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ड्रग्स का डंक, लोग हताश, क्या चुनाव से बदलेगा पंजाब ?

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पाकिस्तान बॉर्डर से लगभग 40 किलोमीटर दूर पिंडयां गांव के खेतों में 53 साल के कशमीर सिंह (सबसे बांयें) और उनके 30 साल के बेटे दलजीत। एक समय में काफी समृद्द पंजाब ने हरित क्रांति की मिसाल पेश की थी। अब यहां की हवाओं में ड्रग्स घुल चुका है। बेरोजगारी और सुस्त आर्थिक विकास से यहां गुस्सा और निराशा की झलक मिलती है।

 

कुछ ना होंदा पंजाब दा, जमीन बंजर, औलाद कंजर…

 

(पंजाब का कुछ नहीं हो सकता है, यहां की जमीन बंजर है और युवाओं के पास रोजगार नहीं है।)

 

भारत के 11 वें सबसे अमीर राज्य का यह दृश्य ‘उड़ता पंजाब’ नामक एक विवादास्पद फिल्म में लोगों ने देखा था। जैसा कि इंडियास्पेंड ने 31 जनवरी, 2017 को अपनी रिपोर्ट में बताया है। आंकड़ों की हकीकत यह है कि पंजाब अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने या अपने युवाओं को तैयार करने में विफल रहा है। राज्य का रोजगार और आर्थिक विकास राष्ट्रीय औसत से पीछे है।

 

अमृतसर के  दो ग्रामीण और सीमावर्ती जिले तरन तारन और औद्योगिक केंद्र लुधियाना की यात्रा के दौरान इंडियास्पेंड ने पाया कि पंजाब की वास्तविकता इस फिल्म और सांख्यिकीय मूल्यांकन में झलकती है। बेहतर जीवन के लिए अपने गांव छोड़ने की इच्छा रखना, राज्य में आम बात है। साथ ही लोगों में बढ़ रही ड्रग्स की लत, रोजगार की कमी, सपनों की विफलता से गुस्सा साफ झलकता है। हर कोई सिर्फ एक ही चीज चाहता है- ‘बदलाव’।

 

***

 

अमृतसर, तरन तारन, लुधियाना: सर्द मौसम की एक कोहरे भरे दिन हम हेर गांव पहुंचे। यह अमृतसर हवाई अड्डे से 4 किमी दक्षिण में बसा गांव हैष यहां से ताशकन्द, दोहा, दुबई और सिंगापुर के लिए प्रस्थान करने वाली हवाई जहाजें पंजाबियों की ऊड़ान को प्रतिबिंबित करती है। हमने देखा कि गांव के मुख्य चौराहे के पास टूटी सड़कों पर युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग बैठे बातचीत कर रहे हैं।

 

हमने उनसे पूछा  कि 4 फरवरी, 2017 को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए क्या महत्वपूर्ण मुद्दे हैं? एक सुर में उनका जवाब था – “बेरोजगारी”। 34 वर्षीय अमरिंदर सिंह विज्ञान में ग्रैजुएट हैं और दो बच्चों के पिता हैं। अमरिंदर कहते हैं, “हमें देखिए…आधा दिन गुजर चुका है और हम अब तक खाली बैठे हैं। हमारे पास करने के लिए कुछ नहीं है।”

 

शरीर से तंदरुस्त दिखने वाले अमरिंदर को ग्रैजुएशन के बाद एक निजी कंपनी में नौकरी मिली। 15,000 रुपए वेतन से असंतुष्ट अमरिंदर ने वह नौकरी छोड़ दी। कई अन्य पंजाबी युवाओं की तरह ही अमरिंदर भी सरकारी नौकरी चाहते थे। उन्होंने शारीरिक शिक्षा शिक्षक और पुलिस उप-निरीक्षक के पद के लिए आवेदन भी दिया। लेकिन सफल नहीं हुए। अमरिंदर कहते हैं, “नौकरी पाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, कभी-कभी तो 20 लाख रुपए तक की रिश्वत देनी पड़ती है। और इसके बाद भी नौकरी मिलेगी कि नहीं यह गारंटी नहीं है।”

 

