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ग्रामीण रोजगार संकट से महिलाएं होती हैं सबसे ज्यादा प्रभावित

तिश संघेरा,
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मुंबई और नासिक: जब कमल गंगरुद घाटी के पास बने अपने घर के बगल के खेतों की ओर देखती है, तो उन्हें खेतों की वह पट्टी दिखती है, जिस पर इस वर्ष जुताई या रोपण नहीं होगा। डिवेलपर को बेची दी गई है वह जमीन, जो कारखानों और सड़कों का निर्माण करेगा या आम तौर पर गैर-कृषि कार्य में इसका इस्तेमाल होगा। इससे खेती का नुकसान होगा और इस नुकसान का मतलब महाराष्ट्र के नासिक जिले के एक गांव पिंपलाद में दलित परिवारों के लिए महत्वपूर्ण श्रम नौकरियों का नुकसान भी है।

 

पहले जब मानसून में बारिश होती थी, तो गंगरुद जैसे ग्रामीणों को कम से कम दो महीने तक काम मिलने की उम्मीद रहती थी और आस-पास के धान के खेतों में काम करके वे प्रतिदिन 200-250 रुपये तक कमाती थी। अब काम कम हो गया है और कभी-कभार ही मिलता है। गैंगरुद ने मार्च की एक सुबह इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा, “आबादी बढ़ रही है, लेकिन रोजगार की संख्या हर साल कम हो रही है। पिछले साल कुछ लोगों को पूरे सीज़न में सिर्फ तीन हफ्ते का काम मिला था। अधिक मशीनरी के साथ भी, काम तेजी से पूरा हो जाता है। ” गंगरुद के पति कुछ भाग्यशाली लोगों में से एक हैं। कुछ साल पहले, उन्होंने पड़ोसी शहर में गैर-कृषि की नौकरी के रूप में दर्जी का काम पाया और पिछली दीपावाली को 6,000 रुपये कमाए। लेकिन अन्य लोग, विशेषकर गांव की महिलाएं, प्रायः मानसून के अलावा बेरोजगार रह जाती हैं- सिर्फ दो महीने की अवधि में काम,जब वर्ष का एकमात्र कृषि कार्य होता है। गंगरुद ने कहा, “प्लास्टिक प्रतिबंध के बाद, एक एनजीओ ने अगले गांव में आकर महिलाओं को कपड़े के थैले, पेटीकोट और इस तरह की चीजों की सिलाई करने का तरीका सिखाया। मैं भी सीखती, लेकिन वे यहां नहीं आए। मुझे नहीं पता कि कैसे इस तरह का काम पा सकती हूं। ”

 

महाराष्ट्र के उत्तर-पश्चिमी नासिक जिले के पिंपलाड गांव में, अपने बेटे के साथ 35 वर्षीय कमल गंगरुदे। पीछे वे खेत हैं जो लंबे समय से कृषि कार्य के लिए थे, लेकिन अब इसे डिवलपर्स को बेच दिया गया है। ऐसे में गांव के गरीबों के लिए रोजगार के मौके कम हो गए हैं।

 

पिंपलाद के ग्रामीणों की तरह, भारतीय गांवों में महिलाओं की एक बड़ी संख्या के पास कम मेहताना और अनिश्चित कृषि काम के अलावा कुछ ही रोजगार के विकल्प हैं। 2001 और 2011 के बीच भारत में महिला कृषि श्रमिकों की संख्या में 24 फीसदी की वृद्धि हुई।  यहां तक ​​कि 77 लाख किसानों ने खेती छोड़ दी, यह दर्शाता है कि किस प्रकार सीमित, गैर-खेती के अवसर तेजी से पुरुषों के पक्ष में जा रहे हैं, जो आसानी से अधिक कुशलता, बेहतर शिक्षा पा सकते हैं और उन्हें काम के लिए पलायन में भी अधिक सक्षम माना जाता है।

 

