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गर्म मौसम का प्रभाव भारतीय श्रमिकों की उत्पादकता पर

भास्कर त्रिपाठी,
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भारत के गर्म दिनों में 27 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से  श्रमिकों की उत्पादकता में 4 फीसदी की गिरावट आती है। यह जानकारी एक नए अध्ययन में सामने आई है। 200 वर्षों से 2016 तक,  भारत में सालाना औसत तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। वर्ष 2030 तक 1.5-2.0 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की आशंका जताई गई है।

 

सीधे शब्दों में कहा जाए तो, इसका मतलब है कि यदि कोई कर्मचारी 27 डिग्री सेल्सियस के तपमान पर जूते के 100 बक्से पैक कर रहा है, तो वह 28 डिग्री सेल्सियस तापमान पर उस दिन केवल 96 बक्से ही पैक करेगा।

 

30 अगस्त, 2018 को एक वैचारिक संस्था, एनर्जी पॉलिसी इन्स्टिटूट एट यूनवर्सिटी ऑफ शिकागो ( एपिक ) द्वारा किए गए अध्ययन पर जारी रिपोर्ट के अनुसार, कपड़ा-बुनाई इकाइयों जैसे छोटे उद्योग, जो एयर कंडीशनिंग वहन नहीं कर सकते हैं, वहां तापमान में वृद्धि के कारण उत्पादन में कमी की आशंका सबसे ज्यादा है।

 

गर्म राज्य उत्पादन नुकसान के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील

 

गर्म दिनों में दिल्ली और गुजरात जैसे ‘गर्म क्षेत्रों’ के श्रमिक पर उत्पादकता में 4 फीसदी की गिरावट की आशंका है, जबकि दक्षिण और मध्य भारत के ‘हल्के जलवायु’ में श्रमिकों की दक्षता में 2 फीसदी की कमी होगी, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है। हम बता दें कि दिल्ली और गुजरात संयुक्त रुप से देश के सकल घरेलू उत्पाद (2014-15 की कीमतों पर) में लगभग 10 फीसदी का योगदान देते हैं।

 

शोधकर्ताओं ने श्रम-केंद्रित और अत्यधिक स्वचालित विनिर्माण प्रक्रियाओं को देखा। अध्ययन के अनुसार, पहली श्रेणी में उन्होंने पाया कि तापमान 27 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने से कपड़ा बुनाई या परिधान विनिर्माण में लगे श्रमिकों की उत्पादकता प्रति डिग्री 4 फीसदी गिर गया है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि, स्टील उद्योग में श्रमिक, जो अत्यधिक स्वचालित आधुनिक प्लांट में काम कर रहे थे, उनपर बाहर के गर्म वातावरण का प्रभाव नहीं पड़ा।

 

तापमान वृद्धि से कामगारों की अनुपस्थिति में भी वृद्धि

 

अध्ययन में कहा गया है कि 10 दिनों के तापमान में औसत 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से अनुपस्थिति की संभावना 5 फीसदी बढ़ जाती है। श्रम-केंद्रित और स्वचालित-निर्माण, दोनों प्रक्रियाओं में अनुपस्थिति बढ़ती है।

 

यहां तक ​​कि अगर नियोक्ता एयर कंडीशनिंग का उपयोग भी करते हैं, तो भी श्रमिक अत्यधिक गर्मी में घर में ही रूक जाते हैं। अध्ययन कहता है, “अनुपस्थिति में वृद्धि हो सकती है क्योंकि कार्यस्थल के अंदर और बाहर निरंतर गर्मी के संपर्क में थकान या बीमारी पैदा हो सकती है।”

 

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि कम उत्पादकता और अनुपस्थिति में वृद्धि से कारखानों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।

 

गर्म दिनों के दौरान भारतीय कारखानों के उत्पादन में गिरावट

 

अध्ययन के मुताबिक वर्ष में औसत दैनिक उच्च तापमान 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है, तो उत्पादन में लगभग 3 फीसदी की गिरावट आती है। “यह नुकसान गर्म दिनों की बारिश में भारत के आर्थिक उत्पादन में पूरी कमी को समझने के लिए काफी है।”

 

आर्थिक गतिविधियों पर तापमान वृद्धि के प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए, शोधकर्ताओं ने भारतीय जिलों के लिए 11 साल से 2009 तक विनिर्माण क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों का उपयोग किया है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 70,000 औद्योगिक संयंत्रों से आया था।

 

छोटे उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित

 

तापमान से संबंधित नुकसान से बचने के लिए, एयर कंडीशनिंग एक त्वरित समाधान प्रतीत होता है। हालांकि, जैसा कि हमने पहले कहा था, छोटे उद्योग तापमान वृद्धि के उपायों में पिछड़ जाते हैं, क्योंकि वे एयर कंडीशनिंग वहन नहीं कर सकते हैं।

 

ईपीआईसी के कार्यकारी निदेशशक और अध्ययन के सह-लेखक, अनंत सुदर्शन ने इंडियास्पेंड को बताया, “कई क्षेत्रों में छोटे उद्योग के लिए एयर कंडीशनिंग बहुत महंगा हो सकता है, इसलिए उन्हें कम उत्पादन पर संतोष करना पड़ सकता है।”

 

छोटे पैमाने पर कपड़ा-बुनाई इकाइयों के एक सेट से लिया गया डेटा ( जो विनिर्माण के लिए कम लागत वाले दैनिक मजदूरी श्रमिकों का उपयोग करते हैं ) बताता है कि इन इकाइयों की पूरी मंजिल की एयर कंडीशनिंग की लागत कुल मजदूरी बिल का 20 फीसदी तक हो सकती है। सुदर्शन कहते हैं, ” जब तक उत्पादकता में कमी बहुत अधिक नहीं है (छोटे उद्योगों के लिए) एयर कंडीशनिंग की लागत उत्पादन के लाभ से ज्यादा होगी।”

 

सुदर्शन बताते हैं कि यह विशेष रूप से कम मूल्य वाले, छोटे मार्जिन उद्योगों में सच है, जो भारत में अनौपचारिक क्षेत्र के विनिर्माण के एक महत्वपूर्ण हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।

 

(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 11 सितंबर 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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