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गुजरात के एक गरीब जिले का बुनियादी ढांचा नहीं कर सकता है नौकरियों की कमी की पूर्ति

Swagata Yadavar,
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अहवा सिविल अस्पताल में नीओनैटल इन्टेन्सिव यूनिट में दस वार्मर और पांच उपस्थायी नर्स हैं। हालांकि, डांग जिले के स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा कई अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर है। हमने देखा कि आदिवासियों के स्वास्थ्य पर थोड़ा जोर भी है, स्वास्थ्य देखभाल तक सीमित जनजातीय पहुंच, और प्रवास जिससे महिलाओं और बच्चों के बारे में पता करना मुश्किल हो जाता है, अपने नागरिकों के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार को सीमित करता है।

 

डांग जिला, गुजरात: 50 वर्षीय गमन गावित से हमने दक्षिण गुजरात के डांग जिले में एक पर्यटक स्थल, गिमरल फॉल के पास बातचीत की। यह राज्य की राजधानी गांधीनगर से 400 किलोमीटर दूर है। 50 वर्षीय गवित एक किसान हैं। वह कहते हैं, “हमारे गांव में बात करने के लिए ज्यादा लोग नहीं मिलेंगे।” उनके चार बेटों में से दो सूरत और महाराष्ट्र चले गए, जिससे उनके परिवार 15 सदस्यों को भोजन मिल सके। गवित चार एकड़ जमीन के मालिक हैं । जिस पर वह चावल, नगी ( बाजरा) और यौगिक (चारा) उगाते है। इंडियास्पेंड के साथ बात करते हुए उन्होंने बताया कि हर साल मानसून के बाद लगभग 50 ट्रकों पर गांव के लोग चले जाते हैं, क्योंकि यहां खेती के कुछ ही विकल्प मौजूद हैं।

 

डांग की कम से कम 75 फीसदी आबादी गांवों में प्रति माह प्रति व्यक्ति 356 रुपए और शहर में प्रति माह प्रति व्यक्ति 538 रुपए की गरीबी रेखा के नीचे रहती है और जिला गुजरात के विकास मॉडल के तहत सफल होने के लिए संघर्ष कर रहा है। 2015-16 के नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस -4) के अनुसार, मुख्य रुप से इस आदिवासी जिले ( 98 फीसदी अनुसूचित जनजाति से हैं ) में, पांच साल से कम उम्र के 48.1 फीसदी बच्चे स्टंड हैं, 72.2 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है और केवल 44.3 फीसदी बच्चों को पूरी तरह से प्रतिरक्षित किया गया था, हांलाकि, जिले ने स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में निवेश किया है।

 

और यह स्थिति केवल डांग की नहीं है। देश में प्रति व्यक्ति आय के मामले में गुजरात पांचवें स्थान पर है। शिशु मृत्यु दर पर 29 राज्यों में से गुजरात 19वें स्थान पर है। गुजरात में प्रति वर्ष प्रति 1,000 शिशुओं पर 34 शिशु मृत्यु का आंकड़ा है। यह आंकड़े, देश के गरीब राज्य मेघालय के आंकड़ों ( 30 ) से भी बद्तर है और और भारत की औसत शिशु मृत्यु दर (आईएमआर: प्रति 1000 जन्मों में मृत्यु) 41 से कम है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने नवंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है। इसके पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र, स्टंटिंग को कम करने, वेस्टेड बच्चों की संख्या को कम करने और मां के स्वास्थ्य में सुधार करने में सक्षम है, जबकि गुजरात को संघर्ष करना पड़ रहा है।

 

आंकड़ों थोड़े उलझे हुए हैं। औद्योगीकरण, बढ़ती आय और बुनियादी ढांचे में निवेश के बावजूद, स्वास्थ्य के नतीजे खराब हैं और भारत में बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं- भारत में, 280 मिलियन लोगों को अब से वर्ष 2050 के बीच नौकरियों की आवश्यकता होगी। यह वो वर्ष है जब कार्य-आयु आबादी (15 से 64 साल) चरम पर आएगी, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मई, 2016 की रिपोर्ट में बताया है। इस आबादी को उत्पादक होने के लिए स्वस्थ और शिक्षित होना होगा।

 

गुजरात के कर्मसद में प्रमुखस्वामी मेडिकल कॉलेज में बाल चिकित्सा विभाग के प्रमुख सोमशेखर निंबालकर कहते हैं, “गुजरात में स्वास्थ्य को प्राथमिकता बनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी कभी नहीं रही है। कमी नौकरशाहों और प्रशासकों की है जो समस्याओं का अध्ययन करें और राजनीतिक नेताओं को समाधान की पेशकश करें। “

