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निर्भया कांड के पांच साल के बाद भी बलात्कार पीड़ितों को नहीं मिल रहा न्याय और समर्थन

स्वगता यदवार,
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दिसम्बर 2012 को निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार और उसकी मृत्यु के बाद, महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा का विरोध करती छात्राएं। इस घटना के बाद कानून में सुधार के बावजूद बलात्कार और अन्य यौन हिंसा से पीड़ित लड़कियों और महिलाओं को अक्सर पुलिस स्टेशनों और अस्पतालों में अपमान सहना पड़ता है।

 

दिल्ली की छात्रा ज्योति सिंह “निर्भया” के साथ सामूहिक दुष्कर्म और मृत्यु के पांच साल गुजरने के और इसके बाद हुए कानूनी सुधारों के बावजूद, भारत में बलात्कार पीड़ित महिलाओं  को न्याय और समर्थन के लिए बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जैसा कि एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है।ज्योति सिंह की मौत पर भड़के लोगों के गुस्से के बाद यौन अपराधों से संबंधित कानूनों में संशोधन किया गया था। वर्ष 2012 से 2015 के बीच बलात्कार की शिकायतों की संख्या में 39 फीसदी की वृद्धि हुई थी।

 

इस परिवर्तन के बावजूद, बलात्कार पीड़ित लोगों को अभी भी पुलिस स्टेशनों और अस्पतालों में अपमान का सामना करना पड़ रहा है, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ (एचआरडब्ल्यू) द्वारा जारी किए गए रिपोर्ट, ‘एवरीवन ब्लमेस मी: बैरियरस टू जस्टिस एंड सपोर्ट सर्विसेज फॉर सेक्सुअल एसॉल्ट सरवाइवर इन इंडिया’ के निष्कर्ष में बताया गया है।

 

भारत में रिपोर्ट किए गए बलात्कार के मामले, 2011-2015

Source: Crime in India, 2015, National Crime Records Bureau

 

पीड़ितों और उनके परिवार का कहना है कि शुरुआत में पुलिस शिकायत दर्ज करने के लिए तैयार नहीं होती है। रिपोर्ट कहती है कि इसके बाद, महिलाओं और लड़कियों को स्वास्थ्य देखभाल, परामर्श और कानूनी सहायता तक पहुंचने में कई समस्याएं आती हैं।

 

मेडिकल पेशेवर अब भी बलात्कार पीड़ितों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं और यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों के लिए कोई कानूनी सहायता या समर्थन उपलब्ध नहीं है। सरकार की हालिया पहल जैसे बलात्कार मुआवजा और वन स्टॉप सेंटर भी अप्रभावी साबित हो रहे हैं।

 

रिपोर्ट की लेखक, जयश्री बजोरिया कहती हैं, “अक्सर बलात्कार पीड़ित अगर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से होते हैं, तो उन्हें खाप पंचायत द्वारा दबाव डाला जाता है और यदि अपराधी शक्तिशाली परिवार या जाति से है, तो यहां तक ​​कि पुलिस पर मामले को ‘ निपटाने’ का दवाब बनाया जाता है।”

 

रिपोर्ट में 21 मामले  हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के हैं, जिनमें से 10 पीड़ितों की आयु 18 वर्ष से कम है। इन भारत के इन चार राज्यों में बलात्कार की सबसे ज्यादा रिपोर्ट दर्ज है। रिपोर्ट का निष्कर्ष पीड़ितों, उनके परिवार के सदस्यों, वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, डॉक्टरों, फोरेंसिक विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों के साक्षात्कार पर आधारित हैं।

 

पुलिस को पता नहीं या नई प्रक्रियाओं की अनदेखी?

 

उत्तर प्रदेश के ललितपुर की 22 वर्षीय बरखा ( बदला हुआ नाम ) कहती हैं, “हम गांव में नहीं रह पाए, क्योंकि वे (आरोपी) हमें मारने के लिए तैयार हैं और पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। हम गांव के मुखिया के पास गए भी, लेकिन उन्होंने हमारी कोई बात नहीं सुनी। हमारी मदद के लिए कोई नहीं है।” स्थानीय पुलिस ने बलात्कार की शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि मुख्य आरोपी सत्तारूढ़ दल का स्थानीय नेता है। यहां तक ​​कि अदालत द्वारा पुलिस को शिकायत दर्ज कराने के आदेश देने के बाद भी एफआईआर दर्ज करने में आठ महीने का समय लग गया था।

 

इस उद्धरण से साफ पता चलता है, पुलिस बलात्कार के मामलों को दर्ज करने के बारे में उदासीन हैं। पीड़ितों का कहना है कि उन पर मामले को ‘रफा-दफा’करने के लिए दबाव डाला जाता है, खासकर यदि आरोपी अमीर या प्रभावशाली है।

