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ट्रेनी फर्स्ट ऑफिसर गरिमा श्योराण की कहानी, और भारत की महिलाओं का उदय

एलिसन सलदानहा,प्राची सालवे,
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सेंट्रल उत्तर प्रदेश के फुर्सतगंज हवाई क्षेत्र में, भारत के राष्ट्रीय उड़ान स्कूल, ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी’ (आईजीआरयूए) में, अपने बैचमेट्स के साथ ट्रेनी फर्स्ट ऑफिसर गरिमा श्योराण  

 

मुंबई: 2016 में, जब 17 वर्षीय गरिमा श्योराण को उत्तर प्रदेश के सेंट्रल जिले के अमेठी के फुर्सतगंज एयरफील्ड में भारत के राष्ट्रीय उड़ान स्कूल, ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी’ (आईजीआरयूए) में दाखिल कराया गया था, तब उनके गृह नगर, रोहतक ( हरियाणा ) में किसी को पता नहीं था कि वह क्या कर रही है?

 

स्पाइसजेट एयरलाइन में ट्रेनी फर्स्ट ऑफिसर, 20 वर्षीय श्योराण ने इंडियास्पेंड से टेलिफोन पर बात करते हुए कहा कि, “देखिए, मैं छोटे शहर हरियाणा के एक जाट परिवार से आती हूं।” उन्होंने वहां के परिवेश का वर्णन करते हुए कहा कि “लड़कियों के लिए बहुत अच्छा माहौल नहीं”। अपनी बेटियों की व्यावसायिक शिक्षा में माता-पिता को निवेश करते हुए देखना वहां अब भी असामान्य है। उन्होंने बताया कि, “अगर लोगों को पता लग जाए तो वे कहेंगे,‘ आप अपनी बेटी पर इतना खर्च क्यों कर रहे हैं? इसे अपने बेटे के लिए छोड़ दो! ‘… हर किसी को लगता है कि लड़कियां इंजीनियरिंग या चिकित्सा की पढ़ाई कर तो लेंगी लेकिन जाएगी।”

 

दो साल तक, उसके बारे में माता-पिता और छोटे भाई के अलावा, केवल एक चाचा को हकीकत पता थी। वह कहती हैं, “बहुत अजीब लगता था जब पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार  पूछते थे कि गरिमा कहां है? वह कैसी है? वे टालते हुए मेरे बारे में कहते कि वह दूर के एक कॉलेज से इंजीनियरिंग कर रही है।”

 

लंबे, काले बालों वाली एक तेज-तर्रार, आत्मविश्वास से भरी युवती, और अंग्रेजी पॉप संगीत के लिए एक आत्मीयता (उसका कॉलर ट्यून क्यूबा के-अमेरिकी गायक कैमिला कैबेलो का ‘हवाना’ है), श्योराण एक ऐसी जनसांख्यिकीय का प्रतिनिधित्व करती है, जो भारत की महिलाओं की प्रगति से जुड़ा है।

 

 ‘इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ वूमेन एयरलाइन पायलट’ के 2018 के आंकड़ों के अनुसार, महिला पायलट, जो भारत के वाणिज्यिक पायलट का 12.4 फीसदी का गठन करती हैं, वैश्विक स्तर के 5.5 फीसदी के दोगुने से अधिक और संयुक्त राज्य अमेरिका (5 फीसदी) और यूनाइटेड किंगडम (5.2 फीसदी) सहित अधिकांश पश्चिमी देशों से आगे हैं।

 

श्योराण भारतीय महिलाओं की मातृ, शिशु और शिशु मृत्यु दर, स्वास्थ्य सेवा और प्राथमिक, माध्यमिक और कॉलेज शिक्षा जैसी कई क्षेत्रों में की गई पीढ़ीगत प्रगति का प्रतिनिधित्व करती हैं।

 

उनकी कहानी, उनके जिले और राज्य द्वारा की गई प्रगति की कहानी भी है – और उस प्रगति की भी… जो अभी भी भारत को दुनिया के साथ और कुछ मामलों में, उपमहाद्वीप देशों के बराबर आने के लिए हासिल करनी है।

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श्योराण के गृह जिले में लैंगिक पूर्वाग्रह
 

