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पहले से संकट में रहे कपड़ा उद्योग पर नोटबंदी की मार, महाराष्ट्र के मालेगांव में थम रहा है बिजली करघे का शोर

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पूरी दुनिया बदल गई, लेकिन नंदन पगारे के लिए शायद कुछ नहीं बदला। महाराष्ट्र के मालेगांव में रहने वाला 41 वर्षीय यह बिजली करघा कारीगर अब भी एक दिन में 12 घंटे से ज्यादा काम करता है और एक सप्ताह में करीब 1,800 रुपए कमाता है। नंदन पगारे को न तो कोई भविष्य निधि प्राप्त होता है और न ही छुट्टी के साथ भुगतान या अपने मालिक से किसी किस्म का बीमा मिलता है। नोटबंदी के बाद पगारे की आय आधी हो गई है, क्योंकि बिजली करघा कारीगर अब सप्ताह में छह की जगह तीन दिन ही काम कर पा रहे हैं।

 

मालेगांव (महाराष्ट्र): पिछले दो दशकों में, दुनिया में काफी बदलाव हुए हैं। लोग लैंडलाइन फोन से मोबाईल फोन और चिटठी से ई-मेल तक पहुंच गए हैं। लेकिन 41 वर्षीय नंदन पगारे के लिए कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है। नंदन पगारे मालेगांव के बिजली करघा उद्योग में तब से काम कर रहे हैं, जब वे 18 वर्ष के थे। बिजली करघा सेंटर भारत की वाणिज्यिक राजधानी, मुंबई के 270 किमी उत्तर में स्थित है।

 

नंदन पागरे ग्रैजुएट हैं और अपने दिन का ज्यादा समय करघा सेंटर में गुजारते हैं। हर सप्ताह 1800 रुपए ही कमाते हैं। अब नोटबंदी के बाद पागरे का काम सप्ताह में छह दिन की बजाए तीन दिन ही चल पा रहा है। ऐसे में उनकी कमाई भी पहले की तुलना में आधी हो गई है। वह कहते हैं,”अब हम सावधानी से खर्च कर रहे हैं। हम बहुत जरूरी चीजें ही खरीद पाते हैं।”

 

बिजली की ज्यादा लागत, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और परिसर का बड़े पैमाने पर उल्लंघन और बिना सुधार किए हुए श्रम कानून – ये कुछ जरूरी मुद्दे उत्तरी महाराष्ट्र के मालेगांव के कपड़ा शहर के थे, जिस पर सरकार ने कभी गौर नहीं किया। इससे यहां के फर्म बड़े नहीं हो पाए और पूरा उद्योग आर्थिक रुप से कमजोर रहा। अब सरकार के नोटबंदी के फैसले से 80,000 श्रमिकों को बड़ा झटका लगा है, जिसकी अर्थव्यवस्था नकद पर ही थी।

 

मालेगांव का सामाजिक और आर्थिक संकेतक

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Source: Multi-Sectoral Development Plan for Malegaon Town by Tata Institute of Social Sciences; Households data, Census 2011; Poverty Estimates 2011-12, Planning Commission; Primary Census Abstract For Slum, Census 2011; Workers and work participation rate, Census 2011

 

जब इंडियास्पेंड ने मालेगांव शहर के बाजार का दौरा किया तो वहां सन्नाटा था। नवंबर 2016 के पहले बिजली करघा की तेज आवाज से गलियां गूंजती थीं, लेकिन अब वहां सन्नाटा पसरा रहता है।

 

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Source: Census 2011

 

बिजली करघा मालेगांव में सबसे बड़ा उद्योग है, और सीधे तौर पर मालेगांव के 3,86,000 वयस्क आबादी में से 20 फीसदी से अधिक को रोजगार उपलब्ध कराता है।

 

अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा,  बढ़ रही लागत के साथ बढ़ रहा है कपड़ा उद्योग का संघर्ष

 

