Home » Cover Story » गंगा के मैदान में 6 करोड़ भारतीय वायु प्रदूषण और बदलते जलवायु के प्रभाव को करते हैं महसूस

गंगा के मैदान में 6 करोड़ भारतीय वायु प्रदूषण और बदलते जलवायु के प्रभाव को करते हैं महसूस

दिशा शेट्टी,
Views
2545

Varanasi Climate Change_620
 

(जब पीएम 2.5 को मापा गया तो ये सामने आया कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र वाराणसी (ऊपर) दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है। वायु प्रदूषण का कारण बनने वाली कई गैसों और पार्टिकुलेट मैटर में भी ग्रीनहाउस गुण होते हैं, जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ाते हैं।)

 

वाराणसी: उत्तर भारतीय शहर वाराणसी में वह जनवरी महीने की एक ठंडी शाम थी। साढ़े छह बजे का समय था। अंधेरा होने वाला था, लेकिन अब भी चीजें दिखाई दे रही थी। भीड़-भाड़ वाले सड़कों पर कारों को केवल कुछ मीटर की दूरी से देखना मुश्किल था। लेकिन इस दृश्य देखते हुए आपकी जुबान को धूल का स्वाद महसूस होता।

 

जल्द ही, आपकी त्वचा इस धूल को बनाने वाले मोटे कणों को महसूस करती । 2018 के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र को ग्रह पर सबसे अधिक प्रदूषित हवा वाले शहरों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

 

12 लाख लोगों का घर, वाराणसी, भारत की सबसे पवित्र नदी, गंगा के किनारे बसा हुआ है और 2016 के बाद से यह शहर वायु प्रदूषण के मामले में भारत की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से आगे निकल गया है, जैसा कि डब्लूएचओ के आंकड़ों से पता चलता है।

 

वाराणसी अकेला नहीं है। 6 करोड़ से अधिक लोगों का घर, गंगा के मैदान में चार अन्य शहर (कानपुर, फरीदाबाद, गया और पटना ) शामिल हैं। जब ऐसे कणों को मापा जाता है, जो व्यास में 2.5 माइक्रोन (पीएम 2.5) या उससे कम होते हैं, तो यह शहर 2018 की डब्लूएचओ सूची में दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शीर्ष पांच स्थान पर काबिज है।

 

ये कण मानव बाल के 1/25वां हिस्सा जितना महीन होते हैं। वे हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियों, यहां तक कि कैंसर का कारण बन सकते हैं। यदि एक बड़े प्रदूषक (पीएम 10) पर विचार किया जाए तो डब्ल्यूएचओ की दुनिया के सबसे प्रदूषित 15 शहरों की सूची में से 11 स्थानों पर भारत के शहरों के नाम हैं।

 

इस वायु प्रदूषण का प्रभाव सिर्फ मानव स्वास्थ्य पर ही नहीं पड़ता है। वायु प्रदूषण का कारण बनने वाली गैसों में से कई में ग्रीनहाउस गुण भी हैं – वे सूरज की गर्मी को फैलाते हैं और पृथ्वी के तापमान को बढ़ाते हैं। नवीनतम शोध इन प्रदूषकों को स्थानीय और वैश्विक जलवायु में परिवर्तन के रूप में दर्शाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि, ऐसा लगता है गंगा के मैदान में तापमान बढ़ रहा है, और मानसून अनिश्चित हो रहा है।

 

जर्मन शोध संस्थान ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस सस्टेनेबिलिटी स्टडीज’ (आईएएसएस) पोट्सडैम में वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंधों का अध्ययन करने वाले एरिका वॉन श्नीडेमेसेर ने कहा, “वायु प्रदूषक, जलवायु पर भी प्रभाव डालते हैं। अगर हवा में छोड़े गए पार्टिकुलेट मैटर में ब्लैक कार्बन (या कालिख) की मात्रा अधिक है, तो यह अधिक धूप को अवशोषित करेगा और वार्मिंग में योगदान देगा और जिससे जलवायु परिवर्तन होगा। “

 

जबकि कई गैसों ( जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड ) को वार्मिंग का कारण माना जाता था। पहले यह माना जाता था कि हवा में पार्टिकुलेट मैटर सूरज की रोशनी को  प्रतिबिंबित करता है, जिससे एक शीतलन प्रभाव पैदा होता है।

