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चुनाव में भारत के वायु प्रदूषण में कटौती का वादा, लेकिन ये वादे पर्याप्त नहीं

भास्कर त्रिपाठी,
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नई दिल्ली: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के 2019 के आम चुनावों में पहली बार पार्टी के घोषणापत्र में वायु प्रदूषण का जिक्र हुआ है। हम बता दें कि भारत में वायु प्रदूषण मौत का सातवां सबसे बड़ा जोखिम कारक है, जिसके कारण 2017 में 12.4 लाख लोगों की मौत हुई है। और साथ ही ग्रह के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 14 शहर भारत में ही हैं। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने ‘नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम’ (एनसीएपी) को एक ‘मिशन’ में बदलने और वायु प्रदूषण के स्तर को 2014 तक 35 फीसदी (वर्तमान में यह लक्ष्य 30 फीसदी का है )तक कम करने का वादा और कांग्रस ने एनसीएपी को मजबूत करने और ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित करने वादा किया है, लेकिन ये वादे पर्याप्त नहीं हैं।

 

अपने मौजूदा स्वरूप में, एनसीएपी त्रुटिपूर्ण है क्योंकि इसमें कानूनी जनादेश का अभाव है, इसकी समयसीमा स्पष्ट नहीं है और यह विफलता के लिए जवाबदेही तय नहीं करता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 6 फरवरी, 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (सीपीआई-एम) ने सभी क्षेत्रों में विनियमन और ऊर्जा दक्षता के माध्यम से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने का वादा किया है, लेकिन वायु प्रदूषण का उल्लेख नहीं किया है।

 

दिल्ली स्थित थिंक-टैंक, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्लू) के वरिष्ठ शोध सहयोगी, हेम ढोलकिया ने कहा, “यह स्वच्छ हवा के लिए एक लोकतांत्रिक मांग बनाने की दिशा में एक कदम है। हालांकि, सभी चुनावी वादे पूरे नहीं होते हैं।”

 

दिल्ली के थिंक-टैंक द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के अर्थ साइंस एंड क्लाइमेट चेंज डिवीजन के निदेशक  सुमित शर्मा कहते हैं, “राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में दिखाया गया वायु प्रदूषण बेहतर जागरूकता और मुद्दे को हल करने के इरादे का कुछ संकेत तो देते ही हैं।”

 

शर्मा ने कहा, “आम चुनावों के अलावा, राज्य और शहर के स्तर के चुनावों में इस मुद्दे की कवरेज अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है, खासकर उन राज्यों और शहरों के लिए जहां प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक हैं।”

 

भारत में, वायु प्रदूषण जन प्रतिनिधियों को सावधान करने में विफल रहता है। क्योंकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा रैंक किए गए दुनिया के शीर्ष 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 भारतीय शहरों ( कानपुर, वाराणसी, दिल्ली, जयपुर, श्रीनगर, पटना और लखनऊ सहित ) के सांसद इस मुद्दे पर  “निष्क्रिय” और “चुप्पी” साधे हुए हैं, जैसा कि दिल्ली स्थित एक संस्था, ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ द्वारा “पॉलिटीकल लीडर्स पोजिशन एंड एक्शन ऑन एयर क्वालिटी इन इंडिया” नामक अप्रैल 2019 की रिपोर्ट से पता चलता है।

 

प्रदूषण पर वादे

बीजेपी का वादा:

  • एनसीएपी को एक “मिशन” में बदलना।
  • अगले पांच वर्षों में वायु प्रदूषण को 35 फीसदी तक कम करना। वर्तमान में, एनसीएपी ने 2024 तक 20-30 फीसदी प्रदूषण कम करने का लक्ष्य रखा है। 2017 आधार वर्ष है।
  • 2022 तक फसल जलाने को 100 फीसदी कम करना।

कांग्रेस का वादा:

  • वायु प्रदूषण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में घोषित करना और खतरे से तत्काल निपटना।
  • मौजूदा एनसीएपी को मजबूत करना।
  • देश में पर्यावरण मानकों और नियमों की स्थापना। उन पर निगरानी और लागू करना।
  • क्षेत्रीय उत्सर्जन मानकों को स्थापित करना।
  • उत्सर्जन के सभी प्रमुख स्रोतों को लक्षित किया जाएगा, कम किया जाएगा और स्वीकार्य स्तर तक घटाया जाएगा।
  • स्वतंत्र और अधिक पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण (ईपीए) की स्थापना करना। क्षेत्राधिकार और शक्ति का प्रयोग करने वाले अन्य सभी मौजूदा निकायों को प्रतिस्थापित करना।