हरियाणा के 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 10 लाख की आबादी वाले रोहतक में  हिंदू जाट समुदाय के लोगों का मूल इलाका माना जाता है, जिनका वंश 12 वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व तक पता लगाया जा सकता है।  हालांकि, जिले का साक्षरता दर 84 फीसदी है, जो 74 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। य यहां पुरुष साक्षरता दर 88 फीसदी है, जबकि महिला साक्षरता दर 72 फीसदी से कम है, जो राज्य में महिलाओं के खिलाफ निरंतर लैंगिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है।  भारत भर में, महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए राज्य छठे स्थान पर है और राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक गैंगरेप की सूचना दी गई है: प्रत्येक 100,000 महिलाओं के लिए 1.5, जैसा कि नवीनतम उपलब्ध डेटा, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट से पता चलता है।  2011 की जनगणना के अनुसार, प्रति 1,000 पुरुषों पर 879 महिलाओं के साथ, हरियाणा ने भी राज्यों के बीच भारत के सबसे कम लिंगानुपात की सूचना दी है।   हरियाणा में सरकार द्वारा 17 जिलों को ‘जेंडर-क्रिटिकल’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें से एक रोहतक है, जिसमें प्रत्येक 1,000 पुरुषों पर 867 महिलाओं का आंकड़ा हैं। यहीं से भारत को 2016 में अपना पहला ओलंपिक पदक मिला था, जब स्थानीय पहलवान साक्षी मलिक ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं थी। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 2016 में रिपोर्ट किया था।

 
जहां से मैं आती हूं, माता-पिता केवल बेटों के लिए ऐसा करते हैं…”

 

उड़ान प्रशिक्षण शुरु होने के छह महीने पहले, श्योराण एक पायलट होने की कल्पना नहीं कर सकती थी। एक दिन, जब वह इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षा (जो उसने क्लियर की थी) के लिए पढ़ रही थी, उसके माता-पिता ने एक विकल्प के रूप में उड़ान भरने का सुझाव दिया।

 

श्योराण ने कहा, “ईमानदारी से जब वे मेरे पास आए, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मैं जैसी थी, ठीक थी! मुझे नहीं पता था कि यह कुछ ऐसा है जो मैं कर सकती हूं … अब जब यह मेरे सामने है, तो मैं निश्चित रूप से कुछ बड़ा करना चाहूंगी। “

 

जब उसने आईजीआरयूए में मेडिकल परीक्षा पास की, तभी उसे लगा कि वह पायलट बन सकती है।

 

वह कहती हैं, ” यह मेरे पिता का सपना था कि मैं पायलट बनूं  और उन्होंने इस संबंध में पहले कभी एक शब्द भी नहीं कहा था।”लेकिन वह अब भी चिंतित थी कि हरियाणा के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में एक राइट-टू-इनफॉरमेशन ऑफिसर उसके पिता और एक पब्लिक-स्कूल टीचर उसकी मां , फ्लाइंग स्कूल की फीस और अन्य खर्च कैसे वहन करेंगे। श्योराण ने कहा, “मेरे माता-पिता ने कुछ जमीन बेच दी और कुछ पैसे जमा हुए। मैं अभी भी असमंजस में थी, क्योंकि आपको समझना होगा, मैं कहां से आती हूं। मेरे इलाके में  माता-पिता आमतौर पर केवल बेटों के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन मेरी मां ने मुझसे कहा, “मुझसे वादा करो कि मैं उनसे यह नहीं पूछूंगी कि हमने इसके लिए क्या और कैसे पैसे दिए।” श्योराण ने 15 महीनों में अपने वाणिज्यिक पायलट का लाइसेंस प्राप्त कर लिया ( आईजीआरयूए में कैडेटों को आम तौर पर इस बिंदु तक पहुंचने में 18 महीने से दो साल लगते हैं)। वह हंसते हुए कहती हैं ” नौकरी मिलने के बाद ही हमने अपने परिवार के अन्य लोगों को सच्चाई बताई।”  अपने पहले वेतन के साथ, उन्होंने अपनी मां के लिए सोने की अंगूठी खरीदी। अपने पिता और 15 वर्षीय भाई के लिए, उसने स्केगन घड़ियों को खरीदा, जो कि एक महंगा डेनिश ब्रांड था।

 

