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न्याय के लिए भारत के पीड़ित बच्चों को करना होगा 2022 तक का इंतजार!

प्रगति कुलकर्णी,
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Kolkata: Children participate in awareness rally against child abuse and child labour, in Kolkata, on July 29, 2018. (Photo: Kuntal Chakrabarty/IANS)
 

मुंबई:  बच्चों की रक्षा और कानूनी प्रक्रिया में जल्द सुनवाई के लिए एक कानून लैंगिक अपराधों (पोक्सो) अधिनियम– 2012 के तहत 2016 से चार वर्षों में पंजीकृत मामले, निपटान की वर्तमान दर के आधार पर 2022 तक ही समाप्त हो पाएगा, जैसा कि एक नए अध्ययन से पता चलता है।  इंडियन नोबल लॉरीइट द्वारा संचालित एक संस्था ‘कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाउंडेशन’ (केएससीएफ) के एक अध्ययन के मुताबिक गुजरात और अरुणाचल प्रदेश, जहां दायर मामलों में सबसे ज्यादा बैकलॉग की सूचना है, इन राज्यों में ऐसे मामलों के निपटान में 55 और 101 साल लगेंगे। पोक्सो के तहत दर्ज मामलों की संख्या 2009 से 2014 तक 151 फीसदी बढ़ी है, जैसा कि  इंडियास्पेन्ड ने 22 अगस्त, 2015 की रिपोर्ट में बताया है।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2014-2016 के बीच 104, 976 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए थे। जबकि केवल 10 फीसदी ट्रायल पूरे किए गए थे, 2016 के लिए सजा दर 30 फीसदी थी।

 

पोक्सो 2015-16 के तहत पूरा किए गए ट्रायल और सजा दर

Completion Of Trials & Conviction Rate Under POCSO, 2015-16
2015(%) 2016(%)
Completion of trials 12 10
Conviction rate 36 30

Source: Kailash Satyarthi Children’s Foundation

 

2016 (10 फीसदी) के निपटान दर अगर निरंतर बना रहे तो पंजाब और नागालैंड जैसे कुछ राज्यों में दर्ज मामलों को पूरा करने में लगभग दो साल लगेंगे, जबकि गुजरात और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में 2016 तक पंजीकृत मामलों को पूरा करने में 50 से अधिक वर्षों का समय लगेगा।

 

पोक्सो के तहत लंबित मामले, 2016 मामलों के ट्रायल को पूरा करने में लगने वाला समय

Source:Kailash Satyarthi Children’s Foundation , Crime in India 2016, National Crime Records Bureau

 
2012 तक, जब पोक्सो पारित किया गया था, तब बच्चों के खिलाफ यौन अपराध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तीन खंडों के तहत कवर किया गया था। धारा 376 के तहत बलात्कार, धारा 354 के तहत एक महिला की शीलता भंग और धारा 377 के तहत अप्राकृतिक यौन कृत्य।
 

पोक्सो की शुरूआत के साथ, उत्पीड़न के अन्य रूप भी शामिल किए गए थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिनियम को लिंग-तटस्थ बनाया गया था और विशेष रूप से बाल अधिकारों की रक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया था और यह सुनिश्चित किया गया कि न्यायिक प्रणाली बाल-अनुकूल होगी।

 

मई 2018 में एक अध्यादेश द्वारा पोक्सो अधिनियम और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में किए गए संशोधन के अनुसार, पुलिस द्वारा जांच दो महीने के भीतर और छह महीने के भीतर ट्रायल को पूरा हो जाना चाहिए।
 

सुप्रीम कोर्ट ने बाद में उच्च न्यायालयों को आदेश दिया कि पोक्सो के मामले की सुनवाई नामित विशेष अदालतों में हो।पोक्सो न्यायाधीशों द्वारा स्थगित करने की अनुमति नहीं दी गई और राज्य पुलिस प्रमुखों द्वारा विशेष जांच कार्य बल गठित किया गया, जैसा कि 1 मई, 2018 को ‘द हिंदू’ ने अपने रिपोर्ट में बताया है।  

 
पोक्सो कानून के तहत मामले क्यों हैं लंबित? 
 