 

नए शोध अब कुछ अलग ही कह रहे हैं। हालांकि कुछ पार्टिकुलेट्स में शीतलन प्रभाव होता है, दूसरे तापमान में वृद्धि का कारण बनता है, जैसा कि अध्ययन से पता चलता है।

 

दुनिया में जलवायु डेटा का सबसे बड़ा संग्रह, ‘यूएस नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन’ (एनओएए) के आकलन के अनुसार, 1880 में जब से रिकॉर्ड रखने की शुरुआत हुई, वर्ष 2018 ग्रह के लिए सबसे गर्म साल था।

 

तापमान में उतार-चढ़ाव सामान्य हो जाने के कारण, लोग मौसम पर कम ध्यान दे रहे हैं, जैसा कि ट्विटर इंटरैक्शन पर आधारित 2019 के फरवरी के अध्ययन में कहा गया है। अध्ययन में कहा गया है कि लोग केवल दो से आठ साल तक ही मौसम की घटनाओं को याद करते हैं, और अगर असामान्य मौसम जारी रहता है, तो वे इसे असामान्य नहीं पाएंगे और न ही अंतर बता पाएंगे।

 

यह भारत की जलवायु-परिवर्तन पर हमारी श्रृंखला की पांचवीं रिपोर्ट है

 

(आप पहली रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं, दूसरी यहां, तीसरी यहां और चौथी यहां)।

 

श्रृंखला नवीनतम वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ ग्राउंड रिपोर्टिंग से जुड़ी है और यह पता लगाती है कि लोग बदलते परिवेश में कैसे अनुकूल हो रहे हैं या कोशिश कर रहे हैं।

 
वायु प्रदूषण की मानवीय लागत
 

24 वर्षीय नाविक रवि सहानी बनारस के अस्सी घाट  ( गंगा के किनारे वाराणसी में सबसे लोकप्रिय घाट ) पर पर्यटकों को गंगा में घुमाने का काम करते हैं। पर्यटकों को वह 30  मिनट की सवारी की पेशकश करते हैं। दोपहर के 2 बजे हैं। वह सुबह 4 बजे से यहां हैं और रात 8 बजे तक यहां रहेंगे। आने वाले पर्यटकों से नाव में सवारी करने का अनुरोध करेंगे।

 

लेकिन आने वालों नें कुछ ही लोग नौकायन में रुचि रखते हैं।

 

नदी का पानी गहरे रंग का है और हवा धुंधली है। पर्यटकों की शिकायत है कि प्रदूषित हवा से उन्हें खांसी होती है और उनकी त्वचा में खुजली होने लगती है।सहानी के लिए इन चीजों का मतलब है कि आय में कमी। उन्होंने बताया, “हमने पीढ़ियों से यह काम किया है। मैंने जो पैसा कमाया है, उसमें से मुश्किल से ही कभी कुछ बचा है। अगर मेरे पास कुछ और शुरू करने के लिए पैसा होता, तो मैंने शुरु कर लिया होता। लेकिन मेरे पास नहीं है।”

 

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक नाविक रवि सहानी ने कहा कि कम ही लोग गंगा पर नाव की सवारी में रुचि रखते हैं, जिससे उनकी आय का एकमात्र स्रोत प्रभावित होता है।नदी का पानी गहरे रंग का है और हवा धुंधली है। पर्यटकों की शिकायत है कि प्रदूषित हवा से उन्हें खासी होने लगती है और उनकी त्वचा में खुजली होने लगती है।

 

‘सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट’ (सीइइडी), इंडियास्पेंड और कैर 4 एयर द्वारा ‘वाराणसी चोक्स’ नाम के 2016 की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में हवा को लेकर वाराणसी में कोई अच्छा दिन नहीं था।

 

बेंगलुरु की शोधकर्ता और रिपोर्ट की लेखिका, ऐश्वर्या मैडिनेनी ने कहा, “हमने जिन कारणों से वाराणसी को अध्ययन करने के लिए चुना, उनमें से एक यह था कि वायु प्रदूषण की समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। जरूरत थी इसे राष्ट्रीय राजधानी से आगे ले जाने की। ”

