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जन्म के समय कम वजन और अपरिपक्व प्रसव के कारण सबसे अधिक होती हैं नवजात बच्चों की मौत

देवानिक साहा,
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अगरतला के त्रिपुरा में एक अस्पताल में नवजात बच्चे का वजन लेती एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता। अपने देश में नवजात बच्चों में से जिनकी जन्म के 29 दिनों के भीतर मौत हो जाती है, उनमें से 48.1 फीसदी बच्चों का जन्म के समय वजन कम होता है या उनका समय से पहले जन्म होता है।

 

भारत में हर दूसरे नवजात बच्चे की मौत का कारण जन्म के समय कम वजन या अपरिपक्व प्रसव है। यह जानकारी जनगणना आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आई है। यह निष्कर्ष निश्चित रुप से माताओं के बदहाल स्वास्थ्य और अपर्याप्त स्वास्थ्य व्यवस्था को दर्शाता है।

 

पहले 28 दिनों भीतर हुए मृत्यु को नवजात मृत्यु दर के रूप में परिभाषित किया गया है। बाल मृत्यु की संख्या के संबंध में भारत का स्थान दुनिया में काफी ऊपर है। यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में हर वर्ष कम से कम 700,000 नवजात शिशुओं की मौत होती है यानी प्रति 1,000 बच्चों पर 29 की मौत हो जाती है।

 

यूनाइटेड नेशन चिल्ड्रन्स फंड (यूनिसेफ) के अनुसार,दुनिया में होने वाली नवजात मौतों में भारत की हिस्सेदारी 26 फीसदी है। 13 अफ्रीकी देशों का भारत की तुलना में बेहतर स्थिति है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने मई 2016 में विस्तार से बताया है।

 

भारत में 0-5 वर्ष की आयु वर्ग में भी बाल मृत्यु दर के लिए आंकड़े भी ज्यादा हैं। वर्ष 1990 से 2015 के बीच भारत में इस आयु वर्ग के बच्चों की मृत्यु किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे अधिक हुई है। हालांकि, इन वर्षों में बाल मृत्यु दर में 62 फीसदी की कमी हुई है। बावजूद इसके हर साल यह संख्या 13 लाख बनी हुई है।

 

जन्म के बाद के घातक 28 दिन

 

यदि जन्म के समय शिशु का वजन 2.5 किलो (5.5 पाउंड) से कम होता है तो उसे एलबीडब्लू कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार अपरिपक्व बच्चा वह होता है जो गर्भावस्था के 37 सप्ताह के पूरा होने से पहले जीवित पैदा होता है।

 

जनगणना कार्यालय द्वारा 2010-13 मौत सांख्यिकी कारणों की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में, ऐसे सभी शिशुओं में से जिन्होंने जन्म के बाद से 29 दिन पूरे किए, उनमें से 48.1 फीसदी एलबीडब्लू और अपरिपक्व जन्म से पीड़ित थे। एक साल के भीतर के आयु के बच्चों के लिए यह आंकड़े 35.9 फीसदी थे और 0 से 4 वर्ष आयु वर्ग में यह संख्या 29.8 फीसदी था।

 

इन दो कारणों से 0-4 वर्ष के आयु वर्ग के बीच के बच्चों की सबसे अधिक लोगों की मृत्यु हुई है। लेकिन 1 से 4 साल के बीच हुई मौतों की वजह शिशु मृत्यु के 10 प्रमुख कारणों से अलग थे। इससे एक बात साफ है कि अपने देश में 0-1 वर्ष का वक्त बच्चों के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित है।

 

कारण अनुसार नवजात एवं बाल मृत्यु दर

Source: Causes of Death Statistics, 2010-13

 

बदहाल मातृ स्वास्थ्य

 

एलबीडब्लू एक जटिल सिंड्रोम है, जो दो कारणों से होता है। अपरिपक्व जन्म और गर्भ की आयु के लिए बहुत छोटा भ्रूण। इन दोनों स्थितियों का एक ही समय होना और भी खतरनाक है।

 

इनक्लूड लैब्स के अध्यक्ष नारायण रामचंद्रन ने हाल ही में अंग्रेजी अखबार, द मिंट में लिखा है कि एलबीडब्ल्यू के लिए तीन अंतर्निहित कारण हैं। ये सभी माता से जुड़े हुए हैं। गर्भाधान से पहले बुरी पोषण की स्थिति, अधिकतर बचपन के दौरान बुरे पोषण और संक्रमण के कारण छोटे कद और  और गर्भावस्था के दौरान बुरा पोषण। इनक्लूड लैब्स, भारत में राज्य सरकारों द्वारा बड़े पैमाने पर स्कूल आधारित स्वास्थ्य मिशन को लागू करने में मदद करता है।

 

इन बातों को एक शोध के निष्कर्ष से भी समझा जा सकता है। यह शोध उत्तर प्रदेश में रोहिलखंड मेडिकल कॉलेज द्वारा किया गया था, जिसमें 350 माताओं को शामिल किया गया। शोध का उदेश्य संस्थागत प्रसव के बीच एलबीडब्ल्यू के साथ जुड़े महामारी के कारकों को ढूंढना था।

 

शोध के निषकर्ष कुछ इस प्रकार थे। 40 फीसदी गर्भवती माताओं ने एलबीडब्लू बच्चों को जन्म दिया और उनमें से 76.5 फीसदी की गर्भावधि उम्र 37 सप्ताह की तुलना में कम था; इनमें से 58.5 फीसदी माताओं की उम्र 20 वर्ष से कम थी, और उनमें से 76.1 फीसदी का वजन 50 किलो से कम था।