 

एचआरडब्ल्यू की जांच के 21 मामलों में, पुलिसकर्मियों को अनजान या प्रक्रियाओं की अनदेखी करना पाया गया था, विशेष रुप से महिलाओं और बच्चों की सहायता के लिए वर्ष 2012-2013 में पेश किए गए मामले।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि, “पुलिस ने पीड़ितों और उनके परिवारों को मुआवजा और नि:शुल्क कानूनी सहायता से संबंधित प्रावधानों के बारे में शायद ही कभी जानकारी दी और अक्सर बाल कल्याण समितियों को सूचित करने में विफल रहे हैं। एक कारण यह है कि सरकारी परिपत्र और दिशानिर्देश गांव और छोटे शहरों में पुलिस तक नहीं पहुंचते हैं। “

 

वर्ष 2013 के संशोधनों के तहत, उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, जो कानून संहिता की धारा 166 ए के तहत बलात्कार की शिकायत दर्ज करने में विफल रहते हैं और ऐसे अधिकारियों को दो साल की सजा तक हो सकती है। लेकिन एचआरडब्ल्यू द्वारा जांच किए गए एक भी मामलों में इस अनुभाग के तहत किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है।

 

चिकित्सा पेशेवरों में संवेदनशीलता की कमी

 

18 वर्षीय पलक (बदला हुआ नाम) एक दलित महिला है। मध्य प्रदेश में उसका अपहरण हुआ, फिर उसके साथ बलात्कार किया गया था। पलक की मां कहती हैं,“डॉक्टर ने मेरी बेटी से कहा, ‘यदि उसने आप पर जबरदस्ती किया, तो आपके शरीर पर निशान होना चाहिए, लेकिन कोई निशान नहीं है। लगता है आपने सब अपनी मर्जी से किया है। परीक्षण के बाद मेरी बेटी और बीमार हो गई। ”

 

वर्ष 2014 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने यौन हिंसा पीड़ितों की मेडिको-कानूनी देखभाल के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। ये चिकित्सा जानकारी और निर्धारित प्रक्रियाएं प्रदान करते हैं, जो यौन उत्पीड़न के बारे में व्यापक मिथकों को दूर करने के लिए होती हैं। दिशा-निर्देशों में जब तक कि यह ‘चिकित्सकीय संकेत’ न हो तब तक ‘ टू फिंगर टेस्ट ’ को भी खारिज किया गया, जो योनि परीक्षा के लिए इस्तेमाल किया गया जाता था, ताकि पीड़िता के यौन इतिहास को देखा जा सके। इस दिशा-निर्देश के तहत पीड़िता को नीचा दिखाने और उसके ‘चरित्र’ पर सवाल उठाने के लिए ‘चिकित्सा निष्कर्षों’ के उपयोग पर भी रोक लगाई गई है।

 

अब तक, केवल 9 राज्यों ने दिशानिर्देश अपनाये हैं, लेकिन इन राज्यों में चिकित्सा पेशेवर हमेशा प्रक्रियाओं का पालन नहीं करते हैं, जैसा कि रिपोर्ट में पाया गया है। डॉक्टर पीड़ितों के परीक्षण के बारे में पर्याप्त जानकारी देने में विफल रहे और उनके साथ के व्यवहार में संवेदनशीलता की कमी थी।

 

दिशानिर्देशों में फोरेंसिक साक्ष्य के संग्रह को मानकीकृत किया गया है, लेकिन वे सुरक्षित गर्भपात और यौन संचारित रोगों के लिए परीक्षण सहित पीड़ितों की चिकित्सीय देखभाल और परामर्श प्रदान करने में विफल रहे हैं। स्वास्थ्य पेशेवरों को ऐसे मामलों में पीड़िताओं को पहली पंक्ति सहायता प्रदान करना चाहिए, लेकिन एचआरडब्ल्यू के साक्षात्कार में पता चला है कि ऐसा नहीं होता है।

 

किसी ने हमें कानूनी सहायता के बारे में नहीं बताया: पीड़िता

 

एक स्टॉप सेंटर की महिला प्रभारी कहती हैं, “सच यह है कि हम इन मामलों पर अनुपालन नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे पास कोई संसाधन नहीं है। हमें पीडि़ता से बात करने और उनकी मदद करने के लिए कहा जाता है, लेकिन हमारे पास विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिक नहीं हैं। मैंने कुछ किताबें पढ़ी हैं लेकिन व्यावहारिक मामलों के लिए केवल किताबी ज्ञान काफी नहीं है।”

