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देश के लिए स्वच्छ हवा और यहां कोयले की आदत को कम करने के लिए क्या कर सकता है 2019 का बजट ?

भास्कर त्रिपाठी,
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The International Labiour Organisation estimates that 300,000 workers would be employed directly in the solar and wind sectors in India by 2022. (File Photo: UN)
 

नई दिल्ली: नवीकरणीय उर्जा के विस्तार के लिए दुनिया के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक भारत के पास है- अगले चार वर्षों में क्षमता को दोगुना करना- लेकिन 175 कोयले से चलने वाले प्लांट के समकक्ष बदलने के लिए भारत का 2022 का महत्वपूर्ण लक्ष्य ट्रैक से मुड़ रहा है।

 

01 फरवरी, 2019 को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पास चीजों को पटरी पर लाने का एक मौका है, जो भारत को कोयले की लत को कम करने में मदद कर सकता है और देश की हवा को शुद्ध करने में मदद कर सकता है । साथ ही देश वैश्विक जलवायु-परिवर्तन प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सकता है, क्योंकि भारत दुनिया के चौथे सबसे तेजी से बढ़ते कार्बन प्रदूषण फैलाने वाला देश है।

 

चार वर्षों से 2017 तक रीन्यूअबल की स्थापित क्षमता में रिकॉर्ड वृद्धि के बाद, 2018 में क्षमता वृद्धि धीमी हुई है। इसके मुख्य कारण है, घरेलू विनिर्माण में मदद करने के लिए आयातित सौर मॉड्यूल पर सरकार द्वारा लगाया गया एक एंटी-डंपिंग शुल्क,  माल और सेवा कर (जीएसटी) के तहत कराधान की उच्च दर और बहुत हद तक अस्पष्ट नीति।

 

इसलिए, 2019 के आम चुनावों से पहले का अंतिम बजट रीन्युअबल क्षेत्र के लिए विशेष महत्व रखता है, जिसमें सौर, पवन, पनबिजली और जैव ऊर्जा से बिजली शामिल है।

 

ये वे कुछ मुद्दे हैं, जिन पर बजट को फोकस करना चाहिए:

  • 2018 में कम गति होने के कारण, सरकार को पिछले चार वर्षों के लिए अपनी औसत गति की तुलना में हर महीने 3.5 गुना अधिक क्षमता स्थापित करनी होगी।
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  • आयातित सौर मॉड्यूल (जो देश की जरूरत के 80 फीसदी  से अधिक को पूरा करता है) पर एक नया शुल्क उत्पादन लागत में वृद्धि करता है और कोयले के खिलाफ सौर टैरिफ की प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाता है।
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  • सौर मॉड्यूल और सेवाओं पर उच्च जीएसटी दर निवेशकों और निर्माताओं को दूर कर रही है। सेक्टर से अनिश्चितता को दूर करने के लिए दीर्घकालिक नीति में देरी नए निवेश को रोक रही है।

 
बजट क्यों महत्वपूर्ण है रीन्यूअबल?
 
 

नीतिगत मुद्दों को हल करना महत्वपूर्ण है, यदि भारत को पेरिस जलवायु समझौते-2015 के तहत 2022 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का 175 गीगा वाट (जीडब्ल्यू) स्थापित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करना है। हम बता दें कि एक जीडब्ल्यू 1000 मेगा वाट (मेगावाट) है। यह प्रत्येक 1,000 मेगावाट के 175 कोयला आधारित बिजली प्लांट को बदलने और जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता को कम करने के लिए पर्याप्त है। भारत की 80 फीसदी से अधिक बिजली जीवाश्म ईंधन से आती है, जो ग्रीनहाउस गैसों का उत्पादन करती है और ग्लोबल वार्मिंग को तेज करती है।

 

रीन्यूअबल लक्ष्य तक पहुंचना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत के लिए एक नया रास्ता खोलेगा,जहां हम गैर-जीवाश्म स्रोतों से, वर्तमान के 11 फीसदी की तुलना में 40 फीसदी बिजली प्राप्त करने के 2030 के लक्ष्य को प्राप्त करेंगे।

 