 

जबकि उच्च आय वाले देशों में हवा की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है। शहरों में रहने वाले लगभग 97 फीसदी( 100,000 से अधिक की आबादी के साथ ) निम्न और मध्यम आय वाले देशों में अब प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं।

 

2016 में, डब्ल्यूएचओ ने 70 लाख मौतों का श्रेय ( हैदराबाद की आबादी के बराबर ) इनडोर और आउटडोर प्रदूषण को दिया है। इनमें से सबसे ज्यादा मौतें 24 लाख, अकेले दक्षिण-पूर्व एशिया में हुई थीं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार जैसा कि हवा की गुणवत्ता में गिरावट आती है अधिक लोगों को स्ट्रोक, हृदय रोग, फेफड़ों के कैंसर के साथ-साथ पुरानी और तीव्र श्वसन बीमारी का खतरा होता है।

 

Cities in Asia, including India, have some of the world’s most polluted air. The darker shades represent higher levels of PM 2.5 (particulate matter less than 2.5 µm diameter) in the map above, updated regularly by the WHO.
Source: World Health Organization

 

विशेषज्ञों ने कहा कि ये शहर जलवायु परिवर्तन के चालक भी होंगे। वायु प्रदूषण से तापमान, वर्षा प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों ने कहा कि वायु प्रदूषण से तापमान में वृद्धि या गिरावट हो सकती है और बारिश के पैटर्न में बदलाव हो सकता है।

 

जब कुछ जलता है, तो दहन की रासायनिक प्रक्रिया गैस या पार्टिकुलेट मैटर को कालिख की तरह छोड़ती है। ज्यादातर उदाहरणों में, गैसों और कण पदार्थ को एक साथ छोड़ा जाता है। वैज्ञानिकों ने कहा कि उनके पास सबसे अधिक गैसों और सूक्ष्म कणों दोनों की प्रकृति की “निष्पक्ष समझ” है।

 

आईएएसएस-पोट्सडैम के श्नीडेमेसेर ने कहा “लेकिन हमारी जानकारी में अंधे स्थान भी हैं, और यह कहना मुश्किल है कि ये रसायन एक दूसरे के साथ कैसे मिलेंगे।”

 

यदि वार्मिंग के कारण कण और गैसें मिश्रण पर हावी हो जाती हैं, तो शुद्ध परिणाम तापमान में वृद्धि होगी। धूल, समुद्री नमक और हवा में घुले राख जैसे कणों को एरोसोल के रूप में जाना जाता है। कुछ एरोसोल सूरज से अधिक गर्मी को अवशोषित करते हैं, कुछ ऐसे होते हैं, जिससे तापमान गिरता है।

 

कानपुर में ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (आईआईटी) के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख सच्चिदा नंद त्रिपाठी ने कहा, “एरोसोल बादल के गुणों में महत्वपूर्ण बदलाव कर सकते हैं।” से वायु प्रदूषण ने स्थानीय और क्षेत्रीय वातावरण में कैसे बदलाव लाए, इस विषय पर प्रोफेसर त्रिपाठी ने चार साल तक अध्ययन किया है।

 

बादलों में, पानी के कण संघनित होकर द्रव्य का निर्माण करते हैं, जो बाद में बारिश के रूप में नीचे आते हैं। एरोसोल वर्षा को कमजोर कर सकता है। यहां बताया गया है कि यह कैसे काम करता है: जबकि बादलों में उपलब्ध पानी समान होता है, यह अब उपलब्ध कणों की बड़ी संख्या के बीच पुनर्वितरित होता है।

 

नतीजतन, दो पैटर्न उभर रहे हैं। प्रोफेसर त्रिपाठी कहते हैं, “यह दिखाता है कि वायुमंडल में बढ़ते एरोसोल भारतीय मानसून को थोड़ा कमजोर कर रहे हैं।” “और दो, थोड़े समय के पैमाने पर, यह बारिश का पुनर्वितरण कर सकता है।”

 

लेकिन वर्षा पर एयरोसोल प्रदूषण का प्रभाव एक जटिल तंत्र है, जो नमी की उपलब्धता, प्रदूषण की मात्रा और ऊंचाई, अन्य कारकों के बीच निर्भर करता है।

