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गाय से जुड़ी हिंसा की वजह से मांस और चमड़े का निर्यात तबाह, आय प्रभावित: नई रिपोर्ट

एलिसन सलदानहा,
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मुंबई: 19 फरवरी, 2019 को जारी अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत का गौ रक्षा आंदोलन धार्मिक और सामाजिक स्तर पर किसानों और चरवाहों को नुकसान पहुंचा रहा है।

 

2014 के बाद से, जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने केंद्र में सत्ता संभाली है, तब से गौमांस चमड़े के निर्यात की वृद्धि, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय बाजार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लगभग रुक गई है। इसने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को प्रभावित किया है, जैसा कि 2010-11 और 2017-2018 तक के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के विश्लेषण की रिपोर्ट से पता चलता है।  2010 से 2018 के बीच, भारत में गौ-संबंधित हिंसा के 123 हमलों की सूचना दर्ज की गई है- इनमें से 98 फीसदी केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार के सत्ता संभालने के बाद हुई है, जैसा कि ऐसे अपराधों को ट्रैक करने वाले FactChecker.in के डेटाबेस से पता चलता है।

 

‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की रिपोर्ट कुछ अन्य आंकड़ों के साथ, इस डेटाबेस पर निर्भर है।

 

अतिसतर्कता  से जीविका और विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित

 

कई हिंदू गाय को पवित्र मानते हैं, और 99.38 फीसदी भारतीय अब गौ-संरक्षण कानूनों के तहत रहते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 14 अप्रैल, 2017 की रिपोर्ट में बताया है। फरवरी 2019 में, केंद्र सरकार ने गौ रक्षा के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की घोषणा की।

 

‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ का कहना है, “इन नीतियों और अतिसतर्कता से जुड़े हमलों ने भारत के मवेशी व्यापार और ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था, साथ ही चमड़े और मांस निर्यात उद्योगों को बाधित किया है, जो खेती और डेयरी क्षेत्रों से जुड़े हैं।”

 

भारत दुनिया में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक है, जो प्रति वर्ष $ 4 बिलियन का भैंस का मांस निर्यात करता है। हालांकि, 2014 के बाद से निर्यात में ज्यादातर गिरावट आई है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि, भारत का शीर्ष मांस उत्पादक राज्य, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी राज्य सरकार की नीतियों ने व्यापार के भविष्य पर अनिश्चितताओं को जन्म दिया है। 2014-15 में, भारत ने $ 4.78 बिलियन मूल्य की भैंस के मांस का निर्यात दर्ज किया ( 2010 के बाद सबसे अधिक ), हालांकि विकास में 26.05 प्रतिशत अंक की गिरावट आई। यह आंकड़े 2013-14 में 35.93 फीसदी से 2014-15 में 9.88 फीसदी हुए हैं। इसके बाद, निर्यात की मात्रा लगभग 4 बिलियन डॉलर हो गई है। 2016-17 में 3.93 फीसदी की गिरावट और 2017-18 में 3.06 फीसदी की मामूली वृद्धि हुई है।

 

गोमांस निर्यात में वृद्धि ( 2010-11 से 2017-18 )

Source: Human Rights Watch

 

इसी तरह, दुनिया भर के चमड़े में भारत की 13 फीसदी हिस्सेदारी है। उद्योग ने $ 12 बिलियन से अधिक का वार्षिक राजस्व दर्ज किया है, जिसमें से 48 फीसदी निर्यात ($ 5.7 बिलियन) से है, और लगभग 3 मिलियन लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिसमें से 30 फीसदी महिलाएं हैं। 2017 में, सरकार ने परिधान और चमड़ा क्षेत्र की पहचान विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी और विकास के लिए रोजगार पैदा करने के लिए उपयुक्त के रुप में की।

 

इसी समय, एक सरकारी सर्वेक्षण ने स्वीकार किया कि ” मवेशियों की बड़ी संख्या

 

होने के बावजूद, भारत से मवेशियों के चमड़े के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी कम है और भारत में वध के लिए मवेशियों की सीमित उपलब्धता के कारण घट रही है”।

 

चमड़ा निर्यात में वृद्धि (2010-11 से 2017-18)

Source: Human Rights Watch

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि गाय को लेकर अतिसतर्कता के डर से और सैकड़ों बूचड़खानों के बंद होने से मवेशियों के चमड़े की उपलब्धता में व्यवधान आ रहा है।

 

 जबकि चमड़े और चमड़े के उत्पादों का निर्यात 2013-14 में 18 फीसदी से अधिक और 2014-15 में 9 फीसदी बढ़ा, 2015-16 में 20 प्रतिशत अंक की गिरावट के साथ यह -9.86 फीसदी हुआ है। यह फिर से बढ़ गया, लेकिन 2017-18 में 1.4 फीसदी की बहुत कम दर पर, जैसा कि सरकारी आंकड़ों के अपने विश्लेषण की रिपोर्ट कहती है।  रिपोर्ट में उद्धृत, एक राजस्थान-आधारित लेखक और पशुपालन के विशेषज्ञ, एम.एल परिहार कहते हैं, “हिंदुत्व से जुड़े नेता, जो गायों के साथ इस जुनून को बढ़ावा दे रहे हैं, उन्हें यह महसूस नहीं होता है कि उनके अपने हिंदू समुदाय को कितना नुकसान हो रहा है, और वे अपने देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं।”

