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छोटे व साक्षर राज्य केंद्र से प्राप्त शिक्षा राशि का करते हैं बेहतर उपयोग

प्राची सालवे,
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मुंबई: देश के छोटे और अधिक साक्षर राज्य शिक्षा के लिए दिल्ली से भेजी दी राशि को स्कूलों को वितरित करने में तत्परता दिखाते हैं। उनके द्वारा इस राशि को दूसरे काम में लगाने या गलत इस्तेमाल करने की आशंका भी बड़े राज्यों की तुलना में कम है । ये राज्य केंद्रीय शिक्षा वित्त निधि का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल करते हैं। यह जानकारी सरकार के लेखा परीक्षक से प्राप्त डेटा पर हमारे विश्लेषण में सामने आई है।  मिसाल के तौर पर, मिजोरम, भारत का तीसरा सबसे साक्षर राज्य, शिक्षा के लिए प्राप्त केंद्रीय धन को एजेंसियों तक 30 दिनों के भीतर स्थानांतरित कर, सबसे आगे था। गोवा, भारत का चौथा सबसे साक्षर राज्य, 30 दिनों के भीतर राज्य एजेंसियों से स्कूलों तक पैसे भेजने में सबसे तेज था, जैसा कि 2017 नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट से पता चलता है।  कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि 35 राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों ने 2010 में 10,681 करोड़ ((1.53 बिलिन डॉलर) खर्च नहीं किया था, जो 2016 में सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए या सभी के लिए शिक्षा) के तहत 14,113 करोड़ रुपये (2.15 अरब डॉलर) तक पहुंच गया है, जिसका परिणाम है कि सरकारी स्कूलों में कम नामांकन, कम कक्षाएं और अधिक शिक्षकों की मौजूदगी है।   2015-16 में, राज्यों द्वारा 14,113 करोड़ रुपये का एसएसए फंड खर्च नहीं किए गए। यह राशि 2018-19 के लिए केरल के शिक्षा बजट के 67 फीसदी के बराबर था। बच्चों का नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा (आरटीई) अधिनियम, 2009 छह वर्ष से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों को अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक पड़ोस स्कूल में नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है।

 

केंद्रीय सरकारी कार्यक्रम एसएसए, अधिनियम को लागू करने के लिए मुख्य माध्यम है। आरटीई अधिनियम और राज्य आरटीई नियमों के अनुरूप मार्च 2011 में एसएसए संशोधित किया गया था।

 

अव्ययित एसएसए राशि में 24 फीसदी की वृद्धि हुई है। वर्ष 2010-11 में 10,680 करोड़ रुपये से 2015-16 में 14,112 करोड़ रुपये, 2014-15 में सबसे ज्यादा 17,281 करोड़ रुपये था। फंड में ज्यादा शेष राशि का एक मुख्य कारण राशि के स्थानांतरण में देरी होना था। केंद्र से राज्य, राज्य से नोडल विभाग, वहां से  जिलों, ब्लॉक और स्कूलों में जाने में अक्सर देरी होती है।  राज्य सरकार से कार्यान्वयन एजेंसी को फंड हस्तांतरण में देरी नागालैंड में 373 दिनों से लेकर मिजोरम में 30 दिनों तक थी। अरुणाचल प्रदेश में 300 दिनों से लेकर गोवा में 30 दिनों तक फंड एजेंसियों से राज्य, राज्य से एजेंसियों, यहां से जिला एजेंसियों और स्कूलों तक पहुंचने में समय लगा।नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (आंध्र प्रदेश, दमन और दीव, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और नागालैंड) ने अनुसंधान, मूल्यांकन, निगरानी और पर्यवेक्षण पर पैसे खर्च नहीं किए। यह कमी 9 फीसदी (गुजरात) से 65 फीसदी (झारखंड) तक रही है।

 

ओडिशा में, हेडमास्टर ने बुनियादी ढांचे के लिए पैसे निकाले और बिना खर्च किए हुए सेवानिवृत्त
 

कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि एसएसए फंडों को राज्यों द्वारा अन्य कार्यक्रमों में लगाया गया था। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने क्रमश: 8.95 करोड़ रुपये और 5.30 करोड़ रुपये के एसएसए फंडों को प्राथमिक स्तर पर लड़कियों की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए लगाया है।

 

कैग सर्वेक्षण में जिलों में धन का दुरुपयोग भी पाया गया। उदाहरण के लिए, ओडिशा ( जहां साक्षरता दर 73 फीसदी है ) ने आवंटित 80 बुनियादी ढांचे के कार्यों को निष्पादित किए बिना 58 हेडमास्टर्स द्वारा 1,04 करोड़ रुपये निकालने और रोकने की सूचना दी । उन 58 हेडमास्टर्स में से 14 सेवानिवृत्त, चार की मृत्यु और दो फरार हो गए, जबकि 38 सेवा में जारी रहे। आरटीई अधिनियम की मांग है कि स्थानीय प्राधिकरण 14 वर्ष तक वार्षिक घरेलू सर्वेक्षण के माध्यम से अपने अधिकार क्षेत्र में सभी बच्चों का जन्म से रिकॉर्ड बनाए रखे। कैग ने पाया कि 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ऐसे किसी भी रिकॉर्ड को बनाए नही रखा है या 2010-2016 के बीच इस तरह के सर्वेक्षण आयोजित नहीं किए हैं।

 