 

वर्ष 1994 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में कहा गया है कि यौन उत्पीड़न पीड़ितों को कानूनी सहायता प्रदान की जानी चाहिए और पुलिस स्टेशनों को कानूनी सहायता विकल्पों की सूची रखना चाहिए। दिल्ली में महिला आयोग का ‘रेप क्राइसिस सेल’ है जो पुलिस के साथ समन्वय में काम करते हैं। लेकिन यह देश के अन्य भागों में विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में मिलना दुर्लभ है,  जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

 

एचआरडब्ल्यू द्वारा प्रलेखित 21 मामलों में से एक में भी पुलिस ने पीड़ित को कानूनी सहायता लेने या कानूनी सहायता देने के अपने अधिकार के बारे में सूचित नहीं किया था।

 

नेटवर्क के समर्थन में कोई निगरानी या मूल्यांकन नहीं

 

यौन उत्पीड़न पीड़ितों का समर्थन करने के लिए केंद्रीय और राज्य की पहल किसी भी निगरानी या मूल्यांकन के बिना चलती है और इस वजह से वे अपर्याप्त या अप्रभावी रहे, जैसा कि एचआरडब्ल्यू कहती है।.

 

3,000 करोड़ रुपए के निर्भया फंड से वर्ष 2015 में निर्मित एक केंद्रीय पीड़ित मुआवजा फंड ने अनिवार्य किया कि बलात्कार पीड़ितों को न्यूनतम 300,000 रुपए मिले, लेकिन प्रत्येक राज्य अलग-अलग राशि प्रदान करता है। पीड़ितों को या तो पैसे के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है या फिर उन्हें कुछ नहीं मिलता है।

 

एचआरडब्ल्यू ने 21 मामलों का अध्ययन किया, केवल तीन को मुआवजा

 

इसके अलावा, एकीकृत सेवाएं प्रदान करने वाली  वन स्टॉप सेंटर ( पुलिस सहायता, कानूनी सहायता और चिकित्सा परामर्श ) के तहत 151 केंद्र होने के बावजूद इनके संबंध में बहुत कम जागरुकता है। अध्ययन में पाया गया कि इसमें शामिल विभिन्न विभाग समन्वय में काम नहीं करते हैं।

 

एचआरडब्ल्यू के दक्षिण एशिया के निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “बलात्कार की रिपोर्ट करने से पीड़िता के दुःस्वप्न में योगदान नहीं करना चाहिए। मानसिक स्थिति को बदलने के लिए समय लगता है, लेकिन भारत सरकार को पीडि़तों और उनके परिवारों के लिए चिकित्सा परामर्श और कानूनी समर्थन सुनिश्चित करना चाहिए और साथ ही यौन हिंसा के मामलों को ठीक से निपटाने के लिए पुलिस कार्यालयों, न्यायिक अधिकारियों और चिकित्सा पेशेवरों को संवेदनशील बनाने की ओर और अधिक काम करना होगा। “

 

ह्यूमन राइट्स वॉच की ओर से सिफारिश
 

  • आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम- 2013 और यौन हिंसा के पीड़ितों की सहायता करने वाली नीतियां लागू की जाए।
  • यौन हिंसा के मामलों को ठीक से नियंत्रित करने के लिए पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों और चिकित्सा पेशेवरों को संवेदनशील बनाने के लिए नियमित प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम सुनिश्चित किया जाए।
  • गवाहों के संरक्षण का कानून बनाना  जिसमें महिलाओं और लड़कियों और उनके परिवारों के लिए सुरक्षा शामिल है, जो यौन हिंसा की आपराधिक शिकायत दर्ज कराने पर प्रतिशोध झेलते हैं।
  • यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए मेडिको-कानूनी देखभाल के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के दिशा-निर्देशों और प्रोटोकॉल मंत्रालय को अपनाया जाए।
  • सुनिश्चित किया जाए कि ‘वन स्टॉप क्राईसिस सेंटर’ संशाधन युक्त और सुलभ हों,  इन केंद्रों के लिए एक निगरानी तंत्र स्थापित हो, समय-समय पर जवाबदेही रिपोर्ट प्रकाशित हो और सुनिश्चित किया जाए कि निर्भया फंड पारदर्शी रूप से वितरित हो।
  • महिलाओं के अधिकार समूहों, नागरिक समाज संगठनों, शहरी योजनाकारों और अन्य लोगों के साथ काम करने के लिए एक निश्चित समयरेखा के भीतर ठोस योजनाओं को विकसित और कार्यान्वित करने के लिए सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित और महिलाओं के लिए अधिक सुलभ बनाया जाए।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 14 नवंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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