यह ‘कृषि का नारीकरण’ स्वागत के योग्य नहीं है”, जैसा कि दिल्ली के अंबेडकर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर इशिता मेहरोत्रा कहती हैं, “क्योंकि कृषि नौकरियां महिलाओं को कम भुगतान करती है, यहां असुरक्षा है और दमनकारी श्रम संबंध हैं। कृषि कार्य एक पितृसत्तात्मक विचारधारा संकेत है, जो महिलाओं को गांव में रहने के लिए बाध्य करती है और घरेलू कार्यों के साथ जुड़ी रहती है, जबकि लैंगिक भूमिका पुरुषों को आर्थिक स्वच्छंदता देती है और सामाजिक कारणों से उन्हें पलायन करने की भी अनुमति मिलती है।

 

मेहरोत्रा ​​ने ऑक्सफैम इंडिया की सैकेंड इंडिया इनिक्वालिटी  रिपोर्ट – माइंड द गैप – द स्टेट ऑफ एम्प्लॉयमेंट इन इंडिया ’में ग्रामीण बेरोजगारी और असमानता पर एक अध्याय लिखा है।

 

 यह भारत की नौकरियों के परिदृश्य हमारी मौजूदा परख में नवीनतम आलेख है, और यह नौकरियों की स्थिति पर ऑक्सफैम के विश्लेषण और हमारी फील्ड से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित है।

 

असमान आर्थिक वृद्धि

 

जैसा कि कमाई के अवसर गायब हो गए हैं…महिलाएं और हाशिये पर पड़े समूह सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। साथ ही,1990 के दशक के शुरुआत से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में चार गुना वृद्धि से भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संकट आया है। मार्च 2019 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा प्रकाशित नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (NSSO) की एक लीक रिपोर्ट के अनुसार, करीब 3.2 करोड़ कैजुअल मजदूरों ने 2011-12 और 2017-18 के बीच अपनी नौकरी खो दी, जिनमें से 94 फीसदी लोगों के पास कृषि कार्य थे। इसी समय, नियोजित पुरुषों में 6 फीसदी की कमी की तुलना में, 2011-12 से 2017-18 तक, नियोजित ग्रामीण महिलाओं का अनुपात 31 फीसदी तक गिर गया।

 

ग्रामीण इलाकों में महिला रोजगार में सबसे ज्यादा गिरावट


 

इस तरह की अशांति के बीच, देश ने कई किसान विरोध प्रदर्शन, ग्रामीण परिवारों के बीच कर्ज के बढ़ते स्तर और फसल की कीमतों में गिरावट देखी है, जिससे 60 करोड़ भारतीय खेती करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नतीजतन, बढ़ती बेरोजगारी और कृषि संकट, मुख्य चुनावी मुद्दे बन गए हैं। एक हालिया सर्वेक्षण में 70 फीसदी से अधिक लोगों ने नौकरियों की कमी को महत्वपूर्ण चिंता के रुप में बताया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मार्च 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

 
सीमांत समूह सबसे ज्यादा प्रभावित
 

गैर-कृषि गतिविधियां अब ग्रामीण घरेलू आय का 65 फीसदी से अधिक का प्रतिनिधित्व करती हैं, क्योंकि कृषि का आय का मुख्य स्रोत धीरे-धीरे कम प्रचलित हो रही है,  जैसा कि सरकार के नीतिगत थिंक-टैंक नीति आयोग द्वारा जारी 2017 के इस पेपर में कहा गया है। यह दर्शाता है कि श्रमिकों को पारंपरिक कृषि आधारित रोजगार से बाहर होना पड़ा है, क्योंकि अवसर कम हो गए हैं।

 

वैकल्पिक रोजगार खोजने की आवश्यकता कामकाजी गरीबों (जो दलित, आदिवासी और मुस्लिम हो सकते हैं) को सवर्ण व जमींदार वर्ग की तुलना में काफी ज्यादा प्रभावित करते हैं, जो वर्ग। परिसंपत्ति समर्थित धन सृजन व्यापार पर भरोसा और मशीनरी किराए पर देने पर भरोसा करते हैं, जैसा कि ऑक्सफेम रिपोर्ट से पता चलता है। उच्च शिक्षा स्तरों के कारण कुशल ग्रामीण परिवारों को भी कुशल, सफेदपोश रोजगार मिलने की संभावना ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, जैसा कि खेत मजदूर नए और बेहतर रोजगार की तलाश में एक अनुत्पादक कृषि क्षेत्र को पीछे छोड़ रहे हैं लेकिन किसे कौन सी नौकरी मिलती है और किन परिस्थितियों में, यह असमान स्थितियों पर निर्भर करता है,यह ग्रामीण श्रम बाजारों का सच है।