 

निंबालकर आगे विस्तार से बताते हैं कि जबकि पुलों और अच्छे पानी की आपूर्ति उपलब्ध कराने में तेजी से सुधार किया जा सकता है और उसके परिणाम नजर आ सकते हैं, स्वास्थ्य कार्यक्रमों को दीर्घकालीन योजना की आवश्यकता होती है और लाभ लेने के लिए समय लगता है। समाधानों को जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों के सामने आने की जरूरत है, जो स्थानीय मुद्दों को समझते हैं।

 

गुजरात में 9 दिसंबर को हुए और 14 दिसंबर 2017 को होने वाले चुनावों के दौरान, यह समझने के लिए कि भारत और गुजरात के विकास मॉडल में कहां कमी हुई है, इंडियास्पेंड ने डांग जिले में आधे दर्जन गांवों का दौरा किया है। हम बता दें कि डांग जिला गुजरात के छह सबसे पिछड़े जिलों में से एक है।

 

यहां तक कि गुजरात में औद्योगिक रूप से विकास होने के बावजूद नौकरियों की कमी, लोगों को डांग से स्थानांतरित करने के लिए बाध्य करती है । लोगों का शिक्षा के उच्च स्तर तक पहुंचना मुश्किल है, आदिवासी स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत ज्यादा जोर नहीं है और संदेश स्थानीय परिस्थितियों में अनुकूलित नहीं हैं।

Source: National Family Health Survey, 2015-16 data Gujarat, Dang

 

Gujarat’s Health Lags Other Rich States
State Infant mortality (Deaths/1,000 live births) Under-five mortality (Deaths/1,000 live births) Children (12-23 months) fully immunised (In %) Children < 5 who are stunted (In %) Children < 5 who are wasted (In %) Children < 5 who are severely wasted (In %) Children < 5 who are underweight (In %)
Haryana 33 41 62.2 34 21.2 9 29.4
Maharashtra 24 29 56.3 34.4 25.6 9.4 36
Punjab 29 33 89.1 25.7 15.6 5.6 21.6
Gujarat 34 43 50.4 38.5 26.4 9.5 39.3
Kerala 6 7 82.1 19.7 15.7 6.5 16.1
Tamil Nadu 20 27 69.7 27.1 19.7 7.9 23.8

 

नौकरी की कमी के कारण मजबूरी में पलायन  

 

 गुजरात की प्रति व्यक्ति आय 122,502 रुपए है जो कि भारत के 82,269 रुपए के औसत से 39 फीसदी अधिक है। लेकिन 75 फीसदी डांग के निवासी गरीबी रेखा से नीचे रहती हैं।

 

डांग में ज्यादातर लोग चावल, बाजरा, और दालों के बारिश से होने वाली खेती पर निर्भर हैं। एक भारतीय गैर लाभकारी संस्था, आगा खान ग्रामीण सहायता कार्यक्रम के एक 2013 के अध्ययन के अनुसार, खेती के तहत 31 फीसदी क्षेत्र और 13 फीसदी सिंचाई के साथ यहां कृषि उत्पादकता कम है।

 

अध्ययन के अनुसार, डांग के सुबीर और वाघई ब्लॉकों में, 48 फीसदी से 60 फीसदी परिवार मॉनसून के बाद मौसमी पलायन करते हैं। डांग में स्थानीय रोजगार के अवसरों की कमी और अपर्याप्त आय लोगों को कर्ज के जाल में फंसने के लिए मजबूर करता है और उन्हें स्थानीय मुक्करदाम्स को कर्ज चुकाने या श्रम ठेकेदारों को भुगतान करने के लिए स्थानांतरित पड़ता है।

 

मुक्करदाम को चुकाने के बाद, वापस भेजने के लिए बहुत पैसे नहीं बचतें है, जैसा कि गिरदर गांव के गावित ने बताते हैं। गावित के दो बेटे काम के लिए गांव से पलायन किया है।

 

उसी गांव के 18 वर्ष के योहन ठाकरे कहते हैं, “यहां कोई नौकरी नहीं है, केवल बाहरी लोग यहां आते हैं और यहां काम करते हैं। ” वह बताते हैं, गुजरात के अन्य हिस्सों के लोग शिक्षक या सरकारी कर्मचारियों के रूप में काम करते हैं, जबकि स्थानीय लोग कृषि मजदूरों के तौर पर काम करते हैं और नौकरियों को खोजने के लिए पलायन करना पड़ता है।

