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तमिलनाडु में बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के बड़े नतीजे

प्राची सालवे,
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मुंबई: तमिलनाडु के तीन ब्लॉक में ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने से अधिक लोग इसकी सुविधाओं का उपयोग कर पा रहे हैं और आउट डोर पेशंट देखभाल पर उनका व्यय कम हुआ है। यह जानकारी  मद्रास स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थाने द्वारा सरकारी संचालित पायलट परियोजना के मूल्यांकन में सामने आई है।

 

कृष्णागिरी, पुदुक्कोट्टई और पेरामंबुर जिलों के प्रत्येक ब्लॉक में किए गए अध्ययन में पाया गया है कि बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से ही कम लोग बाह्य रोगी देखभाल के लिए निजी सुविधाओं तक गए ।

 

इस नीति के निहितार्थ स्पष्ट हैं, क्योंकि स्वास्थ्य पर भारतीयों के जेब का खर्च 50 निम्न-मध्यम आय वाले देशों में छठा सबसे ज्यादा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मेडिकल जर्नल ‘द लंसेट’ में प्रकाशित दो अध्ययनों के आधार पर रिपोर्ट किया था।

 

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2013-14 में लोगों की जेब से 290,932 करोड़ रुपये (42.6 बिलियन डॉलर) खर्च किए गए थे, जिसमें 32 फीसदी या एक तिहाई बाह्य रोगी देखभाल के लिए था।

 

फिर भी, ‘मोदीकेयर’  नाम के बड़े राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना से बाह्य रोगी देखभाल को बाहर रखा गया था। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने फरवरी 2018 में अपने बजट भाषण में इस योजना की घोषणा की थी। यह कार्यक्रम 100 मिलियन परिवार को 500,000 रुपये का वार्षिक बीमा कवर प्रदान करेगा।  हालांकि, आलोचकों ने बताया कि बाह्य रोगी ( जेब व्यय का सबसे बड़ा व्यय ) देखभाल को कवर न करके, यह उन लोगों की मदद करने में विफल रहेगा, जिनको लक्ष्य में रखकर इस योजना की रूपरेखा तैयार की गई है।

 

सरकार का दावा यह है कि विभिन्न योजनाएं पहले से ही जेब व्यय को कवर करती हैं। प्रसूति देखभाल कार्यक्रम जनानी सुरक्षा योजना गर्भवती महिलाओं और अस्पताल में भर्ती के दौरान एक साथ देखभाल करने वाले को भोजन प्रदान करती है। सरकारी संचालित मोबाइल मेडिकल इकाइयां और एम्बुलेंस सेवाएं सार्वजनिक सुविधाओं के लिए और मुफ्त परिवहन प्रदान करती हैं;  और सार्वजनिक हेल्थकेयर सिस्टम एचआईवी, टीबी, मलेरिया, कुष्ठ रोग आदि के लिए मुफ्त टीके, गर्भ निरोधक, दवाएं और कई तरह की जांच की सुविधा प्रदान करते हैं, जैसा कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने 18 मार्च, 2018 को एक साक्षात्कार में इंडियास्पेंड को बताया है।

 

कुछ ठोस कदम

 

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को आगे बढ़ाने की तैयारी में, तमिलनाडु की राज्य सरकार ने कृष्णागिरी जिले के शुलागिरी ब्लॉक में, पुडुकोट्टई जिले के विरलीमालाई ब्लॉक और पेरामंबुर जिले के वेपपुर ब्लॉक में 2017 की शुरुआत में एक पायलट परियोजना शुरू की है।

 

 

भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का ढांचा
 

स्वास्थ्य उप-केंद्र (एचएससी) देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ ग्रामीण भारतीयों के संपर्क का पहला बिंदु है। एक एचएससी 5,000 लोगों को सेवा प्रदान करता है और बच्चों के लिए दस्त, मलेरिया और टीकों के लिए दवाएं स्टॉक करती है। इसमें 3-4 कर्मचारी होते हैं और मूल जांच की क्षमता होती है, जैसे हेमोग्लोबिन , एल्बमिन और डायबटीज के लिए मूत्र परीक्षण।

 

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Source: Ministry of Health and Family Welfare

 

हालांकि, भारत भर में अनुमानित 22 फीसदी एचएससी सहायक नर्स मिडवाइव (एएनएम) की कमी है, और 46.4 फीसदी पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता के बिना काम कर रहे हैं। यह जानकारी 2015 के ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ों से पता चलती है।

