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ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी से प्रभावित वैशाली शाह ने जान बचाने के लिए नई दवा के लिए पीएमओ में दायर की याचिका। दवा की प्रतीक्षा में अन्य की गई जान

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मुंबई/नई दिल्ली: चेहरे पर मास्क और वजन में महज 32 किलो! अक्टूबर 2018 में डोंबिवली के उसके एक बेडरूम वाले अपार्टमेंट में जब इंडियास्पेंड ने उनसे मुलाकात की तो 39 वर्षीय वैशाली शाह एक वयस्क से ज्यादा दुबली-पतली किशोरी दिखाई  दे रही थी। डोंबिवली महाराष्ट्र के ठाणे जिला में है और मध्य मुंबई से 40 किमी की दूरी पर है।

 

एक ट्यूशन शिक्षक और 14 वर्ष बच्चे की मां, शाह गंभीर रूप से ड्रग-रेसिस्टेट टीबी (एक्सडीआर-टीबी) रोगी हैं। एक्सडीआर-टीबी मल्टी- ड्रग रेसिस्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) का एक उन्नत रूप है। जैसा कि नाम से पता चलता है, एमडीआर-टीबी के मरीज़ राइफ़ैम्पिसिन और आइसोनियाज़िड जैसी पहली पंक्ति की दवाओं के प्रतिरोधी हैं, जिनका उपयोग अधिक सामान्य दवा-संवेदनशील टीबी के इलाज के लिए किया जाता है। एक्सडीआर-टीबी के रोगी कुछ दूसरी पंक्ति की दवाओं के भी प्रतिरोधी हैं।

 

हालांकि मुम्बई में टीबी असामान्य नहीं है, लेकिन शाह का मामला अनोखा है, क्योंकि वह भारत में कुछ ड्रग-रेसिसटेंट टीबी रोगियों में से हैं, जो एक्सडीआर-टीबी से लड़ने के लिए, ड्रग इमिपेनेम के साथ दो नई खानेवाली दवाओं (बेडक्वीलाइन और डेलमनीड) ले सकती हैं।

 

शाह को एक सरकारी कार्यक्रम से बेडक्वीलाइन मिला। अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सहायता संगठन मेडेसिन्स सैन्स फ्रंटिअर्स (एमएसएफ)  द्वारा डेलमनीड और इमिपेनेम का दान किया गया। हालांकि, उसे निदान के लिए काफी इंतजार करना पड़ा। प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ पत्र व्यवहार किया गया। इस लंबी प्रक्रिया के दौरान, शाह मौत से बाल-बाल बचीं।

 

यदि भारत अगस्त 2018 में जारी किए गए और 21 दिसंबर, 2018 को दोहराए गए नए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशानिर्देशों का पालन करता है तो अन्य दवा प्रतिरोधी टीबी रोगियों को भी इसी तरह से संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। दवाइयों के प्रतिरोधी टीबी रोगियों के लिए दिशानिर्देश में बेडक्वीलाइन और अन्य नई मौखिक दवाओं की सलाह दी गई है, जबकि गंभीर दुष्प्रभावों के चलते इन दवाओं का उपयोग कम होता है।

 

2018 के अंत में दो महीने में, मरीजों,वकालत समूहों, सरकारी अधिकारियों और छाती चिकित्सकों के साथ साक्षात्कार के माध्यम से इंडियास्पेंड ने उन चुनौतियों की जांच की, जो वैशाली शाह जैसे भारतीय रोगियों को टीबी की नई दवाओं – विशेष रूप से बेडक्वीलाइन – का उपयोग करने की कोशिश में मिलती हैं। हमने पाया कि 2017 के बाद से बेडक्वीलाइन  प्राप्त करने वाले रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है। वर्तमान में केवल 2.2  फीसदी पात्र रोगी ही दवा प्राप्त कर रहे हैं। मार्च 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा यह दोहराए जाने पर भी कि 2025 तक भारत का लक्ष्य  टीबी को करना है, यह स्थिति कायम है।

 

इंडियास्पेंड ने दक्षिण अफ्रीका का दौरा भी किया, जिसने अपने ड्रग-प्रतिरोधी टीबी रोगियों के लिए बेडक्वीलाइन पहुंच में सुधार किया है। इस श्रृंखला के दूसरे भाग में, हम भारत के साथ दक्षिण अफ्रीकी सरकार की नीतियों पर भी चर्चा करेंगे।

 

वैश्विक टीबी बोझ


 
टीबी और ड्रगरेसिसटेंट टीबी मामलों में भारत की हिस्सेदारी दुनिया में ज्यादा

 

यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटनस ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट, 2017 के अनुसार वैश्विक स्तर पर टीबी के कारण हुई कुल मौतों में से 1990 में 3.4 फीसदी और 2017 में 2.12 फीसदी भारत में हुई है।

 

डब्लूएचओ की ‘ग्लोबल ट्युबर्क्यलोसिस रिपोर्ट’ (डीटीआर)- 2018 के अनुसार, इस बीमारी ने 1 करोड़ लोगों को प्रभावित किया है ( जिनमें से 558,000 को ड्रग रेसिसटेंट टीबी था ) और इससे 2017 में वैश्विक स्तर पर 16 लाख लोगों की मौत हुई है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में टीबी रोगियों में सबसे अधिक हिस्सेदारी भारत की है, लगभग 27 फीसदी । स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के (एमओएचएफडब्लू) नेशनल एंटी-ट्यूबरकुलोसिस ड्रग रेजिस्टेंस सर्वे- 2016 के अनुसार अनुमानित 27.9 लाख नए टीबी रोगी हर साल जुड़ जाते हैं।

 

सर्वेक्षण के अनुसार, ड्रग रेसिसटेंट टीबी के मामलों में भी भारत की सबसे अधिक (24 फीसदी) हिस्सेदारी है, लगभग 135,000 , जिनमें 124,200 (92 फीसदी) में एमडीआर-टीबी है।

 

एमडीआर-टीबी रोगियों में, 31,547 (25.4 फीसदी) प्री-एक्सडीआर और 1,615 (1.3 फीसदी) एक्सडीआर-टीबी रोगी हैं। केवल 39,009 या 28 फीसदी दवा प्रतिरोधी टीबी के मामलों का निदान किया गया था और 2017 में भारत में केवल 35,950 या 26 फीसदी का इलाज किया गया था।

 

ड्रग रेसिसटेंस टीबी के मामले और चेतावनी- 2017


 

टाइप अनुसार भारत में ड्रग रेसिसटेंट टीबी मामले, 2017


 

अपने इलाज की कहानी को बयान करते हुए, वैशाली शाह अफसोस करती है, कि उसे एक्सडीआर-टीबी पहले ही पता चल गया था, उसके फेफड़े खराब नहीं हुए होते। जिस तरह से सरकारी अस्पतालों ने उसका इलाज किया है,इसपर वह गुस्सा है। अब वह एक स्वस्थ जीवन जी पाने की उम्मीदलकर रही हैं।