Source: Manifestos of the Bharatiya Janata Party and the Indian National Congress

 
घोषणापत्र और जहरीली हवा
 

 एनसीएपी को एक ‘मिशन’ में बदलने का बीजेपी का वादा है। इसका अर्थ है कि इसे बेहतर ढंग से संस्थागत बनाना और केंद्र में जवाबदेही बढ़ाना, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। एनसीएपी की कई सीमाएं हैं: यह अप्रभावी विनियामक क्षमता को संबोधित नहीं करता है। यहां शहर-दर-शहर दृष्टिकोण है। यह ग्रामीण क्षेत्रों और औद्योगिक क्षेत्रों की अनदेखी करता है और प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों से निपटने के लिए ‘आगे की रणनीति’ को तय करने में विफल है, जैसा कि दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) के फेलो संतोष हरीश कहते हैं। हरीश आगे बताते हैं, “मौजूदा एनसीएपी में इन सीमाओं को देखते हुए, मुझे यकीन नहीं है कि यह एक मिशन के रूप में कितना बदलाव लाएगा। इसलिए, मुझे लगता है कि बीजेपी का घोषणापत्र अधिक महत्वाकांक्षी हो सकता है। कांग्रेस के घोषणापत्र में ‘इरादे और संकेत’ अच्छे है। वायु प्रदूषण को एक राष्ट्रीय सार्वजनिक-स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में मान्यता देकर, यह समस्या के वास्तविक पैमाने की पहली ऐसी मान्यता है, कुछ ऐसा जो एनसीएपी से भी अनुपस्थित है।”

 

कांग्रेस के घोषणा पत्र में अन्य मौजूदा संस्थानों की जगह एक स्वतंत्र और पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण (ईपीए) स्थापित करने का भी वादा किया गया है।

 

हरीश ने कहा, “मुझे यकीन नहीं है कि एक नया प्राधिकरण मौजूदा एजेंसियों की तुलना में अधिक प्रभावी होगा। लेकिन यह आशाजनक है कि वे मानते हैं कि संस्थानों में सुधार की जरूरत है। अगर अपने शब्दों में कहें, तो ‘स्वतंत्र, सशक्त और पारदर्शी’ बनाने के लिए पर्याप्त संरचनात्मक परिवर्तनों की आवश्यकता हो सकती है।”

 

सीईईवी के ढोलकिया ने हालांकि, माना कि यदि भारत को 2030 तक अपने राष्ट्रीय परिवेश वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) को प्राप्त करना है तो दोनों रणनीतियां अधिक महत्वाकांक्षी हो सकती हैं ।

 

 इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड सिस्टम एनालिसिस के सहयोग से मार्च 2019 के एक स्वतंत्र अध्ययन सीईईवी का हवाला देते हुए, ढोलकिया ने कहा, “अधिकांश राज्य आसपास के क्षेत्रों में कटौती के माध्यम से केवल वायु गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार प्राप्त करेंगे। उन्होंने कहा,  “इसलिए, हमें क्षेत्रीय रूप से समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी।”

 

विशेषज्ञों के मुताबिक विकास को प्राथमिकता देने वाले उपाय भारत में वायु-गुणवत्ता में सुधार ला सकते हैं, भले ही वे मुख्य रूप से वायु प्रदूषण पर लक्षित न हों।

 

ये उपाय अक्सर उन विभागों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जहां वायु-गुणवत्ता के प्रबंधकों का प्रतिनिधित्व नहीं किया जाता है और उनमें नीतिगत ढांचे नहीं होते हैं, जिससे हवा की गुणवत्ता को प्राथमिकता दिया जाए। ढोलकिया कहते हैं, “इसमें आर्थिक और सामाजिक विकास, ऊर्जा या कृषि नीतियां या शहरी प्रबंधन शामिल हैं।”

 

