स्थायी कृषि पद्धतियों के विशेषज्ञ हैं, जो जलवायु के अनुरूप कृषि पद्धतियों के निर्माण या परिवर्तन का प्रबंधन करने की क्षमता, जलवायु बाधा को कम करने और खुध के लिए अवसरों को बढ़ाने का होसला रखते हैं।

 

ग्रीस में आग से लाओस में बाढ़ और जापान में गर्म हवाओं से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव व्यापक हैं। विश्व बैंक की जुलाई 2018 में की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन 2050 तक भारत की आबादी के आधे हिस्से के जीवन स्तर के मानकों को कम करेगा।

 

इन परिवर्तनों को भारत के अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में पहले ही महसूस किया जा रहा है, जो हाल के दशकों में 10 फीसदी तक बढ़ गया है। इन क्षेत्रों में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं, जो भारत के सबसे कमजोर लोगों के घर हैं।

 

जलवायु परिवर्तन के असर के अलावा, ग्रामीण भारत भारी उपज के बावजूद बढ़ते कृषि संकट को देख रहा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जून 2017 की रिपोर्ट में बताया है। बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ती ऋणात्मकता के बीच जूझते कई किसान कृषि को एक घाटे की आजीविका मानते हैं। देश भर में सर्वेक्षण किए गए 50,000 किसानों में से एक चौथाई ने कहा कि यदि उनके पास विकल्प होता तो वे खेती छोड़ देंगे, जैसा कि फरवरी 2017 के इस अध्ययन से पता चलता है।

 

फिर सरकार और विकास एजेंसियां ​​कैसे किसानों को अपनी भूमि में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कैसे किसानों को एक बदलते माहौल के अनुकूल बनाने में मदद कर सकते हैं? कुछ जवाब कलाबुरागी और पाटिल के जीवन में मौजूद हैं।

 

शुष्क भूमि में फसलों की विविधता और पानी की बचत

 

कालाबर्गा, जिसे पहले गुलबर्गा कहा जाता था, गोवा की तुलना में लगभग तीन गुना या नीदरलैंड की तुलना में चार गुना एक सूखा प्रवण क्षेत्र है गर्मी में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से सर्दियों में 10-15 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने के साथ, क्षेत्र सालाना 842 मिमी की औसत वर्षा प्राप्त करता है। कर्नाटक का औसत 1,248 मिमी है।  कर्नाटक के तूर दाल क्षेत्रों में खेतों को अब सर्दी के तापमान और अनियमित बारिश का सामना करना पड़ रहा है।

 

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कालाबर्गा एक सूखा प्रवण क्षेत्र है। गर्मी में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से सर्दियों में 10-15 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने के साथ क्षेत्र सालाना 842 मिमी की औसत वर्षा प्राप्त करता है । कर्नाटक का औसत 1,248 मिमी है।

 

हालांकि, श्यामराव के पास दो बोरवेल हैं, लेकिन शायद ही कभी उनका उपयोग होता है क्योंकि उनमें केवल 5 सेमी पानी होता है। उन्हें पता है कि सावधानीपूर्वक पानी के प्रबंधन की जरूरत है। वह कहते हैं, “अगर हम जमीन से पानी वापस लेते हैं, तो फिर जमीन में कुछ नहीं बचेगा।” हमारी धरती को भी पानी की जरूरत है।”

 

श्यामराव ने अन्य किसानों के साथ कृषि तालाबों का निर्माण करके और बांधों की देखभाल करके पानी भंडार करने के लिए एक सामूहिक प्रयास पर माहौल बनाया है। कर्नाटक सामुदायिक वाटरशेड विकास में अग्रणी है और सूखा मुक्त खेतों के लिए यहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसे सरकारी कार्यक्रम हैं।

 

 

कालाबुर्गी में 17 फीसदी से अधिक कृषि भूमि सिंचित नहीं है। भारतीय औसत 58 फीसदी है। पानी की कमी या अत्यधिक बारिश वाली स्थितियों में एक छोटे से किसान के लिए कृषि में नए तरीकों को अपनाना एक चुनौती है, लेकिन श्यामराव पाटिल ने 3.5 एकड़ के अपने खेत पर ऐसा किया है, जो कि भारतीय मानदंड से काफी बड़ा नहीं है। 2013 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 85 फीसदी कामकाजी खेत दो हेक्टेयर से छोटे हैं।

 

श्यामराव और लक्ष्मीबाई, तूर दाल, प्याज, गेहूं, ज्वार, मूंगफली, तिल, आम और करी पत्तियां उगाने के लिए मिश्रित-फसल प्रणाली ( पारिस्थितिक लाभ प्रदान करने के लिए एक साथ दो या दो से अधिक फसल उत्पन्न करना ) का उपयोग करते हैं। वे आठ गायों, 150 मुर्गियों और 28 बकरियों के साथ एक डेयरी और पोल्ट्री फार्म भी चलाते हैं। उनकी वार्षिक आय 500,000 रुपये तक पहुंच जाती है, जिनमें से 250,000 अनुमानित लाभ है।