ट्रेनी फर्स्ट ऑफिसर गरिमा श्योराण (20) अपनी स्ट्राइप पाने के बाद कॉकपिट में

Trainee First Officer Garima Sheoran (20) in the cockpit after earning her stripes

 

श्योराण पहले ही अपने एयरलाइन परिवहन पायलट के लाइसेंस के लिए परीक्षा और साक्षात्कार पास कर चुकी हैं, जो कि उनके 21 वर्ष की होने तक के लिए रुका हुआ है। 2,500 घंटे विमान उड़ाने के बाद वह कप्तान होने के लिए आवेदन कर सकती हैं।

 
भारत की महिला पायलटों से दृष्टि मिली
 

श्योराण की कहानी शहरी, अर्ध-शहरी और ग्रामीण भारत की कई महिलाओं के समान है। वे इस पेशे में दुनिया का नेतृत्व करने के लिए पायलट और कमांडर बनने के लिए अवरोधों को पार कर रही हैं और स्टीरियोटाइप्स हालातों पर काबू पा रही हैं।

 

भारत में 1,092 महिला पायलटों में से 384 या 35 फीसदी कमांडर (या कप्तान) हैं, जो वैश्विक औसत 28 फीसदी से 7 प्रतिशत अंक अधिक है। अमेरिका और ब्रिटेन में, महिला पायलटों में, महिला कप्तानों की हिस्सेदारी 27 फीसदी और 28 फीसदी हैं।  आईजीआरयूए के पूर्व निदेशक, एयर मार्शल वीके वर्मा (retd) ने कहा, “महिला पायलटों को अन्य नौकरियों में महिलाओं के सामने आने वाली पारंपरिक चुनौतियों का एहसास नहीं होता है।” उन्होंने कहा कि समान वेतन है, जैसा कि यूनियनों द्वारा निर्धारित किया गया है, और एयरलाइनों द्वारा प्रदान की जाने वाली अन्य सुविधाएं हैं, जैसे कि बाल देखभाल और सुरक्षा वे भी समान हैं। उन्होंने कहा, “हम उन युवा लड़कियों को बहुत उत्साही पाते हैं, जो पायलट बनना चाहती हैं, और हमें पुरुषों और महिलाओं के कौशल सेट में कोई अंतर नहीं दिखता है।” आईजीआरयूए की कई महिला ट्रेनी, अकादमी में फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर बन गई हैं। यहां मुख्य उड़ान प्रशिक्षक एक महिला है।

 

विमानन की दुनिया का उदाहरण ग्लैमर से भरा है, लेकिन जैसे-जैसे शैक्षिक और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार होता है, महिलाओं के बीच एक बड़ी संख्या गैर-पारंपरिक करियर पथ और व्यवसायों में आगे बढ़ने के लिए जी-तोड़ कोशिश करती दिखाई दे रही हैं।

 

2015 तक, भारत की 500 सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों में 17 सीईओ महिलाएं थीं, जैसा कि ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ ने 2016 की रिपोर्ट में बताया है। इनमें से सात बैंकिंग और वित्तीय सेवा उद्योग में थी। 2005 की तुलना में यह चार गुना से अधिक था, जब सबसे बड़ी, सूचीबद्ध कंपनियों की चार से अधिक सीईओ महिलाएं नहीं थीं। महिला न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हुई है। 1950 में छह से बढ़ कर यह सर्वोच्च न्यायालय और भारत में उच्च न्यायालय में में 229 में से 124 न्यायाधीश महिलाएं हैं। इस संबंध में ‘न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ ने दिसंबर 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

इससे भारत की महिला साक्षरता में हुई प्रगति को हम देख सकते हैं।

 

शिक्षा में महिलाओं की दमदार मौजूदगी, विशेषकर विज्ञान की शिक्षा में

 

2017 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिला साक्षरता 1951 में 9 फीसदी से बढ़कर 2011 में 65 फीसदी हुआ है।

 

अपर प्राइमरी ग्रेड (ग्रेड VI-VIII) में लड़कियों के लिए सकल नामांकन अनुपात 2005-06 में 66.4 फीसदी से बढ़कर 2015-16 में 97.6 फीसदी हुआ है। इसी अवधि में अपर सेकेंड्री शिक्षा (ग्रेड IX-XII) में नामांकन 36 फीसदी से बढ़कर 69 फीसदी हुआ है।

 