 

दक्षिण एशिया में एलबीडब्ल्यू की दर ज्यादा, भारत दूसरे स्थान पर

 

यूनिसेफ के अनुसार, 2013 में कम से कम 220 लाख नवजात बच्चे एलबीडब्लू के शिकार थे। अनुमान के अनुसार, विश्व स्तर पर 16 फीसदी बच्चे एलबीडब्लू से पीड़ित थे।

 

क्षेत्रीय विविधताओं के संदर्भ में, दक्षिण एशिया में एलबीडब्लू के सबसे अधिक मामले हैं। दक्षिण एशिया में 28 फीसदी नवजात शिशुओं का वजन 2.5 किलो से कम था। क्षेत्र में ऐसे शिशुओं का प्रतिशत भी सबसे अधिक था, जिनका जन्म के समय वजन नहीं लिया गया है। ये आंकड़े करीब 66 फीसदी दर्ज किए गए हैं। अनुमान किया गया है कि उप-सहारा अफ्रीका में नवजात शिशुओं में 13 फीसदी एलबीडब्ल्यू के मामले हैं। यहां 54 फीसदी नवजात शिशुओं का जन्म के समय वजन नहीं लिया गया है।

 

भारत नवजात शिशुओं में एलबीडब्लू के दर में तीसरे नंबर पर है। यह आंकड़ा 28 फीसदी का है। भारत केवल केवल मॉरिटानिया (35 फीसदी) पाकिस्तान और यमन (32 फीसदी प्रत्येक) से पीछे है। पाकिस्तान के अलावा, सभी दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों की तुलना में भारत की हालत खराब है। वैसे युनिसेफ का मानना है कि ये आंकड़े गलत भी हो सकते हैं, क्योंकि सभी मामलों की सही रिपोर्ट नहीं मिल पाती।

 

देश के अनुसार जन्म के समय कम वजन का प्रसार

Source: United Nations Children’s Fund

 

भारत में होता है सबसे अधिक अपरिपक्व जन्म

 

वर्ष 2012 में डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में हर वर्ष अनुमानित तौर पर 15 मिलियन अपरिपक्व जन्म होते हैं। अफ्रीका और दक्षिण एशिया में 60 फीसदी से अधिक अपरिपक्व जन्म के मामले पाए जाते हैं। 3.5 मिलियन के आंकड़ों के साथ भारत अपरिपक्व बच्चों के जन्म की सूची में सबसे उपर है। 1.17 मिलियन के साथ चीन और 0.77 मिलियन के साथ नाइजीरिया दूसरे और तीसरे स्थान पर है।

 

देश के अनुसार अपरिपक्व जन्म, 2012

Source: World Health OrganizationFigures for 2012, latest available

 

इंडिया न्यू बॉर्न एक्शन प्लान और इसका काम

 

इंडिया न्यू बॉर्न एक्शन प्लान (INAP) सितंबर 2014 में शुरू किया गया था। योजना का उदेश्य वर्ष 2030 तक नवजात शिशु मौतों और मृत प्रसव समाप्त करना है। साथ ही योजना का लक्ष्य 2030 तक एकल अंक नवजात मृत्यु दर और मृत प्रसव दर हासिल करना है।

 

इंडिया न्यू बॉर्न एक्शन प्लान के तहत लक्ष्य

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Source: India Newborn Action PlanKMC Coverage: Newborn with low birthweight or rpematurity managed with Kangaroo Mother Care at facility (In %)

 

आईएनएपी की मुख्य रणनीति को कंगारू मदर केयर (केएमसी) कहा जाता है। यह नवजात शिशु के लिए गर्भ की तरह वातावरण बनाता है, जो बच्चे को चार बुनियादी जरूरतों को प्रदान करता है। गर्मी, भोजन, प्यार और संरक्षण। इसके तहत सभी नवजात शिशुओं को लाभ पहुंचाया जाता है, विशेष रुप से जिनका अपरिपक्व जन्म हुआ है या जो एलबीडब्ल्यू से पीड़ित है।

 

आम तौर पर, जन्म के समय 2.5 किलो से कम वजन वाले सभी नवजात शिशुओं के लिए केएमसी की सुविधा होनी चाहिए। हालांकि, भारत में, एलबीडब्ल्यू के अधिक मामले होने के कारण आईएनएपी जन्म के समय 2 किलो से कम वजन वाले बच्चों के लिए ही प्राथमिकता के आधार पर केएमसी की सिफारिश करता है।

 

Note: In September 2016, KMC was introduced in Veerangana Avanti Bai Women’s Hospital in Lucknow. It will also be launched in all the 79 Sick Newborn Care Units (SNCUs) across Uttar Pradesh

 

वैसे भारत ने नवजात टिटनेस मृत्यु दर में 99.76 फीसदी की कमी कर ली है और डब्ल्यूएचओ ने हमें टिटनेस मुक्त ‘मातृत्व एवं नवजात’ भी घोषित किया था। इस संबंध में  इंडियास्पेंड ने अक्टूबर 2015 में पहले ही विस्तार से बताया है।

 

(साहा एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वह ससेक्स विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज़ संकाय से वर्ष 2016-17 के लिए जेंडर एवं डिवलपमेंट के लिए एमए के अभ्यर्थी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 01 नवम्बर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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