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कई युवा पंजाबियों की तरह ही अमरिंदर भी सरकारी नौकरी चाहते हैं। कई नौकरियों के लिए इन्होंने आवेदन भी दिया है लेकिन अब सफल नहीं हो पाए हैं। पिछले आठ वर्षों से अमरिंदर बेरोजगार हैं।

 

अमरिंदर के परिवार के पास कृषि योग्य भूमि है, लेकिन परिवार के बढ़ने से बंटवारे के बाद सबके हिस्से की जमीन कम हुई है। अब उनके पास खेती का कोई विकल्प नहीं है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2005-06 से 2010-11 के पांच वर्षों में खेती योग्य भूमि का औसत रकबा 3.9 हेक्टेयर से कम हो कर 3.7 हेक्टर हुआ है।

 

अमरिंदर कहते हैं, “पहले ही एक भाई खेती देख रहा है, मैं वहां क्या करुंगा?” क्या उन्होंने अपना खुद का व्यापार शुरु करने पर विचार किया है? इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं, “यहां वही व्यापार शुरु कर सकता है, जिसके पास राजनीतिक ताकत है।”

 

और सरकारी नौकरी के इंतजार में अमरिंदर पिछले आठ वर्षों से बेरोजगार हैं।

 

अमरिंदर कहते हैं, “यह सिर्फ मेरी ही कहानी नहीं है। यह रह रहे अधिकतर युवाओं की यही स्थिति है। यही कारण है कि हम में से ज्यादातर शराब, तंबाकू या नशीली दवाओं के आदी हो रहे हैं। पिछले ढाई महीने में नशीली दवाओं का अधिक मात्रा में सेवन करने से हमारे गांव के तीन लोगों की जान जा चुकी हैं।”

 

सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल-भाजपा ने संयुक्त रुप से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर “बहादुर पंजाबियों को बदनाम” करने और पंजाब में ड्रग्स की समस्या को राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगाया है। हम बता दें कि राहुल गांधी ने 10 में से एक पंजाबी को नशे की लत का शिकार होने की बात कही थी।

 
जनवरी 2017 में, शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा था, “हम अपनी माटी के युवाओं को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। पंजाब की छवि को धूमिल नहीं किया जाना चाहिए…कांग्रेस ने हमें नशे की लत का शिकार कहा है और राहुल गांधी ने ऐसा कह कर पंजाबियों की छवि धूमिल की है।”

पंजाब में ड्रग्स की समस्या का डंक

 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और नशीली दवाओं के दुरुपयोग की रोकथाम करने वाली एक गैर सरकारी संगठन सोसाइटी ऑफ प्रमोशन ऑफ यूथ एंड मासेस के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए वर्ष 2015 पंजाब ओपीएड (नशा) निर्भरता सर्वेक्षण के अनुसार, पंजाब में करीब 230,000 लोग ओपीएड ओपीएड – दवाइयों  आदि हैं, जबकि 860,000 लोग ओपीएड के आदि हैं। ओपीएड अफीम के पौधों का उत्पाद होता है जैसे कि हेरोइन, मोरफाइन या सिंथेटिक दवाएं जो  अफीम की तरह शरीर को प्रभावित करता है। 3,620 ड्रग्स पर निर्भर व्यक्तियों के सर्वेक्षण में पाया गया कि ओपीएड पर निर्भर वाले 99 फीसदी पुरुष हैं, 54 फीसदी विवाहित हैं और 55 फीसदी हेरोइन के नशे की लत का शिकार हैं। इसके उपयोग से शरीर की क्रियाएं धीमी हो जाती है। इसे लेने वाले को दर्द से मुक्ति और आनंद की अनुभूति मिलती है। इसके एक ग्राम की कीमत लगभग 400 रुपए है और बाजार में यह सबसे महंगी दवाओं में से एक है।

 

हालांकि, 80 फीसदी नशे की लत के शिकार लोगों ने इससे बाहर आने की कोशिश की है, लेकिन 35 फीसदी से ज्यादा लोगों को इससे बाहर निकलने में पेशेवर मदद प्राप्त नहीं हुआ है। ओपीएड पर निर्भर लोग प्रति दिन ड्रग्स पर 1,400 रुपए खर्च करते हैं या एक अनुमान के अनुसार राज्य स्तर पर हर साल 7575 करोड़ रुपए खर्च होते हैं।

 

