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देश से टीबी कैसे खत्म हो, यह आप इडुक्की से पूछें !

मेनका राव,
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इडुक्की, केरल:  2006 में , तपेदिक (टीबी) नियंत्रण के संबंध में केरल के इडुक्की जिला का सबसे बद्तर प्रदर्शन था। सुंदर पहाड़ी जिला, मुन्नार और थेक्कडी के अपने पर्यटन स्थलों के लिए प्रसिद्ध इलाके में अपेक्षाकृत खराब सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली है। उस समय जिले में 100,000 आबादी पर केवल 17 टीबी के मामलों का पता लगा था, जो संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) के मुताबिक अपेक्षा से कम था। आरएनटीसीपी ने दक्षिण भारत में प्रति 100,000 लोगों पर 50 मामलों के होने की आशंका जताई थी।

 

हालांकि, 2006 में, जिला टीबी केंद्र ने निदान और उपचार तक पहुंच में सुधार के लिए चिकित्सा अधिकारियों और प्रयोगशाला तकनीशियनों की सभी रिक्तियों को भरने का फैसला किया। इसने 2006 में ही, टीबी के लिए ‘एक्टिव केस-फाइंडिंग’ शुरू की। यह प्रक्रिया वर्ष 2017 में देश भर में शुरू किया गया। इससे 2009 तक पाए गए मामलों की संख्या में प्रारंभिक वृद्धि हुई, जिसके बाद जिला टीबी केंद्र के अनुसार संख्या 100,000 लोगों पर 51 मामले थे। इसके विपरीत,  वर्ष 2017 के आरएनटीसीपी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में टीबी की पहचान दर प्रति 100,000 लोगों पर 138 मामले का है।

 

इससे पता चलता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे और इसके उपयोग में कितने मामूली सुधार से भारत में टीबी रोकने प्रयासों में मिल सकती है मदद।
 

 टीबी की सबसे कम घटनाओं के साथ इडुक्की अब पांच जिलों में से एक है, जहां केंद्रीय टीबी डिवीजन टीबी उन्मूलन के अंतिम लक्ष्य को कवर करने के लिए आरएनटीसीपी की रणनीतियों को लागू किया गया है।  राज्य के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सलाहकार शिबू बालकृष्णन कहते हैं, “इडुक्की प्रयोगशाला है, जहां हमने अपने सभी विचारों का परीक्षण किया।” बालाकृष्णन ने डिप्टी जिला चिकित्सा अधिकारी सुरेश वर्गीस के साथ मिलकर काम किया है, जिनके साथ उन्होंने रोगियों की संख्या कम करने के लिए अपने विचार साझा किए। परिणाम प्राप्त करने में प्रेरित स्वास्थ्य सेवाकर्मियों की तत्परता को प्रमाणित किया। वह कहते हैं,  “जब भी टीबी नियंत्रण के लिए केरल में किसी भी नई रणनीति लागू करनी होती है, तो इसे आम तौर पर पूरे राज्य में लागू करने से पहले इडुक्की में एक बार कोशिश की जाती है।” इंडियास्पेंड की ओर से चार आलेकों वाली श्रृंखला में 2020 तक टीबी मामलों की संख्या को 2020 तक कम करने और मौत की संख्या को शून्य तक कम करने के लिए केरल की महत्वाकांक्षी योजनाओं को ट्रैक किया जा रहा है। श्रृंखला के इस दूसरे भाग में, हम देकेंगे कि कैसे इडुक्की जिले में जारी रणनीतियां टीबी को खत्म करने के साधनों के तौर पर समझना जरूरी, खासकर उन इलाकों में जहां प्रचाक-प्रसार कम है।

 

इडुक्की के डिप्टी जिला चिकित्सा अधिकारी सुरेश वर्गीस, जिले में ‘वल्नरबिलिटी मैपिंग’  के दौरान एकत्र किए गए आंकड़ों को दिखाते हुए।

 

बद्तर से बेहतर तक

 

