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गंगा को साफ करने की समय सीमा वर्ष 2020 नजदीक, बजट का एक-तिहाई से कम खर्च

भास्कर त्रिपाठी,
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Patna: Activists of team 'Mission Gange' participate in a cleanliness drive at the banks of Ganga river, under the 'Namami Gange Programme', in Patna on Oct 30, 2018. (Photo: IANS)
 

नई दिल्ली: गंगा को साफ करने के लिए स्वयं घोषित समय सीमा, वर्ष 2020 नजदीक है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस काम के लिए केंद्र सरकार ने स्वच्छ गंगा मिशन के तहत 2019 तक 20,000 करोड़ रुपये की राशि तय की थी, लेकिन अब तक इस राशि का 25 फीसदी से भी कम खर्च हुआ है।

 

 2015 में नमामि गंगे या स्वच्छ गंगा मिशन के लॉन्च होने के बाद से, पिछले चार वर्षों से नवंबर 2018 तक, गंगा और इसकी सहायक नदियों – यमुना और चंबल को साफ करने के लिए परियोजनाओं पर 4,800 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं, जैसा कि 14 दिसंबर, 2018 को लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों से पता चलता है।  अक्टूबर 2018 तक, 3,700 करोड़ रुपये या 4,800 करोड़ रुपये के व्यय का लगभग 77 फीसदी खर्च किया गया है। इसमें उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित नदी तट वाले राज्यों में गंगा के तट पर गिरने वाले शहरों में सीवेज-उपचार के लिए बुनियादी ढांचे को बनाने पर 11 फीसदी से अधिक खर्च नहीं किया गया था। यह जानकारी मिशन की मासिक प्रगति रिपोर्ट पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आई है।  वर्ष 2015 से स्वीकृत 96 सीवेज-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में से 23, यानी लगभग 24 फीसदी  अक्टूबर 2018 तक पूरे किए गए। 96 सीवेज-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में 44 (46 फीसदी) निर्माणाधीन थे और 29 (30 फीसदी) पर कोई काम शुरू नहीं हुआ था।

 

गंगा (एक नदी जो हिमालय से निकलकर लगभग 2,500 किमी तक बहती है और उत्तर भारत के गंगा मैदान को पानी देती है ) की सफाई 1986 से लगातार सरकारों के एजेंडे पर रहे हैं और  2014 तक इस पर 4,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। लेकिन नदी गंदी बनी हुई है।

 

 2019 तक नदी को साफ करने के लिए, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने 20,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ 2015 में सबसे बड़ा अभियान ( नमामी गंगे ) लॉन्च किया। कार्यक्रम को अब 2020 तक बढ़ा दिया गया है।

 

गंगा की सफाई में खर्च राशि, 2015-16 से 2018-19 तक

Source: Lok Sabha
Note: Rs 679.15 crore was spent on other activities (Rs 52.56 crore in 2015-16, Rs 121.12 crore in 2016-17, Rs 271.56 crore in 2017-18 and Rs 233.91 crore in 2018-19)

 
नदी किसी भी तरह से साफ नहीं हुई है
 

मुख्य पर्यावरण प्राधिकरण ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ के अनुसार, 2013 से नदी पर बने 80 निगरानी साइटों पर प्रदूषण के स्तर बढ़े हैं, जैसा कि ‘द वायर’ ने 20 अक्टूबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।  बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी)- पानी में गैर जरूरी कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने के लिए जैविक जीवों द्वारा आवश्यक विघटित ऑक्सीजन की मात्रा- 2017 में, 80 साइटों में से 36 साइटों पर 3 मिलीग्राम / लीटर (मिलीग्राम / एल) से अधिक थी और अन्य 30 साइटों पर 2-3 मिलीग्राम / एल थी। 2013 में, यह 31 साइटों पर 3 मिलीग्राम / एल और 24 साइटों पर 2-3 मिलीग्राम / एल था, जैसा कि द वायर ने अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

उच्च बीओडी स्तर नदी और उसके प्राणियों के लिए हानिकारक हैं। 2-3 मिलीग्राम / एल के बीओडी स्तर के साथ पानी खपत के लिए उपयुक्त नहीं है और बिना  प्रशोधन के खपत से गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। यदि बीओडी 3 मिलीग्राम / एल को पार करता है, तो पीने की बात तो दूर, पानी नहाने के लिए भी उपयुक्त नहीं है।

 
परियोजनाओं की धीमी प्रगति
 

गंगा में प्रदूषण का मुख्य कारण शहरों से अनुपचारित और आंशिक रूप से उपचारित सीवेज का निर्वहन है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, गंगा में 2,900 मिलियन लीटर सीवेज डिस्चार्ज प्रति दिन (एमएलडी) जाता है, जिसमें से केवल 48 फीसदी या 1,400 एमएलडी का उपचार किया जाता है।

 

स्वच्छ गंगा मिशन के तहत केंद्र सरकार को 1,500 एमएलडी (निर्वहन का 52 फीसदी) सीवेज उपचार की क्षमता को अतिरिक्त रूप से जोड़ना है, लेकिन 31 अक्टूबर, 2018 को केवल 172 एमएलडी, या आवश्यक क्षमता का 11 फीसदी, पूरा किया गया है।

 
(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

 यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 19 दिसंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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