 

वर्ष 2007 में, बिचौलियों को बेचने के बजाय पटिल ने छोटे तूर दाल मिल में निवेश करने के लिए  कालाबुरगी कृषि विभाग के अधिकारियों से परामर्श किया।

 

अधिकारियों ने सरकारी सब्सिडी के साथ उनकी मदद की। छोटे दाल मिल कच्चे तूर को सांबर बनाने के लिए अनुकूल बना देते हैं। उन्होंने शविज (चावल वर्मीसेली) मशीन भी खरीदी हैं, जिससे वे चावल नूडल्स (नाश्ते के लिए उपयोग की जाती हैं) बनाते हैं और बाद में आस-पास बेचते हैं।

 

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वर्ष 2007 में, बिचौलियों को बेचने के बजाय पटिल ने छोटे तूर दाल मिल में निवेश करने के लिए  कालाबुरगी कृषि विभाग के अधिकारियों से परामर्श किया। अधिकारियों ने सरकारी सब्सिडी के साथ उनकी मदद की।

 

श्यामराव कहते हैं कि ऐसी सब्सिडी उनके जैसे छोटे भूमि धारकों के लिए ‘बहुत उपयोगी’ है और उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं जिनके पास फसल के बाद के बुनियादी ढांचे में निवेश करने के लिए अतिरिक्त नकदी नहीं है। उदाहरण के लिए इस दाल मशीन के बाद कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात के बाजारों में पाटिल तूर पाउडर प्रति किलो 140 रुपये पर बेचते हैं , जबकि कलाबुर्गी में 100 रुपए प्रति किलो कच्चा तूर बेचा जाता है।

 

उन्होंने अपने जैसे अन्य लोगों के साथ काम करना भी सीखा है। पाटिल गांव के एक स्व-सहायता समूह भाग्यवंती संघ के 13 सदस्यों में से एक हैं। संघ के भरोसे वे मध्य प्रदेश, कोलकाता, अहमदाबाद, हैदराबाद और दिल्ली जैसे दूरदराज के स्थानों में अपने तूर और अनाज बेच सकते हैं।

 

सहयोग की कीमत

 

श्यामराव की मां भी किसान थीं। अपने 8 एकड़ के खेत पर सिंथेटिक उर्वरकों का उपयोग देखते हुए श्यामराव बड़े हुए हैं. लेकिन उन्होंने देखा था कि उपज में बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं थी।

 

 उन्होंने 3.5 एकड़ जमीन पर परंपरागत, रासायनिक खेती के विरासत को जैविक खेती में बदल दिया है। 1997 में अपने गांव के पास आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने के बाद उन्होंने इस बदलाव का निर्णय लिया। प्रशिक्षण कार्यक्रम में ही उन्होंने कार्बनिक खेती के लाभों के बारे में जाना।

 

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उन्होंने 3.5 एकड़ जमीन पर परंपरागत, रासायनिक खेती के विरासत को जैविक खेती में बदल दिया है। 1997 में अपने गांव के पास आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने के बाद उन्होंने इस बदलाव का निर्णय लिया।

 

बदलाव के लिए उत्सुक, श्यामराव ने एनजीओ से मदद मांगी, जिसने बदले में उन्हें कृषि विभाग के माध्यम से केंचुआ तक पहुंचा दिया। धीरे-धीरे, पाटिल जैविक खेती की ओर गए। लगभग दो दशक पहले, पहले साल में उन्होंने व्यासियम फॉस्फेट (डीएपी), एक व्यापक रूप से प्रयुक्त उर्वरक, और वर्मीकंपोस्ट को बराबर माप में मिलाया। दूसरे वर्ष में, उन्होंने डीएपी के आधे बैग को वर्मीकंपोस्ट के एक बैग के साथ मिश्रित किया। तीसरे वर्ष में, 10 किलो रासायनिक उर्वरक और वर्मीकंपोस्ट के तीन बैग मिलाए। चौथे वर्ष में उन्होंने वर्मीकंपोस्ट के केवल पांच बोरे का इस्तेमाल किया था और कोई रासायनिक उर्वरक नहीं था।

 

श्यामराव कहते हैं, “मैंने अचानक रासायनिक उर्वरक का उपयोग करना बंद नहीं किया। मैंने इसे धीरे-धीरे छोड़ा। उपज पहले कम हो गई, लेकिन वे सुधर गए और अब बढ़ गए हैं। “

 