44 वर्षीय इकबाल अमरवीर का परिवार पिछली तीन पीढ़ी से बिजली करघा के मालिक हैं। वह कहते हैं, “मालेगांव बिजली करघा उद्योग पर कपास की उच्च कीमत के कारण काफी दबाव है। कपास ही मुख्य कच्चा माल है। राजस्थान में 700 से अधिक कपड़ा इकाइयों को बंद कर दिया गया है, जहां मालेगांव में बनाए गए कपड़े रंगे जाते हैं; और दबाव का दूसरा कारण अंतारराष्ट्रीय बाजार प्रतिस्पर्धा भी है।” अमरवीर का मानना है कि अब यह उद्योग ज्यादा दिन तक नहीं चल पाएगा

 

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अमरावीर को इस उद्योग के ज्यादा दिन चलने की उम्मीद नहीं है।

 

कपड़ा मंत्रालय की ओर से जारी वर्ष 2015 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कृषि के बाद वस्त्र उद्योग भारत में दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है, जहां 25 मिलियन से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है। कपड़ा उद्योग भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 2 फीसदी का योगदान देता है।  1.1 मिलियन बिजली करघे के साथ महाराष्ट्र देश की सबसे बड़ी बिजली करघा केन्द्रों में से एक है।

 

कुल मिलाकर, गिरते निर्यात, कम उत्पादकता और बढ़ती कीमतों से भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए संघर्ष बढ़ गया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 में विस्तार से बताया है।

 

नासिक और मालेगांव के डिवीजनों के लिए राज्य सरकार के श्रम अधिकारी, दिनेश पटोले का कहना है, चीनी और बांग्लादेशी कपड़ा की तुलना में भारतीय बिजली करघा में उत्पादित कपड़ा प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। यही कारण है मांग कम और भारतीय वस्तुओं के लिए कम कीमतें हैं।

 

छह की बजाय तीन दिन ही क्यों काम कर रहा है करघा

 

मालेगांव पावरलूम उद्योग पर महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग को प्रस्तुत की गई वर्ष 2012 की आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार, मालेगांव के 1.1 लाख बिजली करघा में से अधिकांश सूक्ष्म और लघु उद्यम हैं। प्रत्येक में नौ से 12 बिजली करघे हैं।

 

नोटबंदी के बाद वाले सप्ताह में  बिजली करघे में काम करने वाले हजारों श्रमिकों की मजदूरी आधी हो गई है। पहले जहां सप्ताह में छह दिन और एक दिन में 16 से 18 घंटे काम होते थे। वहीं अब सप्ताह में तीन दिन ही काम हो रहा है।

 


 

बिजली करघा क्षेत्र में अधिकांश लेनदेन नकद में होता है – करघा मलिक कच्चा माल खरीदने, श्रमिकों को भुगतान करने और माल बेचने के लिए नकद का ही इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, कई मालिकों ने उधार पर काम करने की कोशिश की है, लेकिन इंडियास्पेंड को उन्होंने बताया कि नकद के बिना वे उसी स्तर के उत्पादन को कायम नहीं रख सकते हैं।

 

पगारे कहते हैं, “भुगतान में देरी हो रही है क्योंकि उनके पास देने के लिए नए नोट नहीं हैं। ” 8 दिसंबर 2016, को इंडियास्पेंड से बात करते हुए उन्होंने बताया कि अब भी कई लोगों को पुराने नोट में भुगतान का जा रहा है। नकद की कमी और धागों की कीमतों में गिरावट के कारण काम करने के घंटे कम कर दिए गए हैं या कई करघों को बंद कर दिया गया। इसी वजह से अधिकांश श्रमिकों को कम नहीं मिल रहा है।

 

कारखानों में काम करने की बद्तर स्थिति, सरकार का ध्यान नहीं  

 

500 और 1,000 रुपए को नोटों को बंद करने से पहले भी मालेगांव में 100 वर्ष पुराना बिजली करघा उद्योग, जो प्रतिदिन 10 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करता था, में कारीगर बद्तर हालात में काम करते थे। भारत में जटिल श्रम कानून और बिजली करघा व्यवसायों के छोटे आकार से स्थिति और खराब हुई है।

 