केरल के बाकी हिस्सों की तुलना में इडुक्की में ऐतिहासिक रूप से बद्तर स्वास्थ्य हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर था – उदाहरण के लिए, 1995 में, केरल के सरकारी अस्पताल में प्रति 1,00,000 आबादी पर 93 बिस्तर थे। 2013 में, सरकारी रिकॉर्ड दिखाते हैं कि केरल के अन्य जिलों की तुलना में इडुक्की के पास सबसे कम डॉक्टर (177) और सबसे कम बिस्तर (1,085) थे। यह केरल के कुछ जिलों में से एक है, जहां मेडिकल कॉलेज या तृतीयक सार्वजनिक अस्पताल नहीं हैं। इसलिए अगर कोई गंभीर बीमारी, जैसे कि हार्ट अटैक जैसी बीमारी का शिकार होता है तो और उसे सुपरस्पेशियलिटी उपचार की आवश्यकता है तो उन्हें से 100 किमी से अधिक कोच्चि शहर तक की यात्रा करनी पड़ती है।

 

जिला टीबी अधिकारी अनूप के. ने इंडियास्पेंड को बताया, “हमारे जिले में निजी क्षेत्र में भी न्यूरोलॉजिस्ट नहीं है। हमारे पास निजी क्षेत्र में कुछ हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। हाल ही में मुझे दवा प्रतिरोधी तपेदिक समीक्षा बैठक के हिस्सा के लिए जिला के बाहर से न्यूरोलॉजिस्ट की व्यवस्था करनी पड़ी, जहां हम दवा प्रतिरोधी तपेदिक के साथ सभी रोगियों का मूल्यांकन करते थे और उपचार को मंजूरी देते थे। “

 

2006 में, इडुक्की अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में गंभीर मानव संसाधनों की कमी के साथ संघर्ष कर रहा था। हालांकि 21 केंद्र (ज्यादातर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों) में बलगम माइक्रोस्कोपी का संचालन करने के लिए उपकरण थे। वर्गीस ने इंडियास्पेंड को बताया, “मूल टीबी परीक्षण जिसमें प्रयोगशाला तकनीशियन एक रोगी के शुक्राणु में टीबी बेसिलि की तलाश करता है, केवल पांच का उपयोग पूर्ण क्षमता में किया जा रहा था। प्रयोगशालाएं इसलिए काम नहीं कर रहीं थीं, क्योंकि चिकित्सा अधिकारी या प्रयोगशाला तकनीशियन वहां तैनात नहीं थे।” नतीजतन, जिला एक वर्ष में प्रति 100,000 लोगों पर 500 टीबी संदिग्धों के नमूने का परीक्षण कर रहा था। अगले कुछ वर्षों में, जिला प्रशासन ने खाली पदों को भर दिया। अधिक नमूनों का परीक्षण शुरू किया गया, और 2015 तक, प्रति 100,000 आबादी पर करीब 1,400 नमूने परीक्षण किए जा रहे थे। राष्ट्रीय औसत अब लगभग 700 नमूने हैं।  अनूप कहते हैं, “अब रिक्तियां कम हैं या ज्यादार पद भरे हुए हैं। अच्छी सड़कों से जुड़ जाने के कारण डॉक्टर यहां स्थानांतरित होने के इच्छुक हैं। “नवंबर 2017 में, राज्य सरकार ने टीबी के लक्षणों और ‘वल्नरबिलिटी मैपिंग’  , विशेष रूप से मधुमेह के मैपिंग के लिए लोगों की तलाश करने के लिए इडुक्की में कुड्डाथूर पंचायत की पूरी आबादी का एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर डोर-टू-डोर सर्वेक्षण किया। इस अभ्यास को फिर पूरे जिले और फिर राज्य में दोहराया गया था। टीबी मामलों की रिपोर्टिंग परीक्षण केंद्रों के मानचित्रण से पता चला कि वे जिले में एक साथ फैले हुए थे, जिससे पहुंच की एक समानता दिखाई दे रही थी। बालाकृष्णन कहते हैं,  “माइक्रोस्कोपी सेंटर्स के प्रसार ने इडुक्की जैसे पहाड़ी इलाके में एक बड़ा प्रभाव डाला था, जहां लोगों को लंबे समय की यात्रा करनी पड़ती थी। ये रोगी अन्यथा बिना पता चले ही मर गए होते।”

 

Source: Idukki District TB Centre/WHO

 
जिला टीबी केंद्र और भी माइक्रोस्कोपी सेंटर्स खोलने के इच्छुक था, लेकिन आरएनटीसीपी दिशानिर्देशों ने कहा कि जिले में प्रयोगशाला तकनीशियनों के केवल 24 पद हो सकते हैं।
 