 

उदाहरण के लिए, 2011-12 और 2017-18 के बीच श्रम बाजार से 2.9 करोड़ ग्रामीण महिलाएं गायब हो गई हैं। जब श्रम बाजार में गिरावट आती है और नौकरियों की मांग बढ़ती है, तो महिलाओं को खोने की संभावना अधिक होती है, खासकर ग्रामीण निर्माण नौकरियों में, जैसा कि मुंबई विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व निदेशक और प्रोफेसर रितु दीवान कहती हैं।  उन्होंने कहा कि,”एक कारण श्रम का व्यावसायिक और लिंग तकनीकी विभाजन है।” उदाहरण के लिए, पुरुष की विशेषज्ञता आम तौर पर बढ़ई और राजमिस्त्री की होती है, जबकि निर्माण स्थलों पर महिलाओं को कुली, ईंट और सीमेंट ढोने का काम मिलता है, जिसकी निंदा भी की जाती है।”

 

रिपोर्ट में पाया गया है कि रोजगार के विकल्पों की कमी और बढ़ती हताश स्थिति का मतलब हाशिए के समूहों के बीच शोषण की अधिक संभावना हो सकती है। जैसे-जैसे गैर-कृषि क्षेत्र ‘वैकल्पिक रोजगार का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत’ बनता जा रहा है। कई पुरुष काम के लिए पलायन करते हैं तो महिलाओं को घर चलाने का बोझ उठाने के लिए छोड़ दिया जाता है। ऐसे में निम्न जाति की दलित महिलाओं के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि उच्च-जाति के भूस्वामियों द्वारा सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के बदले में कभी-कभी कम भुगतान और कभी-कभी अवैतनिक श्रम भी ।

 

 वह कहती हैं, “जब पुरुष शहरी केंद्रों से गांवों में पैसा भेजते हैं तो यह अनियमित रूप से और लंबे अंतराल के बाद आता है, इसलिए दैनिक आधार पर आप अपना भोजन कहां से प्राप्त करते हैं? ऐसे में महिलाएं प्रमुख जातियों के प्रति कृतज्ञ हो जाती हैं। वह स्कूल या चिकित्सा शुल्क का भुगतान करने के लिए अपने रोजगार की शर्तों को निर्धारित करने में असमर्थ होती हैं। ”  रोजगार हासिल करने की एक शर्त के रूप में, महिलाओं के लिए यौन शोषण की एक अतिरिक्त परत भी हो सकती है, जैसा कि  दीवान ने ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिक हब में अपने फील्डवर्क के दौरान पाया। उन्होंने कहा, “इससे पहले कि आप कौशल, भाषा और लिंग द्वारा विभाजित प्रतीक्षा करते श्रमिकों के समूह देखते थे; लेकिन अब पिछले दो वर्षों में और विशेष रूप से नोटबंदी के बाद महिलाओं के बीच एक नया विभाजन सामने आया है। नौकरियों की मांग कम होने के कारण नियोक्ता यौन आकर्षण के आधार पर, “छोटी और कम कुपोषित” लड़कियों को वृद्ध महिलाओं से अलग कर रोजगार देने में एक नई परिपाटी शुरु कर चुके हैं। ”

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि,ग्रामीण नौकरियों की संख्या में कमी काम की गुणवत्ता में कमी में भी तब्दील हो रही है। वास्तव में, ऐसे कमजोर रोजगार ’में शामिल होने वाले भारतीयों का अनुपात 2019 तक लगभग 77 फीसदी होने का अनुमान है, जो दक्षिण एशिया औसत से पांच प्रतिशत अंक ज्यादा है।“यह ग्रामीण भारत में आजीविका संकट की सीमा का संकेत है”, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर इकोनोमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर जयति घोष कहती हैं, “जहां रोज़गार के पर्याप्त दिन या यहां तक कि अधिकांश बार पूरे दिन का काम मिल पाना कठिन है, और कोई भी गतिविधि जीवन का एक सभ्य मानक प्रदान करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