अमृतसर के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए समाजशास्त्र के प्रोफेसर रंविंदर सिंह संधू कहते हैं, “मादक पदार्थों की लत को लोग अब भी एक सामाजिक समस्या की बजाय व्यक्तिगत समस्या के रुप में देखते हैं।”  संधू ने वर्ष 2009 में शहरी और ग्रामीण पंजाब में नशीली दवाओं के आदि 600  लोगों पर एक समाजशास्त्रीय अध्ययन किया था। अध्ययन में पाया गया कि 73.5 फीसदी नशे की लत के शिकार लोग 16 से 35 वर्ष की आयु के बीच के हैं। जिनमें 40.6 फीसदी निरक्षर हैं। उनमें पांचवी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त 22.3 फीसदी लोग हैं। जो मादक पदार्थों की लत के शिकार थे, वे ग्रमीण इलाकों से थे। जबकि शहरी क्षेत्रों में ऐसे लोग नशे की लत के शिकार थे जिन्होंने 10वीं  या अधिक शिक्षा प्राप्त की है। इनका प्रतिशत 44.6 था। सर्वेक्षण में शरीक  चार में से एक उत्तरदाता बेरोजगार था।

 

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गुरु नानक देव विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए समाजशास्त्र के प्रोफेसर रंविंदर सिंह संधू कहते हैं कि नशे की लत को लोग अब भी एक सामाजिक समस्या की बजाय व्यक्तिगत समस्या के रुप में देखते हैं।

 

संधू कहते हैं, “मादक पदार्थों की लत का सीधा संबंध गरीबी के साथ जुड़ा हुआ है न की समृद्धि के साथ, जैसा कि आमतैर पर माना जाता है। ” संधू इसके एक मुख्य कारण के रुप में पंजाब में शिक्षा की गुणवत्ता की ओर इशारा करते हैं कि क्या पंजाब के युवा चाहते हैं और वे क्या बन रहे हैं।

 

उदाहरण के लिए, जबकि साक्षरता और सामान्य शिक्षा के बजट में वृद्धि हुई है, लेकिन प्राथमिक शिक्षा और छात्रों में स्कूलों में बनाए रखने के लिए दिए जाने वाले प्रोत्साहन में कटौती की गई है। यही कारण है कि एक साल में प्राथमिक स्कूल छोड़ने वालों की दर दोगुनी हुई है, जैसा कि हमने 31 जनवरी 2017 को विस्तार से बताया है।

 

पिछले कुछ वर्षों में कई अर्द्ध शिक्षित युवा बिना किसी तैयारी के नौकरी के लिए बाजार में आ गए। संधू कहते हैं, “सपने पूरे नहीं होने से तनाव बढ़ता है और इससे ड्रग्स के सेवन में वृद्धि होती है।

 

अंग्रेजी में पोस्ट-ग्रैजुएट एक फुटबॉल खिलाड़ी कैसे हो गया नशे की लत का शिकार

 

28 वर्षीय हरिंदर (बदला हुआ नाम) अंग्रेजी में पोस्ट-ग्रैजुएट हैं। हरिंदर को चार सालों तक नौकरी नहीं मिली। हरिंदर बताते हैं कि सबसे पहले उसने और उसके दोस्तों ने हेरोइन लेना शुरु किया लेकिन कुछ ही समय में वे लोग उससे उब गए। उन्होंने ड्रग्स लेना बंद नहीं किया और जल्द ही उन्हें एहसास हो गया कि जिंदगी में चल रही चीजों को ठीक करने के लिए उन्हें इन दवाओं की जरुरत है।

 

हरिंदर एक संपन्न परिवार से थे, इसिलए पैसे उनके लिए कभी समस्या नहीं रही। हरिंदर बताते हैं कि उन्होंने कई बार नशा छोड़ने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाए। बाद में वह खुद 250 बिस्तरों वाले स्वामी विवेकानंद गवर्नमेंट ड्रग डिएडिक्शन एवं रिहैबिलिटेशन सेंटर (पंजाब में ऐसे पांच केंद्र हैं) में भर्ती हो गए। वहां इंडियास्पेंड से बात करते हुए उन्होंने बताया कि, “अगर आप खुद इसे छोड़ने की कोशिश करते हैं को पूरे शरीर की व्यवस्था बिगड़ जाती है, पूरे शरीर में दर्द रहने लगता है।”