पगारे अनौपचारिक कार्यकर्ता हैं, यानी की उन्हें नियमित रूप से काम नहीं दिया जाता। नियमित कारीगरों के लाभों के हकदार वह नहीं हैं। हालांकि वे इस उद्योग से 23 वर्षों से जुड़े हैं। उन्हें  नकदी में साप्ताहिक मजदूरी भुगतान किया जाता है वह रोजगार राज्य बीमा योजना के तहत पंजीकृत नहीं हैं, न हीं वेतन के साथ छुट्टी मिलती है और न ही कोई स्वास्थ्य बीमा है। पैसे को बढ़ाने के मोल-भाव के लिए उन्हें हर वर्ष अपना काम बदलना पड़ता है क्योंकि उद्योग में किसी तरह की वृद्धि या पदोन्नति की व्यवस्था नहीं है। पगारे बताते हैं कि ‘ईयर-प्लग’ के बिना शोरगुल वाले बिलजी करघा में 12-12 घंटे काम करने से उनके सुनने की शक्ति प्रभावित हुई है।

 

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500 और 1,000 रुपए को नोटों को बंद करने से पहले भी मालेगांव में 100 वर्ष पुराना बिजली करघा उद्योग, जो प्रतिदिन 10 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करता था, में कारीगर बद्तर हालात में काम करते थे। मालेगांव में श्रमिक एक दिन में औसतन 12 घंटे या ज्यादा काम करते हैं। ज्यादातर करघों में पानी या चाय पीने की सुविधा भी नहीं है।

 

पगारे कहते हैं, “यह बहुत मेहनत का काम है और आठ मशीनों को संभालने के लिए आस-पास बहुत कुछ चल रहा होता है। ” वह कहते हैं कि वह दूसरे काम करने के इच्छुक हैं, लेकिन उनके पास बहुत कम विकल्प हैं। पागरे ने केवल कक्षा 4 तक ही पढ़ाई की है और उनके पास अन्य कोई विशेषज्ञता नहीं है। पांच सदस्य के परिवार में पागरे अकेले कमाने वाले हैं।

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ संबद्ध ट्रेड युनियन ‘इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की अध्यक्ष, सुनीता कुलकर्णी कहती हैं, “बिजली करघा कारीगर एक दिन में आमतौर पर 15 से 18 घंटे बद्तर स्थिति में कम करते हैं। वह भी बिना किसी ओवरटाइम या किसी संरक्षण के। उन पर नौकरी खोने का दबाव लगातार रहता है। ” टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान द्वारा एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि वर्ष 2011 में एक करघा कारीगर की औसत मासिक आय 911 रुपए थी।

 

वह कहती हैं, “अधिकांश श्रमिक निरक्षर और अपने अधिकारों से अनजान हैं। उन्हें केवल अपने मालिक, अपना काम और मजदूरी के बारे में ही जानकारी है।”

 

सरकार के श्रम अधिकारी पटोले कहते हैं, चाय स्टालों पर काम करने वाले बच्चों से लेकर कारोबार में काम करने वाले बच्चों के साथ मालेगांव में बड़े पैमाने पर बाल श्रम फैला हुआ है। हथकरघा मालिक अमनवीर कहते हैं, कई बार माता-पिता अपने बच्चे को लेकर आते हैं और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए जोर देते हैं। हम बच्चों को कारखानों में काम नहीं देते हैं।

 

तीन श्रम कानून जो मालेगांव बिजली करघा उद्योग के लिए संकट पैदा करते हैंs
 

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948: इस अधिनियम के अनुसार, हर नियोक्ता को अपने कर्मचारियों के रिकॉर्ड को बनाए रखने चाहिए, उनके द्वारा किए गए काम और उन्हें किए गए भुगतान का रिकॉर्ड होना चाहिए।

 

क्या होता है मालेगांव में : पागारे ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि आज तक उन्हेंने जितने भी बिजल करघा कारखानों में काम किया है, कहीं भी उनका रिकॉर्ड नहीं रखा गया है। श्रम अधिकरी पटोने कहते हैं, “श्रमिक और मालिकों का मजदूरी के संबंध में आपसी समझौता होता है, और इसलिए श्रम अधिकारी ज्यादातर मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर पाते हैं।

 

