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दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों की महिलाओं को कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए परिवहन पर करना पड़ता है ज्यादा खर्च

नमिता भंडारे,
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मोमीना (बीच में) आंखों से देख नहीं पाती है। वह एक कारखाने में पर्स के धागे काटने के काम के लिए एक साझा रिक्शा लेती है। सप्ताह में छह दिन, और दिन में आठ घंटे काम करने के बदले उनको प्रति माह 5,500 रुपए मिलते हैं। भारत के महानगरों में, महिलाएं छोटी दूरी की यात्रा करती हैं, जिनमें से अधिक महिलाएं पैदल चलना या काम पर जाने के लिए बस लेना पसंद करती हैं। और कई बार ज्यादा यात्रा से बचने के लिए कम भुगतान करने वाले नौकरियों का चुनाव भी कर लेती हैं।

 

बावाना (दिल्ली): जब 25 फरवरी, 2018 को एक पर्स कारखाने में मोमीना को नौकरी मिली तो उसके पति ने काफी नाराजगी जाहिर की। मोमीना ने बताया कि उसके पति को नशे की लत है। वह उसे नियमित रूप से मारता है, कभी-कभी काम करता है और शायद ही कभी उसे अपने पैसे देता है। फिर भी, जब उसने घर पर यह बताया की कि वह हर रोज घर जाकर काम करने जा रही है, तो वह खुश नहीं था।

 

मोमीना ने बताया कि, “लोग उन महिलाओं के बारे में अनाप-शनाप बोलते हैं जो काम करने के लिए बाहर जाती हैं।” लेकिन वह अपनी बात पर अडिग थी। वह कहती हैं, “मेरे लिए सारी समस्याओं को भूलने का एक तरीका घर से बाहर निकलना है। ”

 

समस्याएं बहुत सारी हैं। मोमीना को जन्म से ही केवल एक आंख से ही दिखाई देता है। उसकी छोटी बेटी की उम्र 10 वर्ष है। छोटी बेटी भी बहुत अधिक विकलांगता के साथ पैदा हुई थी और सहायता के बिना चलना, बोलना या एक जगह से दूसरे जगह नहीं जा सकती हैं। मोमीना अपने पिता के साथ दिल्ली के उत्तर-पश्चिम इलाके में 12.5 वर्ग मीटर क्षेत्र पर बने ईंट के मकान में रहती हैं। उनके पिता बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर कुछ पैसे घर में देते हैं।

 

ममीना अपने पति की स्वीकृति के लिए इंतजार नहीं कर रही थी। वह कहती हैं, “मुझे उनकी अनुमति की ज़रूरत नहीं है। कम से कम अब जब भी मेरा बच्चा बीमार होता है, तब मुझे पड़ोसियों से पैसे नहीं मांगने पड़ते हैं।”

 

उसके लिए नौकरी पाना आसान नहीं था। बहुत से लोग एक आंख वाली महिला को भर्ती नहीं करना चाहते हैं । लेकिन उनके एक पड़ोसी ने मदद की। वह एक कारखाने में पर्स के धागे काटने के काम के लिए एक साझा रिक्शा लेती है। सप्ताह में छह दिन, और दिन में आठ घंटे काम करने के बदले उनको प्रति माह 5,500 मिलते हैं।

 

 

हालांकि इसकी शिकायत वह नहीं करती। यह एक ऐसी महिला की नियमित आय है, जो केवल छठी कक्षा तक पढ़ी है। यहां कई महिलाओं के विपरीत जो काम करने के लिए चलना पसंद करते हैं, मोमीना एक साझा रिक्शा लेती है, और प्रत्येक तरफ का किराया पांच रुपये देती है। लेकिन उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है, क्योंकि काम के स्थान तक वह पैदल नहीं जा सकती, बहुत दूर है।

 

भारत की महिलाएं रोजगार की बढ़ती दर से बाहर निकलने का विकल्प चुन रही हैं। पिछले 10 साल से 2011 तक ( जनगणना का पिछला वर्ष ) शैक्षिक प्राप्ति और आर्थिक वृद्धि के समय में 19.6 मीलियन महिलाएं नौकरी के नक्शे से बाहर हुई हैं।  24 फीसदी पर, दक्षिण एशिया में भारत की महिला श्रम शक्ति भागीदारी अब दूसरी सबसे कम है। भारत का स्थान केवल पाकिस्तान से बेहतर है।