 

35 वर्षीय कुलजीत (बदला हुआ नाम) ग्रैजुएट हैं, फुटबॉल खिलाड़ी हैं और साथ ही हेरोइन के लत के शिकार हैं। वह कहते हैं, “जीवन बचाने का यह अब आखरी मौका है।” कुलजीत बताते हैं कि एक समय में वे अटारी में सुरक्षा अधिकारी थे और केवल कौतूहलवश उन्होंने अफीम लेना शुरु किया था। तब उन्हें इसके ‘साइड इफेक्ट’ के संबंध में जानकारी नहीं थी। जब अफीम मिलना मुश्किल हो गया तो उन्होंने हेरोइन लेना शुरु किया, जो आसानी से मिल जाता था। कुलजीत बताते हैं कि वे हेरोइन को पानी में मिला कर इंजेक्शन लेते थे। और बाद में उन्होंने अपनी नौकरी गंवा दी, अपनी पत्नी के गहने तक बेच दिए। और अब उनकी पत्नी ने कोर्ट में तलाक की अर्जी दायर की है और उनका छह वर्ष का बेटा बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहा है।

 

पिछले पांच दिनों से कुलजीत इस केंद्र में हैं और यहां उन्हें अपनी जिंदगी वापस मिलने की उम्मीद दिखी है।

 

नैतिकता और आर्थिक विफलताओं की ड्रग्स समस्या में भूमिका

 

नाम न बताने की शर्त पर एक मनोचिकित्सक, जो तरन तारन के सिविल अस्पताल में नशे की लत के शिकार लोगों का इलाज करते हैं, बताते हैं कि वे हर रोज आठ नए नशे के रोगी और करीब 30 पहले से इलाज करा रहे रोगियों के मामले देखते हैं। 80 फीसदी नशा हेरोइन से संबंधित है।

 

वह बताते हैं, “2008 में जब मैंने काम शुरु किया था जब ज्यादातर मामले फार्मसूटिकल ड्रग्स जैसे कि अफ़ीम, लोमोटिल, ट्रामेडोल के होते थे, लेकिन अब हेरोइन काफी आम हो गया है।” उनका कहना है कि अधिकांश लोग अब भी नशे की लत को नैतिक पतन के रुप में देखते हैं। वास्तव में यह जैविक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों के साथ यह एक मानसिक बीमारी है।

 

सीमावर्ती जिलों में ड्रग्स की समस्या का कारण आर्थिक विफलताएं हैं। पाकिस्तान की साथ सीमा की रक्षा करने वाले सीमा सुरक्षा बल के उप महानिरीक्षक जे एस ओबेराय कहते हैं, “यदि सीमावर्ती जिलों में बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की सुविधा की मिलेगी तो उनका ड्रग्स तस्करी की ओर झुकाव कम होगा। ” वे कहते हैं, कई ऐसे किसान, जिनके पास दो-तीन एकड़ जमीन है, सिर्फ10,000 रुपए के लिए ड्रग्स के धंधे में शामिल हो जाते हैं।

 

खेत, शहर, सपने और हकीकत के बीच फंसे पंजाब के लोग

 

यह मटर-कटाई का मौसम है और 53 वर्षीय कश्मीर सिंह अपने परिवार और 30 अन्य मजदूरों के साथ इस काम में लगे हैं। हम, जालंधर के औद्योगिक शहर से 50 किमी और पाकिस्तान की सीमा से 40 किमी दूर अमृतसर के पिंडीया गांव में हैं।

 

कश्मीर कहते हैं, “आमतौर पर हर साल हमें काम करने का पांच से कम महीनों का समय मिलता है।” अन्य महीनों में वे आसपास के गांव या शहर में मजदूरी का काम ढ़ूंढ़ते हैं। चूंकि वे सालाना 60,000 रुपए से कम कमाते हैं और उनके पास कोई भूमि भी नहीं हैं, इसलिए ये ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले “ब्लू कार्ड” के पात्र हैं। ब्लू कार्ड ग्रामीण इलाकों में उन्हें दिया जाता है, जिनके पास 2.5 एकड़ से कम जमीन हो या फिर शहरी क्षेत्रों में 100 वर्ग गज से कम जमीन हो।