ढोलकिया कहते हैं, “यदि उन्नत तकनीकी को उत्सर्जन नियंत्रण से जोड़ा जाए तो इस तरह के विकास के उपाय 85 फीसदी भारतीय जनसंख्या को एनएक्यूएस-अनुपालन वायु गुणवत्ता प्रदान कर सकते हैं।”

 

उन्होंने आगे कहा कि इनमें से कुछ वादों को पूरा करने के लिए नई सरकार को “निम्न-कार्बन मार्ग” के लिए “सही मायने में प्रतिबद्ध” होने, अधिक राजनीतिक इच्छाशक्ति, बेहतर कार्यान्वयन और प्रवर्तन और निगरानी में अधिक निवेश करने की आवश्यकता है।

 

स्वच्छ हवा एक लोकप्रिय मांग नहीं

 

भारत में वायु प्रदूषण एक सार्वजनिक प्राथमिकता नहीं है।

 

स्वास्थ्य की वकालत करने वाले वैश्विक संगठन , वायटल स्ट्रैटिजीज द्वारा ‘हेजी पर्सेपशन’ नामक मार्च 2019 के अध्ययन के अनुसार, तीन साल की अवधि में समाचार और सोशल मीडिया पोस्ट का विश्लेषण वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों और समाधानों के बारे में खराब सार्वजनिक समझ दिखाता है। वायटल स्ट्रेटेजीज ने दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के 11 देशों में 500,000 समाचारों और सोशल मीडिया पोस्टों की जांच की और तीन साल से 2018 तक वायु प्रदूषण के कारणों और समाधानों के बारे में सार्वजनिक समझ हासिल की। ​​उनके मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं:खराब वायु गुणवत्ता के दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों की सार्वजनिक समझ कम है। समाचार और सोशल मीडिया पोस्ट बड़े पैमाने पर अल्पकालिक स्वास्थ्य प्रभावों का उल्लेख करते हैं जैसे कि खांसी या खुजली या आंखों की परेशानी आदि जो पुराने जोखिम जैसे कैंसर के कारण होने वाले स्वास्थ्य खतरों से कहीं अधिक दिखता है।

 

  • खराब वायु गुणवत्ता के दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों की सार्वजनिक समझ कम है। समाचार और सोशल मीडिया पोस्ट बड़े पैमाने पर अल्पकालिक स्वास्थ्य प्रभावों का उल्लेख करते हैं जैसे कि खांसी या खुजली या आंखों की परेशानी आदि जो पुराने जोखिम जैसे कैंसर के कारण होने वाले स्वास्थ्य खतरों से कहीं अधिक दिखता है।
  • सार्वजनिक चर्चा वायु प्रदूषण के सबसे महत्वपूर्ण चालकों पर केंद्रित नहीं है। प्रदूषक के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत, जैसे कि घरेलू ईंधन, बिजली संयंत्र और अपशिष्ट जल, वाहनों के उत्सर्जन पर उतनी चिंता व्यक्त नहीं की जाती है, जितनी कि  वाहनों के उत्सर्जन जैसे स्रोतों पर की जाती है।
  • सार्वजनिक चर्चाएं अल्पकालिक उपायों पर ध्यान केंद्रित करती हैं। अल्पकालिक व्यक्तिगत सुरक्षा के बारे में बातचीत जैसे कि फेस मास्क पहनना, लंबे समय तक समाधानों ( जैसे कचरा जलाने पर प्रतिबंध )की तुलना में बहुत अधिक आम है।
  • बातचीत हवा की गुणवत्ता में मौसमी बदलाव से प्रेरित है। वायु प्रदूषण की चर्चा सितंबर से दिसंबर तक होती है, जब हवा की गुणवत्ता सर्दी के मौसम और किसानों द्वारा अपनाई गई फसल जलाने की प्रथा के कारण और बद्तर होती है।
  • यह प्रभावी वायु प्रदूषण नियंत्रण का समर्थन करने के लिए जनता को आकर्षित करना एक चुनौती है, जिसके लिए साल भर, निरंतर उपायों की आवश्यकता होती है।

 