 

भारत में अधिक संख्या में महिलाओं के द्वारा नौकरी छोड़ने के कारणों पर इंडियास्पेंड की चल रही राष्ट्रव्यापी जांच (भाग 1, भाग 2, भाग 3, भाग 4, भाग 5, भाग 6, भाग 7 और भाग 8 पढ़ें) से सामाजिक व्यवहार के बोझ से लेकर घर के काम-काज तक बाधाओं की जटिल परतों का पता चलता है।

 

श्रृंखला 9 के भाग में हम भौतिक बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से परिवहन, और आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी के बीच संबंध को समझने के लिए दिल्ली के बाहरी इलाके में एक पुनर्वास कॉलोनी की यात्रा कर रहे हैं।

 

भारत की राजधानी में 45 पुनर्वास कालोनियों की तरह बवाना (आबादी: 73,680) स्थित है। जब सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के प्रदूषणकारी उद्योगों को बाहर जाने का आदेश दिया, तो वे यहां आए थे। जब मलिन बस्तियों को ध्वस्त कर दिया गया और बेघर हो गए, तो वे यहां भी आए।

 

भारत भर में, जबरदस्ती बेदखली में महिलाओं की लागत उच्च होती है। उदाहरण के लिए, यदि झुग्गी, जहां एक घरेलू काम करने वाली रहती है, और शहर के बाहरी इलाके में उसे स्थानांतरित किया जाता है, तो लागत और समय को देखते हुए उसके काम करने के लिए 40 किमी या उससे भी ज्यादा की यात्रा करने में सक्षम होने की संभावना नहीं लगती है। और अतत:, वह नौकरी छोड़ देती हैं और कम भुगतान वाला कोई विकल्प चुनती हैं , जो उसके आवास के निकटतम होता है।

 

जनगणना 2011 द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि पुरुषों और महिलाओं को काम करने के बहुत अलग तरीके हैं, इंडियास्पेंड द्वारा कहानी यहां बताई गई है।

 

भारत के महानगरों में, महिलाएं छोटी दूरी की यात्रा करती हैं, साथ ही काम तक जाने के लिए पैदल चलने या बस से यात्रा करने को प्राथमिकता देती है। पुरुष साइकिल, दोपहिया और चार पहिया वाहनों को अधिक प्राथमिकता देते हैं।

 

भारत भर में, केवल 22 फीसदी महिलाएं काम के लिए यात्रा करती हैं। दिल्ली में, 2011 की जनगणना के मुताबिक, यह सिर्फ 15 फीसदी है। सुरक्षित नागरिकों का समर्थन करने वाली एनजीओ सेफ्टीपिन की कल्पना विश्वनाथ कहती हैं, “महिलाओं की पसंद, चाहे नौकरियों के लिए या कॉलेजों के लिए, अक्सर दूरी के आधार पर तय होती है।”

 

उदाहरण के लिए, विश्वनाथ कहते हैं, “अर्थशास्त्री गिरिजा बोरकर के एक 2017 के अध्ययन ने पाया गया है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में यात्रा की दूरी को कम और सुरक्षित देखते हुए महिलाओं ने वास्तव में निम्न श्रेणी के कॉलेजों को चुना है।

 

विश्वनाथन कहते हैं कि जब सार्वजनिक परिवहन अविश्वसनीय या अपरिवर्तनीय होते हैं तो महिलाओं को कम भुगतान करने वाले नौकरियों के पक्ष में विचार करना पड़ता है। घर से बेहतर रोजगार के अवसरों को छोड़ना पड़ सकता है।

 