रीन्यूअबल से एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य समस्या भी हल होगी। वायु प्रदूषण, प्रत्येक आठ मौतों में से एक के लिए जिम्मेदार और इससे वर्ष 2017 में भारत में 12.4 लाख जिंदगियों का नुकसान हुआ है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 7 दिसंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। भारत सरकार के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के अनुसार कोयला बिजली प्लांट के रूप में भारत के प्रमुख वायु प्रदूषक को हटाने में दिसंबर 2017 की समय सीमा से चूक गए और समय सीमा पांच साल बढ़ाकर 2022 कर दी गई। स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाना जहरीली हवा से लड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। 10 जनवरी, 2019 को लॉन्च, एसीएपी का लक्ष्य राष्ट्रीय प्रदूषण के स्तर को पांच वर्षों से 2024 तक 20-30 फीसदी घटाना है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के 2022 रीन्यूअबल के लक्ष्य में 100 गीगावॉट सौर और 60 गीगावॉट पवन ऊर्जा से आने वाले हैं। भारत ने अक्टूबर 2018 तक 74 जीडब्लू अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित की है।अक्टूबर 2018 तक, नवीकरणीय ऊर्जा ने भारत की बिजली उत्पादन क्षमता का 340 जीडब्लू का 21 फीसदी का गठन किया है। यह आंकड़ा 2014-जब भाजपा सत्ता में आई- तब से 13 फीसदी से ऊपर है। उस कार्य को प्राप्त करने के लिए, जिसे भाजपा सरकार ने अपने लिए निर्धारित किया है- 2022 तक 175 जीडब्लू  स्थापित करना – इसके लिए मार्च 2022 तक हर महीने 2 जी डब्लू  अक्षय क्षमता से अधिक स्थापित करना होगा, जैसा कि सरकारी आंकड़ों पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है। यह सरकार की वर्तमान औसत गति से 3.5 गुना अधिक है, जैसा कि हमने मार्च 2014 के बाद से हर महीने लगभग 0.6 जीडब्लू (600 एमडब्लू) क्षमता स्थापित करने की बात कही है।

 

12 महीने से अक्टूबर 2018 तक, भारत ने लगभग 13 जीडब्लू क्षमता स्थापित की, जो पिछले वर्ष 15 जीडब्लू से 15 फीसदी कम थी।

 

 विशेषज्ञों का कहना है कि, इस कम रफ्तार पर ध्यान देने की जरूरत है,  अगर सरकार 2022 नवीकरण लक्ष्य तक पहुंचना चाहती है और इसके लिए बजट में ध्यान देने की आवश्यकता है।

 

भारत में रीन्यूअबल क्षमता की वृद्धि, 2015-18

भारत की विद्युत उत्पादन क्षमता, 2018

 

Source: Ministry Of New And Renewable Energy

 

स्रोत अनुसार, भारत में स्थापित रीन्यूअबल क्षमता

 

दुनिया के साथ तुलनात्मक रूप से भारत
 
 

भारत अक्षय ऊर्जा के समग्र व्यय और वृद्धि के मामले में अपने पड़ोसी चीन से पीछे है। चीन की सरकार की योजना चार साल में 2020 तक रीन्यूअबल वस्तुओं पर लगभग 25 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की है, यानी प्रति वर्ष लगभग 6 लाख करोड़ रुपये है। जबकि भारत के नवीकरणीय मंत्रालय ने अपने आखिरी बजट 2018-19 में लगभग 5,146 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव रखा था। दूसरी तरह से देखें तो,रीन्यूअबल के लिए चीन का वार्षिक बजट भारत की तुलना में 128 गुना अधिक है। 2017 तक, चीन में नवीकरणीय स्थापित क्षमता की 650 गीगावॉट थी, भारत की 18 फीसदी की तुलना में अपनी कुल ऊर्जा उत्पादन क्षमता का 36 फीसदी।  भारत हरित ऊर्जा में नए निवेश के मामले में भी चीन से पीछे है। 2017 में, भारत के 75,500 करोड़ रुपये के मुकाबले चीन ने 9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे। इसका मतलब है कि भारत के स्वच्छ ऊर्जा पर खर्च किए गए प्रत्येक एक डॉलर पर चीन ने 12 डॉलर खर्च किए थे, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र, ब्लूमबर्ग न्यू एनर्जी फाइनेंस और फ्रैंकफर्ट स्कूल-यूएनईपी कॉलेबोरेटिंग सेंटर फॉर क्लाइमेट एंड सस्टेनेबल एनर्जी फाइनेंस की 2018 की रिपोर्ट से पता चलता है।  \

 

रीन्यूअबल फंडिंग : एनडीए सरकार बनाम यूपीए 

 

भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के तहत नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के वित्त पोषण में, चार साल से वित्तीय वर्ष 2017-18 तक 600 फीसदी की वृद्धि हुई है, जैसा कि मंत्रालय के संशोधित बजट अनुमानों पर इंडियास्पेंड विश्लेषण से पता चलता है।

 

नई और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के लिए संशोधित बजट अनुमान

 

प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के तहत, एमएनआरई ने वित्त वर्ष 2011-12 में अपनी उच्चतम बजट निधि, लगभग 1,200 करोड़ रुपये प्राप्त की। संशोधित अनुमानों के विश्लेषण के अनुसार, मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2016-17 में नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार के तहत सबसे अधिक धनराशि प्राप्त की, करीब 4,300 करोड़ रुपये, जो यूपीए में प्राप्त राशि से लगभग 3.5 गुना अधिक है।

 

यूपीए के सबसे अधिक खर्च करने वाले वर्ष के अंतर्गत कुल बजट के अनुपात में नवीकरणीय के लिए बजट 0.09 फीसदी था, जबकि एनडीए के सबसे उच्चतम-व्यय वाले वर्ष में यह 0.21 फीसदी था।

 

अक्षय क्षेत्र की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए?
 