 

जैसे-जैसे लोग काम की तलाश में आगे बढ़ते हैं, वे डांग में प्राप्त होने वाले सरकारी लाभों को छोड़ते हैं, जो उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। आधार जो प्रत्येक भारतीय को एक अद्वितीय पहचान संख्या प्रदान करता है, यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ हद तक गठित किया गया था कि जब लोग प्रवास करते हैं लोग इस तरह के लाभों को न खोएं, लेकिन कार्यान्वयन अंतराल अब भी वैसे ही हैं।

 

जिले की सफलताएं: स्वच्छता, पर्याप्त रूप से स्टाफ वाले स्वास्थ्य केंद्र

 

जब इंडियास्पेंड ने धवलदुद में स्वास्थ्य उप-केंद्र का दौरा किया आयुर्वेद, योग, नेचुरोपैथी, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी (आयुष) चिकित्सक प्रियंका पटेल आउटपैंटिव डिपार्टमेंट (ओपीडी) में थी। डॉ. प्रियंका ने बताया कि, प्रत्येक गांव में एक डिस्पेन्सरी स्थापित करने के लिए शुरू किए गए सरकार के आरोग्य सेतु कार्यक्रम के तहत डॉक्टरों ने उप-केंद्रों में एक सप्ताह में दो दिन सामान्य ओपीडी आयोजित किया है।

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जिले के अन्य उप-केन्द्रों की तरह, धवलदुद के उप-केंद्र स्वच्छ थे। वहां पर्याप्त रूप से स्टाफ थे और दवाओं का स्टॉक भी प्याप्त था। दवाएं व्यवस्थित ढंग से रखी गई थीं।

 

जिले के अन्य उप-केन्द्रों की तरह, धवलदुद के उप-केंद्र स्वच्छ थे। वहां पर्याप्त रूप से स्टाफ थे और दवाओं का स्टॉक भी प्याप्त था। दवाएं व्यवस्थित ढंग से रखी गई थीं।एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता अब्दुल फकीर बताते हैं यहां दवाओं का स्टॉक भी अच्छा है और  उप-केंद्र में 76 गर्भवती महिलाएं पंजीकृत की गई थीं।

 

इंडियास्पेंड ने जब केंद्र का दौरा किया तब दोपहर को कोई रोगी नहीं था लेकिन ममता दिवस के लिए बहुत से लोग आए थे। यह गांव के स्वास्थ्य और पोषण दिवस है जो हर सोमवार और बुधवार को आयोजित किया जाता है, जब महिलाओं और बच्चों को प्रतिरक्षित किया जाता है।

 

1998 से अहवा सिविल अस्पताल में काम कर रही सहायक नर्स और दाई, उषा वालंद कहती हैं,  “अहवा में स्वास्थ्य सुविधाओं ने एक लंबा सफर तय किया है।” वह बताती हैं, अस्पताल का दो साल पहले पुनर्निर्माण किया गया था। अब अधिक महिलाएं संस्थागत प्रसव हैं और प्रतिरक्षण के बारे में जागरूकता है। उन्होंने सही तापमान पर इसे बनाए रखने के लिए हमें ‘दिल्ली से’ निदान करने वाले टीकों के लिए हमें शीत भंडारण दिखाया। जब हमने दौरा किया तब अस्पताल के पास दो बाल चिकित्सक थे, एक आर्थोपेडिक और एक दंत चिकित्सक थे। इसमें दस वार्मर और पांच उपस्थित नर्सों के साथ एक नवजात गहन इकाई भी थी।

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1998 से अहवा सिविल अस्पताल में काम कर रही सहायक नर्स और दाई, उषा वालंद कहती हैं, “अहवा में स्वास्थ्य सुविधाओं ने एक लंबा सफर तय किया है।”

 

वालंद को यहां की सेवाओं पर इतना भरोसा है कि वो अपनी बेटी के प्रसव के लिए वड़ोदरा से लेकर अहवा ले कर आ रही हैं।

 

रोगी भी इस बात से सहमत हैं। अहवा से 20 किलोमीटर दूर चिखली से आने वाली 27 वर्षीय दक्षा चौधरी बताती हैं, “हमारी आशा [मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता] हमें अस्पताल ले गई, और वे मुझे और मेरे बेटे की अच्छी देखभाल कर रहे हैं।” उसने बताया कि उसके पास एख बैंक खाता था और जननी स्वास्थ्य योजना के लाभों के बारे में पता था। यह एक सुरक्षित मातृत्व हस्तक्षेप है, जो माताओं को नकद देकर संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करता है।

