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दस मिलियन किसानों के लिए महाराष्ट्र जल योजना विफल

अभिषेक वाघमारे,
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मध्य महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में जयराम जाधव के कुएं को महाराष्ट्र सरकार की जलयुक्त शिवर अभियान के तहत, पास के नहर को साफ एवं चौड़ा करने के बाद फिर से भरा गया है। इस अभियान का उदेश्य 2019 तक महाराष्ट्र को सूखा-मुक्त बनाना है। दिसंबर 2014 में यह कुआं लगभग खाली था।

 

बीड और वाशिम (महाराष्ट्र): यदि आप मध्य महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के जयराम जादव से नहीं मिलेंगे तो शायद आपको कभी पता नहीं चलेगा कि भारत की दूसरी सबसे बड़ी कृषि अर्थव्यवस्था में सूखे का कितना बड़ा संकट है। इस सदी में इस क्षेत्र में सबसे अधिक सूखा पड़ा है।

 

35 वर्षीय जादव खुशहाल इंसान है। दो मौसम में बारिश न होने के बावजूद, गन्ना, कपास और अरहर की अपने 20 एकड़ जमीन को हर रोज़ तीन घंटे तक पानी देने के लिए जादव के कुएं में पर्याप्त पानी है। पिछले साल, इस समय उसके पास एक घंटे से अधिक का पानी नहीं था।

 

महाराष्ट्र सरकार की जलयुक्त शिवर अभियान के कारण ही बीड ज़िले में जादव के पंधरवाड़ी गांव  के नहरों को मौनसून से पहले चौड़ा और गहरा किया गया है। जादव की भूमि, इनमें से एक पुन:शुरु किए गए नहर के पास स्थित है और इस कारण जादव के कुएं में भरपूर पानी जाता है।

 

विदर्भ के वाशिम जिले में 250 किलोमीटर दूर पूर्वोतर में रहने वाले 35 वर्षीय रमेश मार्ज भी सरकार की कोशिश से काफी खुश हैं। गयावल गांव में उनका 35 एकड़ का कपास और सोयाबिन (कुछ दालें और सब्ज़ियां भी) का फसल फलफूल रहा है।

 

मार्ज, इलाके में पड़ रहे सूखे से किसानों पर पड़ने वाले प्रभाव से पूरी तरह वाकिफ हैं।

 

मार्ज कहते हैं, “जब मैं छोटा था तब जनवरी और फरवरी के महीने में अपनी भैंसों को खूब पानी से नहलाता था। और अब गांव में अक्टूबर के महीने में भी पानी नहीं दिखता है। पिछले साल पोला के दौरान (आमतौर पर अक्टूबर में, गर्मी की फसल के खेत उत्सव) पशुओं को ठीक से धोने ते लिए भी पानी नहीं था।”

 

इसी गांव के शंकर चौड़े ने इंडियास्पेंड को एक दशन पुराने  नारंगी के बाग दिखाए कि किस प्रकार वह फलफूल रहा है। यह जलयुक्त शिवर अभियान के तहत बांध निर्मित होने के कारण ही संभव हो पाया है जो पानी को रोकता है। शंकर अपनी 100 एकड़ की ज़मीन की सिंचाई के लिए चार पंप चलाता है।

 

चौड़े, मार्ज और जादव में एक समानता है – वे राज्य में तुलनात्मक रूप से बड़ी जुताई के साथ समृद्ध किसान हैं, भारत के कृषि जनगणना के अनुसार जहां औसत जुताई 1.44 एकड़ जमीन है, पिछले दो दशक में 1.86 एकड़ से नीचे हुई है।

 

1995 से 2011 के दौरान छोटे किसानों (5 एकड़ से कम के मालिक) की तादाद 70 फीसदी से बढ़ कर 79 फीसदी हुई है।

 