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अपने वर्मीकंपोस्ट पिट्स में पानी देते श्यामराव पाटिल। पाटिल धीरे-धीरे जैविक खेती की ओर गए। लगभग दो दशक पहले, पहले साल में उन्होंने व्यासियम फॉस्फेट (डीएपी), एक व्यापक रूप से प्रयुक्त उर्वरक, और वर्मीकंपोस्ट को बराबर माप में मिलाया। दूसरे वर्ष में, उन्होंने डीएपी के आधे बैग को वर्मीकंपोस्ट के एक बैग के साथ मिश्रित किया। तीसरे वर्ष में, 10 किलो रासायनिक उर्वरक और वर्मीकंपोस्ट के तीन बैग मिलाए। चौथे वर्ष में उन्होंने वर्मीकंपोस्ट के केवल पांच बोरे का इस्तेमाल किया था

 

श्यामराव बताते हैं कि उनके इलाके में डीएपी का उपयोग गिर गया है और अपने वर्मीकंपोस्टिंग बढ़ गया है। श्यामराव की बातों को अलंद गुलबर्गा के एक गैर सरकारी संगठन, ‘समता लोक शिक्षा समिति’ भी सच बताते हैं।

 

समिति ने अन्य गैर सरकारी संगठनों जैसे कि एमवाईआरएडीए के माध्यम से लगभग 150 अन्य किसानों को प्रशिक्षित किया है। हमने देखा कि प्रगतिशील किसानों, जैसे कि पाटिल के अनुभव, दूसरों के लिए इसे पालन करने और जानकारी बढ़ाने के लिए शक्तिशाली ट्रिगर्स हैं। 2000 में, श्यामराव और लक्ष्मीबाई ने अपने स्वयं के किसान समूह को पुण्यकोटी नाम दिया, जिसमें उनके गांव के 15 किसान शामिल थे। वे नियमित रूप से मिलते हैं और अपने उत्पादन जैसे तूर दाल और हरी अनाज की बिक्री के लिए सलाह मशविरा करते हैं।

 

419 परिवारों में, जिनका हमने सर्वेक्षण किया, 12 फीसदी ने बताया कि कलाबुरगी में सरकार द्वारा संचालित एक कृषि ज्ञान केंद्र, द्वारा उन्हें जानकारी मिली। इनमें से 85 फीसदी जानकारी को संतोषजनक पाया गया। यह महत्वपूर्ण है कि 85 फीसदी परिवार या पड़ोसियों पर निर्भर करते हैं। सरकार पर 1 फीसदी, राजनेताओं पर 1 फीसदी और संकट के समय 2.5 फीसदी एनजीओ / सामुदायिक समूहों पर निर्भर रहते हैं।

 

पाटिल अब उन किसानों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान में प्रमुख सहायक हैं, जो नई विधियों का प्रयास करने के इच्छुक हैं।श्यामराव अन्य किसानों को वित्तीय सहायता दिलाने में भी मदद करता है। उन्होंने 250,000 रुपये के ऋण पाने के लिए अपने गांव में पांच किसानों की मदद की है।

 

पहचान और इनाम

 

पिछले 18 वर्षों से कर्नाटक सरकार हर साल कार्बनिक और एकीकृत खेती में अच्छा प्रदर्शन करने वाले किसानों को सम्मानित करती रही है।

 

2008-09 में, पानी के कमी के बावजूद संपन्न कृषि प्रथाओं को प्रदर्शित करने के पाटिल के प्रयासों के लिए को कृषि पंडित प्रशस्थी पुरस्कार (प्रगतिशील किसान पुरस्कार) से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार 30 में से एक है, जिनसे पाटिल को नवाजा गया है।

 

श्यामराव और उनकी पत्नी ने सोशल नेटवर्क्स बनाए हैं और इससे लोगों की मदद की है, जैसा कि हमने कहा, सब्सिडी पाने में सहायता के रूप में और तकनीकी जानकारियों तक पहुंच में। उन्होंने अपने खेती प्रथाओं को और अधिक टिकाऊ, विविध और लाभकारी बनाने के लिए भी नवाचार किया है, जिससे जलवायु परिवर्तन के बावजूद वे स्थिर हैं।

 

पाटिल एक उदाहरण हैं कि राज्य समर्थन, एनजीओ का काम और किसान में नवाचार का सही मेल हो तो जलवायु परिवर्तन के दौर में किसान कैसे अच्छी खेती कर सकते हैं और वित्तिय लाभ कमा सकते हैं।

 

(ग्रीष्मा हेगड़े और चांदनी सिंह बैंगलोर के ‘इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स’ (आईआईएचएस) में जलवायु परिवर्तन टीम का हिस्सा हैं। वे जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, प्रवासन और आजीविका में बदलावों के मुद्दों पर काम करते हैं । वर्तमान में पूरे भारत और अफ्रीका में एक बहुराष्ट्रीय, दीर्घकालिक परियोजना के साथ जुड़े हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 7 अगस्त, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

कृषि नवाचार और स्थायी खेती पर अन्य आलेखों के लिए कृपया देखें: http://www.assar.uct.ac.za/news/adaptation-innovation-lessons-smallholder-farmers-indias-rainfed-karnataka

 

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