पुरुषों और महिलाओं ने भी सार्वजनिक परिवहन का बहुत अलग उपयोग किया है, जैसा कि ‘परिवहन और विकास नीति संस्थान’ (आईटीडीपी) और ‘सेफ्टिपिन’ द्वारा दिसंबर 2017 की रिपोर्ट, ‘वुमन एंड ट्रांसपोर्ट इन इंडियन सिटीज’ द्वारा पाया गया है। उदाहरण के लिए, महिलाएं एक ही यात्रा के भीतर कई जगहों को संयोजित करती हैं – कार्यालय से वापस रास्ते पर किराने का सामान लेने के लिए, या बच्चे को काम करने के रास्ते पर चाइल्डकैअर पर छोड़ना आदि।

 

शहरी नियोजक और रिपोर्ट के प्रमुख लेखक सोनल शाह कहती हैं, “लिंग-उत्तरदायी परिवहन न केवल पुरुषों और महिलाओं की यात्रा के रास्ते में अंतर को पहचानता है, बल्कि महिलाओं और लड़कियों को उपयोगकर्ताओं, परिवहन श्रमिकों और निर्णय लेने वालों के समान असमानताओं को भी संबोधित करता है।” इस तरह के दृष्टिकोण का लक्ष्य महिलाओं और लड़कियों को सामाजिक और आर्थिक अवसरों तक पहुंच बढ़ाना है।”

 

सुरक्षा चिंताओं का मतलब है कि महिलाएं घर नहीं छोड़ सकती हैं!

 

2000 के दशक के शुरुआती दिनों में मोमीना का परिवार यमुना पुश्ता से बावाना चले गए थे। गली से दूसरे घरों की तरह ही उनके घर में भी कोई शौचालय नहीं था। क्योंकि उसकी बेटी को सामुदायिक शौचालय तक नहीं ले जाया जा सकता था, मोमीना का काम और बढ़ जाता था। मोमीना का ज्यादा समय रोज चादरें धोने में जाता। यहां के अन्य निवासियों की तरह, उसे हर सुबह दो घंटे पानी मिलता था।

 

1995 में विश्व बैंक के एक अध्ययन में लिखा गया है, “सार्वजनिक नीति श्रम के घरेलू विभाजन में असमानताओं को संबोधित कर सकती है, जो बिना भुगतान के काम करने वाली महिलाओं के समय को कम करता है।” बेहतर पानी, स्वच्छता, विद्युतीकरण और सार्वजनिक परिवहन नीति के हस्तक्षेप के उदाहरण हैं जो महिलाएं आय-उत्पन्न, आय-संवर्धन और आय-बचत गतिविधियों के लिए अपना अधिक समय समर्पित करने में सक्षम बनाएगी।

 

मोमीना का घर ,झुग्गी के बीच एक तरह की कई कीर्ण गलियों में से एक पर स्थित है जहं खुले नाले, बकरियों और मुर्गियां नजर आती हैं। पास ही कचरे के ढेर लगे हुए हैं और हर जगह मक्खियां हैं।

 

लेकिन स्वच्छता की कमी से ज्यादा, अधिकांश माता-पिता के लिए, बड़ी चिंता यह है कि सुरक्षा की कमी है। देश में सर्वाधिक अपराध-विस्फोट वाले शहर में सबसे अधिक अपराध-विच्छेद वाले क्षेत्र के रूप में वर्णित और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, बाहरी दिल्ली (बावाना सहित) में 1 जून 2014 और 31 मार्च 2015 के बीच 1,093 बच्चों (औसतन एक दिन में तीन का ) अपहरण हुआ है।

 

माता-पिता के लिए, इसका अर्थ असाधारण सतर्कता है। मोमीना की छोटी बेटी की देखभाल उसकी बड़ी बेटी करती है, जो सातवीं कक्षा में है। मोमाना के माता-पिता उसके घर के ऊपर रहते हैं और वे लड़कियों पर नजर रखते हैं। जब मोमीना बाहर जाती हैं तो क्या वो बेटी की सुरक्षा के बारे में चिंतित रहती हैं? इसके जवाब में मोमीना के कंधा उचकाया और सोचती रही।

 