 

शाह का टीबी के साथ यह दूसरा मुकाबला है। वह नहीं जानती कि वह दो बार कैसे संक्रमित हुई। लेकिन टीबी बेसिली विशेष भू-भाग वाले मुंबई में अच्छी तरह से पनपती है, जहां आधी आबादी झुग्गियों में रहती है, जिसमें अपर्याप्त स्वच्छता, उच्च प्रदूषण, असमानता और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए असंगत पहुंच है।

 

वैशाली जैसे कई लोग मध्य मुंबई के भीड़-भाड़ वाले, दूर के उपनगरों में रहते हैं और भीड़-भाड़ वाली उपनगरीय ट्रेनों में सफर करते हैं। मुंबई में जीटीआर-2018 के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर पहले से टीबी के इलाज चल रहे 12 फीसदी रोगियों में बाद में ड्रग रेसिसटेंस टीबी का पता चला था, लेकिन मुंबई में कम से कम 11-67 फीसदी हैं, जैसा कि  2012 के इस पेपर से पता चलता है।

 

एमडीआर-टीबी के रोगियों को चार समूहों में विभाजित दवाओं के संयोजन के साथ इलाज किया जाता है – फ्लोरोक्विनोलोन, दूसरी पंक्ति की दवाएं, दूसरी पंक्ति की इंजेक्टेबल दवाएं और एड-ऑन ड्रग्स। प्री-एक्सडीआर-टीबी के मरीज़ फ़्लोरोक्विनोलोन और दूसरी-पंक्ति इंजेक्शन वाली दवाओं के प्रतिरोधी हैं। शाह जैसे एक्सडीआर-टीबी रोगी एक या अधिक समूहों के प्रतिरोधी हैं। इन दवाओं को हल्के से गंभीर दुष्प्रभावों के लिए जाना जाता है, जिसमें मनोरोग संबंधी विकार और अंगों में सुन्नता शामिल है, जबकि इंजेक्शन वाली दवाओं से सुनवाई हानि, गुर्दे और यकृत की हानि हो सकती है।

 

पारंपरिक टीबी के लिए छह महीने की तुलना में ड्रग रेसिसटेंट टीबी के लिए उपचार दो साल तक चलता है। रोगियों में मृत्यु दर एमडीआर-टीबी में 40 फीसदी और एक्सडीआर-टीबी के लिए 60 फीसदी है।

 

टीबी दवा बेडक्वीलाइन की स्वीकार्यता और पहुंच में देरी का एक कारण शक

 

2012 में मल्टीनेशनल फार्मास्युटिकल कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन की सहायक कंपनी, जानसेन फर्मासुटिका को संयुक्त राज्य अमेरिका के नए ड्रग बेडक्वीलाइन के लिए ‘सिर्तुरो’ ब्रांड के नाम से संयुक्त राज्य के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से स्वीकृति प्राप्त हुई।

 

चूंकि, पिछले 40 वर्षों में बेडक्वीलाइन टीबी के लिए विकसित की गई पहली नई दवा थी और एक असमान आवश्यकता को संबोधित करते हुए, इसे तीन अनिवार्य नैदानिक ​​परीक्षण चरणों के तीसरे से पहले त्वरित स्वीकृति प्राप्त हुई। नैदानिक ​​परीक्षणों के दौरान एक प्लेसबो प्राप्त करने वाले समूह की तुलना में दवा प्राप्त करने वाले रोगियों के समूह में अधिक मौतें पाए जाने के बाद एफडीए ने जैनसेन को दवा के साथ-साथ मृत्यु और अनियमित दिल की धड़कन के बढ़ते जोखिम की चेतावनी देने के लिए कहा।

 

जानसेन फर्मासुटिका ने 2012 में लगभग 40 वर्षों में टीबी के लिए विकसित की जाने वाली पहली नई दवा बेडक्वीलाइन – ब्रांड नाम सिर्तुरो के तहत लॉन्च की।

 

तीसरे चरण के नैदानिक ​​परीक्षण की अनुपस्थिति में, डॉक्टरों को बेडाकॉलाइन की प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में संदेह था। हालांकि, बेडक्वीलाइन से पहले दवा प्रतिरोधी टीबी का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अधिकांश दवाओं का कभी भी इस बीमारी के लिए परीक्षण नहीं किया गया था और इसके गंभीर दुष्प्रभाव ज्ञात थे।

 

2013 में, डब्ल्यूएचओ ने एमडीआर-टीबी रोगियों के लिए बेडक्वीलाइन के उपयोग को मंजूरी दी। 2018 तक, डब्ल्यूएचओ ने दवा को प्री-एक्सडीआर और एक्सडीआर-टीबी के लिए निर्धारित करने की भी सिफारिश की, जब कोई अन्य आहार प्रभावी नहीं पाया गया। इस प्रकार, अधिकांश सरकारी और निजी क्षेत्र के डॉक्टर दवा की प्रभावकारिता के बारे में उलझन में रहे।

 

हालांकि, कुछ वर्षों के भीतर, कम मृत्यु दर के साथ बेडक्वीलाइन एक प्रभावी दवा साबित हुई। जुलाई 2018 में, राष्ट्रीय क्षय रोग कार्यक्रम के निदेशक सहित दक्षिण अफ्रीकी शोधकर्ताओं के एक समूह ने द लैंसेट रेस्पिरेटरी मेडिसिन जर्नल में 19,000 रोगियों का पूर्वव्यापी अध्ययन प्रकाशित किया, जिसमें मानक एमडीआर-टीबी देखभाल लोगों की मृत्यु दर ( 25 फीसदी ) की तुलना में बेडक्वीलाइन (13 फीसदी) प्राप्त करने वाले रोगियों की मृत्यु दर में कमी देखी गई। एक्सडीआर-टीबी के लिए, मृत्यु दर लगभग एक तिहाई थी – बेडक्वीलाइन समूह के रोगियों में 15 फीसदी और मानक आहार समूह में 40 फीसदी।

 

जीटीआर 2018 के अनुसार, जून 2018 में, दक्षिण अफ्रीका, जिसमें सभी ड्रग रेसिसटेंट टीबी रोगियों का 2.5 फीसदी (14,000) है, विषाक्त इंजेक्शन वाली दवाओं की जगह एमडीआर-टीबी और एक्सडीआर-टीबी के लिए अपने उपचार के लिए, बेडक्वीलाइन को हिस्सा बनाने वाला पहला देश बन गया। इस संबंध में अगस्त 2018 में इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