तो, जबकि जलयुक्ल शिवर अभियान का उदेश्य महाराष्ट्र को 2019 तक सूखा-मुक्त बनाने का है, ऐसा प्रतीत होता है कि इस योजना से लाभ अधिकतर समृद्ध किसानों को हुआ है। जैसा कि इस श्रृंखला के पहले भाग में हमने बताया है कि क्रम से पद्धति का काम क्षेत्र के भूगर्भीय जल चक्र पर ध्यान नहीं देता है – एक जल विभाजक – और यह प्रभावित किसानों की सहायता के गति को धीमी करता है।

 

चौड़े के गांव, गयावल में, जहां तालुका में सबसे अधिक संख्या में परियोजनाओं हैं, वहां 60 फीसदी से कम किसानों के पास 5 एकड़ से कम ज़मीन है। भारत की कृषि जनगणना के अनुसार राज्य के 13.7 मिलियन किसानों (या 79 फीसदी) में से 10.7 मिलियन किसानों के पास पांच एकड़ या इससे कम ज़मीन है।

 

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मुर्झाए हुए दालों के खेत – गायवल के 60 फीसदी किसानों के खेत के लिए आम दृश्य है जिनके पास पांच एकड़ से कम ज़मीन है। यह खेत महाराष्ट्र के महत्वकांक्षी जलयुक्त शिवर अभियान द्वारा पुन: जीवित किए गए नहर से 500 मीटर की दूरी पर स्थित है।

 

पानी के टैंकर पर निर्भर कई गांव

 

जलयुक्त शिवर अभियान यदि महत्वकांक्षी नहीं है तो फिर कुछ नहीं है: अभियान का उदेश्य वर्ष 2019 तक महाराष्ट्र के 22 सूखा प्रभावित ज़िलों के 40,000 गांवों में से 19,059 गांवों की सिंचाई करना है। सरकार के मुताबिक 0.14 मिलियन वाटरशेड परियोजनाओं में से कम से कम 41,000 परियोजनाएं एक वर्ष में पूरी की गई है।

 

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इकोनोमिक टाइम्स को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा, जलयुक्त शिवर अभियान के ज़रिए करीब 24 टीएमसी फीट (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) पानी भंडारण क्षमता राज्य से जोड़ा गया है।

 

ज़मीनी स्तर पर, सूखे का प्रभाव बढ़ रहा है और इससे निपटने के लिए अधिक गांव संघर्ष कर रहे हैं।

 

2014 में, पिछले वार्षिक खेती के मौसम में मध्य महाराष्ट्र के बीड से 1,377 गांवों में पानी की कमी घोषित की गई है; इस वर्ष 1,403 गांव सूची में हैं। 2014 में सरकार ने यवतमाल एवं वाशिम ज़िलों से 2,050 एवं  793 गांवों में सूखा घोषित किया है जबकि 2015 में खरिफ (मौनसून) मौसम के दौरान किसी ज़िले को सूखा नहीं घोषित किया गया है।

 

वर्षा, टैंकर एवं तीन ज़िलों में घोषित पानी की कमी, 2014 एवं 2015

 

 

2014 में, पिछले वर्ष हुई पर्याप्त वर्षा के परिणाम के रुप में, बीड ज़िले के 15 गांवों में 13 टैंकरों द्वारा पीने के पानी की आपूर्ती की गई है। 2015 में, लगातार दो बार पड़ने वाले सूखे के कारण प्रशासन को गांवों में टैंकरों की संख्या को 12 से 16 गुना अधिक बार भेजना पड़ा है: 243 गांवों में 162 टैंकर भेजे गए।

 

लगातार सूखा पड़ने के बावजूद,यवतमाल और वाशिम जिलों से कोई टैंकर बाहर नहीं भेजा गया है। यह गर्मियों के महीने, अप्रैल, मई और जून में हो सकता है जब कमी और अधिक होगी, जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है –

 

महाराष्ट्र के गांवों में पानी की आपूर्ती करते टैंकर, 2015

 

 

टैंकरो : जनवरी 2016 स्थिति की तुलना में जनवरी 2015

 

 