 

नतीजतन, ग्रामीण भारतीय या तो निजी चिकित्सकों के पास जाते हैं ( राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 71वें दौर के अनुसार, 58 फीसदी ग्रामीण भारतीयों ने निजी स्वास्थ्य देखभाल पसंद की है ) या माध्यमिक और तृतीयक सार्वजनिक सुविधाओं की ओर जाते, जो अक्सर अत्यधिक बोझ से दबे हुए होते हैं।

 

स्तर के क्रम में उच्चतर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, और सामान्य अस्पताल हैं।

 

 

पायलट प्रोग्राम में यह सुनिश्चित किया गया कि एचएससी में पानी, बिजली, शौचालय, उचित परामर्श कक्ष और नर्सों के लिए क्वार्टर हो। इसके अलावा, कर्मचारियों की कमी की पहचान की गई और प्रत्येक एचएससी को दो गांव स्वास्थ्य नर्स (वीएनएन) आवंटित किए गए।

 

गैर-संक्रमणीय बीमारियों के लिए दवाओं सहित मूल नैदानिक ​​सेवाएं उपलब्ध कराई गईं।

 

सकारात्मक नतीजा

 

इसके बाद पाया गया है कि विभिन्न सार्वजनिक सुविधाओं में बाह्य रोगी देखभाल के लिए जेब के व्यय में में उल्लेखनीय गिरावट आई है। अध्ययन के मुताबिक, शुलागिरी ब्लॉक में 77 फीसदी,( प्रति दौरे पर 261 रुपये से 59 रुपये), विरिलमालाई में 92 फीसदी (351 रुपये से 26 रुपये) और वेपपुर में 83 फीसदी (395 रुपये से 67 रुपये) की गिरावट हुई है।

 

एचएससी में, विशेष रूप से, जेब व्यय कम था। शुलागिरी में प्रति दौरा पर 5.9 रुपये, विरलीमालाई में 2.9 रुपये और वेपपुर में 5.16 रुपये था। एचएससी के उपयोग में भी सुधार हुआ है। शुलागिरी ब्लॉक में सभी रोगियों में से 17.8 फीसदी, विरिलमालाई में 14.8 फीसदी और वेपपुर में 23.1 फीसदी एचएससी का इस्तेमाल करते थे, हस्तक्षेप से पहले केवल 1 फीसदी से ऊपर।

 

सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में आउट पेशेंट दौरे में वृद्धि

Source: Indian Institute of Technology, Madras
Note: PHC/CHC: Primary Health Centre/Community Health Centre

 

एचएससी में आउट पेशेंट उपस्थिति में भी वृद्धि हुई। प्रत्येक एचएससी में से शुलागिरी में प्रतिदिन 10 बाह्य रोगियों, विरिलमालाई में 13 और वेपपुर में 10 रोगियों को सेवा प्रदान की गई। हस्तक्षेप से पहले प्रति दिन तीन से कम रोगी देखे जाते थे।

 

इसी प्रकार, इन ब्लॉक के कम लोगों ने निजी सुविधाओं में बाह्य रोगी देखभाल की मांग की। शुलागिरी में, बाह्य रोगी देखभाल के लिए निजी सुविधा तक जाने वाले लोगों का प्रतिशत 51फीसदी से 21 फीसदी तक गिर गया। विरिलमाला में 47.8 फीसदी से 24.2 फीसदी तक की गिरावट हुई; और वेपपुर में आंकड़ा 40.9 फीसदी से 23.9 फीसदी तक पहुंचा।

 

दवाओं पर खर्चों के कारण मरीजों पर कुल वित्तीय बोझ में गिरावट आई थी। दिसंबर 2017 तक, पायलट ने एचएससी के माध्यम से उच्च रक्तचाप और मधुमेह के रोगियों को 10.5 लाख रुपये की दवाएं भेजी थीं।

 

ग्रामीण भारत में सबसे आम ये दो गैर-संक्रमणीय बीमारियां हैं। पांच वयस्कों में से एक उच्च रक्तचाप से प्रभावित है और 20 में से एक मधुमेह से प्रभावित है, जैसा कि भारत विकास समीक्षा में मार्च 2018 के इस लेख में कहा गया है। अगस्त 2016 के इस पेपर के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में लगभग 70 फीसदी आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय गैर-संक्रमणीय बीमारियों के लिए दवाओं पर है।

 

(सालवे विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।.)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 25 मई 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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