दक्षिण अफ्रीका के पोर्ट एलिजाबेथ में नेल्सन मंडेला यूनवर्सिटी टुबर्क्यलोसिस रिसर्च यूनिट में  नैदानिक ​​अनुसंधान विशेषज्ञ, पीएचडी फ्रांसेस्का कॉनराडी ने कहा, “बेडक्वीलाइन सबसे अच्छी दवा है जो हमारे पास दवा प्रतिरोधी टीबी के लिए है, और यह साक्ष्य पर आधारित है। इसने हमें रोगियों को शीघ्र स्वास्थ्य के लिए सक्षम किया है। ” कॉनराडी ने कहा कि न केवल एक्सडीआर टीबी रोगियों के लिए, बल्कि सभी दवा प्रतिरोधी टीबी रोगियों के लिए बेडक्वीलाइन का इस्तेमाल करने का मतलब है कि अधिक से अधिक मरीज ठीक हो जाएं और जीवित रहें, बजाय इसके कि यह बीमार रोगियों को इस कदर सीमित कर दे कि उन्हें अपनी जान बचाने के लिए बहुत देर हो जाए।

 

डब्ल्यूएचओ ने 2018 में दवा प्रतिरोधी टीबी के लिए बेडक्वीलाइन को फ्रंटलाइन दवा के रूप में अनुमोदित किया, लेकिन यह अभी भी भारत के रोगियों की पहुंच मे नहीं

 

अगस्त 2018 में, दक्षिण अफ्रीका के अनुभव सहित दुनिया भर में आयोजित सुरक्षा और प्रभावकारिता परीक्षणों के आधार पर, डब्ल्यूएचओ ने सभी ड्रग रेसिसटेंट टीबी रोगियों के लिए फ्रंटलाइन दवा के रूप में पूर्व-अंतिम सिफारिशों में बेडक्वीलाइन को मंजूरी दी। यह इंजेक्शन करने योग्य दवाओं केनामाइसिन और कैप्रोमाइसिन को हटाने की भी सिफारिश करता है जो उपचार विफलता पुनरावर्तन और साइड-इफेक्ट्स की उच्च दर दिखाते हैं।

 

इसने सभी दवा प्रतिरोधी टीबी रोगी को ( भारत में अनुमानित 135,000 सहित ) बेडक्वीलाइन प्राप्त करने के लिए पात्र बनाया।

 

डब्ल्यूएचओ ने 21 दिसंबर, 2018 को इन दिशानिर्देशों को अंतिम रूप दिया। हालांकि, अभी तक, भारत अपने ड्रग-प्रतिरोधी टीबी रोगियों में से केवल 33,161 को ही एक्स-एक्सडीआर और एक्सडीआर-टीबी रोगियों पर इसकी पहुंच प्रतिबंधित करता है।

 

इस प्रकार, डब्ल्यूएचओ के मानदंडों के तहत केवल 26.7 फीसदी मरीज ही बेडक्वीलाइन के लिए पात्र हैं, जो भारत के मानदंडों के तहत भी पात्र हैं।

 

वर्ष 2013 से 2016 तक, भारतीय रोगी केवल निजी क्षेत्र के डॉक्टरों के माध्यम से, जेनसेन के ‘कंपैसेटन यूज’  कार्यक्रम के तहत बेडक्वीलाइन का उपयोग कर सकते थे। इस कार्यक्रम के माध्यम से दवा प्राप्त करना थकाऊ काम है। एक ऑनलाइन आवेदन के साथ यह शुरु होता है, फिर एक जेनसेन बोर्ड द्वारा समीक्षा, प्रत्येक व्यक्तिगत मामले में आयात परमिट के लिए आवेदन, वितरण से पहले प्रेषण, शिपिंग और कस्टम क्लीयेरेंस जैसे काम शामिल हैं।

 

मुंबई में पीडी हिंदुजा अस्पताल में चेस्ट फिजिशियन और ड्रग रेसिसटेंट टीबी के लिए भारत के अग्रणी विशेषज्ञ जरीर एफ उदवाडिया ने ईमेल पर इंडियास्पेंड को बताया, “दवा प्राप्त करना एक कठिन परीक्षा की तरह है। कंपनी से पहली बार आवेदन करने के बाद हमें दवा प्राप्त करने में औसतन 51 दिन लगते हैं। ” उदवाडिया ने पहली बार 2012 में ‘टोटली ड्रग रिसिसटेंट टीबी ( टीडीआर-टीबी )’ के बारे में बात की थी, जब उन्होंने अपने रोगियों के बारे में बताया था, जो सभी पहली और दूसरी पंक्ति की टीबी दवाओं के प्रतिरोधी थे।

 

डीटीआर 2018 के अनुसार,  2015 में, भारत में एक्सडीआर-टीबी उपचार के लिए भारत की सफलता दर सिर्फ 28 फीसदी थी, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़े 34 फीसदी थे।

 

फिर, 2016 में,एमओएचएफडब्लू ने पांच राज्यों – असम, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में छह केंद्रों पर, राज्य सरकारों द्वारा कार्यान्वित एक कंडिश्नल एक्सेस प्रोग्राम (सीएपी) के माध्यम से बेडक्वीलाइन उपलब्ध कराया गया।

 

सीएपी की बेडक्वीलाइन की आपूर्ति यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट्स (यूएसएआईडी) दान कार्यक्रम से होती है, जिसने मार्च 2019 तक वितरित किए जाने वाले कुल 10,000 कोर्स में से मार्च 2018 तक 6,750 कोर्स वितरित किए हैं ।

 

सीएपी ने रोगी के नामांकन की धीमी गति देखी है। 2016 में, प्रोग्राम के पहले वर्ष में, केवल 223 रोगियों ने दवा प्राप्त की, जिनमें से 23 फीसदी दिल्ली में थे। एमओएचएफडब्लू के सेंट्रल ट्यूबरकुलोसिस डिवीजन (सीटीडी) से इंडियास्पेंड को सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, मार्च 2016 और अगस्त 2017 के बीच सिर्फ 654 रोगियों ने सीएपी के तहत बेडक्वीलाइन प्राप्त किया था।

 

सीटीडी के अधिकारियों ने इंडियास्पेंड को बताया कि जनवरी से नवंबर 2018 के बीच लगभग 1,964 मरीजों को बेडक्वीलाइन या डेलमनीड सहित नई दवाओं से युक्त आहार शुरू किया गया था।

 

नवंबर 2018 के अंत तक सीएपी के माध्यम से बेडक्वीलाइन प्राप्त करने वाले रोगियों का सबसे हालिया अनुमान लगभग 3,000 है, सभी एक्स-एक्सडीआर और एक्सडीआर-टीबी रोगियों का सिर्फ 9 फीसदी।

 

2016 से अगस्त 2017 के बीच सीएपी के तहत बेडक्वीलाइन प्राप्त करने वाले रोगी


 
रोगियों मे बेडक्वीलाइन प्रतिरोध विकसित होने की चिंता की वजह से सरकार दवा तक पहुंच को कड़ाई से नियंत्रित करती है

 