 

लेकिन ब्लू कार्ड के लिए आवेदन दिए एक साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी कश्मीर सिंह को यह प्राप्त नहीं हुआ है।

 

ब्लू कार्ड धारकों को 2 रुपए प्रति किलो आटा या गेहूं और 30 रुपए किलो दाल-दलहन दिया जाता है। कश्मीर सिंह को 12 साल पुरानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) द्वारा 100 दिन रोजगार की गारंटी के संबंध में जानकारी नहीं है। वह कहते हैं, “हमारे पास इस तरह का कोई कार्ड नहीं है।”

 

कश्मीर सिंह के आसपास रहने वाले दूसरे लोगों को मनरेगा का पता था, लेकिन उनका आरोप है कि अधिकांश कार्ड ग्राम पंचायत कार्यालय के कर्मचारियों द्वारा रख लिया जाता है। सरकारी भुगतान में हेरफेरी करते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के साथ यह एक आम समस्या है, जैसा कि  इंडियास्पेंड ने फ़रवरी 2016 में विस्तार से बताया है।

 

कश्मीर सिंह का 30 वर्षीय बेटा दलजीत भी अपनी पत्नी और बेटे के साथ काम करते हैं। दलजीत और उनकी पत्नी 10वीं पास हैं। वे फैक्ट्री में काम करना पसंद करते हैं, लेकिन इलाके की आस-पास की फैक्ट्रियां कुछ साल पहले ही बंद हो चुकी हैं। दलजीत शहर जाना चाहता है, लेकिन वहां उसके पास घर नहीं है। किराया देना महंगा है और इतनी जमीन भी नहीं कि उसे बेच कर शहर में घर खरीद सके। इसलिए बिना किसी रोजगार के अवसर और बेहतर जीवन के उम्मीद के बिना वे पिंडिया में रह रहे हैं।

 

 

कश्मीर और दलजीत की तरह ही हरभजन भी दुखी हैं। पिछले दो महीनों में, 8 नवंबर 2016 को 500 और 1,000 रुपए के नोट अमान्य घोषित करने के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था अस्थायी रूप से लड़खड़ाई है। इसके बाद हरभजन सिंह को 35,000 रुपए का नुकसान हुआ है। (हमारे विशेष लेख आप यहां पढ़ सकते हैं)।

 

हरभजन कहते हैं, “मटर के दाम 10 रुपए किलो से कम हो गए हैं। इससे खाद, बीज और श्रम की लागत भी नहीं निकल पा रही है। यह अच्छा है कि हम खेती पर निर्भर नहीं हैं।”  हरभजन 18 साल तक सैनिक रहे हैं और 24 साल तक एक बैंक में एक सुरक्षा गार्ड के रूप में काम किया है और उन्हें पेंशन मिलता। हरभजन का एक बेटा सेना में हैं और एक खेतों में काम करता है।

 

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हरभजन 18 साल तक सैनिक रहे हैं और 24 साल तक एक बैंक में एक सुरक्षा गार्ड के रूप में काम किया है और उन्हें पेंशन मिलता। हरभजन के पास दो एकड़ जमीन है जिप पर वह गेहूं और मटर उगाते हैं। नोटबंदी के बाद से हरभजन को 35,000 रुपए का नुकसान हुआ है।

 

हरभजन कहते हैं, “हम कांग्रेस और (शिरोमणि) अकाली दल दोनों से थक चुके हैं। हम इस बार नई पार्टी को मौका देंगे। ” हमने हरभजन के घर के आस-पास आम आदमी पार्टी के पोस्टर देखे जो फिलहाल दिल्ली में सत्तारुढ़ पार्टी है और जिसकी पंजाब पर भी अच्छी पकड़ है।

 

उद्योग-धंधों में सुस्ती, घर छोड़ने को तैयार युवा और बादल के खिलाफ गुस्सा

 

रंजीत सिंह की कहानी परिचित सी लगती है। 37 वर्षीय रंजीत की तरन तारन के दर्डा गांव में एक दुकान है, जिसे वे छोड़ नहीं सकते । उनकी मां कैंसर से पीड़ित हैं। रंजीत कहते हैं कि उनके कई साथी बेहतर अवसर के तलाश में दूसरे राज्य जा चुके हैं।

 

गांव में स्वास्थ्य सेवा या बच्चों के लिए खेलने का मैदान नहीं है। गांव की आधे से ज्यादा आबादी अनुसूचित जाति है। इसलिए उनके पास खुद की जमीन नहीं है।

 

रंजीत कहते हैं, “यहां कारखानों और कृषि कार्य की कमी है और इसलिए हम अपनी जगह छोड़ने के लिए मजबूर हैं।”.