वर्गीस ने अधिक प्रयोगशालाओं को बनाने और अधिक तकनीशियनों को किराए पर लेने के लिए निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी के लिए आवंटित धन का उपयोग करने का निर्णय लिया।
 
 भारत में जिला टीबी केंद्र ने सबसे बड़े डॉक्टरों के संगठन भारतीय मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के साथ प्रयोगशालाओं को चलाने और तकनीशियनों को किराए पर लेने के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। इसने सुनिश्चित किया कि जिले में 10 और प्रयोगशालाएं हो और वे चल रही हों। केंद्र ने निजी अस्पतालों में माइक्रोस्कोपी, एक्स-रे या सीटी स्कैन का उपयोग करके परीक्षण के लिए प्रति मामले का भुगतान करना शुरू कर दिया।
 
जिले में अब 51 माइक्रोस्कोपी सेंटर्स हैं, जिनमें सात निजी क्षेत्र में शामिल हैं।
 

 इसके अलावा, इडुक्की (और वायनाड जिले) में स्पुतम माइक्रोस्कोपी में सकारात्मक परीक्षण करने वाले सभी नमूने, दवा संवेदनशीलता या प्रतिरोध परीक्षण चलाने के लिए तिरुवनंतपुरम में इंटरमीडिएट रेफरेंस लेबोरेटरी को भेजे जा रहे है, जो केंद्रीय टीबी डिवीजन द्वारा मान्यता प्राप्त है। योजना है कि शुरुआत में ही दवा प्रतिरोध के किसी भी मामले को निपटाया जाए।

 
रोगी पर केंद्रित देखभाल
 

 सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को मजबूत करने के लिए, फ्रंट लाइन मान्यताप्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा), बहुउद्देशीय श्रमिकों और नर्सों सहित स्वास्थ्य कर्मचारियों को नियमित प्रशिक्षण दिया गया है। जिले की सबसे ऊंची श्रृंखला प्रवासी श्रमिकों की आबादी में है, जो हर साल मौसमी काम खोजने के लिए तमिलनाडु के पड़ोसी जिलों की यात्रा करते हैं। जिला टीबी केंद्र ने 2006 में उनके बीच ‘एक्टिव केस-फाइंडिंग’  का फैसला किया।

 
बालकृष्णन बताते हैं, “हमने इन श्रमिकों के पर्यवेक्षकों को लिंक श्रमिकों के रूप में नियुक्त किया है। उन्होंने बलगम के नमूने के संग्रह में मदद की और उन्हें हमारे बहुउद्देशीय श्रमिकों को सौंप दिया। ये कर्मचारी अपने जेब में नमूनों को रखकर माइक्रोस्कोपी सेंटर्स में ले जाते हैं।”

 

इन गतिविधियों ने टीबी उपचार के लिए मरीजों तक पहुंच में वृद्धि की। वे बीमार होने पर आमतौर पर एक स्वास्थ्य संस्थान का दौरा करने में देरी कर सकते थे। वर्गीस ने कहा कि हमारा प्रयास है कि जितना संभव हो सके योजना मरीज-केंद्रित हो, यहां तक ​​कि फ्रंटलाइन स्वास्थ्य श्रमिकों को भी एक ही दृष्टिकोण के लिए प्रशिक्षण देना था।

 

अपने घरों से दूर अस्पतालों की यात्रा करने वाले टीबी रोगियों के लिए इडुक्की जिला बस किराया देता है।

 
निजी डॉक्टर और सरकारी दवाएं
 
2006-07 की शुरुआत में, वर्गीस और उनकी टीम ने निजी क्षेत्र के साथ बड़े पैमाने पर नेटवर्किंग किया। उन्हें टीबी मामलों की रिपोर्ट करने और उचित निदान और उपचार देने में उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए जिला प्रशासन के साथ सहयोग करने के लिए कहा गया।
 