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अहवा से 20 किलोमीटर दूर चिखली से आने वाली 27 वर्षीय दक्षा चौधरी बताती हैं, “हमारी आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) हमें अस्पताल ले गई, और वे लोग मेरी और मेरे बेटे की अच्छी तरह से देखभाल कर रहे हैं।”

 

ओपीडी में, हमने कुछ रोगियों से मुलाकात की, जो आंखों की सर्जरी के लिए महाराष्ट्र से आए थे। विलास गवली, 150 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र में धुले जिले से अपनी दादी और पिता के साथ अस्पताल पहुंचे थे। गवली बताते हैं, अच्छी गुणवत्ता की देखभाल और मुफ्त उपचार के कारण हमने तीन घंटे की यात्रा और 3,000 रुपए खर्च किए हैं।

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अहवा सिविल अस्पताल में बाहर-रोगी विभाग

 

जिला की नई स्वास्थ्य अधिकारी मेघा मेहता कहती हैं, “मैं प्रतिरक्षण कवर को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही हूं। एक महीने पहले एक वर्ष से कम उम्र के 89 फीसदी बच्चे पूरी तरह से प्रतिरक्षित थे; पिछले एक महीने में, यह सुधार 99 फीसदी हुआ है। ” ये संख्या ई-ममता से हैं। यह एक गुजरात सरकार की माता और बच्चे की ट्रैकिंग प्रणाली है। यह इस प्रणाली में पंजीकृत गर्भधारण पर आधारित है, और अन्य संस्थागत प्रसव, और प्रसव जो कि एक स्वास्थ्य देखभाल केंद्र में नहीं होते हैं, चूक कर सकते हैं।

 

केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, डांग जिले में कुल मिलाकर, 2015-16 में 44.3 फीसदी बच्चे दो साल से पूरी तरह से प्रतिरक्षित थे, जबकि राष्ट्रीय औसत 62 फीसदी था।

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जिला की स्वास्थ्य अधिकारी मेघा मेहता कहती हैं, “एक महीने पहले एक वर्ष से कम उम्र के 89 फीसदी बच्चे पूरी तरह से प्रतिरक्षित थे, पिछले एक महीने में, यह सुधार 99 फीसदी हुआ है।”

 

सभी स्वास्थ्य केंद्र अच्छे नहीं हैं। गारखाडी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) में, कोई टेलीफोन कनेक्शन या मोबाइल फोन नेटवर्क नहीं था, जिसका मतलब है कि पार्क की गई एम्बुलेंस का बहुत कम उपयोग किया जाता है। जनवरी तक, गांव में थोड़ा पानी बचा है। जब इंडियास्पेंड ने पीएचसी का दौरा किया, तो लगभग 5 बजे वहां कोई डॉक्टर नहीं था। चिकित्सा अधिकारियों को पीएचसी क्वार्टरों में रहना मुश्किल लगता है इसलिए वे बड़े शहरों से आना-जाना करते हैं और 5 बजे के बाद शायद ही कभी कोई चिकित्सक उपलब्ध होता है, जैसा कि पीएचसी के अकाउंटेंट और सुरक्षा स्टाफ बताते हैं। टिप्पणी के लिए इंडियास्पेंड डॉक्टर तक पहुंचने में असमर्थ रहा।

 

आदिवासी स्वास्थ्य पर कम जोर

 

अच्छे स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य संसाधनों के बावजूद, डांग का राज्य में सबसे खराब स्वास्थ्य संकेतक है।

 

इसका एक कारण, आदिवासी जनसंख्या ( गुजरात की 15 फीसदी आबादी आदिवासियों की है जबकि भारत की 8 फीसी आबादी आदिवासी है ) तक ऐसी सेवाओं तक कम पहुंच है। अन्य जातियों से गैर-गरीब महिलाओं की तुलना में अनुसूचित जनजाति से गरीब महिलाओं को 5.32 गुना कम प्रसवपूर्व देखभाल (एएनसी) सेवाएं मिलने की संभावना है, जैसा कि 2013 के एक अध्ययन में पाया गया है। इस अध्ययन में जिला स्तर के स्वास्थ्य सर्वेक्षण में युवा माताओं के बीच एएनसी के उपयोग का विश्लेषण किया गया है। यहां तक ​​कि गैर-गरीब अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को अन्य जातियों की तुलना में सेवा का 2.37 गुना कम इस्तेमाल होने की संभावना है।