सीएपी में धीमे नामांकन में बेडक्वीलाइन के दुष्प्रभावों का डर एक कारक रहा है। इसकी पात्रता के लिए एक और मानदंड है, जिसमें रोगियों को दवा प्रदान करने वाले क्षेत्र का निवासी होना चाहिए। यह तब बदल गया जब पटना, बिहार की एक 18 वर्षीय लड़की ने दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल के खिलाफ जनवरी 2017 में एक अदालत का मुकदमा जीता, जिसने उसे शहर की निवासी न होने के कारण बेडक्वीलाइन तक उसकी पहुंच से वंचित कर दिया था।

 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि निवासी न होने की वजह से बेडक्वीलाइन देने से इंकार नहीं किया जा सकता है। तक पहुंच से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता है, और आदेश दिया कि 18 वर्षीय लड़की को मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में एक बेडक्वीलाइन कोर्स दिया जाए।

 

बाद में, उसके स्वास्थ्य में सुधार हुआ। हालांकि, नवंबर 2018 को अस्पताल पहुंचने के बाद सांस फूलने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उदवाडिया ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को दिसंबर 2018 में बताया कि उपचार में देरी ने उसके फेफड़ों को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया था, और “उसका अंत दुखद हुआ”।

 

मामले पर बहस करते हुए, एमओएचएफडब्लू ने दावा किया था कि बेडक्वीलाइन प्रतिरोध विकसित न हो जाए, इसके लिए कड़ा नियंत्रण आवश्यक था।

 

ड्रग के उपयोग की अनुमति देने में भारत की अनिच्छा की व्यापक रूप से आलोचना हुई है।

 

“लोगों तक इस दवा (बेडक्वीलाइन – जो इलाज की संभावना को दोगुना कर देता है) की पहुंच को रोककर – वे एमडीआर-टीबी को पूरे देश में अनियंत्रित रूप से फैलने की अनुमति दे रहे हैं। और यह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भी प्रभावित करता है। क्योंकि एमडीआर-टीबी एक हवाई बीमारी है, जो देश की सीमाओं का सम्मान नहीं करती है,” जैसा कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ग्लोबल, हेल्थ एंड सोशल मेडीसिन की व्याख्याता जेनिफर फुरिन ने जनवरी 2017 को ‘द हिंदू’ के साथ एक साक्षात्कार में बताया है।

 

हालांकि, भारत में कई डॉक्टर अभी भी इसके बारे में आश्वस्त नहीं हैं। “यह स्वीकार्यता की एक प्रक्रिया है। पेशेवर समुदाय और रोगियों को बेडक्वीलाइन स्वीकार करना पड़ता है, अगर वे इसे लिखते हैं, ”जैसा कि, दिल्ली में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरकुलोसिस एंड रेस्पिरेटरी डिजीज के निदेशक रोहित सरीन कहते हैं। दिल्ली  बेडक्वीलाइन के लिए पहले छह सीएपी साइटों में से एक है।

 

सीटीडी के डिप्टी डायरेक्टर जनरल, के एस सचदेवा कहते हैं, डॉक्टरों इसलिए दवा न लिखते हैं किभारत की धीमी गति का कारण है। सचदेवा ने इंडियास्पेंड को बताया, “हम वर्कशॉप आयोजित कर रहे हैं, जिससे डॉक्टरों को दवाओं के इस्तेमाल पर भरोसा हो ।”

 

नौकरशाही में देरी बेडक्वीलाइन का इंतजार करने वाले रोगियों के इंतजार को और लंबा कर देता है

 

इस दवा के बारे में जारी संदेह और सख्त सरकारी नियंत्रण से बेडक्वीलाइन के लिए लंबे इंतजार का सामना करना पड़ रहा है, जिससे मरीज और बीमार हो जा सकते हैं।

 

वैशाली शाह का अक्टूबर 2015 में एमडीआर-टीबी के लिए इलाज शुरू किया गया और उसका इलाज अक्टूबर 2017 तक पूरा हो जाना चाहिए था। हालांकि, जून 2017 में, उन्होंने महसूस किया कि वह ठीक महसूस नहीं कर रही है। बुखार और कमजोरी लौट आई थी। उसने एक छाती का एक्स-रे और बल्गम की कल्चर जांच कराई। टीबी के निदान में सटीक होते हुए, बाद वाले परीक्षण में परिणामों के लिए चार सप्ताह तक का समय लगता है।

 

वैशाली शाह के पति, समीर शाह, जो एक कृषि बाजार में खजांची के रूप में काम करते हैं, कहते हैं, ”  उन्होंने एक्स-रे में देखा कि टीबी फेफड़ों में वापस आ गया था, लेकिन वे कुछ भी नहीं कर सके।”

 

प्रयोगशाला और सरकारी अस्पतालों के बीच संचार की कमी के कारण परिणाम में देरी हुई: उसकी कल्चर रिपोर्ट सामान्य 25 दिन के बजाय 50 दिनों के बाद वापस आ गई। रिपोर्ट से पता चला कि वैशाली को फिर से टीबी हुआ है। लेकिन इस बार, यह एक्सडीआर-टीबी था। उसका एक्सडीआर-टीबी उपचार पर शुरू किया गया था, लेकिन आगे के परीक्षणों से पता चला कि वह सबसे उन्नत टीबी दवाओं में से चार के लिए प्रतिरोधी था।

 

रिपोर्ट्स के आते ही, वैशाली की हालत बिगड़ गई। उसे ऑक्सीजन सहायता की आवश्यकता थी और एक सप्ताह के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उसने हिंदुजा अस्पताल में उडवाडिया से दूसरी राय मांगी। वैशाली ने कहा, “उन्होंने मुझे बताया कि मेरे फेफड़े पूरी तरह से खराब हो गए थे और मुझे बेडक्वीलाइन की जरूरत थी।”

 

शाह को दवा प्राप्त करने के लिए पात्र माना गया था और वे सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधा, मुंबई के सेवरी में ग्रुप ऑफ ट्यूबरकुलोसिस (जीटीबी) अस्पताल और और किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) अस्पताल के टीबी आउट-रोगी विभाग की साइट गई। केईएम पहले छह साइटों में से एक था, जहां बेडक्वीलाइन को सीएपी के तहत उपलब्ध कराया गया था।

 

उस समय, डॉक्टरों की एक समिति द्वारा पात्रता के लिए बेडक्वीलाइन की आवश्यकता वाले रोगियों को वीटो किया गया था। समीर ने कहा कि केईएम अस्पताल में चेस्ट मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर विजय खत्री ने वैशाली से पूछा कि उसे बेडक्वीलाइन की आवश्यकता क्यों है, जब उसके लिए कुछ दवाएं काम कर रही हैं। “ उसने उसे एक धार्मिक पुस्तक दी और उसे मृत्यु की तैयारी के लिए कहा। उन्होंने कहा कि भगवान का नाम लें और बेहतर इच्छाशक्ति तैयार करें”, समीर बताते हैं।

 

उसी रात वैशाली का शरीर अकड़ गया। समीर कहते हैं, ” उसके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ था लेकिन यह सुनने के बाद कि वह मरने वाली है, वह हताश हुई हुई होगी।”

 