 

हालांकि इस तरह के असुरक्षित काम करने की स्थिति के नकारात्मक स्पष्ट हैं, घोष ने “पर्याप्त संपत्ति (जैसे जमीन और अन्य धन) वाले लोगों के साथ-साथ उचित नियमित नौकरियों (स्थानीय नौकरशाहों, नियमित रूप से पेरोल पर स्कूल के शिक्षकों, आदि) और बाकी लोगों के बीच बढ़ती हुई खाई की अधिक चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर इशारा किया। ।

 

ग्रामीण नौकरी बाजार संकीर्ण हो गया है और इसे गरीब, हाशिये पर पड़े मजदूरों के लिए छोड़ दिया जा रहा है, यह एक ऐसी स्थिति है जिसे मोहन कांकते बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। दूर के खेतों में बड़े-बड़े बंगलों की ओर इशारा करते हुए, 23 वर्षीय मोहन ने बताया कि कैसे गांव के जमींदारों ने कुछ 10 साल पहले सीमाओं के बाहर नए, बड़े घरों का निर्माण किया था। यह दिखाता है कि हाल के दशकों में दो समुदायों के भाग्य कैसे बदले हैं। वह कहते है, ” यहां आसपास के 20 फीसदी युवा काम कर रहे हैं। शहर में काम करना संभव है, लेकिन कोई भी वास्तव में यह नहीं चाहता है – आप प्रति माह 6,000 रुपये कमाते हैं,  इतने लंबे समय तक और कड़ी मेहनत के बाद भी आप केवल 2,000 रुपये घर ले जाते हैं।” नतीजन, कम आकर्षित विकल्प तलाशने के बजाय, गांव के कई युवा दिन में अक्सर शराब पीते और ताश खेलते हुए दिखाई देते हैं।

 

पश्चिमोत्तर महाराष्ट्र के नासिक जिले के एक गांव पिंपलाद के 23 साल के मोहन कनकते कहते हैं कि उनके गांव में लगभग 20 फीसदी पुरुष ही नौकरी करते हैं। अधिकांश लोग अपने दिन शराब पीने और ताश खेलने में व्यतीत करते हैं। 

 
सामाजिक मानदंड महिलाओं के लिए बाधा
 

 जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के 34 फीसदी पुरुष रोजगार और बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में पलायन कर चुके हैं, ग्रामीण महिलाओं के लिए यह आंकड़ा, इसका, दसवां 3.6 फीसदी पर है। रिपोर्ट में पाया गया कि, आउट-माइग्रेशन आर्थिक और सामाजिक गतिशीलता तक पहुंच प्रदान कर सकता है, लेकिन इस तरह के विकल्प ग्रामीण भारत में कई महिलाओं के लिए “पितृसत्तात्मक विचारधारा और स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं” के कारण पहुंच से बाहर रहते हैं, जो उन्हें गांव तक ही सीमित रखते हैं।

 

अपने पड़ोसियों के साथ अपने घर के बाहर सीढ़ियों पर बैठी, 32 वर्षीय भारती चबीलाल, ने समझाया कि कैसे महिलाओं की निम्न शिक्षा की स्थिति और मौद्रिक निवेश की आवश्यकता का मतलब ज्यादातर गांवों के पुरुषों के लिए कस्बों और शहरों में काम के लिए पलायन है।

 

चबीलाल ने बताया कि, “प्रत्येक यात्रा की लागत 50 रुपये है, इसलिए हर कोई नहीं जा सकता। अगर कोई शहर जा रहा है तो काम की तलाश करेगा, वे पुरुष ही होंगे। वे अधिक कुशल हैं और इसलिए उन्हें नौकरी मिलने की अधिक संभावना है।” मैं और मेरे साथ की ज्यादातर महिलाएं केवल 8 वीं कक्षा तक पढ़ी हैं, जबकि गांव के ज्यादातर पुरुष 12 वीं तक शिक्षित हैं।

