Home » Cover Story » पहले की तुलना में इस बार सबसे ज्यादा महिला सांसद, फिर भी लोकसभा में केवल 14.6 फीसदी हिस्सेदारी

पहले की तुलना में इस बार सबसे ज्यादा महिला सांसद, फिर भी लोकसभा में केवल 14.6 फीसदी हिस्सेदारी

नमिता भंडारे,
Views
1755

Mathura: BJP's Lok Sabha candidate from Mathura Hema Malini who is leading in her constituency, shows victory sign as she arrives at an election counting center during the ongoing counting of votes cast for the 2019 Lok Sabha elections, in Uttar Pradesh's Mathura on May 23, 2019. (Photo: IANS)
 

दिल्ली: एक ब्यूटी क्वीन, एक पुरस्कार विजेता लेखक और चार ‘जाइन्ट किलर’! एक जिसने चुनाव लड़ा, उसे ‘भगवान से संकेत’ मिला और एक और जिसने एक प्रसिद्ध समाचार एंकर को अपमानजनक इशारे किए- यह कहना ज्यादा सही है कि 2019 के आम चुनावों में महिला प्रतियोगी भारत की विविधता और जीवंतता को दर्शाती हैं।

 

2019 में आम चुनाव लड़ने वाली 724 महिलाओं में से 78 को सांसद के रूप में शपथ दिलाई जाएगी, जो कि भारत के संसदीय इतिहास में महिलाओं की सबसे बड़ी टुकड़ी होगी। ‘त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा’(टीसीपीडी) के सह-निदेशक गाइल्स वर्नियर्स कहते हैं, “60 फीसदी से अधिक या इन महिलाओं में से 47 पहली बार सांसद हैं। कुछ जैसे कि आठ बार की विजेता मेनका गांधी की तरह दिग्गज हैं।”

 

‘एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ के मुताबिक, इनमें अरबपति भी हैं – 250 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सबसे अमीर हेमा मालिनी हैं। फिर रेमया हरिदास भी हैं, जिनके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और मां दर्जी का काम करती हैं। 11.5 लाख रुपये की संपत्ति के साथ, 32 वर्षीय केरल की दूसरी दलित महिला सांसद और इस वर्ष राज्य की एकमात्र महिला सांसद हैं।

 

2011 में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा आयोजित एक टैलेंट हंट में कथित तौर पर शॉर्टलिस्ट किए गए, संगीत स्नातक हरिदास ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और संगीत गायन से मतदाताओं तक पहुंचने के लिए एक अभियान चलाया।

 


 

हरिदास के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने उनका मजाक उड़ाया। लेकिन मतगणना के दिन, उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) माकपा के पी.के बीजू को हराया और 52.4 फीसदी वोट शेयर हासिल किया।

 

एक कदम आगे…

 

प्रतिशत के संदर्भ में, 2019 के आम चुनावों में महिलाओं द्वारा किए गए लाभ छोटे हैं: लोकसभा में उनकी हिस्सेदारी 14.6 फीसदी है, जो कि 16वीं लोकसभा के निवर्तमान 16.1 फीसदी (66 महिला सांसदों) से ज्यादा है।

 

आंध्र प्रदेश के अमलापुरम से वाईएसआर कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाली, चिन्ता अनुराधा,जो खुद को नारीवाद का कट्टर समर्थक मानती हैं, ने इंडियास्पेंड को बताया, “आप तुरंत बदलाव नहीं ला सकते हैं। लेकिन महिलाएं अब विभिन्न धाराओं से राजनीति में आ रही हैं और राजनीतिक दलों द्वारा गंभीरता से लिया जा रहा है। यह एक अच्छी शुरुआत है और हम बहुत जल्द संसद में अपनी सही संख्या तक पहुंच जाएंगे। “

 

आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस द्वारा मैदान में उतारी गई सभी चार महिला उम्मीदवारों ने चुनाव जीता – अनुराधा सहित उनमें से दो ने पहली बार जीत हासिल की है।

 

ओडिशा में, महिला उम्मीदवारों के लिए अपनी संसदीय सीटों का 33 फीसदी आरक्षित करने के लिए बीजू जनता दल (बीजेडी) का निर्णय ( किसी भी पार्टी के लिए इस चुनाव से पहले अभूतपूर्व ) शानदार रहा।

 

सात महिला उम्मीदवारों में से पांच ने चुनाव में जीत कराई। इनमें चंद्र मुर्मू, एक बीटेक ग्रैजुएट शामिल हैं, जो मतगणना के दिन 25 साल, 8 महीने और 11 दिन की आयु के साथ, इस साल निर्वाचित होने वाली सबसे कम उम्र की महिला सांसद थीं। मुर्मू ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के दो बार के सांसद अनंत नायक को 66,000 से अधिक मतों से पराजित करते हुए क्योंझर लोकसभा सीट से बीजद के टिकट पर जीत हासिल की।