 

रंजीत ने हमें अपने 22 वर्षीय पड़ोसी देविंदर सिंह से मिलवाया। डिप्लोमा इन इलेक्ट्रिक इन्डस्ट्रीअल वर्क में डिप्लोमा कर चुके देविंदर स्नातक हैं ।वह अपने परिवार में सबसे अधिक शिक्षित सदस्य है लेकिन दो सालों से उन्हें नौकरी नहीं मिल पाई है। अब उन्होंने  रेलवे में लाइनमैन के लिए आवेदन भरा है। देविंदर हाल ही में गुजरात से लौटे हैं, जहां एक महीने से वे फैक्ट्री में काम कर रहे थे। देविंदर के पिता कैंसर रोगी हैं और उनकी 12 वीं पास बहन भी बेरोजगार है।

 

युवाओं में बेरोजगारी की दर 16.6 फीसदी है, जबकि भारतीय औसत 10.2 फीसदी है, जैसा कि इंजियास्पेंड ने पहले बताया है। 2015-16 में पंजाब की ग्रामीण युवाओं बेरोजगारी दर 16.5 फीसदी थी। यह ग्रामीण भारत की 9.2 फीसदी से 7 प्रतिशत अंक ज्यादा है।

 

युवा बेरोजगारी दर, 2015-16

Source: Labour Bureau; Unemployment rate for persons between 18-29 years in percentage.

 

वर्ष 2015-16 में, पंजाब के उद्योग, सेवाओं और समग्र अर्थव्यवस्था में 5.9 फीसदी की वृद्धि हुई है। लेकिन ये आंकड़े 7.6 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से नीचे है। 31 जनवरी, 2017 को जारी किए गए सरकार के ताजा अनुमान के अनुसार वर्ष 2016-17 में भारत की विकास दर 7 फीसदी से कम होने की संभावना के साथ ही पंजाब का विकास और पीछे होगा।

 

दर्डा के करीब एक औद्योगिक एस्टेट में इस आर्थिक मंदी का खुलासा हुआ जहां हमने 15 से ज्यादा बंद कारखाने देखे। गांव वालों ने बताया कि ये कारखाने सात साल पहले बंद होने शुरु हुए थे। लेकिन बंद होने के कारण से या तो वे अंजान थे या फिर वे इन कारखानों को भूल चुके थे।

 

वर्ष 2007 से 2014 के बीच कम से कम 18770 कारखाने बंद हुए हैं। इस अवधि के दौरान शिरोमणि अकाली दल सत्ता में थी, जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स ने पंजाब प्रदेश कांग्रेस समिति द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त आंकड़ों का हवाला देते हुए 3 फरवरी 2014 को बताया है। आंकड़ों के अनुसार, अमृतसर में 8053 कारखाने बंद किए गए और तरन तारन, मोगा, रुपर और मनसा जिले में एक भी नई फैक्ट्री खोली नहीं गई है।

 

हमने पाया कि लोगों में सत्तारूढ़ अकाली दल के नेता बादल के खिलाफ काफी गुस्सा भरा है। हमारे साथ चल रहे ड्राइवर गुरप्रीत कहलों ने आरोप लगाया कि, “राज्य में सबसे ज्यादा कारोबार बादल के ही चलते हैं तो या तो उन्हें मुनाफे में शेयर देना पड़ता है या फिर आपका कारोबार चल नहीं पाता। वे अपना कारोबार का विस्तार करने में इतना व्यस्त थे कि लोगों के बारे में कभी सोचा ही नहीं। ” कहलो को अब पंजाब से कोई उम्मीद नहीं है। कहलो ने कतर में तीन साल काम किया है अब वह ऑस्ट्रेलिया जाने की सोच रहे हैं, जहां उनका भाई भी गाड़ी चलाने का काम करते हैं।

 