शफीकन का पति भी नियमित नौकरी नहीं करता है। इसलिए उसे घर की आय में पूरक की जरूरत है और इसके लिए वह घर पर अगरबत्ती (धूप की छड़ी) पैक करती है। आकार के अनुसार उन्हें छांटने के बाद, उन्हें लगभग 44 समान आकार के अगरबत्ती के बंडल बनाना पड़ता है, इनमें से छह बंडलों को तंग, प्लास्टिक शीथ कवर में डाला जाता है। 1000 के प्रत्येक छह बंडल के लिए उन्हें 25 रुपये का भुगतान किया जाता है।

 

वह कहती हैं, “यह बहुत कठिन काम है, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं है क्योंकि मैं बाहर नहीं जा सकती और काम नहीं कर सकती, जब तक कि मेरी बेटी की शादी नहीं हो जाती है”।

 

एक समय में, बवाना प्लास्टिक के खिलौने, जूते, हैंडबैग, वस्त्र, पंखे, लाइट बल्ब, बिस्कुट आदि के छोटे और मध्यम उद्यमों के साथ दिल्ली के बड़े औद्योगिक केंद्र बनाने के विचार के साथ शुरु किया गया था। लेकिन यह सपना काफी अमल में नहीं आया और एक रिपोर्ट के अनुसार, 16,500 में से 5000 से अधिक कारखानों और औद्योगिक भूखंड या तो रिक्त हैं या परिचालन में नहीं हैं।

 

महिलाओं को कारखाने की नौकरियां पसंद हैं, क्योंकि वे घर पर थोड़े-थोड़े समय पर बेहतर काम कर लेती हैं, भले ही अधिकतर 14,052 रूपए के कानूनी तौर पर अनिवार्य न्यूनतम मजदूरी का एक तिहाई भुगतान मिलता है।

 

छठी कक्षा के बाद स्कूल छोड़ने वाली जमुना कुमारी ने 13 साल की उम्र से विभिन्न कारखानों में काम किया है। वह एक रेडीमेड गारमेंट्स फैक्ट्री में 8,500 रुपये कमाती हैं और प्रति दिन आठ घंटे और सप्ताह में छह दिन काम करती हैं।

 

जमुना के माता-पिता दोनों और दो बड़ी बहनें भी कारखाने में काम करती हैं। सबसे छोटी बहन की उम्र 11 वर्ष हैं और वह अब भी स्कूल में है। रात का खाना तैयार करने की जिम्मेदारी इस बहन पर पड़ती है। जमुना बताती हैं “किसी को खाना बनाना पड़ता है, क्योंकि जब हम वापस आते हैं तो काफी थके हुए होते हैं।”

 

वह आगे बताती हैं, “लड़कों के झुंड ने भद्दी टिप्पणी की थी, लेकिन यह एक दैनिक खतरा है जिसे उसने अनदेखा करना सीखा है।

 

दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों पर यौन उत्पीड़न अब बहुत सामान्य है कि यह एक स्टीरियोटाइप बन गया है।

 

सार्वजनिक स्थानों पर यौन उत्पीड़न बड़े पैमाने पर है और 85.4 फीसदी महिलाओं के लिए भारी चिंता का विषय है ( हिंसक शारीरिक हमले का भय और यहां तक ​​कि बलात्कार का भी डर  ), जैसा कि 2010 में दिल्ली के एनजीओ ‘जागोरी’ ने दिल्ली में 5010 महिलाओं और पुरुषों के अध्ययन में पाया है।

 

पिछले साल के मुकाबले, करीब तीन में से दो महिलाओं ने दो से पांच बार यौन शोषण का सामना किया है। उत्पीड़न दिन और रात, बसों, सार्वजनिक परिवहन और सड़कों पर ज्यादा होने की सूचना दी गई है, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।

 

2016 में जारी ऐक्शनएड की एक अन्य रिपोर्ट में पाया गया कि सर्वेक्षण में 79 फीसदी महिलाओं ने किसी तरह के उत्पीड़न का अनुभव किया था।

 

महिलाओं  ने जहां की यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट

महिलाएं क्यों असुरक्षित महसूस करती हैं?