इंडियास्पेंड ने खत्री से बात की, जिन्होंने आरोप लगाया कि समीर असंवेदनशील व्यक्ति थे। खत्री ने कहा, “परिवार को गलतफहमी हो गई होगी,” उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा कोई मामला याद नहीं है, लेकिन मरीजों के लिए वे ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, “केवल उन रोगियों को जो सीएपी के तहत निर्धारित मानदंडों को पूरा करते हैं, उन्हें बेडक्वीलाइन दिया जा सकता है।”

 

परिवार का कहना है कि खत्री ने कहा कि  वैशाली वैसे भी मरने वाली है, तो वे नई दवा की कोशिश करना चाहते थे। उनके भाई विशाल शाह, जो अपनी रिपोर्ट में देरी होने के बाद अक्टूबर 2017 से प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिख रहे थे, केंद्रीय और राज्य के टीबी प्रभागों को ढेर सारे ईमेल लिखे और उन मुद्दों को उजागर किया, जिसका उन्होंने बेडक्वीलाइन प्राप्त करने में सामना किया।

 

इंडियास्पेंड उनमें से चार ईमेल तक पहुंचा

 

वैशाली शाह ने जिन मुद्दों का सामना किया उनमें से एक यह था कि मुंबई से बाहर के मरीजों को डीपीएस -4 नामक जीटीबी अस्पताल में एक डिवीजन के तहत रखा गया था, जहां उस समय उनके लिए कोई सहायक कर्मचारी नहीं रखा गया था। इसलिए, उसे भर्ती होने के लिए इंतजार करना पड़ा। विशाल ने कहा कि ऐसी अफवाहें थीं कि बेडक्वीलाइन के मरीजों की अचानक मौत हो सकती है और इसलिए उन पर नजर रखने की जरूरत है, इसलिए कोई भी सहायक स्टाफ सदस्य इन मरीजों के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं था।

 

मुंबई के सेवरी में ग्रुप ऑफ ट्यूबरकुलोसिस हॉस्पिटल की कंसल्टेंट डॉक्टर अल्पा दलाल के साथ 39 वर्षीय (बाएं) वैशाली शाह। शाह  डीपीएस -4 से बेडक्वीलाइन प्राप्त करने वाली पहली एक्सडीआर-टीबी रोगी हैं।

 

वैशाली के परामर्श चिकित्सक और डीपीएस -4 के प्रभारी जीटीबी अस्पताल के एक परामर्शदाता चेस्ट एक्सपर्ट अल्पा दलाल ने इंडियास्पेंड को बताया, “उन्हें कार्डिएक अतालता और ऐंठन थी और निजी क्षेत्र में भर्ती होना पड़ा। हां, स्टाफ भी एक समस्या थी, प्रशिक्षण नहीं किया गया था। और उसे कई समस्याएं थीं। व्यापक बीमारी, उसका प्रतिरोध पैटर्न बहुत खराब था और वह केवल दो या तीन दवाओं के प्रति संवेदनशील थी, इसलिए हमें उसके मामले को सुलझाने में अधिक समय लगा। “

 

अस्पताल प्रशासन के साथ गहन अनुवर्ती कार्रवाई के बाद, वैशाली को भर्ती कराया गया और एक महीने बाद, मार्च 2018 को डीपीएस-4 में बेडक्वीलाइन प्राप्त करने वाली पहली रोगी बन गई।

 

विशाल ने कहा, “हमें बताया गया था कि मेरी बहन के मामले ने अन्य रोगियों को अधिक आसानी से बेडक्वीलाइन प्राप्त करने में मदद की है।”

 

बेडक्वीलाइन मिलने के बाद, वैशाली को बताया गया कि उसे भी डेलमनीड की जरूरत है, और उस दवा को प्राप्त करने में समान चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

 

जापानी दवा कंपनी ओत्सुका द्वारा बनाए गए डेलमनीड को 2017 में भारत द्वारा अनुमोदित किया गया था, लेकिन देश भर के 21 केंद्रों में सीएपी के माध्यम से केवल 400 कोर्स प्रदान किए गए थे। हालांकि, मुंबई केंद्रों में से एक नहीं है। अंततः वैशाली को एमएसएफ से दान के जरिए एड-ऑन ड्रग इमीपनीम के साथ ही डेलमनिड प्राप्त हुआ।

 

छह महीने के बेडक्वीलाइन कोर्स के पूरा होने के बाद, दलाल ने महसूस किया कि वैशाली को कोर्स के विस्तार की आवश्यकता थी, लेकिन यह सीएपी दिशानिर्देशों का हिस्सा नहीं था। फिर से, विशाल को सीटीडी  से संपर्क करना पड़ा, जिसने उसे बताया कि इस प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत किया गया है और जीटीबी अस्पताल उसे विस्तारित खुराक देने में सक्षम होगा।

 

नौकरशाही में देरी के कारण सरकारी अस्पताल में मृत्यु हो सकती है, जबकि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र में उपचार के लिए बेडाकॉलिन को प्रतिबंधित करती है।

 

जबकि वैशाली शाह को सही समय पर बेडक्वीलाइन तक पहुंचने का सौभाग्य प्राप्त था, 23 वर्षीय एक्सडीआर-टीबी रोगी स्वेता सिंह इतनी भाग्यशाली नहीं थीं। अगस्त 2018 में बेंगलुरु के सरकारी-केसी जनरल अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई, यहां तक ​​कि बेडक्वीलाइन दवा को कोर्स, जो उसके लिए था, अस्पताल में खोला तक नहीं गया था।

 

दो बहनें स्वेता, 23 (बाएं) और स्वाति सिंह, 26 (दाएं)। बेंगलुरु के सरकारी- केसी जनरल अस्पताल में नौकरशाही की देरी के बाद एक्सडीआर-टीबी रोगी, स्वेता की मृत्यु हो गई, जबकि जीवन-रक्षक नई टीबी दवा बेडक्वीलाइन को खोला तक नहीं गया।

 

स्वेता का इलाज पहली बार 2012 में पारंपरिक, दवा-संवेदनशील टीबी के लिए किया गया था। जब उसके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ, तो उसे बाद में एमडीआर-टीबी का पता चला। उन्होंने 2013 से 2015 तक बेंगलुरु में निजी क्षेत्र के फोर्टिस अस्पताल में केएस सतीश के तहत इलाज कराया। हालांकि, 2015 में अपनी दवा बंद करने के बावजूद, स्वेता ने बेहतर महसूस नहीं किया और उसका वजन कम होना जारी रहा। स्वेता की बहन स्वाति ने इंडियास्पेंड को बताया, “सतीश और उनकी टीम ने स्वेता को अपने आहार पर काम करने और बेहतर खाने के लिए कहा।”

 

जब 2017 में स्वेता की हालत खराब हो गई, तो सतीश ने पारंपरिक टीबी के लिए पहली पंक्ति की दवाओं से इलाज किया। खांसी में खून आना शुरू होने के बाद उसे कोई बेहतर महसूस नहीं हुआ, वजन कम हुआ और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

