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घरेलू हिंसा झेल रही भारतीय महिलाओं के लिए दिलासा

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मुंबई: कई सालों से  रीमा चारी का जीवन अस्पतालों के चक्कर काटते बीत रहा है। इसका पहला कारण यह कि वह आठ बच्चों की मां है और दूसरा कारण यह कि पति की पिटाई से लगने वाली चोट का इलाज कराने उसे अस्पताल जाना पड़ता है।

 

आखिरी बार 35 वर्षीय चारी ( बदला हुआ नाम) मुंबई नगरपालिका के के. बी. भाभा अस्पताल आई थीं, क्योंकि उसके दाहिने हाथ की तीन अंगुलियों में चोट लगी थी और वह काम नहीं कर सकती थी। जब डॉक्टरों ने पूछा कि चोट कैसे लगी, तो हर बार की तरह उनका जवाब था कि वह “गिर गई” थी। लेकिन घरेलू हिंसा ( चोट, फ्रैक्चर, जहर की खपत, कई गर्भपात और गर्भधारण आदि ) के संकेत देखने के लिए प्रशिक्षित डॉक्टरों ने उनसे पूछना तब तक जारी रखा, जब तक कि चारी ने यह खुलासा नहीं किया कि उसके पति ने उसे ईंट से मारा है।

 

चारी और उसके पति उत्तर प्रदेश से भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई आए थे और जीवन यापन के लिए कूड़ा बिनने का काम करते थे। लेकिन उसका पति शकी तबियत का था और उस पर नियंत्रण रखना चाहता था। उसका पति उसे कहीं काम करने, किसी से बात करने, यहां तक कि गर्भ निरोधकों का इसेमाल करने की अनुमति नहीं देता था। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (2015-16) या एनएफएचएस- के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर, 15-49 साल की उम्र की तीन महिलाओं में से करीब एक ( 33.3 फीसदी ) ने वैवाहिक हिंसा (शारीरिक / भावनात्मक/ यौन) का अनुभव किया है और 3.9 फीसदी ने गर्भावस्था के दौरान हिंसा का सामना किया है। भारत की सभी महिलाओं में से, जिन्होंने किसी भी प्रकार की शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव किया है, उनमें से केवल 14 फीसदी ने हिंसा को रोकने में मदद मांगी है। सर्वेक्षण बताता है कि 77 फीसदी ने न तो मदद मांगी है और न ही किसी को हिंसा के बारे में बताया है। अस्पताल अक्सर पहली जगह होती है जहां हिंसा का सामना करने वाली महिलाएं आती हैं, लेकिन वहां उन्हें शायद ही जरूरी देखभाल मिल पाती है। विशेषज्ञों ने कहा, डॉक्टर पहचान नहीं कर पाते या महिलाओं द्वारा सामना करने वाले हिंसा के संकेतों को जानबूझकर अनदेखा करते हैं और सामाजिक या मनोवैज्ञानिक समर्थन की पेशकश किए बिना दवा से उनका इलाज करते हैं।

 

नेशनल हेल्थ मिशन फंड द्वारा वित्त पोषित ‘दिलासा केंद्र’ उस देखभाल के एक मॉडल से इसे बदलने की पेशकश करता है, जिसे राष्ट्रव्यापी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में दोहराया जा सकता है।

 

 2001 में के. बी. भाभा अस्पताल में शुरू किया गया, स्वास्थ्य परामर्श केंद्र सेंटर फॉर इंक्वाइरी इनटू हेल्थ एंड एलाइड थीम्स ( सीईएचएटी ) द्वारा पश्चिमी मुंबई के एक उपनगर, बांद्रा में चल रहे एक 423 बिस्तरों वाले नगरपालिका अस्पताल के जरिए दिलासा केंद्र 8,000 से अधिक महिलाओं तक पहुंच गया है।

 

के.बी. भाभा अस्पताल में दिलासा केंद्र। अस्पताल अक्सर पहली जगह होती है जहां हिंसा का सामना करने वाली महिलाएं आती हैं, लेकिन वहां उन्हें शायद ही वह देखभाल मिल पाती है, जिनकी उन्हें आवश्यकता होती है। दिलासा केंद्र इसमें बदलाव ला रहा है।