कारखाना अधिनियम 1948: इस अधिनियम के अनुसार, 10 से अधिक कर्मचारियों के साथ सभी कारखानों के लिए, सामान्य काम के घंटे एक दिन में नौ घंटे और एक सप्ताह में 48 घंटे होने चाहिए। नियमित वेतन से दोगुना मुआवजे के साथ एक दिन में दो घंटे ओवरटाइम की अनुमति है। पांच घंटे के काम के बाद कार्यकर्ता को 30 मिनट का ब्रेक मिलना चाहिए और कारखानों में देखरेख, भंडारण और परिवहन के दौरान कारखानों के श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

 

क्या होता है मालेगांव में: ट्रेड यूनियन अध्यक्ष कुलकर्णी के अनुसार मालेगांव में कार्यकर्ता एक दिन में 12 घंटे काम करते हैं। दिन में अतिरिक्त घंटे काम करने के लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं किया जाता है। कुलकर्णी कहते हैं, “ज्यादातर बिजली करघों में चाय या यहां तक कि पानी पीने की सुविधा भी नहीं है।” श्रम अधिकरी, पटोले कहते हैं, “अधिकांश करघे अपने कार्यकर्ताओं की संख्या 10 से कम दिखाते हैं और कारखाना अधिनियम के तहत नहीं आते हैं।”

 

कपड़ा निर्माण की इकाइयां छोटे आकार की, कठिन है मशीनों का आधुनिकीकरण

 

मालेगांव में कपड़ा निर्माण की इकाइयां छोटे स्तर हैं । 40 फीसदी करघों में 5 लाख रुपए से कम का निवेश है, जबकि 50 फीसदी करघों में 5 लाख और 10 लाख रुपए के बीच का निवेश है। 10 फीसदी से कम मालिकों को बैंक से मिलने वाली राशि तक पहुंच है, क्योंकि बैंक से अपंजीकृत या बहुत छोटे उद्यमों के लिए ऋण मिलने की संभावना कम होती है।

 

मालेगांव में बिजली करघा कारखानों के छोटे आकारो के कारण मशीनों का आधुनिकीकरण और कर्मचारियों के लिए बेहतर सुविधाएं प्रदान करना कठिन होता है। मालेगांव के कपड़ा क्लस्टर पर 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, 19 फीसदी से कम करघे आधुनिक हैं, जिन्हें ऑटो या शटल-लेस करघा कहा जाता है। इससे कार्यस्थल को सुरक्षित बनाने और उत्पादकता में वृद्धि होगी।

 

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मालेगांव में बिजली करघा कारखानों के छोटे आकार के कारण मशीनों के आधुनिकीकरण और कर्मचारियों के लिए बेहतर सुविधाएं प्रदान करने में मुश्किलें आती हैं।

 

रिपोर्ट के अनुसार, इसके अलावा, कम से कम 83 फीसदी करघा मालिकं ने कहा है कि उद्योग में श्रमिकों की कमी है, क्योंकि युवा कारीगर कम मजदूरी पर काम करना नहीं चाहते हैं।

 

भारत में जटिल है श्रम कानून

 

केंद्र सरकार के 144 कानूनों और राज्य सरकार के 160 नियमों के साथ भारत के श्रम कानून, कठोर और जटिल हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, “हालांकि, ये नियम श्रमिकों के हित के लिए बनाए गए थे, लेकिन करघा मालिक श्रम कानून को दरकिनार करते हैं। ” 2014 की इस रिपोर्ट के अनुसार, काम पर रखने और कार्यकर्ताओं के बाहर निकालने पर प्रतिबंध, ट्रेड यूनियनों के साथ समझौते और पूंजी प्रधान तरीकों का इस्तेमाल।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी है। यह वीडियो, ‘वीडियो वालंटियर्स’ के सहयोग से बनाया गया है। वीडियो वालंटियर्स ,एक वैश्विक पहल है, जो वंचित समुदायों को कहानी एवं आंकड़े संग्रहित करने का कौशल प्रदान करता है। साथ ही सकारात्मक बदलाव के लिए वीडियो को उपकरण की तरह उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित करता है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 दिसंबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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