 

मई 2018 में बेंगलुरु के अपोलो अस्पताल में भर्ती होने के बाद स्वेता के एक्स-एक्सडीआर-टीबी का पता चला था। वह एक और राय चाहती थीं और जून 2018 में मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में उडवाडिया से संपर्क किया। टेस्ट में एक्सडीआर-टीबी का पता चला। उडवाडिया ने स्वेता से कहा कि उसे पारंपरिक टीबी के लिए पहली पंक्ति की दवाएं नहीं दी जानी चाहिए थीं, जब उसका इलाज एमडीआर-टीबी के लिए किया गया था, जैसा कि स्वाति ने बताया। “उन्होंने कहा कि बेडक्वीलाइन उसकी एकमात्र उम्मीद थी।”

 

इंडियास्पेंड ने उनकी प्रतिक्रिया के लिए के. एस. सतीश से संपर्क किया।

 

सतीश ने कहा कि दूसरी बार जब स्वेता के टीबी होने का पता चला, तो उन्होंने कार्ट्रिज आधारित न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन टेस्ट (सीबी-एनएएटी; व्यापक रूप से जीन एक्सपर टेस्ट) किया, दूसरी पंक्ति की जांच परख जिसमें पहली पंक्ति के ड्रग राइफैम्पिसिन के प्रति कोई प्रतिरोध नहीं था, और एक दवा संवेदनशीलता परीक्षण जो केवल आइसोनियाज़िड, एक और पहली-पंक्ति दवा के लिए प्रतिरोध दिखा रहा है।

 

उन्होंने ई-मेल के जरिए इंडियास्पेंड को बताया कि, “इस विसंगति पर छाती चिकित्सकों के समूह में चर्चा की गई।” सतीश ने कहा कि सिंह के फेफड़ों में खराब घाव थे, जिसके कारण सांस फूल रही थी और खून की खांसी हो रही थी, और उन्होंने श्वेता को मुंबई के हिंदुजा अस्पताल और चेन्नई के सरकारी अस्पताल थोरैसिक मेडिसिन से दूसरी राय लेने के लिए कहा था।

 

इस बीच, स्वेता को पता नहीं था कि बेंगलुरु में बेडक्वीलाइन का उपयोग कैसे किया जाता है। उन्होंने तब क्षय रोग के खिलाफ जीवित रहने वाले सहायता समूह सर्वाइवर्स के संयोजक चैपाल मेहरा से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें राज्य के टीबी अधिकारी के संपर्क में रखा। तब तक, स्वेता गंभीर स्थिति में थी और जल्द से जल्द दवा की जरूरत थी।

 

राज्य के टीबी अधिकारियों को लिखने के बाद, बेडक्वीलाइन को अंततः केसी जनरल अस्पताल में अगस्त 2018 में उपलब्ध कराया गया था। लेकिन सबसे पहले उसे यह साबित करने के लिए परीक्षणों का एक दौर से गुजरना था कि वह दवा प्राप्त करने के योग्य थी। इस बीच, सरकारी अस्पताल में डॉक्टर पूछते रहे कि क्या स्वेता बेडक्वीलाइनकॉइन लेना चाहती थी। स्वति बताती हैं कि “वे हमें बताते रहे कि बेडक्वीलाइन अचानक हार्ट अटैक का कारण बन सकता है। मेरी बहन मजबूत थी और कहा कि वह साइड-इफेक्ट्स का सामना करने के लिए तैयार थी। ”

 

उपचार में तेजी लाने के लिए, स्वाति ने निजी क्षेत्र से पात्रता संबंधी सभी परीक्षण किए, लेकिन जैसे ही उन्हें केसी जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया, उन्हें बताया गया कि सरकारी अस्पताल में फिर से परीक्षण पूरा करने की आवश्यकता है।

 

स्वाति ने कहा, “हमें एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक में उस समय दौड़ने के लिए तैयार किया गया था । मेरी बहन बिना मदद के चल नहीं पा रही थी और ऑक्सीजन पर थी।” फिर एक दिन, जब स्वाति अस्पताल से घर जा रही थी, तो उसे फोन आया कि स्वेता की हालत गंभीर हो गई है। जब वह वापस अस्पताल पहुंची, तो उसे बताया गया कि स्वेता की मौत हो गई है। स्वाति ने कहा, “यह सुनिश्चित करने के बजाय कि वह पुनर्जीवित होने की कोशिश कर रही थी, नर्स ने कहा कि हमारे जैसे लोग अस्पताल क्यों आते हैं?”

 

कर्नाटक राज्य के संयुक्त निदेशक (टीबी) एम मंजुला,  ने इंडियास्पेंड को बताया कि अप्रैल 2017 से राज्य में बेडक्वीलाइन उपलब्ध है और जल्द से जल्द स्वेता को उपलब्ध कराया गया था, लेकिन स्वेता पहले से ही बीमार थी, छह साल तक टीबी की रोगी रही। मंजुला ने कहा, “केसी जनरल अस्पताल में मरीज के इलाज के लिए पर्याप्त सुविधाएं थीं और वह (स्वेता) को आइसोलेशन वार्ड में रखा गया था और बेडक्वीलाइन शुरू करने से पहले उसका मूल्यांकन किया जा रहा था।”

 

अपनी बहन को खोने के दो महीने बाद, स्वाति अब अपने पिता को मुंबई में उडवाडिया के पास इलाज के लिए ले जा रही है, जिन्हें एमडीआर-टीबी है। उसे उम्मीद है कि पिता को बेडक्वीलाइन लेने की जरूरत नहीं होगी।

 

चपल मेहरा ने इंडियास्पेंड को बताया, “दवा के उपयोग के लिए प्रोटोकॉल पर कोई स्पष्टता नहीं है, खासकर निजी क्षेत्र के रोगियों के लिए।” वे पूछते हैं, “उदाहरण के लिए, एक मरीज था जो पटना से था लेकिन पुणे में अध्ययन कर रहा था और निजी क्षेत्र में इलाज करवा रहा था। उसे दवा कहां से मिलेगी? ”

 

मेहरा को अक्सर मरीजों और परिवार के सदस्यों को सरकारी अधिकारियों के साथ जुड़ने और प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ने में मदद करनी होती है। अक्सर, देर से जवाब देरी से इलाज में देरी करता है। हरा ने कहा, “निजी क्षेत्र में कुछ उत्कृष्ट चिकित्सक हैं और निजी क्षेत्र में कम से कम कुछ केंद्र होने की आवश्यकता है, जहां नई टीबी दवाओं की पहुंच हो।”

 

2018 में विकेंद्रीकरण से बेडाक्वीलाइन के लिए प्रतीक्षा समय कम हो जाता है, लेकिन सरकार रोगियों के प्रतिरोध को बनाए रखने के लिए सख्त नियंत्रण रखती है।

 