 

अध्ययन में कहा गया है कि, “स्वास्थ्य व्यवस्था को समायोजित करने पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। यहां तक ​​कि मातृ स्वास्थ्य सेवाओं, जैसे कि सशर्त नकदी हस्तांतरण और वाउचर योजनाओं का उपयोग प्रोत्साहित करने के लिए डिज़ाइन ‘डिमांड-साइड’ हस्तक्षेप को शुरू करने और मजबूत करना कुछ समूहों में सेवाओं के उपयोग में होने वाले परिवर्तनों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। लिंग और सामाजिक मानदंड, राजनीतिक प्रभाव, भ्रष्टाचार और भेदभाव जैसे अन्य कारकों को संबोधित करने के लिए अधिक व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है।”

 

फिर भी, सामुदायिक चिकित्सा विभाग सहित गुजरात में मेडिकल कॉलेज, आदिवासी स्वास्थ्य पहलों के प्रति उदासीन हैं, जैसा कि प्रमोशन ऑफ एक्शन रिसर्च फाउंडेशन फॉर डिफ्यूजन ऑफ़ इनोवेशन, जो गुजरात में दाहोद के आदिवासी जिले में काम करता है, के निदेशक कंधारपल्ली तलाति कहते हैं।

 

वह समझाते हुए बताते हैं कि, “स्थानीय प्रथाओं और रीति-रिवाजों के लिए अनुकूलित बहुत कम स्वास्थ्य परामर्श और स्वास्थ्य संदेश है उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य कर्मचारी एक घंटे के जन्म के भीतर स्तनपान के बारे में बात करते हैं लेकिन इसका उल्लेख नहीं है कि माताओं को बकरी के दूध देने से बचना चाहिए जो कि यहाँ प्रचलित अभ्यास है। “

 

निंबालकर कहते हैं कि, “हमने पाया है कि आशाएं अपने घरों में अपने ज्ञान का उपयोग नहीं कर पाई हैं, इसलिए वे अपने समुदायों में संदेशों को संप्रेषित करने में असफल रही हैं। निंबालकर ने तलाती के साथ, स्वास्थ्य कर्मचारियों के ज्ञान के स्तर पर एक अध्ययन का आयोजन किया है।

 

प्रवास की वजह से महिलाओं, बच्चों को ट्रैक करना मुश्किल

 

पूरा परिवार डांग से काम करने के लिए पलायन करते हैं, जिससे आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अपने बच्चों के प्रतिरक्षण कार्यक्रम को ट्रैक करने और आशाओं के लिए गर्भधारण का रिकॉर्ड रखने में में मुश्किल आती है।

 

डांग से प्रवासी मजदूरों के बच्चों पर 2013 के एक अध्ययन के मुताबिक पूरे परिवार के बड़े पैमाने पर मौसमी प्रवासन छह से सात साल की उम्र में बच्चों को श्रम बल में शामिल होने के लिए मजबूर करता है,और 11 से 12 वर्ष की आयु तक वे पूरे मजदूर बनने के लिए स्कूल छोड़ते हैं, और लड़कियों को छोटे भाई-बहनों का ख्याल रखने और घर के काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

 

अध्ययन कहता है , बच्चे स्कूल नहीं जाते, टीकाकरण प्राप्त नहीं होता है, पौष्टिक भोजन नहीं मिलता है और असुरक्षित कार्य वातावरण में समय व्यतीत करते हैं।

 

स्कूली शिक्षा में उच्च स्तर तक पहुंचना मुश्किल

 

2016 में, डांग में 74.8 फीसदी पुरुष साक्षर थे जबकि भारत के लिए यह आंकड़े 85.7 फीसदी थे। वहीं डांग में 56.9 फीसदी महिलाएं साक्षर थीं जबकि भारत के लिए यह आंकड़े 68.4 फीसदी थे। लेकिन 2015-16 में केवल 16.3 फीसदी महिलाएं 10वीं से ज्यादा पढ़ी थी और भारत  लिए यह आंकड़े 35.7 फीसदी थी, जैसा कि नएफएचएस -4 के आंकड़े बताते हैं।

 

पढ़ने में सक्षम मां से जन्म लेने वाले बच्चों की पांच साल की उम्र तक जीवित रहने की संभावना 50 फीसदी अधिक है और माता के स्कूली शिक्षा के प्रत्येक वर्ष में शिशु मृत्यु दर की संभावना 5-10 फीसदी कम हो जाती है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन द्वारा 2011 की एक रिपोर्ट में बताया गया है।