 

भाजपा की दो महिला सांसदों, भुवनेश्वर की अपराजिता सारंगी और बोलांगीर की संगीता सिंह देव, के साथ ओडिशा की 21 सांसदों में से सात अब महिलाएं हैं, जो 2014 में, महिलाओं की 9.5 फीसदी प्रतिनिधित्व से2019 में 33.3 फीसदी के साथ महिलाओं के लिए क्वांटम छलांग दर्शाती हैं।

 

Source: Analysis by BehanBox, an upcoming digital platform for gender issues based on data from TCPD. Note: Does not include Tripura and Meghalaya, where one of two MPs each (50%) is a woman.

 

पश्चिम बंगाल में उल्टा हुआ है, जहां अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा महिलाओं को सभी सीटों (22 टिकट) का 41 फीसदी आवंटित करने के बावजूद, इस चुनाव में महिला सांसदों का अनुपात सिकुड़ गया है, यह आंकड़े 2014 में 28.6 फीसदी थे, इस बार से 26.2 फीसदी हुए हैं। इसके बावजूद, पश्चिम बंगाल अपनी 42 में से 12 सांसदों महिलाओं के साथ महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए एक महत्वपूर्ण राज्य बना हुआ है – भाजपा से दो और टीएमसी से 10, जिसमें एक पूर्व निवेश बैंकर महुआ मोइत्रा भी शामिल हैं, जो 2008 में राजनीति में शामिल होने के लिए लंदन से लौटी थीं और एक बार टाइम्स नाउ पर न्यूज एंकर अरनब गोस्वामी को मिडिल फिंगर दिखाया था।

 


 

लोकसभा में निर्वाचित होने वाली महिलाओं की उच्चतम संख्या के कारण उत्साह के बावजूद, 2019 के चुनाव में 13 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश एक भी महिला उम्मीदवार का चुनाव करने में विफल रहा है।

 

इन ‘शून्य महिला सांसद’ वाले राज्यों में हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर और गोवा शामिल हैं। दादरा और नगर हवेली और साथ ही दमन और दीव के केंद्र शासित प्रदेशों में पहले स्थान पर कोई महिला उम्मीदवार नहीं थी।

 

Source: Election Commission of India data on 2019 Lok Sabha results analysed by IndiaSpend.

 

मिजोरम में, इतिहास तब बना जब एक महिला ने पहली बार संसदीय चुनाव लड़ा। लालथलामुनी ने कहा कि उन्हें “भगवान से संकेत” मिला है और उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। 63 वर्षीय, छिनलुंग इज़राइल एक एनजीओ ‘पीपुल कन्वेंशन’ चलाती है, जिसमें मिज़ो यहूदी शामिल हैं जो मानते हैं कि वे इज़राइल के 10 खोई जनजातियों में से एक हैं। मतगणना के दिन उन्हें 1,975 या 0.4 फीसदी वोट मिले थे।

 

असम के 14 सांसदों में से एक महिला है। लेकिन गुवाहाटी संसदीय सीट पर 17 उम्मीदवारों में से पांच महिलाओं के साथ एक उत्साही प्रतियोगिता देखी गई।

 

अंत में, गुवाहाटी के पूर्व मेयर क्वीन ओजा, जिन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की बबीता शर्मा को हराया, जो असमिया टीवी और फिल्मों में एक मशहूर नाम है और जो असम में सौंदर्य प्रतियोगिता जीतने के बाद, ‘क्वीन बनाम ब्यूटी क्वीन’ जैसी हेडलाइन के साथ सुर्खियों में आईं।

 

5.5 लाख से अधिक मतों के अंतर से ओजा की जीत से वह 1977 के बाद से उस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला बना गई।

 

ओजा ने फोन पर इंडियास्पेंड को बताया, “आजकल महिलाएं राजनीति के बारे में जागरूक हैं, लेकिन उतनी सक्रिय नहीं हैं। ऊपर आने के लिए, महिलाओं को अपने परिवार और समुदायों के समर्थन की आवश्यकता होती है। लेकिन पहले उन्हें समाज और सामुदायिक मुद्दों में शामिल होना चाहिए। ”

 