 

घरेलू देखभाल के काम जैसे कि बच्चे के पालन-पोषण, और जलावन और पानी के संग्रह जैसे समय लेने वाले कार्यों के बोझ को संभालने के लिए, सामान्य तौर पर कुछ महिलाएं भी गांव के बाहर के अवसरों का पता लगाने में सक्षम होती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह उनकी कम सामाजिक आर्थिक स्थिति और भुगतान किए गए श्रम से बहिष्करण को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, चबीलाल ने अपनी घरेलू जिम्मेदारियों की सूची के साथ कहा कि दिन के बड़े हिस्से की जिम्मेदारी उन पर है, इसलिए उनके पास घर के करीब रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वह कहती हैं, “हम सिर्फ अपने गांव और अपने माता-पिता के गांव  के अलावा  शायद ही कहीं और जाएं। हमें क्षेत्र में किसी भी उपलब्ध नौकरी के बारे में सुनने को नहीं मिलता है, पुरुषों को सारी जानकारी मिल जाती है।”

 

पश्चिमोत्तर महाराष्ट्र में नासिक जिले के एक गांव पिम्पलाद में अपने पड़ोसियों के साथ मार्च के एक गर्म दोपहर में अपने घर के बाहर बैठी 32 वर्षीय भारती चबीलाल। उनके पति तो काम की तलाश में आस-पास के शहरों की ओर पलायन करने में सक्षम हैं, लेकिन उनकी तरह की अन्य महिलाओं को घर के कामों के बोझ और शिक्षा की कमी के कारण पीछे रहना पड़ता है, जिससे कुशल नौकरी पाने की संभावना कम हो जाती है।

 

उनका अनुभव ग्रामीण क्षेत्रों में ढेर सारी भारतीय महिलाओं के लिए सामान्य है। वे प्रवास के प्रवाह में शामिल होने और उपयुक्त गैर-कृषि रोजगार खोजने में असमर्थ, और अब उनके पास  कृषि श्रम ही एकमात्र विकल्प बचता है।  जबकि कुल मिलाकर ग्रामीण रोजगार कृषि से अलग हो रहा है (केवल 30 फीसदी ग्रामीण परिवार खेती पर निर्भर करते हैं, जो उनकी आय का मुख्य स्रोत है), 75 फीसदी वर्तमान में कम-भुगतान और अकुशल कृषि कार्य में लगे हुए हैं।

 

ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि न केवल अधिक महिलाएं श्रम के एक ऐसे साधन के रूप में केंद्रित हो रही हैं जो एक “अपर्याप्त” स्रोत प्रदान करता है, बल्कि वे भेदभाव के कई रूपों का सामना भी करती हैं जो संकेत देते हैं कि ‘मजदूरी संबंध केवल एक आर्थिक अनुबंध नहीं है”। उदाहरण के लिए, पुरुष और महिला ग्रामीण कैजुअल श्रमिकों के बीच लिंग का अंतर वर्तमान में 45 फीसदी, है जो  राष्ट्रीय औसत 34 फीसदी से 10 प्रतिशत अधिक है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2018 में बताया है।

 

पिंपलाद गांव की कई महिलाओं ने पुष्टि की कि पुरुषों के लिए खेत में काम करने की दिहाड़ी की दर महिलाओं की तुलना में 50 रुपये अधिक थी ( 250 रुपए बनाम 200 रुपए)।

 

गंगरूद, जो हमसे पहले मिली थे, ने कहा, “मैंने इसके बारे में कभी नहीं सोचा था, लेकिन मुझे लगता है कि महिलाओं को पुरुषों के समान भुगतान किया जाना चाहिए। लेकिन अगर आप अधिक पैसे मांगते हैं तो वे आपको नहीं आने के लिए कह देते हैं। वे कहते हैं कि पुरुष अधिक भारी-भरकम काम करते हैं और यही उनके अधिक भुगतान करने का कारण है, लेकिन हम भी तो उतने ही घंटे काम करते हैं।”