विश्वविद्यालयों में नामांकित महिलाओं की संख्या चार वर्षों में 33 फीसदी से बढ़ी है, 2011-12 में 21 लाख से 2015-16 में 28 लाख तक।

 

विज्ञान शिक्षा में महिलाओं के नामांकन में वृद्धि


 

पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा चुनी जाने वाले विषय विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा में अब अधिक महिलाएं प्रवेश कर रही हैं। छह वर्षों में, विज्ञान में ग्रैजुएशन की डिग्री में नामांकित महिलाओं की संख्या में 130 फीसदी वृद्धि हुई है। यह आंकड़े  2011-12 में 10 लाख से बढ़ कर है और 2017-18 में 23 लाख हुआ है।

 

 सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पांच साल से भी कम समय में, मास्टर इन टेक्नोलॉजी के लिए नामांकित महिलाओं की संख्या में 73 फीसदी वृद्धि हुई है। इस संबंध में आंकड़े 2011-12 में 34,217 से बढ़कर 2017-18 में 59,259 हुए हैं।

 

इस विकास का अधिकांश हिस्सा महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाकर संभव बनाया गया था।

 

स्वास्थ्य संकेतक हो रहे हैं बेहतर

 

दशकों से भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार ने उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने की अनुमति दी है।15-49 वर्ष की आयु की “पतली” महिलाओं (बॉडी मास इंडेक्स के साथ – ऊंचाई के लिए वजन का एक माप – 18.5 किलोग्राम / मी 2 से कम), के अनुपात में 13 प्रतिशत अंक की गिरावट आई है। इस संबंध में आंकड़े  2005-06 में 36 फीसदी से 2015-16 में 23 फीसदी तक हुए हैं।

 

भारतीय लड़कियों में स्टंटिंग (उम्र के अनुससार कम उंचाई) की घटना 10 वर्षों से 2016 तक 23 फीसदी से घटकर 16 फीसदी हो गई है  और कम वजन (आयु के अनुसार कम वजन) लड़कियों का प्रतिशत समान समय अवधि में 16 फीसदी से घटकर 11 फीसदी हो गया है, जैसा कि  2015-16 के ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ (एनएफएचएस) के आंकड़ों से पता चलता है।

 

इंडियास्पेंड ने जुलाई 2018 की रिपोर्ट में बताया कि महिलाओं और बच्चों दोनों के लिए स्वास्थ्य परिणामों में सुधार का एक प्रमुख कारण माताओं के स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करना है।

 

2013 के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (SRS) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 1992 में मातृ मृत्यु दर प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 398 मौतों से कम हो कर 2014-16 में 130 हुआ है। इस बीच, विवाह की औसत आयु, जोकि महिला सशक्तीकरण का एक प्रमुख निर्धारक 1991 में 19.5 साल से बढ़ कर 2013 में 21.3 साल हुआ है, जैसा कि 2013 एसआरएस रिपोर्ट में दिखाया गया है।  18 वर्ष की आयु से पहले विवाह हने वाली महिलाओं का अनुपात 1996 में 18 फीसदी से 2013 में 2.2 फीसदी हुआ है जबकि 21 वर्ष की आयु के बाद विवाह करने वाली महिलाओं का प्रतिशत इसी अवधि में 29 फीसदी से 56 फीसदी हुआ है।

 
ये संकेतक वर्षों से महिलाओं के बीच बढ़ती निर्णय लेने की शक्तियों की ओर इशारा करते हैं।
 

2005-06 में, वर्तमान में विवाहित महिलाएं, जो आमतौर पर घरेलू फैसलों में भाग लेती हैं,  उनका का प्रतिशत 76.5 फीसदी था जो  2015-16 में बढ़ कर 84 फीसदी हुआ है, जैसा कि एनएफएचएस डेटा से पता चलता है।

 

अधिक निर्णय लेने वाली शक्तियों के लिए जिम्मेदार कारणों में से एक महिलाओं की बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता है, जैसा कि आंकड़ों से पता चलता है। एक बैंक या बचत खाते वाली महिलाओं का प्रतिशत जो वे स्वयं संचालित करती हैं, उनकी संख्या तीन गुना हुई है, 15 फीसदी से 53 फीसदी तक।

 

हालांकि, पायलट और सीईओ के बावजूद, महिलाओं की प्रगति भारत के कार्यबल में अपर्याप्त रूप से परिलक्षित होती है।