अरुणाचल प्रदेश में जारजूम ईटे ने जनता दल (सेक्युलर) के टिकट पर अरुणाचल पश्चिम से चुनाव लड़ा, लेकिन सिटिंग सांसद और बीजेपी मंत्री किरेन रिजिजू से हार गए। मेघालय की दो सीटों में से, तुरा को अगाथा संगमा ने जीत लिया है। 38 वर्षीय संगमा पूर्व लोकसभा अध्यक्ष स्व: पी.ए.संगमा की बेटी है। यह उसकी तीसरी चुनावी जीत है। उन्होंने पहली बार 14 वीं लोकसभा के लिए उपचुनाव जीता था।

 

उत्तर-पूर्व पुरुष प्रधान रहा, इसके 25 निर्वाचन क्षेत्रों के साथ आठ राज्यों में सामूहिक रूप से तीन महिलाओं का निर्वाचन हुआ है – 2014 के चुनाव से एक अधिक।

 


 

कुछ पूर्वोत्तर राज्यों उदाहरण के लिए, मणिपुर में कोई महिला उम्मीदवार नहीं थी। नागालैंड ने कभी भी एक महिला को अपने राज्य विधानसभा (विधायिका) के लिए भी नहीं चुना। इसकी एकमात्र महिला सांसद दिवंगत रेनो मेसे शैज रही हैं।

 

बड़ी हार

 

महिला उम्मीदवारों के लिए कुछ उल्लेखनीय नुकसान में आम आदमी पार्टी के आतिशी ( एक शिक्षक और कार्यकर्ता ) शामिल हैं, जिन्होंने अपने पूर्वी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र में 17.44 फीसदी वोट शेयर प्रबंधित किए।भाजपा, कांग्रेस और उनकी अपनी पार्टी के बीच तीन-तरफ़ा मुकाबले में, भाजपा के गौतम गंभीर (55.35 फीसदी) और कांग्रेस के अरविंदर सिंह लवली (24.24 फीसदी वोट शेयर) के बाद आतिशी तीसरे स्थान पर रहीं।

 

असम के सिलचर में, कांग्रेस की सुष्मिता देव भाजपा के राजदीप रॉय से 81,596 मतों से हार गईं। संसद और राज्य विधानसभाओं (विधानसभाओं) में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के लिए देव एक लंबे सिफारिश कर रहे हैं।

 

पूर्व अभिनेत्री और भाजपा की उम्मीदवार जया प्रदा, रामपुर से एक लाख से अधिक वोटों से हार गई। और हरियाणा के अंबाला में कांग्रेस की कुमारी शैलजा को भाजपा के रतन कटारिया ने 3.42 लाख मतों से हराया। कई महिलाएं मजबूत महिला उम्मीदवारों से हार गईं – बीजेपी के तमिलिसाई साउंडराजन ने डीएमके के कनिमोझी करुणानिधि और टीएमसी के रत्न डी ने बीजेपी के लॉकेट चटर्जी को।

 

कम से कम 50 निर्वाचन क्षेत्रों में, महिलाएं दूसरे स्थान पर रहीं, जैसा कि भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर सभी उम्मीदवारों के परिणामों के विश्लेषण में दिखाया गया है।

 

इन तीन निर्वाचन क्षेत्रों में हार का अंतर 10,000 मतों से कम था। टीएमसी के ममताज संघमिता को पश्चिम बंगाल के बर्धमान-दुर्गापुर में 2,439 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। ओडिशा के कोरापुट में, कौसल्या हिकाका की हार का अंतर 3,613 वोट था। और पश्चिम बंगाल के मालदा दक्षिण में, भाजपा के श्रीरूपा मित्रा चौधरी 8,222 वोटों से हार गई।

 

राजनीतिक वंशवाद

 

हमेशा की तरह, महिला सांसदों के नए बैच में राजनीतिक वंश से हैं। कुल मिलाकर, सभी नए लोकसभा सांसदों में से 30 फीसदी राजनीतिक परिवारों से संबंधित हैं, लेकिन इस चुनाव में महिला उम्मीदवारों में 41 फीसदी से अधिक राजनीतिक वंश से थीं, जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक गिलेस वर्नियर्स और क्रिस्टोफ़ जाफ़रलॉट ने 27 मई, 2019 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में कहा है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी, तेलुगु देशम पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और तेलंगाना राष्ट्र समिति द्वारा मैदान में उतारी गई सभी महिला उम्मीदवार राजनीतिक वंश से हैं।

 

दो राज्यों, पंजाब और महाराष्ट्र में, सभी महिला सांसद राजनीतिक वंश से हैं।

 