 

स्थानीय स्तर पर, इसका मतलब यह हो सकता है कि शहर के भीतर वर्षा बहुत भिन्न हो सकती है। उदाहरण के लिए, एक अत्यधिक प्रदूषित शहर के केंद्र में अचानक बारिश हो सकती है, जिससे हल्की बाढ़ भी आ सकती है, जैसा कि अगस्त 2016 में नागपुर में रिपोर्ट किया गया था। फरवरी 2019 में दिल्ली की गई रिपोर्ट के अनुसार, एरोसोल प्रदूषण बादल निर्माण में बाधा उत्पन्न कर सकता है और ओलावृष्टि का कारण बन सकता है।

 

इंडो-गैंगेटिक बेल्ट के प्रदूषित शहर

Of the world’s 15 most polluted cities–measured for PM 2.5–13 are Indian. All 13 are in the Indo-Gangetic plain, which stretches from Pakistan in the west to Bangladesh in the east.

 

2017 में, वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में लगभग 7 फीसदी योगदान भारत का था,  जो 2016 के 6 फीसदी से ज्यादा है, जैसा कि वैश्विक ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन को निर्धारित करने के लिए कई शोध संस्थानों के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास, ‘ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट’ की दिसंबर 2018 की रिपोर्ट से पता चलता है।

 

वर्तमान में, चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के बाद भारत CO2 का दुनिया का चौथा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। अमेरिका और यूरोपीय संघ का उत्सर्जन गिर रहा है, वहीं भारतीय और चीनी बढ़ रहे हैं। अमेरिका में दुनिया में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन जारी है।

 

ये उत्सर्जन जीवाश्म ईंधन के जलने या भूमि-उपयोग के पैटर्न में बदलाव से भी आते हैं। बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से देश में कार्बन उत्सर्जन में शुद्ध वृद्धि हो सकती है।

 

Countries With World’s Highest CO2 Emissions

Carbon emissions from India and China continue to rise, while those of the US and the EU are declining. The US has the world’s highest per capita carbon emissions.
Source: Global Carbon Budget Report 2018

 

दुनिया के शीर्ष 20 सबसे प्रदूषित शहरों में अधिकांश भारतीय शहर गंगा के मैदान में हैं।

 

यह क्षेत्र, जो पश्चिम में पाकिस्तान से पूर्व में बांग्लादेश तक फैला है, इतना प्रदूषित कैसे होता है?

 

प्रोफेसर त्रिपाठी कहते हैं, “घनी आबादी के अलावा इस क्षेत्र का भूगोल भी अनोखा है। भारत के उत्तर में गंगा का मैदान, हिमालय और दक्षिण में दक्खन का पठार है। यह एक घाटी प्रभाव बनाता है और हवा को स्थिर करने का कारण बनता है। “

 

पूरे क्षेत्र में चलने वाली उत्तर-पश्चिमी हवाएं भारत-गंगा के मैदान में प्रदूषित हवा फैलाती हैं। प्रोफेसर त्रिपाठी कहते हैं कि पंजाब के कुछ हिस्सों में हवाएं मध्य एशिया और पाकिस्तान से भी प्रदूषण फैला सकती हैं।

 

2011 के नासा के एक अध्ययन में कहा गया है कि भारत-गंगा का मैदान एक “वैश्विक एरोसोल हॉटस्पॉट” है, जिसके कारण हिमालय में बर्फ तेजी से पिघलती है। एयरोसोल भी गर्मी की मानसून के दौरान वर्षा परिवर्तनशीलता का कारण है, जैसा कि एक और 2015 के अध्ययन ने कहा।

 

लेकिन यह सिर्फ भारत-गंगा के मैदान के शहर नहीं हैं जो प्रदूषित हैं।

 

वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र, आईआईटी-दिल्ली में एसोसिएट प्रोफेसर, सग्निक डे कहते हैं ,” मुंबई और हैदराबाद दोनों के आसपास प्रदूषण ज्यादा है। मुंबई के मामले में, स्थलाकृति के कारण  प्रदूषक तत्व हवाओं के द्वारा महासागरों तक जाता है।” डे ने उपग्रह इमेजरी का उपयोग करके भारत में एरोसोल के वितरण का अध्ययन किया है और पाया है कि वितरण हर मौसम में बदलता है, यहां तक ​​कि पड़ोस के बीच भी बदलता है।