 सर्वेक्षण में 14 साल की उम्र के बच्चों की संख्या, स्कूल में बच्चों की संख्या और स्कूल से बाहर के संख्या की जानकारी शामिल है। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि सूचना की कमी ने शिक्षा मंत्रालय द्वारा शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली (डीआईएसई) बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए आंकड़ों की गुणवत्ता को प्रभावित किया है, जो भारत के स्कूलों के बारे में जानकारी का डेटाबेस है।

 

नामांकन अनुपात में कमी

 

नेट नामांकन अनुपात (एनईआर), या प्राथमिक विद्यालयों में आधिकारिक स्कूली आयु के बच्चों की आबादी में नामांकित बच्चों की संख्या में 2012-13 और 2015-16 के बीच गिरावट आई है।

 

प्राथमिक नेट नामांकन में गिरावट, 2012-2016


 

चूंकि एनईआर स्कूल-आयु सीमा के भीतर स्कूलों में नामांकित बच्चों से संबंधित है, इसलिए यह 100 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। हालांकि, छह राज्यों द्वारा 100 फीसदी से अधिक एनईआर की सूचना मिली थी, जो आरटीई उपलब्धि पर आंकड़ों और सरकारों के दावों पर सवाल उठाती है, जैसा कि कैग रिपोर्ट में कहा गया है।

 

 सबसे कम प्रतिधारण दर ( चार साल पहले ग्रेड I में नामांकन के अनुपात के रूप में एक वर्ष में ग्रेड पांचवी में नामांकन के रूप में गणना) मिजोरम प्राथमिक विद्यालयों में था, जहां 36 फीसदी स्कूल में रहे थे, और महाराष्ट्र में ऊपरी प्राथमिक विद्यालयों में, जहां 2015-16 में स्कूल में 15 फीसदी से अधिक नहीं रहे थे। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि डीआईएसई डेटा अधूरा था, और सभी राज्यों के आंकड़ों के बिना प्रतिधारण दर की गणना की गई थी। कैग रिपोर्ट के अनुसार अन्य सभी प्रबंधन स्कूलों की तुलना में सरकारी संचालित स्कूलों में प्रतिधारण दर “खराब” थी।

 

कक्षाओं से ज्यादा शिक्षक
 

 

एकल शिक्षक स्कूलों से बचने के लिए, आरटीई अधिनियम का कहना है कि 60 छात्रों तक के प्राथमिक विद्यालयों में दो शिक्षक होना चाहिए। चूंकि छात्रों की संख्या बढ़ती है, इसलिए शिक्षकों की संख्या भी होनी चाहिए। 200 से अधिक छात्रों वाले स्कूलों के लिए 40 शिक्षक निर्धारित किए जाते हैं।

 

 कैग ने पाया कि 11 राज्यों में, इन नियमों को लागू नहीं किया गया था। उदाहरण के लिए, 2012-16 के दौरान, बिहार में, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक सरकारी स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात ( पीटीआर, प्रति  शिक्षक छात्र, 30:1 प्राथमिक प्राथमिक विद्यालयों और 35:1 ऊपरी प्राथमिक में सेट) 50:1 और 61:1 था।

 

बिहार में 3,269 प्राथमिक विद्यालयों (8 फीसदी) और 127 ऊपरी प्राथमिक विद्यालयों (1 फीसदी) के एक ही शिक्षक थे। राजस्थान में, 2012-16 में 11,071 प्राथमिक विद्यालय (29 फीसदी) और 365 ऊपरी प्राथमिक विद्यालयों (2 फीसदी) में दो और तीन शिक्षकों के मानदंड की तुलना में एक शिक्षक थे।

 

कक्षाओं की तुलना में अधिक शिक्षकों के साथ स्कूलों की संख्या 2012-13-16 में 894,329 से बढ़कर 2015-16 में 958,820 हुई है, यानी 7 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

इसका मतलब है कि 2012-13 में 62 फीसदी स्कूलों में कक्षा में एक से अधिक शिक्षक थे, 2015-16 में यह 66 फीसदी तक बढ़ गया।

 

अधिक शिक्षक, कम कक्षाएं: 2012-13 से 2015-16

Source: Comptroller and Auditor General of India

 

शिक्षा मंत्रालय ने कैग (जनवरी 2017) को बताया कि 2000-01 से 1.7 मिलियन कक्षाओं का निर्माण किया गया था,  लेकिन कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2016 तक एक प्रतिकूल शिक्षक-कक्षा अनुपात के साथ 900,000 स्कूल थे।

 

आरटीई अधिनियम के मुताबिक, स्थानीय प्राधिकरण, राज्य विधायिकाओं या संसद के चुनाव से संबंधित और आपदा राहत कामों या जनसंख्या गणना के अलावा किसी भी गैर-शैक्षिक उद्देश्यों के लिए कोई शिक्षक तैनात नहीं किया जाएगा।

 

कैग ने गैर-शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए नौ राज्यों में शिक्षकों को तैनात पाया, जैसे सार्वजनिक प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत सहायक के रूप में या  कलेक्टरों, चुनावी रोल का संशोधन, जिला प्रशासन कार्यालयों में कर्मचारियों के सदस्यों के रूप में काम करना आदि।उदाहरण के लिए, 2014-15 के दौरान असम में, चार जिलों में से तीन में, 1,595 प्राथमिक शिक्षक नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) को अद्यतन करने में लगे थे।

 
( सालवे प्रोग्राम मैनेजर हैं और इंडियास्पेंड से जुड़ी हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 14 नवंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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