गेरोई के बीड गांव के मध्य आयु के किसान मौजूदा परिस्थिति से दुखी पड़ते हैं। इंडियास्पेंड से बात करते हुए एक किसान ने बताया कि, “टैंकर? 2012 से पहले हमारे गांव में कभी टैंकर नहीं आया। यदि इन चार वर्षों में हमारे गांव में टैंकर आए हैं तो इसका मतलब है अन्य गांवों में स्थिति अधिक बुरी है।”

 

नया कार्यक्रम पुरानी योजना ही जैसा, सबको नहीं मिल रहा लाभ

 

यह अक्सर अद्वितीय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन जलयुक्त शिवर अभिन शायद ही राज्य को सूखा-मुक्त बनाने की पहली पहल है। 1972, पहली रोज़गार गारंटी योजना का वर्ष, जो विनाशकारी सूखे का वर्ष भी रहा है, में समृद्ध किसान, खेतिहर मजदूर बनने के लिए मजबूर हुए थे।

 

पिछले सरकारों द्वारा एकीकृत जलग्रहण विकास कार्यक्रम,  विदर्भ सघन सिंचाई विकास कार्यक्रम, महात्मा फुले जल भूमि अभियान, शुष्क भूमि कृषि मिशन सहित कई जलयुक्त शिवर परियोजनाएं शुरु की गई हैं।

 

पिछले सरकारों द्वारा एकीकृत जलग्रहण विकास कार्यक्रम,  विदर्भ सघन सिंचाई विकास कार्यक्रम, महात्मा फुले जल भूमि अभियान, शुष्क भूमि कृषि मिशन सहित कई जलयुक्त शिवर परियोजनाएं शुरु की गई हैं।

 

छोटे और सीमांत किसानों, जिनके पास पांच एकड़ से कम ज़मीन होने के रुप में परिभाषित किया गया है, को जलयुक्त शिवर की सबसे अधिक आवश्यकता है। इंडियास्पेंड द्वारा की गई पड़ताल से योजना की विफलता के ये कारण सामने आए हैं:

 

250 घरों वाले एक प्रतीकात्मक गांव में, 50 में से केवल 30 लोगों को योजना का लाभ मिला है जोकि 10 से 20 फीसदी से अधिक नहीं है जबकि छोटे किसानों की प्रतिशत 80 फीसदी है।

 

समृद्ध किसानों के खेत अधिकांश रुप से नहर एवं कुएं के पास होते हैं इसलिए इनकी चौड़ाई एवं गहराई से उन्हें ही लाभ मिलता है। इन्हीं गावों के कुएं जो इन नहरों से दूर हैं वो लगभग सूख गए हैं भूवैज्ञानिक विस्तार और स्थानीय की ओर अपर्याप्त ध्यान को सुस्पष्ट करने की ज़रुरत है।

 

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विदर्भ के गांव, गयावल में एक सूखा कुआं। गांव के मुख्य नहर से मील दूर स्थित इस कुएं को जलयुक्त अभियान के दायरे से बाहर छोड़ दिया गया है।

 

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आंशिक रूप से चौड़ा और गहरा नहर वाशिम के पूर्वी जिले पसारानी में स्थित है। गांव के प्रधान कहते हैं कि इसकी चौड़ाई और गहराई पर्याप्त नहीं है।

 

वाशिम के पूर्वी जिले में पसारानी गांव के सरपंच, पीरन गारवे कहते हैं कि, क्षेत्र में हाल ही में चौड़े किए गए नहर को कम से कम 10 मीटर चौड़ी और 20 फुट गहरे होने की ज़रुरत है। जलयुक्त शिवर के तहत नहरों को 5 मीटर चौड़ा और 8 फुट गहरा बनाया गया है।

 

सिंचाई संकट का हल मलहमपट्टी नहीं

 

गांव में आमतौर पर जल-विभाजक कैसे काम करता है नीचे दिखाया गया है। दिखाई गई बड़ी लाल बिंदु गांव है। छोटी लाल बिंदुएं धाराओं का मूल है।