इडुक्की के निजी क्षेत्र में, बड़े पैमाने पर धर्मार्थ अस्पतालों और एक छोटी संख्या में निजी डॉक्टर शामिल है। निजी डॉक्टर पहले संदेह में थे। अपने काम में सरकारी हस्तक्षेप से चौकन्ने थे। लेकिन जिला टीबी सेंटर ने उन्हें आश्वासन दिया कि आरएनटीसीपी के साथ सहयोग का प्रभाव उनके मरीजों पर नहीं पड़ेगा और वास्तव में उन्हें यह सुनिश्चित करके लाभ होगा कि रोगियों ने सरकार द्वारा नियुक्त प्रत्यक्ष रूप से पर्यवेक्षित उपचार शॉर्टकोर्स (डीओटीएस) प्रदाता के नज़दीकी अवलोकन के तहत अपने उपचार के नियमों को पूरा किया है।

 

सरकार जोर नहीं देती है कि रोगी सरकारी अस्पतालों में फॉलो अप के लिए जाएं। वर्गीस बताते हैं, “हम मरीजों की पसंद में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते हैं।” “हमारी चिंता यह है कि रोगी छह महीने के लिए मानक उपचार लेता है और हमारे आवश्यक परिणाम प्राप्त करता है और यह ठीक हो जाता है।”
 
वर्गीस ने कहा कि पिछले साल, इडुक्की में कुल टीबी मामलों में से लगभग 20 फीसदी निजी क्षेत्र से आए थे। उन्होंने कहा, “अभी भी कुछ डॉक्टर हैं जो रिपोर्ट नहीं करते हैं। निजी क्षेत्र में दवा की बिक्री के आधार पर हमें लगभग 10 फीसदी अधिसूचनाएं चाहिए। हमारा लक्ष्य इस साल तक इस अंतर को भरना है। ”

 

2009 से मामलों में गिरावट
 

 विस्तृत स्क्रीनिंग के साथ, इडुक्की में टीबी मामलों की संख्या 2007 से 2009 तक तेजी से बढ़ी है। 2007 में, जिले में 644 मामले सामने आए, जो प्रति 100,000 पर 58 मामलों का दर है। केरल टीबी उन्मूलन मिशन रणनीति दस्तावेज के मुताबिक 2009 में यह संख्या 747 हो गई थी, जो लगभग प्रति 100,000 पर 67 का दर था। 200 9 के बाद, मामलों की संख्या में लगातार गिरावट हुई है। औसतन, हर साल 4 फीसदी तक, जैसा कि जिला टीबी केंद्र के आंकड़े बताते हैं (तालिका देखें)। 2007 में, एक टीबी मामले की पुष्टि के लिए लगभग 24 संभावित टीबी मामलों की आवश्यकता थी; यह आंकड़ा 2016 में 84 हो गया था।

 

इडुक्की में टीबी के मामले, 2007 से 2017

 

 
बालाकृष्णन आगे बताते हैं, “टीबी सेवाओं में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ करना और इसे बनाए रखना इडुक्की की सफलता की कहानी है।” उन्होंने प्रयोगशाला तकनीशियनों, डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों ( जिनमें से सभी को नियमित रूप से प्रशिक्षित किया गया है) का जिक्र करते हुए कहा कि, “हम सभी को जगह पर रखने में कामयाब रहे हैं। इन गतिविधियों ने टीबी अधिसूचना को कम करने में मदद की है।”
 

 भारत की नई टीबी उन्मूलन योजना के बीच ( 2025 तक एक मिलियन पर एक मामला कम करने के लिए ) इडुक्की ने लोगं का ध्यान अपनी ओर है। इडुक्की ने दिखाया है कि कम संसाधन वाले स्थानों में भी, रोगियों की निदान और उपचार तक पहुंच में सुधार किया जा सकता है। इससे यह भी पता चलता है कि मुश्किल इलाकों में भी कम घटना वाले क्षेत्रों में परिणाम सुधार सकते हैं।

 

बालाकृष्णन बताते हैं, ” ‘लो प्रेवलन्स सेटिंग’ में, आपको अधिक संसाधनों की आवश्यकता हो सकती है क्योंकि आपको उन स्थानों पर जाना पड़ सकता है जहां मामले हैं। यहां तक ​​कि अगर सिर्फ एक लड़का कमजोर है और उसे टीबी, तो वह मर भी सकता है। “

 

…और इडुक्की ने दिखाया है कि यह किया जा सकता है।

 
यह टीबी के खिलाफ केरल की लड़ाई पर चार आलेखें की श्रृंखला का दूसरा भाग है। पहला भाग आप यहां पढ़ सकते हैं।
 
( राव स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहती हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 9 अक्टूबर 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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