 

श्रमबल में कम महिलाएं

 

भारत की महिला श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) या शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 1,000 व्यक्तियों पर महिलाओं की संख्या, 18 वर्षों से 2011 तक कम हुआ है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जनवरी 2019 की रिपोर्ट में बताया है।  शहरी क्षेत्रों में महिला एलएफपीआर 1993 में प्रति 1,000 पर 165 से घटकर 2011 में 155 हुआ है। इसी अवधि में ग्रामीण क्षेत्रों में महिला एलएफपीआर 330 से घटकर 253 रह गई, जैसा कि हमने बताया है।

 

जबकि पुरुषों के लिए नौकरियों में 9 लाख की वृद्धि हुई है, 2017 के पहले चार महीनों में 24 लाख महिलाएं रोजगार के नक्शे से हटी हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2017 की रिपोर्ट में बताया है। वर्तमान में केवल 27 फीसदी भारतीय महिलाएं श्रम शक्ति में हैं। जी -20 देशों में, केवल सऊदी अरब का प्रदर्शन बदतर है। भारत में काम करने वाली महिलाओं के बारे में हमारी सूचनाप्रद गंभीर रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं।  महिलाओं के कदम पीछे जा रहे हैं, यह स्पष्ट है, यहां तक कि फुर्सतगंज में उड़ान स्कूल में भी। जबकि महिलाओं की बढ़ती आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए क्षमता में वृद्धि की गई है,  लेकिन नामांकित कैडेटों की एक चौथाई से भी कम महिलाएं हैं।

 

पूर्व निदेशक एयर मार्शल वर्मा ने कहा, “पारिवारिक स्तर पर कुछ अवरोध हैं …(सीटें बढ़ने के बावजूद) लेकिन यह स्पष्ट है कि आकांक्षाएं काफी बढ़ रही हैं।”

 

श्योराण कहती हैं, “मुझे लगता है कि मेरे करियर की पसंद ने निश्चित रूप से विभिन्न कैरियर चुनने की संभावना के संबंध में मेरे रिश्तेदारों की आंखें खोली हैं। लेकिन अभी भी कई हैं, जो केवल अपने बेटों के लिए सोचेंगे।”

 

उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर, जहां उसके फॉलोअर्स की संख्या जनवरी 2019 में 1,000 को पार कर गई, श्योराण को भारत भर की लड़कियों से कई संदेश मिलते हैं, उनसे आईजीआरयूए प्रवेश परीक्षा, छात्रवृत्ति की जानकारी – और माता-पिता को उन्हें पायलट बनाने के लिए समझाने पर सलाह के लिए कहते हैं।

 

श्योराण कहती हैं, “ग्वालियर, मेरठ, और यूपी, राजस्थान और हरियाणा के कई हिस्सों से कई लड़कियां नियमित रूप से मेरे पास पहुंचती हैं, जो मेरी नौकरी से जुड़ी गलत धारणाओं के बारे में बताती हैं। वे जानना चाहती हैं कि क्या यह असुरक्षित है, या यहां भी हम भेदभाव के साथ संघर्ष करते हैं ।मैं फौरन पायलटों के साथ भारत की प्रगति के बारे में समाचार लेख साझा करता हूं।”

 

श्योराण कहती हैं, “आमतौर पर मुख्य समस्या मैं यह सुनती हूं कि माता-पिता उन्हें उड़ने के लिए सीखने के लिए फीस देने करने के लिए कभी सहमत नहीं होंगे, इसलिए मैं उन्हें अध्ययन करने और छात्रवृत्ति के लिए आवेदन करने के लिए कहती हूं।”

 

 “मैंने पाया कि केवल आईजीआरयूए ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारें भी छात्रवृत्ति प्रदान करती हैं – शायद इनको और अधिक विज्ञापित करने की आवश्यकता है। काम के घंटे कुछ अलग हो सकते हैं, लेकिन अंत में नौकरी की संतुष्टि से बढ़ कर कुछ नहीं है। इन लड़कियों को यह जानना होगा कि उनके पास विकल्प हैं। “

 

( सलदानहा सहायक संपादक हैं और सालवे प्रोग्राम मैनेजर हैं। दोनों इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)
 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 8 मार्च, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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