 

जब महिलाएं वैकल्पिक और खेत सीमित से परे अवसरों को खोजने में सक्षम होती हैं, जैसे कि घर-आधारित काम, भेदभाव उनका अनुसरण करता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उनका वेतन, कौशल और भागीदारी ‘स्थानीय मूल्य प्रणाली और पितृसत्तात्मक मानदंडों’ से निर्धारित होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) ने उन क्षेत्रों में महिलाओं को कुछ गैर-कृषि रोजगार प्रदान करने में मदद की है, जहां पहले उन्हें बाहर रखा गया था, जैसे कि निर्माण। कार्यक्रम ने श्रम बाजार में महिलाओं की मजदूरी बढ़ाने में भी मदद की। वास्तव में 1993-94 और 2011-12 के बीच, राष्ट्रीय लिंग वेतन अंतर 3 प्रतिशत अंक से कम हो गया था और इसका श्रेय अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा 2018 की रिपोर्ट में मनरेगा और इसके ग्रामीण न्यूनतम वेतन को लागू करने को दिया गया था।

 

दीवान जैसे अर्थशास्त्री योजना के योगदान की पहचान करते हैं और काम की बढ़ती मांग के मद्देनजर अधिक निवेश की मांग करते हैं। उन्होंने कहा, “कार्यान्वयन के शुरुआती वर्षों में, उच्च जाति के पुरुषों ने मनरेगा को कुछ क्षेत्रों में लागू करने की अनुमति नहीं दी थी, क्योंकि लिंग समान मजदूरी पुरुषों के लिए ‘अपमान’ के रूप वे देखते थे, लेकिन कुल मिलाकर, यह सकारात्मक रहा है। हमें न केवल इसे जारी रखने की आवश्यकता है, बल्कि वास्तव में मजबूत करना है, विशेष रूप से कृषि संकट के संदर्भ में… राष्ट्रीय स्तर पर, अब हमारे पास महिलाओं के रूप में 53% कार्यकर्ता हैं, कुछ राज्यों में लगभग दो-तिहाई की सूचना दी गई है।”

 

जबकि अन्य सरकारी कार्यक्रम जैसे कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और सर्व शिक्षा अभियान, महिलाओं के लिए व्यावसायिक विविधीकरण प्रदान करने में सक्षम रहे हैं, जैसे कि आशा और आंगनवाड़ी (सामुदायिक स्वास्थ्य और चाइल्डकैअर) कार्यकर्ता,  उन्होंने मौजूदा मान्यताओं को भी समाप्त कर दिया है कि सामाजिक और देखभाल का काम कम दर पर किया जा सकता है, इस प्रकार महिलाओं के श्रम को असमान रखा जा सकता है। दीवान कहते हैं,”हमें केवल महिलाओं को प्रजनन एजेंटों और माध्यमिक नागरिकों के रूप में नहीं देखना चाहिए, जो केवल सामाजिक कल्याण, शिक्षा और देखभाल के लिए अनुकूल हैं। महिलाएं व्यापक अर्थव्यवस्था में भी मौजूद हैं और उनके योगदान को मान्यता, दृश्यमान और परिमाणित किया जाना चाहिए।”

 

नीतिगत उपायों की जरूरत

 

इस तथ्य के बावजूद कि 85 फीसदी भारतीय महिलाएं कृषि में लगी हुई हैं, 13 फीसदी से अधिक के पास अपनी जमीन नहीं है। इस तरह के फैलाव और  भूमिहीनता ’का मतलब केवल महिलाओं को आधिकारिक तौर पर किसानों के रूप में मान्यता प्राप्त न होना ही नहीं है, बल्कि औपचारिक क्रेडिट विकल्पों तक पहुंचने में असमर्थ हैं, जिनके लिए संपत्ति समर्थित सुरक्षा की आवश्यकता होती है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

 

