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नरेगा के दस वर्ष: क्या रहीं खूबियां और खामियां?

स्वाति नारायण,
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तमिलनाडु के विल्लिपुरम ज़िले के एक दलित इलाके से ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) के अंश के रुप में गांव के बाहरी इलाके में एक श्मशान भूमि के लिए सड़क का निर्माण करते श्रमिक। तमिलनाडु में कम से कम 86 फीसदी नरेगा श्रमिक महिलाएं हैं।

 

जन आंदोलन के परिणाम के रुप में बनाया गया एवं दुनिया का सबसे बड़ा गरीबी- विरोधी लोक निर्माण, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा), ने पिछले वर्ष, 22 फीसदी ग्रामीण घरों में रोज़गार उपलब्ध कराया है।

 

पांच वर्ष पूर्व, जब यह कार्यक्रम चरम पर था, यह योजना 55 मिलियन लोगों या हरेक तीन ग्रामीण घरों में से एक घर के लिए जीवन रेखा थी।

 

लेकिन कार्यक्रम की क्षमता अनुसार, इसका पूरा विस्तार होना अब भी बाकि है। भारत मानव विकास सर्वेक्षण 2 (IHDS2) कहती है कि वर्ष 2004-05 और 2011-12 के बीच 70 फीसदी गरीब परिवारों को नरेगा कार्यक्रम के तहत कोई रोज़गार प्राप्त नहीं हुआ है।

 

बेरोज़गारी भत्ता, जो कानून में निर्धारित की गई है, शायद ही विकल्प के रुप में भुगतान किया गया है। IHDS2 के अनुसार, फिर भी, प्राप्तकर्ता परिवारों के लिए, गरीबी में 32 फीसदी गिरावट का श्रेय अकेले नरेगा को जाता है।

 

क्यों वर्तमान में नरेगा नहीं है प्रभावी सूखा-राहत उपाय

 

2005 में लागू की गई कानून के तहत, प्रत्येक वर्ष हर परिवार को 100 दिन रोज़गार मिलने की गारंटी दी गई है। लेकिन पिछले दशक के दौरान औसतन, प्रत्येक नरेगा परिवार को 45 दिनों का ही रोज़गार प्राप्त हुआ है – यानि कि गारंटी दिए गए समय का आधा।

 

सबसे कम औसत, 38 दिन, पिछले वर्ष दर्ज की गई थी। उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में इससे भी कम औसत दर्ज किए गए हैं।

 

इसलिए, इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि हाल ही में केंद्र सरकार ने 14 सूखा-प्रभावित राज्यों में गारंटी का समय बढ़ा कर 150 दिन कर दिया है। ओडिसा में यह समय बढ़ा कर 200 दिन तक की गई है।

 

लेकिन यह सूखा-राहत उपाय के रुप में कार्य नहीं करता है। पिछले वर्ष केवल 4 फीसदी कार्यरत परिवारों को ही 100 दिन का रोज़गार मिल पाया था। जब यह अपने चरम पर था तब भी केवल 14 फीसदी परिवारों को पूरे 100 दिनों का रोज़गार प्राप्त हुआ था। इससे भी बद्तर, कुल राष्ट्रव्यापी व्यक्ति दिन – नरेगा रोज़गार का एक उपाय – पांच साल पहले अपने चरम की तुलना में (2.84 बिलियन) वर्ष 2014-15 में करीब आधे (1.49 बिलियन) हुए हैं।

 

नरेगा परिवारों के लिए औसत व्यक्ति-दिन, एवं पूरे 100 दिनों के लिए मिले रोज़गार का प्रतिशत

 

 

कानून यह भी कहता है कि श्रमिकों को 15 दिनों के भीतर ही उनके काम का भुगतान किया जाना चाहिए। पिछले वर्ष 72 फीसदी मजदूरी का भुगतान करने में देरी हुई है। इस वर्ष भी 45 फीसदी से अधिक मजदूरी भुगतान समय पर नहीं की गई है। सूखे की मार झेल रहे गांव में जो भी बचे हैं वो इंताज़ार करने की स्थिति में नहीं हैं। विलंबित भुगतान के लिए मुआवजा भी शायद ही दिया जाता है।

 

केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान जैसे कई राज्यों में, नरेगा मजदूरी, अकुशल कृषि कार्य के लिए दी जा रही न्यूनतम मजदूरी की तुलना में कम हैं। यही कारण है कि श्रमिक, विशेष कर युवा, इसकी ओर आकर्षित नहीं होते हैं एवं मजदूरी के लिए शहरी इलाकों की तरफ पलायन करते हैं। फिर भी, यह सुरक्षा तंत्र उनके सौदेबाजी की शक्ति को मजबूत करने में मददगार है।

 

महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को मदद करता है नरेगा

 