 

This image from NASA, taken on August 23, 2018, shows aerosol pollution–a mix of particulate matter and gases–over India. The red over the Indo-Gangetic plain in north India indicates aerosol pollution caused by soot, the purple haze over Rajasthan indicates aerosol pollution due to dust from the Thar desert, while the blue specks over northern Gujarat are from aerosol pollution caused by the presence of sea salt in the air.
Credit: Earth Observatory, National Aeronautical and Space Agency, USA

 

डे एक और बात को उजागर करते हैं: वायु-गुणवत्ता वाले सेंसर की कमी।

 

डे कहते हैं, ” हमारे पास 130 से अधिक स्वचालित स्वचालित निगरानी प्रणाली हैं, जिनमें से 40 एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में हैं। भारत में लगभग 500 जिलों में एक भी निगरानी प्रणाली नहीं है, चाहे वह स्वचालित हो या मैनुअल। इसे सीधे शब्दों में कहें, तो हमें पता नहीं है कि भारत के टियर -2 और -3 शहरों में से कितने प्रदूषित हैं, क्योंकि हम वहां प्रदूषण के स्तर को माप नहीं रहे हैं। ”

 

वहीं, गंगा के मैदान में, भारत की निष्क्रियता के प्रभाव साफ देखे जा सकते हैं।

 

जीवन भर का बदलाव
 

बैजनाथ मांझी 87 साल के हैं। वह कभी स्कूल नहीं गए। अपने पिता की तरह, वह एक नाविक हैं, जैसा कि उनके बच्चे और पोते हैं। अपने जीवनकाल में, मांझी ने देखा कि गंगा का पानी प्रदूषित हो रहा है और वाराणसी में वायु की गुणवत्ता बिगड़ती जा रही है।

 

मांझी ने कहा, “हम केवल तभी पैसा कमा सकते हैं, जब लोग आएंगे,” मैं सुबह से यहां बैठा हूं, लेकिन अभी तक एक भी ग्राहक नहीं आया है। “

 

बैजनाथ मांझी ने कहा कि उन्होंने अपने जीवनकाल में वाराणसी में हवा और पानी की गुणवत्ता को खराब होते देखा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये ऐसे बदलाव हैं जिसे होने में आमतौर पर, सैकड़ों साल लगते हैं।

 

मांझी जैसे लोगों के लिए, प्रदूषित हवा का मतलब जीवन की बिगड़ती गुणवत्ता और गरीबी का एक चक्र है, जिससे वे बच नहीं पा रहे हैं। एक पर्यटक जो कुछ भी देने को तैयार है, मांझी को उसे स्वीकार करना पड़ता है। विशेषज्ञों ने कहा कि कई बदलाव, जो मांझी ने अपने जीवनकाल में देखे, वो सैकड़ों वर्षों से चल रहे हैं। लेकिन वायु प्रदूषण की भारी मात्रा का मतलब यह है कि मांझी जैसे लोग एक अवधारणात्मक अंतर को नोटिस करने में सक्षम हैं।

 

दिसंबर 2018 में जारी ‘ग्लोबल कार्बन बजट रिपोर्ट’ के अनुसार, वायुमंडल में सीओ 2 की मात्रा पूर्व-औद्योगिक युग से अब तक लगभग दोगुनी हो गई है। अकेले 1960 और 2017 के बीच, वायुमंडल में CO2 की मात्रा 310 पीपीएम (प्रति मिलियन भाग) से 410 पीपीएम तक चली गई है – 32 फीसदी से अधिक की वृद्धि।

 

1950 के दशक से वायु में CO2 का स्तर

Source: Global Carbon Budget 2018 report

 

इस प्रदूषण का बहुत सारा हिस्सा भारत में वाहनों से नहीं आता है। डे ने कहा, “ग्रामीण भारत में घरेलू प्रदूषण का एक बड़ा योगदान है, जिसका कारण कोयले या लकड़ी जैसे ठोस ईंधन का इस्तेमाल होता है।” उन्होंने कहा कि ज्यादातर विकासशील देशों के लिए यह एक विशेषता है।