25 मार्च, 2016 को स्क्रॉल की पड़ताल के अनुसार,शिरोमणि अकाली दल का कई  उद्योगों के साथ संबंध प्रतीत होता है। इनमें पत्थर तोड़नेकी फैक्ट्री , रेत खनन, केबल वितरण, शराब वितरण और बस परिवहन शामिल हैं। दो साल पहले, ट्रिब्यून ने भी यह बताया कि किस प्रकार परिवहन व्यवसाय, होटल और मीडिया के कारोबार में बादलों की बड़ी हिस्सेदारी है।

 

हेर गांव में सत्तारुढ़ पार्टी के दावों के बावजूद सड़कों की हालत खराब

 

हमने हेर गांव के सरपंच बलविंदर से मुलाकात की। गांव में 2,500 वयस्क हैं और सरकार द्वारा 350 ‘ब्लू कार्ड’ जारी किए गए हैं । 300 लोगों को सरकारी पेंशन मिलता है।

 

बलविंदर ने दावा किया, “केवल एक को छोड़ कहमने सारी सड़के पक्के की बना दी हैं । अभी चुनाव के कारण काम रूका हुआ है, नहीं तो वह एक सड़क भी पूरी हो गई होती । ” लेकिन जब हम मुख्य सड़क तक पहुंचे तो टूटी सड़कों की तरह ही बलविंदर के दावे भी खोखले नजर आए।

 

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अपने बंगले के सामने खड़े हेर गांव के पूर्व सरपंच, बलविंदर सिंह। ड्रग समस्या के संबंध में पूछने पर बलविंदर कहते हैं जब माता-पिता अपने बच्चों पर नियंत्रण नहीं रख सकते हैं तो सरकार से ये उम्मीद कैसे की जा सकती है।

 

बलजीत कौर के पति पिछले 40 वर्षों से दुबई में काम करते हैं। बलजीत का बेटा स्नातक है और सेना के कैंटिन में सेवक का काम करता है। बलजीत बताती हैं कि, “पिछले 20 वर्षों से सड़कें नहीं बनी हैं। गांव की सकड़ों पर लाइटें भी नहीं हैं। हम रात को वहां नहीं जा सकते हैं, क्योंकि रात को अक्सर उधर नशे में धुत लोग अड्डा जमाए बैठे रहते हैं।”

 

हमने बलविंदर से ड्रग समस्या के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा कि, “जब माता-पिता अपने बच्चों पर नियंत्रण नहीं रख सकते हैं तो सरकार से ये उम्मीद कैसे की जा सकती है।”

 

कुछ दूर आगे हमने एक चाय की दुकान के मालिक नरिंदर सिंह से मुलाकात की।  36 वर्षीय नरिंदर ब्लू कार्ड धारक हैं। इस कार्ड के माध्यम से उन्हें गेहूं तो मिलता है, लेकिन कभी दाल नहीं मिल पाई।

 

जबकि सरपंच बलविंदर सिंह का दावा था कि सभी ब्लू कार्ड धारकों को समय पर राशन मिलता है।

 

नरेंद्र बताते हैं कि उन्होंने एक सरकारी सब्सिडी आवास कार्यक्रम ‘इंदिरा आवास योजना’ के तहत घर के निर्माण के लिए आवेदन दिया था। लेकिन उन्हें कोई राशि नहीं मिली है।

 

हेर में अनुसूचित जाति के ब्लॉक में 36 वर्षीय लखविंदर सिंह ने हमें कचरा गिराने का यार्ड और सीवेज लाइन दिखाया, जिसकी हालत बारिश में खस्ता हो जाती है। इससे आने वाली बदबू से वे और उनका परिवार परेशान है। उन्हें पता ही नहीं कि इसकी शिकायत कहां करनी है।

 

सिंह कहते हैं,“शौचालय के निर्माण के लिए पैसे के लिए आवेदन किया है, लेकिन हमें अभी तक पैसे नहीं मिले हैं ।हम बाहर शौच जाते हैं। हमें विश्वास ही नहीं कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने वादे को पूरा करेगी या इससे हमारे जीवन पर फर्क पड़ेगा।”

 

हमारी पंजाब यात्रा से जुड़े ट्वीट आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी है।)

 

यह लेख मूलत:अंग्रेजी में 3 फरवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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