 

नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार, दो वर्षों से 2018 तक, 5,647 महिलाओं की पहचान घरेलू हिंसा के संभावित पीड़ितों के रूप में की गई थी, जिनमें से मुंबई में 11 केंद्रों में घरेलू हिंसा के लिए 2,554 मामले और यौन हिंसा के 809 मामले दर्ज किए गए थे।

 

सीईएचएटी के समन्वयक संगीता रेगे कहती हैं, “मॉडल की प्रभावशीलता ने सिक्किम, कर्नाटक, तमिलनाडु, दिल्ली, असम और उत्तर प्रदेश समेत अधिक राज्यों को दोहराने और हिंसा के लिए व्यापक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया को सक्रिय करने के लिए आश्वस्त किया है।“

 

पिछले चार वर्षों से 2018 तक, मुंबई के अलावा, मॉडल को केरल, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और मेघालय में विभिन्न नामों के तहत दोहराया गया है।

 

चारी ने घरेलू हिंसा के बारे में बात नहीं की होगी, लेकिन जब अस्पताल में डॉक्टरों और फिजियोथेरेपिस्ट ने उसे दिलासा संकट केंद्र जाने के लिए कहा, तो उसने वहां जाने का फैसला लिया।

 

 भाषा बाधा के बावजूद ( चारी मुंबई में 10 साल के बावजूद केवल भोजपुरी बोलती है )  उसने अपने पति के हमलों का खुलासा किया। सलाहकारों ने उससे सबसे पहले कहा, “यह आपकी गलती नहीं है। ” साथ ही उन्होंने उनके साथ सुरक्षा योजना, रणनीतियों पर चर्चा की जिसका इस्तेमाल वह हिंसा को रोकने के लिए कर सकती थी। इसमें पड़ोसियों को बुलाना, पति के हिंसक होने पर दरवाजा खटकाना और शांत होने पर उससे बातचीत करना शामिल था।

 

चारी तीन महीने में अस्पताल लौट आईं और परामर्शदाताओं की उपस्थिति में अपने पति के साथ संयुक्त बैठक के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास प्राप्त किया।

 

उसने अपने पति के सामने जो शर्तें रखीं, उसमें से एक यह थी कि उसे मारना बंद कर देना चाहिए। उसने जोर देकर कहा,यह अच्छी बात नहीं है।  सौभाग्य से, उसके पति ने उसकी बात सुनी और व्यवहार बदला। हिंसा भी बंद हो गई। चारी अक्सर दिलासा केंद्रों का दौरा करती है और परामर्शदाताओं को अपने बारे बताती है कि उसके पति ने दोबारा उस पर हाथ नहीं उठाया है।

 
भरोसा, पहचान को छिपाना और व्यक्तिगत देखभाल

 

वार्ड और उसके नाम से लेकर सब कुछ महिलाओं की जरूरत को देखकर बनाया गया है। आउट पेशेंट विभाग में स्थित, स्त्री रोग विज्ञान अनुभाग के पास जहां युवा महिलाएं अपने और अपने बच्चों के लिए प्रसवपूर्व देखभाल पाती हैं, वह स्थान महिलाओं के अनुरूप है।

 

यह घरेलू हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं को संदर्भित करने और पहचानने के लिए भी एक अच्छी जगह है, लेकिन वह खुद आगे नहीं आ सकती हैं। जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, अस्पताल के कर्मचारियों को संभावित समस्या की पहचान करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है: जिन महिलाओं ने जहर खा लिया है, जिनको चोट लगी है, गर्भपात, गर्भधारण, यौन संक्रमित बीमारियों, श्रोणि सूजन संबंधी बीमारियों, चिंता, नींद और अवसाद के लक्षणों को दोहराया गया है।

 

इस योजना का विचार केंद्र यह है कि मां बनने की उम्र में युवा महिलाओं तक पहुंचना और हिंसा के शुरुआती चरणों में हस्तक्षेप करना है, जिसमें चिकित्सा साक्ष्य भी शामिल है, जब यौन हिंसा के ऐसे मामले अस्पताल आते हैं।

 

कैसे अस्पताल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं?
 

 जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया था, भारत में लगभग तीसरी विवाहित महिलाओं को अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार वैवाहिक हिंसा का सामना करना पड़ा है। जिन महिलाओं ने हिंसा का सामना किया है, उन्हें सामान्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा स्वास्थ्य देखभाल की जरुरत है, जैसा कि साक्ष्य दिखाते हैं।

 

महिलाओं द्वारा सूचित शारीरिक हिंसा (15-49 साल)


 

सीईएचएटी के रेगे कहते हैं, “अस्पताल कारण हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं तक पहुंचने के लिए सही जगह हैं और वे हिंसा के शुरुआती चरण में हस्तक्षेप कर सकते हैं।”

 

 “स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली महिलाओं को एक सुरक्षित वातावरण प्रदान कर सकती है जहां वे गोपनीय रूप से हिंसा के अनुभवों का खुलासा कर सकते हैं और एक सहायक प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकते हैं।  इसके अलावा, अंतरंग साथी हिंसा के अधीन महिलाएं स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं को पेशेवरों के रूप में पहचानती हैं जिन्हें वे दुर्व्यवहार के प्रकटीकरण पर भरोसा करते हैं, ” जैसा कि एक मेडिकल जर्नल, लैंसेट में प्रकाशित एक 2014 पेपर में कहा गया है।

 

इस तथ्य के बावजूद कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रकाशित 2013 दिशा-निर्देशों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में पहचाना गया था, यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में पर्याप्त रूप से समझ या स्वीकार नहीं किया गया है।

 
मुंबई दिखाता है रास्ता
 

 2016 में, मुंबई शासित नागरिक निकाय, ग्रेटर मुंबई नगर निगम (एमसीजीएम) ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की शहरी शाखा, राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (एनयूएचएम) के तहत शहर भर में नगरपालिका अस्पतालों में 11 दिलासा केंद्र स्थापित किए। प्रत्येक केंद्र में सामाजिक कार्य में डिग्री वाले दो सलाहकार, दो सहायक नर्स / मिडवाइव (एएनएम) या स्वास्थ्य श्रमिक और डेटा-एंट्री ऑपरेटर के साथ दो सलाहकार होते हैं। केंद्र कर्मचारियों को एक सप्ताह के लिए सीईएचएटी द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है और वे बदले में डॉक्टरों, नर्सों और प्रशासन जैसे अस्पताल कर्मचारियों के एक कोर समूह को प्रशिक्षित करते हैं। परिवार कल्याण और बाल स्वास्थ्य विभाग के उप कार्यकारी स्वास्थ्य अधिकारी, मंगल गोमेरे कहते हैं, “एमसीजीएम ने 2016 में 11 दिलासा अस्पताल स्थित संकट केंद्रों की स्थापना और शिक्षण अस्पतालों में एक अतिरिक्त तीन स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है, इसलिए हम सचमुच कह सकते हैं कि हमने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा के लिए स्वास्थ्य देखभाल का संस्थान स्थापित किया है।”

 

यह एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो स्वास्थ्य अनुसंधान और उत्तरदायित्व में सुधार करने के लिए काम करता है। सीईएचएटी अस्पताल स्थित संकट केंद्रों के लिए एक मॉडल स्थापित करना चाहता था जिसे सरकार द्वारा दोहराया जा सकता है, जो औपचारिक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का हिस्सा बनें और बने रहें।

 

 महिलाएं कैसे आती हैं दिलासा केंद्र तक

 

हालांकि कुछ महिलाएं अस्पताल में पोस्टर और प्रचार सामग्री पढ़ने के बाद केंद्र में आती हैं, जबकि अन्य लोग नर्सों की बातें याद करके आती हैं, जिनसे वे अस्पताल में भर्ती होने पर मिली थी। अन्य महिलाएं, पुलिस चिकित्सकीय परीक्षा के लिए अस्पताल ले जाने के बाद, यौन-हिंसा के मामलों से निपटने वाले डॉक्टरों और नर्सों से के माध्यम से आती हैं।