सुनील मुंडा, पूर्वी ओडिशा के सनरामली गांव के आदिवासी, छह वर्ष पहले की बात याद करते हुए बताते हैं कि “इससे पहले हमने 500 रुपए के नोट कभी नहीं देखे थे; अब हमारे बैंकों में 7000 रुपए से 8000 रुपए तक बैंक बैलेंस होता है। अभी यदि हमें मलेरिया जैसी बिमारी होती है तो हम ऑटो लेकर इलाज के लिए अस्पताल तक जा सकते हैं। पहले यदि बिमारी जड़ीबूटी से ठीक नहीं होती थी तो हमें पता था कि अब जीवित नहीं बचेंगे। इससे पहले हमने अस्पताल के दरवाज़े नहीं देखे थे।”

 

एक और अधिक सकारात्मक रुप में देखा जाए तो, बिना किसी भी स्पष्ट लक्ष्य-निर्धारण के, कानून के तहत कार्यरत 40 फीसदी परिवार दलित और आदिवासी हैं। IDHS2, 38 फीसदी एवं 28 फीसदी, कार्यरत दलित और आदिवासी के घरों में गरीबी में कमी का श्रेय अकेले नरेगा को ही देती है।

 

महत्वपूर्ण बात यह है कि, भारत के पुरुष प्रधान समाज में, नरेगा  महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक पथप्रदर्शक के रूप में उभरा है। 2014-15 में कम से कम 55 फीसदी नरेगा श्रमिक महिलाएं थी एवं पिछले एक दशक में इनकी भागीदारी में 38 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

ज़ाहिर है (जैसा कि वे उच्च महिला साक्षरता और सामाजिक मुक्ति के साथ वाल राज्य हैं) 92 फीसदी एवं 86 फीसदी महिला नरेगा श्रमिकों के साथ केरल और तमिलनाडु चार्ट में सबसे टॉप स्थान पर हैं।

 

जन धन योजना से पहले ही नरेगा के तहत 100 मिलियन बैंक खाते खोले गए हैं जो कि महिलाओं द्वारा उनक मजदूरी के लिए इस्तेमाल किया जाता है और शायद पुरुषों के बराबर होना उनके लिए पहली बार था।

 

नरेगा में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति और महिलाएं

 

 

Note: In 2006-7 NREGA was applicable in only 200 backward districts, in 2007-08, it was extended to 330 districts, and, from 2008-09, implemented across India.

 

नरेगा श्रमिक के रुप में कार्यरत महिलाएं

 

 

नरेगा के काम की गुणवत्ता के संबंध में काफी चर्चा की गई है। यदि ठीक से नज़र डालें तो पता चलता है कि, 28 फीसदी काम, यहां तक कि 2013-14 में भी, ग्रामीण स्वच्छता में सुधार करने के लिए थे (स्वच्छ भारत अभियान के शुरु होने से पहले) अन्य 30 फीसदी काम जल संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, सूखे और सूक्ष्म सिंचाई के लिए किए गए थे।

आधे से अधिक काम “ग्रीन जॉबस”, सीधे कृषि उत्पादकता में सुधार से संबंधित थी।

 

उद्हारण के लिए, झारखंड में मंजूर के बारे में 100,000 कुओं के लिए 6 फीसदी की प्रतिफल दर के साथ, इंस्टिट्यूट ऑफ ह्युमन डेवलपमेंट उच्च पूरा होने की दर दिखाता है।

 

नरेगा कार्यों की श्रेणी

 

 

महाराष्ट्र सरकार द्वारा 5,000 गांवों को सूखा-मुक्त बनाने के उदेश्य से शुरु किया गया जलयुक्त शिवर अभियान भी नरेगा पर ही निर्भर है। तमिलनाडु द्वारा शुरु किए गए एक अन्य पहल में 60,000 थुइमाई कवालरों (सफाई कर्मचारी) को नरेगा के तहत कार्यरत किया गया है। कर्नाटक में नरेगा श्रमिकों को पर्यावरण के अनुकूल मिट्टी की ईंटों का निर्माण के लिए नियोजित किया गया है। यह कार्य खुदाई और खाईयां भरने के कोसो दूर है।

 

आने वाला दशक

 

नरेगा की 10 वीं वर्षगांठ समारोह में प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी ने इसे देश का “गर्व” के रूप में स्वागत किया है।

 

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त्रिपुरा की राजधानी अगरतला की एक झुग्गी बस्ती में शहरी रोजगार गारंटी कार्यस्थल पर काम करते श्रमिक। राज्य में शहरी नौकरियां कार्यक्रम में वृद्धि से राष्ट्रव्यापी स्तर पर प्रतिकृति का तर्क दिया जा रहा है।

 

त्रिपुरा ही एकमात्र राज्य है जो शहरी निवासियों को रोज़गार की गारंटी देता है। इसको देखते हुए राष्ट्र स्तर पर इसकी प्रतिकृति के लिए ज़ोर दिया जा रहा है।

 

अगले दशक में काम के अधिकार के लिए काफी बेहतर संभावनाएं प्रकट होती दिखती हैं।

 

(नारायण टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) में पीएचडी स्कॉलर है एवं स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज,  लंदन, और टीआईएसएस से मास्टर्स हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 9 फरवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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