 

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यह नदी बेसिन नक्शा एक स्थानीय जलग्रहण नेटवर्क का प्रतिनिधित्व के रूप में दिखाया गया है जहां बड़ी लाल वृत्त एक गांव का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके माध्यम से प्राकृतिक धाराएं बहती हैं। इस गांव का जल-विभाजक मे जलयुक्त शिवर विफल होता है क्योंकि यह केवल नहर के एक हिस्से का पुन: निर्माण करती है और गांव से हो कर बहती है। एक अधिक स्थायी प्रभाव के लिए, एक बड़ी धारा या नदी के साथ चौड़ाई और गहराई मूल से की जानी चाहिए। संख्या महाराष्ट्र के कोड जल का प्रतिनिधित्व करते हैं । नदियों के नाम के साथ संख्या को अनदेखा किया जाना चाहिए क्योंकि इस विश्लेषण में के रूप में यह अप्रासंगिक हैं।

Image: Clipped part of Godavari Middle Sub-basin

Image courtesy: Watershed Sub-basin Atlas, Water Resources Information System, National Remote Sensing Centre, India

 

सुरेश खनापुरकर, धुले के उत्तरी जिले में जल संरक्षण के लिए शिरपुर मॉडल के पीछे की बुद्धि, कहते हैं कि, “हालांकि अल्पकालिक उपायों की ज़रुरत है लेकिन यह केवल मलहमपट्टी है।”

 

सुरेश आगे कहते हैं कि, “इसमें कोई दो मत नहीं कि नहरों की चौड़ाई और गहराई और अधिक करने की ज़रुरत है लेकिन यह चौड़ाई और गहराई मूल से करने की आवश्यकता है।”

 

जैसा कि हमने इस श्रृंखला के पहले भाग में बताया है कि महाराष्ट्र में भारत की कुछ सबसे उदार सिंचाई सुविधाएं हैं। तत्कालीन योजना आयोग द्वारा एक 2005 महाराष्ट्र राज्य विकास रिपोर्ट के अनुसार जल वितरण असंतुलित है – बड़े भाग में शक्तिशाली , राजनीति से जुटाए किसानों के कारण – जिसके परिणामस्वरूप सिंचित क्षेत्र -से- फसली क्षेत्रों में से सबसे कम प्रतिशत में से एक है।

 

उदाहरण के लिए, गन्ने एक मिलियन हेक्टर कब्जा करते हैं, कृषि भूमि का करीब 5 फीसदी, लेकिन यह 700 टीएमसी या सालाना उपलब्ध पानी के आधे से अधिक की खपत करता है जोकि केवल बड़े बांधों से संभव बनाया गया है।

 

महाराष्ट्र में कुल भंडारण क्षमता करीब 1,340 टीएमसी है जिनमें से 930 टीएमसी बड़े बांधों में जमा हो जाती है, 170 टीएमसी मध्यम और लघु भंडारण बांधों में जमा होती हैं। राज्य में जल भंडारण इस प्रकार भारी बड़े बांधों पर निर्भर है।

 

मुख्यमंत्री के सूखे के प्रभाव को कम करने में बड़े बांधों की प्रभावहीनता की आलोचना करने के साथ जलयुक्त शिवर की पांच एकड़ या इससे कम ज़मीन वाले 10 मिलियन किसानों की आजीविका बचाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका हो जाती है।

 

2014 में महाराष्ट्र के छह जिलों में जलयुक्त शिवर के तहत परियोजनाएं

 

रॉबर्ट ब्राउनिंग,19 वीं सदी के अंग्रेजी कवि ने  मानव आकांक्षाओं के बारे में कहा है : “मनुष्य की पहुंच उसकी पकड़ से अधिक होना चाहिए।” जलयुक्त शिवर ने  जरूरत को समझा है, लेकिन इसकी पहुंच अपर्याप्त है।

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक है।)

 

दो श्रृंखला लेख का यह दूसरा भाग है। पहला भाग आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 25 जनवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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