 

रेगे कहते हैं, ” उन सभी महिलाओं में से जो प्रसवपूर्व देखभाल चाहते हैं, उनपर सरकारी अस्पतालों में हम काम करते हैं। 17 फीसदी गर्भावस्था के दौरान हिंसा का सामना करते हैं।” यह हर छह गर्भवती महिला में से एक की कहानी है।”

 

एक बार हिंसा पीड़ित केंद्र में आती हैं तो परामर्शदाता अपना विश्वास हासिल करना चाहता है। इसमें समय लगता है लेकिन धीरे-धीरे महिलाएं अपने घर के बारे में खुल कर बात करती हैं। पश्चिमी मुंबई उपनगर सांताक्रुज़ में एक नगरपालिका अस्पताल वी. एन. देसाई अस्पताल की 34 वर्षीय अर्चना माली जैसे सलाहकार जानती हैं कि महिलाएं हमेशा समाधान की तलाश में नहीं आती हैं। कभी-कभी वे केवल इतना चाहती हैं कि उन्हें कोई सुने।

 

खुद को बचाने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाना
 

 दिलासा केंद्र नारीवादी परामर्श की अवधारणा का पालन करता है। वे महिला के सामने आने वाली समस्या के सामाजिक-सांस्कृतिक और लिंग संदर्भ पर चर्चा करते हैं – और परामर्शदाता मुख्य रूप से महिला को स्वयं की रक्षा करने के लिए सशक्त बनाने का लक्ष्य रखते हैं।

 

वे महिलाओं को समझाते हैं कि हिंसा उनकी गलती नहीं है, बल्कि उनके और उनके परिवारों के बीच सांस्कृतिक मानदंडों से उपजी है।

 

माली ने कहा, “, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि महिला समाज के किस स्तर से संबंधित है, वह  हिंसा के बारे में चुप रहना चाहती है।  हम अपने तरीके से उन्हें सिखाते हैं कि वह इसे समाप्त नहीं तो किस प्रकार कम कर सकती हैं। “

 

      हिंसा की गंभीरता को कम करने के लिए महिलाओं द्वारा पालन कुछ रणनीतियों में हैं: शोर करना,  दरवाजों पर टक्कर देना, पड़ोसियों को बुलाना  ताकि तत्काल हिंसा रोक दी जा सके। अन्य मामलों में, चोट खाई महिलाएं अस्पताल आती हैं, जहां सलाहकार महिलाओं की मदद करते हैं ( जहां डॉक्टर कानूनी दस्तावेजों में अपने अवलोकनों की जांच करता है और लिखता है ) जिसे कानूनी कार्यवाही के साक्ष्य के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

 
एक पीड़ित महिला क्या ढूंढती है?
 

एक सत्र के बाद, जो लगभग 45 मिनट तक चलता है, सलाहकार यह पता लगाते हैं कि पीड़ित महिला क्या ढूंढ रही है- अपने पति से अलग होने के तरीके, हिंसा या भावनात्मक समर्थन को रोकने के तरीके?

 

सांताक्रुज़ के वी. एन.. देसाई अस्पताल के दिलासा सेंटर के एक और सलाहकार 34 वर्षीय चैतन्या कुमारी कहती हैं, “हम जानते हैं कि हमें एक गैर-न्यायिक दृष्टिकोण से सुनना है और उसे उसके सभी प्रकार की सहायता प्रदान करना है। कभी-कभी महिलाएं आती हैं और केंद्र में बैठती हैं क्योंकि इससे उन्हें बेहतर महसूस होता है।”

 

एक दिलासा केंद्र में परामर्शदाता एक महिला से बात करते हैं। एक सत्र के बाद, जो लगभग 45 मिनट तक चलता है, सलाहकार यह पता लगाते हैं कि पीड़ित महिला क्या ढूंढ रही है- अपने पति से अलग होने के तरीके या हिंसा को रोकने के तरीके?