महाराष्ट्र में जून 2018 तक, मुंबई के जीटीबी अस्पताल में केवल बेडक्वीलाइन कोर्स उपलब्ध था। मरीजों को अन्य सरकारी अस्पतालों से वहां भेजा जाना था, और छह महीने के बेडक्वीलाइन कोर्स के पहले 14 दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है।

 

अक्सर, अनुपलब्ध बेडक्वीलाइन के कारण मरीजों की गति धीमी करता है। कभी-कभी, अस्पताल में भर्ती होने से इनकार करने वाले रोगियों को दवा नहीं मिल पाती। मुंबई के बाहर के लोगों को अक्सर इलाज की छह महीने की अवधि के लिए शहर की सीमा के भीतर रहने की सलाह दी जाती थी।

 

जून 2018 में, इस प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण किया गया; अब पूरे भारत में बेडक्वीलाइन प्रदान करने वाले 148 केंद्र हैं और रोगियों को अब अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं है, जैसा कि सीटीडी के सचदेवा ने इंडियास्पेंड को बताया है। अकेले मुंबई में अब बेडक्वीलाइन उपचार के लिए पांच केंद्र हैं।

 

सचदेवा कहते हैं कि किसी भी सरकारी स्वास्थ्य सुविधा जैसे कि चिकित्सक, मनोचिकित्सक, और ईसीजी, पोटेशियम, इलेक्ट्रोलाइट और कैल्शियम के स्तर की निगरानी के लिए उपकरण, बेडक्वीलाइन सेंटर बनने के योग्य हो सकते हैं।

 

हालांकि, स्वास्थ्य पदों पर पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ [सरकार द्वारा संचालित उपचार केंद्रों में] रोगियों और दुष्प्रभावों को प्रबंधित करने के लिए आवश्यक है, जैसा कि मुंबई के पांच स्थलों में से एक पर काम करने वाले डॉक्टर ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

मुम्बई में एमएसएफ क्लिनिक के प्रबंधक प्रमिला सिंह ने कहा कि एक और बड़ा मुद्दा सरकार के सीएपी द्वारा संचालित बेडैक्लाइन प्रतिरोध है, जहां मरीज छह महीने के लिए दवा प्राप्त करते हैं, लेकिन उस अवधि के बाद भी इसकी जरूरत पड़ सकती है।

 

एमएसएफ इस क्लीनिक को 2006 से चला रहा है ताकि उन रोगियों का इलाज किया जा सके जिन्हें दवा प्रतिरोधी टीबी के उपचार की आवश्यकता होती है जो सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं। 2016 के बाद से, जब बेडक्वीलाइन को सरकार की सीएपी के तहत उपलब्ध कराया गया था, एमएसएफ जटिल दवा प्रतिरोध पैटर्न वाले रोगियों का इलाज कर रहा है, जिन्हें अधिक नई टीबी दवाओं ( बेडक्वीलाइन, डेलमनीड और ऐड-ऑन ड्रग इमीपनेम ) की आवश्यकता होती है।

 

मुंबई के मेडिसिन सेन्स फ्रंटियर्स क्लीनिक में एक मरीज नई टीबी दवा, डेलमनीड के साथ। भारत ने 2017 में दवा प्रतिरोधी टीबी के लिए डेलमनीड के उपयोग को मंजूरी दी, लेकिन सरकार के द्वारा सशर्त पहुंच को बनाए रखने के कारण केवल 400 कोर्स प्रदान किए हैं।

 

किसी भी प्रभावी टीबी परहेज के लिए, आपको कम से कम चार दवाओं की आवश्यकता होती है जो रोगी के प्रति संवेदनशील होती हैं। सिंह ने कहा, “एक्सडीआर-टीबी रोगियों के लिए, केवल बेडक्वीलाइन जोड़ना पर्याप्त नहीं है, इसलिए हमें ऐडिपेनेम जैसी ऐड-ऑन दवाओं का उपयोग करने की आवश्यकता है, जो परिणामों को बेहतर बनाने के लिए डब्ल्यूएचओ के 2018 दिशानिर्देशों का हिस्सा है।”

 

जबकि डब्ल्यूएचओ दिशानिर्देश छह महीने से परे बेडक्वीलाइन का विस्तार और जहां आवश्यक हो, बेडक्वीलाइन के साथ डेलमेडिड के संयोजन का उपयोग करने की अनुमति देते हैं, सीएपी के तहत ऐसा करना आसान नहीं है।

 

सिंह ने कहा, “जो मरीज छह महीने के बाद बेडक्वीलाइन प्राप्त करना बंद कर देते हैं, उन्हें चार से भी कम प्रभावी दवाओं के साथ छोड़ा जा सकता है, जिसके कारण पुनर्संक्रमण होता है – कल्चर निगेचिव से कल्चर पॉजिटिव या बेडक्वीलाइन विफल होता है, हां बेडक्वीलाइन और डेलमनीड दोनों की आवश्यकता होगी।”

 

एमएसएफ ने 2018 तक नई दवाओं पर लगभग 142 रोगियों का इलाज किया है, जिनमें से 100 (70 फीसदी) बेडक्वीलाइन और डेलमनीड का संयोजन प्राप्त कर रहे हैं।

 

इसने छह महीने से परे बेडक्वीलाइन के साथ 41 रोगियों का इलाज किया और पाया कि 34 (83 फीसदी) के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है।  प्रारंभिक एमएसएफ रिपोर्ट में कहा गया है कि, “वर्तमान में सुझाए गए 24 सप्ताह से अधिक समय तक संयोजन में बेडक्वीलाइन और डेलमिडिड का उपयोग संभावित जीवन रक्षक के रूप में इनकार नहीं किया जाना चाहिए ।”

 

सरकारी प्रणाली के माध्यम से उपलब्ध दवाओं के साथ मरीजों को उपलब्ध कराना सस्ता नहीं है। छह महीने के बेडक्वीलाइन कोर्स की कीमत $ 400 (27,970 रुपये) और डेलमनिड $ 2,003 (1.4 लाख रुपये) है। इम्पीनेम की लागत छह महीने के लिए 10.8 लाख रुपये है। प्रत्येक दवा के लिए कूरियर शुल्क $ 652 (45,591 रुपये) है। पूरी लागत छह महीने के लिए प्रति मरीज 13 लाख रुपये से अधिक आ सकती है।

 

जबकि एमएसएफ को दवाओं को बाजार दरों पर खरीदना पड़ता है, सरकार की सीएपी को यूएसएआईडी दान कार्यक्रम के तहत मार्च 2019 तक मुफ्त में दवाएं मिल रही हैं।

 

अब बड़ा सवाल यह है कि मार्च 2019 के बाद क्या होगा?