पोक्सो की देखरेख करने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग (एनसीपीसीआर) के सदस्य, यशवंत जैन कहते हैं, “बढ़ती जागरूकता और अनिवार्य रिपोर्टिंग के कारण पंजीकृत मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है।”

 

महिलाओं और बाल विकास मंत्रालय के तहत,एनसीपीसीआर जांच, ट्रायल की निगरानी करता है और बाल कल्याण समितियों, विशेष अदालतों और सरकारी अभियोजकों की स्थापना करता है। जैन कहते हैं, “इससे निपटने के लिए उपस्थित अदालतों की संख्या के खिलाफ मामलों की संख्या अधिक हो गई है।” केएससीएफ के शोध निदेशक सुभद्रा मेनन ने इंडियास्पेंड को बताया, “पुलिस जांच में देरी के अलावा, न्यायपालिका की खराब कामकाजी स्थिति लापरवाही को जोड़ती है। कभी-कभी, पोक्सो के तहत पंजीकृत मामलों पर आईपीसी के विभिन्न वर्गों के तहत पंजीकृत मामलों को प्राथमिकता दी जाती है।” इस साल के शुरुआत में इंडियास्पेंड ने न्यायधीशो की कमी पर तीन आलेखों की श्रृंखला प्रकाशित की, जिसे ( यहां, यहां और यहां ) देखा जा सकता है। एनसीपीसीआर के आंकड़ों से पता चलता है कि, 665 नामित जिलावार अदालतों / अभियोजन पक्षों में से केवल 55 9 विशेष अदालतें हैं (84 फीसदी) और केवल 438 (65 फीसदी) विशेष सरकारी अभियोजन पक्ष नियुक्त किए गए हैं।

 

विशेष अदालतों का गठन और सार्वजनिक अभियोजकों की नियुक्ति का मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी पोक्सो मामलों को संभालने के लिए भी बढ़ते हैं। उन पर नियमित अदालतों से भी काम का बोझ है, जैसा कि नेशनल ‘लॉ स्कूल ऑफ इंडिया’ द्वारा 2017 के एक अध्ययन से पता चलता है।

 
जैन कहते हैं, “फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) से रिपोर्ट प्राप्त करने में भी देरी होती है, जिससे पुलिस की जांच लंबित होती है।”
 

 फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में अपर्याप्त कर्मचारियों और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण, दिसंबर 2017 तक छह केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में 12,072 डीएनए नमूने  के मामलों सहित और कई और मामले लंबित थे, जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स ने 26 अप्रैल, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।  संस्था दक्ष के कार्यक्रम निदेशक सूर्या प्रकाश बी एस ने कहा कि जांच में देरी का एक और प्रमुख कारण पुलिसकर्मियों की कमी भी है। ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के आंकड़ों के मुताबिक 1 जनवरी, 2016 को भारत में 500,000 पुलिसकर्मियों की कमी थी।

 

सूर्या ने कहा, ” मुकदमे की उम्र पार्टियों और उनके वकीलों के विवेकाधिकार पर है। याचिकाकर्ता की ओर से स्थगन के कारण अक्सर देरी होती है।” हालांकि पोक्सो अधिनियम के तहत स्थगन की अनुमति नहीं है, ऐसा किया जाता है। सूर्या ने कहा, “वरिष्ठ न्यायाधीशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अधिनियम का पालन किया जाए, जो कभी नहीं होता है, और इसलिए मामले लंबित रहते हैं।”

 
बचे लोगों पर न्याय में देरी से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मेनन ने कहा, “वे मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना करते हैं जिससे उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी हो जाती है, वे डरे रहते हॆ और  उनमें से कई आत्महत्या की कोशिश करते हैं।”
 
( सोशल वर्क में पोस्ट ग्रैजुएट कुलकर्णी इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 5 नवंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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