 

हालांकि, स्थानीय स्कूलों में बच्चों के लिए आवासीय सुविधाएं हैं जिनके माता-पिता काम के लिए पलायन करते हैं लेकिन गावित के गांव, गिरमल में केवल एक सरकारी प्राथमिक स्कूल है। गावित ने कहा कि उन्होंने निकटतम गांव के स्कूल में उनके एक पोते के पढ़ाने के लिए 6,000 रुपए खर्च किए है। अब उनके पास 14 वर्षीय पोती और 15 वर्षीय पोते को शिक्षित करने के लिए पैसे नहीं है।

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गिरमल गांव के एक पचास वर्षीय किसान गामान गावित ने निकटतम गांव के स्कूल में अपने एक पोते को पढ़ाने के लिए 6,000 रुपए खर्च किए हैं। गिरमल में केवल एक सरकारी प्राथमिक स्कूल है।

 

गाओदाहाड गांव के 37 वर्षीय किराना दुकान के मालिक संजय राउत कहते हैं, “शिक्षक (स्थानीय विद्यालयों में) स्थानीय नहीं हैं। वे धरमपुर और वाजदा जैसे शहरों में रहते हैं और गांव तक पहुंचने के लिए दो घंटे का सफर करते हैं। जब तक वे यहां पहुंचें, तब तक वे थक जाते हैं, इसलिए वे सिखाने के लिए उत्सुक नहीं हैं। ” इंडियास्पेंड से बात करते हुए उन्होंने बताया कि स्थानीय विद्यालयों के बहुत ही कम छात्र हैं जो पहले प्रयास में कक्षा X पास करते हैं। इसी वजह से उन्होंने अपनी बेटी को 116 किलोमीटर दूर एक आवासीय स्कूल में अध्ययन करने के लिए भेजा है।

 

जमीनी स्तर पर कई समस्याएं मौजूद

 

पूरी जिंदगी, 60 वर्षीय रामभाई गधार और उनकी पत्नी, धुलडा गांव से गिरमल, अपनी बेटी के घर तक पहुंचने के लिए सायकल से 14 किलोमीटर की यात्रा करते रहे हैं। धुलडा में पास के गांवों के लिए कोई सड़क नहीं है। हालांकि, गांव में आशा है, निकटतम स्वास्थ्य केंद्र 4 किमी दूर है और मानसूनमें बाढ़ के दौरान गांव पूरी तरह से कट जाता है।गधार कहते हैं, “हम एक पुल चाहते हैं,” लेकिन इस चुनाव में किसे वोट देंगे इसके प्रति वे वचनबद्ध नहीं  हैं।

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60 वर्षीय रामभाई गधार और उनकी पत्नी पूरी जिंदगी धुलडा गांव से अपनी बेटी के घर गिरमल तक पहुंचने के लिए साइकल से 14 किलोमीटर की यात्रा करते रहे हैं।धुलडा से पास के गांवों तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं है।

 

जिला अराजनैतिक दिख रहा था। गांवों में कोई भी राजनीतिक बैनर, पोस्टर या झंडे नहीं थे। अधिकांश ग्रामीणों ने कहा कि वे एक पार्टी से संबद्ध नहीं थे।  लेकिन उन्होंने कहा कि पिछले चुनाव के बाद से उन्होंने विधानसभा (विधायक) के अपने सदस्य को नहीं देखा है। कुछ ने कहा कि वे जो भी उन्हें भुगतान करेगा, उसे वे वोट देंगे।

 

1997 में, जिला ने ईसाइयों के विरुद्ध हिंसक हमलों के लिए सुर्खियां बटोरा था, जो उनके खिलाफ “मजबूर रूपांतरण” के विरोध में राइट विंग समूहों के खिलाफ था। ग्रामीण अब भी बाहरी लोगों के साथ धर्म और राजनीतिक संबद्धता के बारे में बात करने से सावधान रह रहे है।

 

2012 से, कांग्रेस पार्टी के मंगलभाई गावित, भारतीय जनता पार्टी के विजयभाई पटेल को 2,422 मतों के अंतर से हराकर जिले के विधायक रहे हैं । इस साल भी गावित और पटेल चुनाव लड़ रहे हैं।

 

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अगली रिपोर्ट: सूरत के स्वास्थ्य परिवर्तन अन्य शहरों को क्या सिखा सकते हैं

 

— ( यादवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 9 दिसंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है। -हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

 

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