 

2016 के बाद से, एमएसएफ अपने क्लिनिक में, उन रोगियों का इलाज कर रहा है, जिन्हें नई टीबी ड्रग की आवश्यकता है, जो सरकार के सशर्त पहुंच कार्यक्रम के तहत उपलब्ध नहीं है, जैसे कि डेलमैनीड के साथ संयोजन में बेडक्वीलाइन ।

 
भारत के पास अपने सभी दवा प्रतिरोधी टीबी रोगियों के लिए पर्याप्त मात्रा में बेडक्वीलाइन नहीं हैं

 

सीटीडी के सचदेवा का कहना है कि भारत में एक साल तक के लिए पर्याप्त बेडक्वीलाइन स्टॉक हैं। वह कहते हैं, “हम वर्तमान में एक महीने में 600-700 मरीजों को भर्ती करते हैं और उनके पास तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त स्टॉक हैं।” सरकार मार्च 2019 से परे दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सुसज्जित है।

 

दक्षिण अफ्रीका में, दीर्घकालिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने दान की आपूर्ति पर भरोसा करने के बजाय, सीधे जेनससेन के माध्यम से बेडक्वीलाइन खरीदने का फैसला किया। जुलाई 2018 में  जेनसेन से छह महीने के बेडक्वीलाइन कोर्स के लिए $ 750 के बजाय 400 डॉलर की कम कीमत पर बातचीत की  गई।

 

एमएसएफ के एक्सेस अभियान के दक्षिण एशिया प्रमुख लीना मेंघेनी कहती हैं, “एक सामान्य नियम के रूप में, चिकित्सा दान अंडरफंड स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए एक दीर्घकालिक समाधान नहीं है।”

बेडक्वीलाइन जैसे पेटेंटेड उत्पादों के दान से भारतीय जेनेरिक टीबी दवा निर्माताओं से प्रतिस्पर्धा को भी दबाया
जा सकता है, जो बेडक्वीलाइन और डेलमनीड दोनों कोर्स के लिए 200 डॉलर (13,985 रुपये) से कम कीमत पर
दवा का उत्पादन करने में सक्षम हो सकते हैं – वर्तमान का सिर्फ 8 फीसदी बाजार दर।

 

एक सक्रिय फ़ार्मास्युटिकल एजेंट को विकसित करने, ड्रग अथॉरिटी के साथ पंजीकरण करने और डब्ल्यूएचओ प्रीक्वालिफिकेशन के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया में 1-2 साल लगते हैं, लेकिन सरकारी समर्थन के बिना, भारतीय निर्माता ऐसा नहीं कर रहे हैं, जैसा कि मेंघेनी ने बताया।

 

साथ ही, सचदेवा की यह धारणा कि भारत में अपने सभी रोगियों के लिए पर्याप्त दवाएं हैं, गलत हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है। सीटीडी के अधिकारियों द्वारा इंडियास्पेंड के साथ साझा किए गए नामांकन के आंकड़ों के अनुसार, केवल 3,000 या 33,162 प्री-एक्सडीआर और एक्सडीआर-टीबी रोगियों के दसवें से कम जिनको दवा की जरूरत है ( भारत के प्रतिबंधित मानदंडों के अनुसार ) नवंबर 2018 तक इसे प्राप्त कर लिया गया है। लेकिन नए डब्ल्यूएचओ दिशानिर्देशों के कार्यान्वयन से भारत में सभी 135,000 ड्रग-रेसिसटेंट टीबी रोगियों के लिए कोर परहेज का बेडक्वीलाइन हिस्सा बन जाएगा। और ये केवल मौजूदा मामले हैं। जीटीआर 2018 के अनुसार, निदान और उपचार में पहले से ही अंतराल हैं, भारत के 135,000 अनुमानित दवा प्रतिरोधी टीबी रोगियों में से केवल 28 फीसदी का निदान किया गया और 2017 में केवल 26 फीसदी का इलाज किया गया है।

 

सीटीडी को ड्रग रेसिसटेंट टीबी रोगियों की संख्या का सही अनुमान लगाने की आवश्यकता होगी। यदि भारत को सभी टीबी नमूनों पर एक सार्वभौमिक ड्रग संवेदनशीलता परीक्षण (डीएसटी) लागू करना शुरू करना था, जैसा कि यह ट्यूबरकुलोसिस 2017-2025 के लिए राष्ट्रीय सामरिक कार्यक्रम के तहत प्रतिबद्ध है, तो ड्रग रेसिसटेंट टीबी के मामलों में और वृद्धि होगी।

 

हालांकि, सीटीडी की इंडिया टीबी रिपोर्ट, 2018 के अनुसार, भारत के 712 जिलों में से केवल 257 ही सार्वभौमिक डीएसटी टेस्ट दे रहे हैं। केवल टीबी रोगियों में से लगभग 32 फीसदी सार्वभौमिक डीएसटी से गुजरते हैं, सीटीडी ने इंडियास्पेंड को सूचित किया है।

 

मुंबई में एमएसएफ क्लिनिक ने बेडक्वीलाइन जोखिम के लिए सार्वजनिक क्षेत्र से संदर्भित रोगियों को प्राप्त किया, जैसा कि क्लिनिक प्रबंधक प्रमिला सिंह ने इंडियास्पेंड को बताया। भारत में कोई बेडक्वीलाइन -प्रतिरोध परीक्षण प्रयोगशाला नहीं हैं।

 

अभी के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र के लिए बेडाक्वाइन और डेलमनिड की पहुंच प्रतिबंधित है। सचदेवा ने कहा, “यह दवाओं की सुरक्षा के लिए किया जाता है। बहुत स्पष्ट है, यदि आप बेडक्वीलाइन और डेलमनिड खो देते हैं, तो कोई अन्य दवा उपलब्ध नहीं है [ ड्रग रेसिसटेंट टीबी के लिए]। फिर रोगी के पास मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हम दवाओं को बर्बाद नहीं करना चाहते हैं, इसलिए उनके उपयोग को सतर्क, अच्छी तरह से सूचित किया जाना चाहिए। “

 

लेकिन सावधानी और कार्रवाई के बीच का संतुलन का असर जीवन पर

 

“जिन सरकारी डॉक्टरों से हम मिले वे खुद को भगवान की तरह समझते हैं। वे चाहते हैं कि मरीज बेडक्वीलाइन के लिए विनती करें और भीख मांगें और यदि आप उनसे सवाल करते हैं, तो वे यह सुनिश्चित करते हैं कि आपको दवा न मिले” जैसा कि स्वाति ने बहन के लिए बेडक्वीलाइन कोर्स को मंजूरी के दौरान अनुभव किए गए संघर्ष को साझा करते हुए कहा।

 

लगभग 40 वर्षों में टीबी के इलाज के लिए विकसित की गई पहली दवा बेडक्वीलाइन के उपयोग के विभिन्न पक्षों को लेकर दो आलेखों की श्रृंखला का यह पहला भाग है।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यादवार 2018 में एमएसएफ मीडिया फेलो थीं। रिपोर्ट पर एमएसएफ की कोई निगरानी या संपादकीय नियंत्रण नहीं है।

 

यह लेख मूलत: 10 जनवरी 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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