बड़े जनसमूह की धारणा क्या मायने रखती है? टेरी के शर्मा ने कहा कि राजनीतिक घोषणापत्र आम तौर पर समाज की मांगों का जवाब देते हैं, और अच्छी वायु गुणवत्ता ऐसी चीज नहीं है जो अभी तक देश में जनता द्वारा प्राथमिकता रूप से मांग की जाती है। उन्होंने आगे कहा, यह मुख्य रूप से वायु प्रदूषण की स्थिति और प्रभावों पर सीमित जागरूकता और अन्य तत्काल महत्वपूर्ण मुद्दों की उपस्थिति के कारण है। आने वाले महीनों में, वैश्विक उदाहरणों का उपयोग करते हुए इंडियास्पेंड भारत के वायु-प्रदूषण संकट पर रिपोर्ट करेगा कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है, इसे उच्च राजनीतिक प्राथमिकता क्यों दी जानी चाहिए। साथ ही उन सार्वजनिक नीतियों की व्याख्या भी, जो संकट को हल कर सकते हैं।

 

वायु प्रदूषण को रोकने के लिए नई सरकार को क्या करना चाहिए:

कई विशेषज्ञों से बात करने के बाद, इंडियास्पेंड ने उन कार्यों की एक सूची बनाई है, जो नई सरकार को बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए करना चाहिए:

  • गरीब परिवारों को रसोई गैस उपलब्ध कराने का उज्ज्वला कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण पहल है और इसे विस्तारित करने की आवश्यकता है। इसके लिए एलपीजी को और अधिक किफायती बनाने के लिए अधिक सब्सिडी की आवश्यकता होगी, लेकिन इसके लिए व्यवहार संबंधी हस्तक्षेप और जागरूकता अभियानों की भी आवश्यकता होगी। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि खाना पकाने और अन्य उद्देश्यों के लिए ठोस ईंधन का घरेलू उपयोग औसत राष्ट्रीय परिवेश में पीएम 2.5 एक्सपोजर (जहरीले इनहेलेबल पार्टिकल) के लिए सबसे बड़ा योगदानकर्ता है।- संतोष हरीश, थिंक टैंक ‘फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ (सीपीआर),
  • एनसीएपी  और पर्याप्त बजट और समयसीमा में सूचीबद्ध गतिविधियों का कार्यान्वयन और ट्रैकिंग: सुमित शर्मा, निदेशक, ‘पृथ्वी विज्ञान, और जलवायु परिवर्तन प्रभाग, ऊर्जा और संसाधन संस्थान ’ (टेरी)।
  • मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्योगों सहित औद्योगिक क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने के साथ वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कड़ी सतर्कता और प्रवर्तन।-  हेम ढोलकिया, सीनियर रिसर्च एसोसिएट, काउंसिल ऑन एनर्जी एन्वायर्नमेंट एंड वाटर (सीईईवी)।
  • यह सुनिश्चित करना कि भारत के कोयला बिजली संयंत्र उपकरण स्थापित करते हैं, जो उन्हें सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड (SOx और NOx) के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों को पूरा करने में मदद कर सकते हैं। पावर प्लांट SOx का सबसे बड़ा योगदानकर्ता हैं, जो कि माध्यमिक पार्टिकुलेट मैटर के लिए महत्वपूर्ण योगदानकर्ता हैं।-  संतोष हरीश, साथी, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर)।
  • सुनिश्चित करना कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पर्याप्त कर्मचारी हैं, रिक्तियों को भरें, बजट और अन्य सुविधाओं को बढ़ावा दें। हमें निगरानी, ​​निरीक्षण और बाद की कार्रवाइयों की सार्वजनिक जानकारी देकर जवाबदेही बढ़ाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की आवश्यकता है।- संतोष हरीश, साथी, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर)।
  • शहर और क्षेत्रीय पैमानों पर वैज्ञानिक रूप से प्राप्त वायु-गुणवत्ता प्रबंधन योजनाओं का विकास और कार्यान्वयन।- सुमित शर्मा, निदेशक, अर्थ साइंस एंड क्लाइमेट चेंज डीविजन, द एनर्जी एंड रिसोर्स इंसट्टयूट।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य के प्रति वर्ष जागरूकता पैदा करना और उनकी सुरक्षा करना।- हेम ढोलकिया, सीनियर रिसर्च एसोसिएट, काउंसिल ऑन एनर्जी एन्वायर्नमेंट एंड वाटर (सीईईवी)।

 
( त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 25 अप्रैल 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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