 

हिंसा ज्यादातर अल्पसंख्यक समूहों पर लक्षित होती है, लेकिन आर्थिक गिरावट से बहुसंख्यक हिंदुओं को नुकसान पहुंचाता है।

 

हाल के वर्षों में, कई बीजेपी शासित राज्यों ने सख्त कानूनों और नीतियों को अपनाया है, जो अल्पसंख्यक समुदायों को असमान रूप से नुकसान पहुंचाते हैं, जैसा कि रिपोर्ट से पता चलता है। हमले  अक्सर बीजेपी से जुड़े संगठनों से जुड़े होने का दावा करने वाले समूहों द्वारा बड़े पैमाने पर मुस्लिम, दलित या आदिवासी समुदायों पर होते हैं।

 

दलित, जो चमड़े के सामानों के लिए मवेशियों के शव और खाल के निपटान से जुड़े हैं  और मुसलमान, जो बूचड़खानों और मांस की दुकानों के पारंपरिक प्रबंधक हैं, गौ रक्षा के नाम पर किए गए हमलों से प्रभावित होते हैं, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है। FactChecker.in डेटाबेस के अनुसार इस तरह की हिंसा का शिकार होने वालों में मुसलमानों और दलितों पर हमले होने की हिस्सेदारी 56 फीसदी और 10 फीसदी है, जबकि हिंदुओं में 9 फीसदी पीड़ित शामिल हैं। ऐसे हमलों में मारे जाने वालों में विशेष रुप से मुस्लमानों की हिस्सेदारी 78 फीसदी है, जैसा कि FactChecker.in से पता चलता है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन हमलों के लिए अधिकारियों की अपर्याप्त प्रतिक्रिया हिंदुओं सहित समुदायों को नुकसान पहुंचा रही है, जिनकी आजीविका पशुधन से जुड़ी हुई है। इसमें किसान, चरवाहे, पशु ट्रांसपोर्टर, मांस व्यापारी और चमड़ा श्रमिक शामिल हैं।

 

 भारत की लगभग 55 फीसदी आबादी कृषि और संबंधित गतिविधियों में लगी हुई है, जो देश के सकल मूल्य में 17 फीसदी का योगदान करती है। भारत, दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक, और लगभग 190 मिलियन मवेशियों और 108 मिलियन भैंसों का घर है। किसान अपनी आय और खाद्य आवश्यकताओं के पूरक के लिए इस पशुधन को बनाए रखते हैं और व्यापार करते हैं।

 

लेकिन गोरक्षा के नाम पर बढ़ती हिंसा का रिश्ता सरकार द्वारा आयोजित पशु मेलों में पशुओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी से जुड़ा प्रतीत होता है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है। उदाहरण के लिए, राजस्थान राज्य सरकार प्रतिवर्ष 10 पशु मेलों का आयोजन करती है। 2010-11 में, 56,000 से अधिक गाय और बैल इन मेलों में लाए गए और 31,000 से अधिक बेचे गए। 2016-17 में, 11,000 मवेशियों को लाया गया था और 3,000 से कम बेचा गया था, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि, कृषि में बढ़ते मशीनीकरण और मवेशियों की बढ़ती उम्र के कारण, किसान गायों को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं, क्योंकि वे उन्हें पालतू बनाए रखने की लागत वहन नहीं कर सकते हैं। इसके कारण आवारा पशुओं द्वारा किसानों की फसलों को नष्ट करने के मामलों में वृद्धि हुई है। रिपोर्ट कहती है कि, नुकसान को रोकने के लिए राज्य सरकारों द्वारा किए गए काउंटर-उपाय स्वास्थ्य और शिक्षा परिणामों में सुधार लाने के उद्देश्य से किए गए प्रयासों से समझौता करते हैं। रिपोर्ट ध्यान दिलाती है कि भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून संधियों का पक्षधर है, जो नस्ल या धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है, और सभी नागरिकों को कानून के तहत समान सुरक्षा प्रदान करना सरकारों की जिम्मेदारी होती है।  रिपोर्ट कहती है कि, “सरकार धार्मिक और अन्य अल्पसंख्यक आबादी की रक्षा  भेदभाव और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ पूरी तरह और निष्पक्ष रूप से मुकदमा चलाने के लिए बाध्य है। अधिकारियों को उन नीतियों को भी उल्टा करना चाहिए जो पशुधन से जुड़ी आजीविका को नुकसान पहुंचाती हैं, विशेष रूप से ग्रामीण समुदायों में और  जाति और धार्मिक पूर्वाग्रह के कारण अधिकारों को बनाए रखने में विफल रहने वाली पुलिस और अन्य संस्थाओं पर नजर रखनी चाहिए।”

 
(सलदानहा सहायक संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 19 फरवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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