 

कई महिलाएं अपने पति से अलग नहीं रहना चाहती हैं, क्योंकि उनके पास अपने स्वयं के रहने के लिए वित्तीय संसाधन नहीं होता है या उसके परिवारों से कोई समर्थन नहीं है। जो लोग इस कदम में आगे बढ़ना चाहती हैं, उनके लिए सलाहकार आगे की कठिनाइयों की यथार्थवादी तस्वीर पेश करते हैं, जिससे कोई परेशानी न हो।

 

परामर्शदाता पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा अधिकारियों के साथ मिलकर काम करते हैं, जो पूछताछ करते हैं और पीड़ित लोगों के लिए कानूनी सहायता प्रदान करते हैं।

 

  कुछ मामलों में, जब महिलाएं को अपने जीवन खोने का डर होता है और जो अपने परिवारों में वापस नहीं आना चाहती हैं, तो दिलासा केंद्र 48 घंटे तक आश्रय प्रदान करते हैं, जिससे वे तय कर सकें कि आगे क्या करना है। अन्य मामलों में, वे महिलाओं को अन्य गैर-सरकारी संगठनों को संदर्भित करते हैं जो व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

 

डॉक्टरों के बीच कैसे बदलीं धारणाएं
 

पिछले 17 सालों, जब से भाभा अस्पताल में दिलासा केंद्र शुरु हुआ है, तब से चित्रा जोशी वहां काम कर रही हैं। उन्होंने एक समुदाय विकास अधिकारी के रुप में काम शुरु किया और अब केंद्र प्रभारी हैं। वह बताती हैं कि ज्यादातर डॉक्टरों और कर्मचारियों ने घरेलू हिंसा को पारिवारिक मामला माना।

 

जोशी कहती हैं, “घरेलू हिंसा के मामलों में निपटने और हस्तक्षेप करने के महत्व को समझना मुश्किल था, क्योंकि उस समय 2000 में इसके आसपास कोई कानून नहीं था।”

 

हालांकि भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत घरेलू हिंसा अपराध था, घरेलू दुर्व्यवहार अधिनियम 2005 ,जो सभी घरेलू दुर्व्यवहारों पर केंद्रित है, यहां तक ​​कि अविवाहित महिलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहारों पर भी  और यौन हिंसा से संबंधित आपराधिक कानून संशोधन 2013 को पारित नहीं किया गया है ।

 

जोशी और सीईएचएटी के अन्य कर्मचारियों ने अस्पताल के कर्मचारियों को इस तरह प्रशिक्षित किया है कि वे लैंगिंक स्थिति से हिंसा पर विचार ककर पाएं और इस बात को समझें कि कि हिंसा एक महिला के स्वास्थ्य ( भौतिक रूप से, भावनात्मक रूप से या यौन ) को प्रभावित करती है । आज भी, दिलासा केंद्र के साथ प्रत्येक अस्पताल परामर्शदाता महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा की पहचान करने और कम करने में हर छह महीने नए रेसिडेंट डॉक्टरों को प्रशिक्षित करते हैं।

 

गोवांडी के मुंबई के पूर्वी उपनगर में दिलासा केंद्र चलाते हुए एक नगर पालिका एम एम एम शताब्दी नगर अस्पताल,  मेडिकल अधीक्षक राजश्री जाधव ने कहती हैं, “यह एक अच्छी पहल है जिसने कई महिलाओं को समर्थन मांगने में मदद की है। बेहतर तरीके से हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं के इलाज के लिए डॉक्टरों को संवेदनशील बनाया गया है।”

 

चारी जैसी महिलाओं के लिए, दिलासा केंद्र हिंसा के बारे में बात करने का मौका देता है। केंद्र के लोग हिंसा को रोकने के तरीकों को ढूंढते हैं, और संभवतः, एक नए जीवन का रास्ता दिखाते हैं।

 
(यदवार एक प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 5 अक्टूबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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