 

निगरानी में सुधार
 

जनवरी, 2019 में दिल्ली में, अभूतपूर्व वायु प्रदूषण और सार्वजनिक दबाव ने सरकार को राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) शुरू करने के लिए प्रेरित किया- पांच साल की एक योजना, जो भारत के 102 शहरों में वायु गुणवत्ता के सुधार पर ध्यान केंद्रित करती है।

 

इस योजना का एक प्रमुख घटक कम लागत वाले वायु निगरानी उपकरणों का उपयोग करके डेटा की निगरानी बढ़ाना है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा ( क्योंकि वह मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं थे ) “वास्तविक परिवर्तन के लिए, विभिन्न विभागों को एक साथ काम करना होगा, अकेले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इतना प्रभाव नहीं डाल पाएगा।”

 

एनसीएपी की अपनी खामियां हैं। इसमें कानूनी जनादेश का अभाव है, इसकी कार्ययोजना के लिए स्पष्ट समयसीमा नहीं है और यह जवाबदेही तय नहीं करता है। फरवरी 2019 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार, यह ग्रामीण भारत में हवा की गुणवत्ता की अनदेखी करता है।

 

मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरामेंट,फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज (एमओइएफसीसी) के अधिकारी ने कहा कि वायु प्रदूषण से निपटने के उपाय मौजूद हैं, लेकिन राज्य सरकार के अधिकारियों को इसका नेतृत्व करना चाहिए। उन्होंने कहा, “सार्वजनिक दबाव में वृद्धि के लिए बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।”

 

वायु प्रदूषण को दूर करने के लिए सरकारी विभागों के बीच समन्वय एक और आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, वाराणसी में, विनियम बनाने के आरोप में नागरिक निकाय शायद ही कभी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सलाह देते हैं।

 

आईआईटी-दिल्ली के डीई का मानना ​​है कि हालांकि एनसीएपी सही दिशा में बढ़ रहा है,  लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें डेटा को मापने में बहुत अधिक निवेश करने की आवश्यकता है।”

 

वायु प्रदूषण और जलवायु-परिवर्तन के प्रभावों को मापना मुश्किल है, आईएएसएस-पोट्सडैम के श्नाइडेमेसेर ने कहा, क्योंकि वायु, भूमि और महासागर प्रणालियों के बीच “बहुत सारे इंटरैक्शन और फीडबैक तंत्र हैं”।

 

लेकिन दूसरी तरफ देखें तो, “यदि नियमों को लागू किया जाता है, तो सप्ताह के समय और यहां तक ​​कि दिनों तक हवा की गुणवत्ता में सुधार देखना संभव है”।  बीजिंग के उदाहरण का हवाला देते हुए आईएएसएस-पोट्सडैम के श्नाइडेमेसेर ने कहा – एक शहर जहां न्यूनतम तापमान -8 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है – जहां वायु प्रदूषण को 2017 तक पांच वर्षों में 35 फीसदी तक लाया गया था।

 

बीजिंग में परिवर्तन संभव था, क्योंकि सरकार के पास एक योजना थी, विभिन्न विभागों ने योजना और कानूनों को लागू किया और लाखों परिवारों को शीतकालीन इनडोर हीटिंग के लिए कोयले से प्राकृतिक गैस पर स्विच करने में मदद की। वाराणसी में, यह एक शुरुआत होगी, यदि सरकारी अधिकारियों ने अपने सहयोगियों से बात करना शुरू किया।

 

यह भारत के जलवायु परिवर्तन की श्रृंखला पर पांचवी रिपोर्ट है। पहली रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं, दूसरी यहां, तीसरी यहां और चौथी रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं।

 
( दिशा शेट्टी ‘कोलंबिया जर्नलिज्म स्कूल और इंडियास्पेंड’ की रिपोर्टिंग फेलो हैं, जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर लिखती हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 9 मार्च 2019 को indiaspend.com प्रकाशित हुआ है।
 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
“क्या आपको यह लेख पसंद आया ?” Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

code