सुरक्षित परिवहन व्यवस्था से महिलाओं को लाभ

 

दिसंबर 2012 में दिल्ली में बस में एक युवा मेडिकल छात्र की सामूहिक बलात्कार और हत्या के परिणामस्वरूप सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा पर ध्यान दिया गया है। 32 शहरों में जीपीएस ट्रैकिंग और वीडियो रिकॉर्डिंग से विभिन्न योजनाओं की घोषणा की गई है ( महाराष्ट्र में 2016 में महिला चालकों और कंडक्टर के साथ केवल ‘तेजस्विनी’ बसें )।

 

अर्बन प्लैनर सोनल शाह कहती हैं, “हमें वर्तमान में आर्थिक विकास और अधिकार आधारित दृष्टिकोण से काम करने की जरूरत है। निश्चित रूप से परिवहन एक आधार है जो महिलाओं को कार्यबल में भाग लेने की अनुमति देता है।”

 

बवाना में रहने वाली और ‘जागोरी’ के साथ काम करने वाली राधा कहती है, फिर भी, कारखाने युवा महिलाओं को काम पर रखने के लिए पसंद करते हैं। इसके कारण कई हैं: महिला श्रमिकों को कम भुगतान किया जाता है, और वे आम तौर पर उनके अधिकारों के लिए संघटन या आंदोलन नहीं करते हैं। जब 21 फरवरी, 2018 को एक फायरक्रैकर स्टोरेज यूनिट में आग लग गई, तब 17 में से 10 श्रमिक मारे गए थे।

 

राधा आगे बताती हैं, महिलाओं को कारखानों में काम करने में कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि यह उनके सीमित शिक्षा पर सबसे अच्छा काम है। लेकिन 40 के बाद, कारखानों में किसी भी काम को प्राप्त करना असंभव है।

 

आरती देवी को कुछ छह महीने पहने नौकरी से निकाला गया था, और अब पंखे की फैक्ट्री में टुकड़े जोड़ने का काम करती है। वह प्लास्टिक के हिस्से को जमा करती हैं जिसे ‘कंडक्टर’ कहते है और हर 1000 ‘कंडक्टर’ के लिए 90 रुपये कमाती हैं।

 

यह एक ऐसी नौकरी है जो उसकी आंखों में तनाव पैदा करती है, और, जब उसके बच्चे घर पर होते हैं, तो वे सब इस काम में  मदद करते हैं।

 

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आरती देवी पंखे की फैक्ट्री में टुकड़े जोड़ने का काम करती है। वह प्लास्टिक के हिस्से को जमा करती हैं जिसे ‘कंडक्टर’ कहते है और हर 1000 ‘कंडक्टर’ के लिए 90 रुपये कमाती हैं। यह एक ऐसी नौकरी है जो उनकी आंखों में तनाव पैदा करती है, और, जब उसके बच्चे घर पर होते हैं, वे सब इस काम में मदद करते हैं।

 

नौकरी बाजार में मामूली उतार-चढ़ाव से महिलाएं महसूस करती हैं असुरक्षित

 

नोटबंदी के तुरंत बाद, कई महिलाओं और उनके पतियों की नौकरियां चली गई थी। जमुना कहती हैं, “मैं बिना किसी काम के पांच महीनों तक घर पर बैठ गई। यह एक बहुत ही ख़राब समय था।”

 

भारतीय महिलाओं का श्रमबल से बाहर होने के कारणों पर देश भर में चल रही हमारी पड़ताल का यह आठवां लेख है।

 

पहले के लेख आप यहां पढ़ सकते हैं:-

 

क्यों भारतीय कार्यस्थलों में कम हो रही है महिलाओं की संख्या –

नौकरी पर महिलाएं : हरियाणा की एक फैक्टरी में उम्मीद के साथ परंपरा का टकराव

घरेलू कामों के दवाब से महिलाओं के लिए बाहर काम करना मुश्किल, मगर अब बदल रही है स्थिति

भारत की शिक्षित महिलाएं ज्यादा छोड़ रही हैं नौकरियां

हिमाचल प्रदेश की महिलाएं क्यों करती हैं काम: एक जैम फैक्टरी के पास है इसका जवाब

भारत में जज से लेकर श्रमिकों तक यौन उत्पीड़न का दंश

 

(भंडारे पत्रकार हैं, दिल्ली में रहती हैं और अक्सर भारत के लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 7 अप्रैल, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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