मेहरोत्रा ​​ने कहा, “भूमि अधिकारों के मुद्दे को सुधारना महिलाओं के खेती के काम के आसपास दृश्यता बनाने के लिए एक पहला कदम हो सकता है। साथ ही साथ उनकी सौदेबाजी की स्थिति में सुधार और संसाधनों का परिवार के भीतर आवंटन भी हो सकता है। यह एक गुणक प्रभाव भी पैदा करेगा जो बेहतर सामाजिक परिणामों को जन्म दे सकता है। कई अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाएं अपनी आय का 90 फीसदी अपने बच्चों और परिवारों में निवेश करती हैं, जिसमें शैक्षिक सामग्री और पौष्टिक भोजन शामिल है, जबकि पुरुषों के लिए आंकड़े 30-40 फीसदी है।“

हालांकि, अब तक, भूमिहीन किसानों को सरकारी योजनाओं से बाहर रखा गया है, जो कि अनुदानित बीज की कीमतों और उर्वरक जैसे उत्पादकता सृजन प्रावधानों की पेशकश करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमि के स्वामित्व और किसान की स्थिति को बदलना, सरकार के लिए बुनियादी ढांचा और संस्थागत सहायता को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। कई लोगों ने महिला किसानों का समर्थन करने वाली सभी सार्वजनिक योजनाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण को अनिवार्य करते हुए एक सकारात्मक कार्रवाई नीति बनाने का आह्वान किया है और इससे उनकी आय का स्तर बढ़ सकता है।

 

 घोष ने कहा, “आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की राज्य सरकारों ने नियम लागू किए हैं, जिससे सभी कृषकों को उनकी भूमि की उपाधियों की परवाह किए बिना पहचान करने की विधि मिल सके और यह सुनिश्चित हो सके कि उन्हें सरकारी योजनाओं तक पहुंच प्राप्त हो। ” उन्होंने आगे कहा कि, ऐसी योजनाओं में महिलाओं के आरक्षण के लिए ‘शर्त’ होनी चाहिए।सिंचाई में बेहतर सार्वजनिक निवेश के माध्यम से कृषि क्षेत्र का समर्थन करते हुए, बेहतर भंडारण और परिवहन सुविधाएं एक “प्राथमिकता” है, ग्रामीण क्षेत्रों में इक्विटी और रोजगार मानकों को बढ़ाने के लिए, गैर-कृषि रोजगार सृजन और सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के साथ कौशल स्तर बढ़ाने पर भी ध्यान देने की जरूरत है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है। पहले चर्चा की गई महिलाओं की गतिशीलता को नियंत्रित करने वाले पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंडों को देखते हुए, ग्रामीण महिला श्रमिकों को लक्षित करने वाला कोई भी प्रशिक्षण कार्यक्रम “लिंग अनुकूल” होना चाहिए। परिवहन और बाल-देखभाल सुविधाएं प्रदान करने के साथ-साथ लागत और महिलाओं की घरेलू कार्य जिम्मेदारियों के बारे में बाधाओं पर ध्यान देना चाहिए। दीवान ने कहा, अब तक, महिलाओं को राज्य-वित्त पोषित प्रशिक्षण कार्यक्रमों से बाहर रखा जा रहा है या टेलरिंग और पापड़ बनाने जैसी लैंगिक रूढ़िवादी गतिविधियों में सबसे अच्छी तरह लगाया गया है। उन्होंने कहा, “कई राज्यों में, आप अभी भी पाते हैं कि प्रशिक्षण केवल उन आर्थिक गतिविधियों के लिए प्रदान किया जा रहा है, जिनमें पुरुष काम कर रहे हैं। महिलाओं द्वारा किए गए कामों को छोड़ दिया जाता है और जो कभी-कभी सभी आर्थिक गतिविधियों में 80 फीसदी तक शामिल होते हैं, इसलिए न केवल महिलाओं के योगदान वर्तमान में अदृश्य हैं,   वास्तव में उनका ‘अवमूल्यन’ किया जा रहा है या सक्रिय रूप से उनकी अनदेखी हो रही है।”

 

( संघेरा लेखक और शोधकर्ता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 17 अप्रैल 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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