जैसा कि हमने कहा, 2018 में नवीकरणीय ऊर्जा में रफ्तार की कमी का एक मुख्य कारण घरेलू विनिर्माण को बचाने के लिए आयातित सौर मॉड्यूल पर एंटी-डंपिंग शुल्क, जीएसटी कराधान की उच्च दर और नीति की अनिश्चितता है। डंपिंग रोधी या ‘सुरक्षित गार्ड’ शुल्क के ‘तदर्थ उपाय’ ने देश में अक्षय क्षेत्र में निवेश के लिए अनिश्चितताएं पैदा कीं, जैसा कि दिल्ली स्थित थिंक-टैंक, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के सलाहकार-ऊर्जा प्रियव्रत भाटी ने इंडियास्पेंड को बताया है। ड्यूटी ने चीन और मलेशिया से आने वाले सेल और मॉड्यूल को महंगा कर दिया। जैसा कि हमने कहा, ये देश भारत की 80 फीसदी से अधिक जरूरतों को पूरा करते हैं।  यह शुल्क भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र को 2022 तक 100 गीगावाट (जीडब्ल्यू) तक पहुंचने के लिए अगले चार वर्षों में चौगुनी क्षमता के लक्ष्य को पूरा करने से रोक सकता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 20 जुलाई, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। आगामी बजट में इस शुल्क से संबंधित मुद्दों को संबोधित किया जा सकता है और सौर-मॉड्यूल विनिर्माण और भंडारण, या क्षमता, में घरेलू क्षमता बनाने में मदद करने के लिए घरेलू अनुसंधान और विकास के लिए नवीकरणीय क्षेत्र के लिए बहुत जरूरी बीज धन प्रदान कर सकता है, जैसा कि भाटी ने बताया है।

 

अक्षय ऊर्जा उत्पादन के लिए उपकरण पहले टैक्स ब्रेक के अधीन थे, जैसे कि सौर मॉड्यूल के लिए मूल सीमा शुल्क। अब जीएसटी के तहत इस पर 5 फीसदी कर लगता है। इसने सौर ऊर्जा का प्रति किलो वाट-घंटा (यूनिट) उत्पादन बढ़ाकर जीवाश्म ईंधन के खिलाफ अक्षय ऊर्जा की प्रतिस्पर्धा को कम कर दिया है, जैसा कि इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट ( आईआईएसडी ) के वरिष्ठ ऊर्जा विशेषज्ञ, विभूति गर्ग कहते हैं।

 

 जीएसटी ने अलग-अलग सेवाओं के लिए अलग-अलग कर दरों के साथ सौर क्षेत्र में बहुत भ्रम पैदा किया है। अक्षय परियोजनाओं की एक इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (ईपीसी) कंपनी के एक अधिकारी ने अक्टूबर 2018 में एक उद्योग प्रकाशन, मेरकॉम इंडिया को बताया कि “अगर हम कम्पलीट सॉल्यूशन बेच देते हैं, तो उसकी जीएसटी दर 5 प्रतिशत है। लेकिन अगर हम इसे अलग करते हैं और ग्राहक को अलग से प्रदान करते हैं, तो इसके कम्पोनन्ट्स पर 18% जीएसटी दर होगी।”आगामी बजट से सेक्टर से नीतिगत अनिश्चितताओं को दूर करने में मदद मिल सकती है और “इस क्षेत्र के लिए लंबी अवधि के लिए आश्वस्ता मिल सकती है,” जैसा कि यस बैंक में स्थायी निवेश बैंकिंग के कार्यकारी उपाध्यक्ष दानिश वर्मा ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

वर्मा ने कहा कि सरकार बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के वित्तीय स्वास्थ्य में सुधार नहीं कर पाई है। उन्होंने आगे बताया कि काम कर रहा डिस्कॉम नवीकरणीय क्षेत्र में “विकास का मूल है, इसलिए इसे ‘तत्काल’ सरकारी धन सहायता की आवश्यकता है।

 

भाटी ने कहा कि सरकार को पवन ऊर्जा के लिए अपने लक्ष्य और फंडिंग को भी बढ़ाना चाहिए, क्योंकि यह सौर के विपरीत, चौबीसों घंटे काम कर सकता है।

 
(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 जनवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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