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की पत्नी ( हरसिमरत कौर बादल, जो हेमा मालिनी के बाद 217 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ सबसे अमीर महिला सांसद हैं ) ने अपनी भठिंडा सीट को बरकरार रखा है। वर्तमान मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पत्नी, कांग्रेस की परनीत कौर ने अपनी पटियाला सीट 45.17 वोट शेयर से वापस जीत ली है, जिसे उन्होंने 2014 में खो दिया था।

 

महाराष्ट्र से जीतने वाली सभी आठ महिलाएं राजनीतिक वंश से हैं। मसलन, राकांपा प्रमुख शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले अपने पिता के पुराने निर्वाचन क्षेत्र बारामती से सांसद के रूप में संसद में तीसरी बार प्रवेश करेंगी।

 

महाराष्ट्र से नवनिर्वाचित महिला सांसदों में पूनम महाजन बीजेपी के कद्दावर नेता प्रमोद महाजन की बेटी हैं। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, प्रिया दत्त (पूर्व कांग्रेस मंत्री सुनील दत्त की बेटी ) मुंबई उत्तर मध्य में निर्णायक 53.97 फीसदी वोट शेयर से हराया।

 

राजनीतिक वंशों से सभी उम्मीदवारों को जीत नहीं मिली। शायद सबसे खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार डिंपल यादव कन्नौज में भाजपा के सुब्रत पाठक से 12,353 मतों के अंतर से हार गईं।

 

नए निर्णायक कारक

 

फिर ऐसे नए लोग भी हैं जिन्होंने जमीनी स्तर पर नेतृत्व के माध्यम से काम किया है। 69 वर्षीय प्रमिला बिश्नोई, केवल कक्षा 2 तक पढ़ी हैं, हिंदी या अंग्रेजी में से कोई भाषा नहीं बोलती है, उसने कभी ओडिशा से बाहर कदम नहीं रखा और उसके दो बेटे हैं, जिनमें से एक चाय-स्टॉल चलाता है।

 

फिर भी, असका के निर्वाचन क्षेत्र में एक महिला स्व-सहायता समूह तैयार करने की उनकी सफलता ने बीजू जनता दल (बीजद) के प्रमुख नवीन पटनायक का ध्यान आकर्षित किया और उन्हें उस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए कहा, जहां से उन्होंने 20 साल पहले अपना राजनीतिक दल शुरू किया था।

 

कहानी यह है कि चुनावों की घोषणा के तुरंत बाद, बिश्नोई के बेटे को फोन आया कि मुख्यमंत्री उनकी मां से मिलना चाहते हैं, इसलिए क्या वह 160 किमी दूर भुवनेश्वर आ सकती हैं? टैक्सी के किराए के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उसने खेद जताया। कुछ घंटों बाद ही एक कार उन तक पहुंच गई। जब वोटों की गिनती हुई, तो बिश्नोई ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, भाजपा की अनीता सुभद्राशिनी को दो लाख से अधिक मतों से हराकर,54.52 फीसदी से जीत हासिल की।

 

‘जाइन्ट किलर’

 

अब ‘जाइन्टकिलर’ शब्द का इस्तेमाल भाजपा की स्मृति ईरानी के लिए किया जा रहा है, जिन्होंने अमेठी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 55,120 वोटों से हराया। महिला सांसदों में ऐसी कम से कम तीन और हैं।

 

सबसे चर्चित आतंक आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर है, जिसने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘ देश भक्त’ कहा। बाद में विवाद हुआ तो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “मैं दिल से उसे माफ नहीं कर सकता।” फिर भी, मतगणना के दिन, उसने भोपाल सीट पर निर्णायक 61.54 फीसदी वोट के साथ निकटतम प्रतिद्वंद्वी, कांग्रेस के दिग्गज दिग्विजय सिंह को 3.64 लाख वोटों से हराया।

 

तमिलनाडु में, एक पुरस्कार विजेता लेखक और कवि जोतिमानी सन्नीमलाई ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। वह ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के एम. थंबीदुरई को 4.2 लाख से अधिक वोटों से हराकर करूर की पहली महिला सांसद बनीं।

 

कर्नाटक के मांड्या में, सुमलता अंबरीश, पूर्व अभिनेता और कांग्रेस सांसद एम.एच. अंबरीश की विधवा को कांग्रेस के टिकट से वंचित कर दिया गया था, और इसलिए उन्होंने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, जनता दल (सेक्युलर) के निखिल कुमारस्वामी को हराया, जो पूर्व मुख्यमंत्री एच. डी. कुमार स्वामी के बेटे हैं और पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी देव गौवडा के पोते हैं। निखिल 1.25 लाख वोट से हारे।

 

(भंडारे पत्रकार हैं और दिल्ली में रहती हैं। वह अक्सर भारत के लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 28 मई 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

code