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पिछड़े बुंदेलखंड में हिंदुत्व को लेकर उदासीनता

रेवती लाउल,
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झांसी में एक अभियान रैली के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतीक्षा में भारतीय जनता पार्टी की टोपियां पहले हुए लोग।

 

झांसी और बांदा ( उत्तर प्रदेश) उत्तर प्रदेश के सबसे गरीब जिलों में से एक बांदा के पुरवा गांव में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थकों ने पार्टी के पसंदीदा विषय ‘धर्म’ पर बातचीत शुरू की- “हम भगवान श्रीराम के साथ हैं। वह सर्वोच्च हैं। उन्होंने इस दुनिया को विकसित किया है। ”

 

जब उनसे पूछा गया कि “अल्लाह के बारे में क्या?”, तो उन्होंने कहा, “उन्हें तो किसी ने नहीं देखा है। लेकिन हमने राम को देखा है। ”

 

क्या अल्लाह को समान रूप से मान्यता नहीं दी जानी चाहिए?

 

एक और भाजपा समर्थक भड़क उठा: “नहीं। अल्लाह नही आते उसमें।”

 

भारतीय जनता पार्टी के समर्थक (आगे बाएं) कहते हैं, “हम भगवान श्री राम के साथ हैं। वह सर्वोच्च हैं। उन्होंने इस दुनिया को विकसित किया है। ” जब उनसे पूछा गया कि “अल्लाह के बारे में क्या राय है?” तो उन्होंने कहा, ” उन्हें तो किसी ने नहीं देखा है।”

 

ये विचार असामान्य नहीं है। यह चुनावी मौसम था और बांदा जिले में बैठक के बाद, भाजपा उम्मीदवार आर. के. पटेल ने अच्छी तरह से स्पष्ट किया।

 

वह एक स्थानीय स्वामी (भिक्षु), और विधायक, प्रकाश द्वेदी के साथ प्रचार कर रहे थे। उनके अभियान के भाषणों की शुरुआती पंक्तियां:

 

“यह एक धर्म युद्ध है, जैसे महाभारत। अच्छे और बुरे के बीच एक लड़ाई। नरेंद्र मोदी सरकार अच्छी है, विपक्ष सामूहिक रूप से बुराई के लिए खड़ा है।”

 

द्वेदी ने कहा, “कांग्रेस की सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण के चरम को छू लिया है।”

 

यह बुंदेलखंड क्षेत्र है- देश के सबसे आर्थिक रूप से वंचित भागों में से एक। 14 वीं शताब्दी के बुंदेला शासकों के नाम पर बना यह भौगोलिक क्षेत्र वर्तमान समय में दो राज्यों – उत्तर प्रदेश (यूपी) और मध्य प्रदेश (एमपी) में फैला हुआ है। इसमें यूपी के सात जिले और पड़ोसी एमपी के अन्य छह जिले शामिल हैं।

 

 

बुंदेलखंड के आधे हिस्से, जो कि यूपी के सात जिले हैं, राज्य में सबसे कम आबादी वाले हैं। यूपी में प्रति वर्ग किमी 829 लोगों का जनसंख्या घनत्व है, जबकि बुंदेलखंड के जिलों में घनत्व सिर्फ 329 है। इसका मतलब यह है कि ये जिले एक साथ 80 में से केवल चार लोक सभा सीटों के लिए जिम्मेदार हैं।यह भौगोलिक क्षेत्र के हिसाब से प्रतिनिधियों या सांसदों की एक छोटी संख्या है जो उत्तर प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 28.7 फीसदी है, लेकिन यह बहुत कम आबादी वाला क्षेत्र है। स्थानीय राजनेताओं ने कहा कि क्षेत्र के पास  केंद्र से धन सड़क और सिंचाई योजनाओं के लिए मिलने वाले धन को लेकर मोलभाव करने की शक्ति बहुत कम है।

 

उत्तर प्रदेश में हिंदू वोट पर छह रिपोर्ट की श्रृंखला में यह तीसरी रिपोर्ट है। यह भारत का सबसे गर्म चुनावी युद्ध का मैदान है, जिसमें कुल 543 लोकसभा सीटों में से 80 सीटें हैं आप यहां पहली रिपोर्ट पढ़ सकते हैं और दूसरी रिपोर्ट यहां। यूपी सरकार द्वारा 2018 में चार में से तीन निर्वाचन क्षेत्रों को सूखा प्रभावित के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। इसलिए राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कहा कि बीजेपी उम्मीदवार पटेल के प्रचार अभियान की ध्रुवीकरण प्रकृति आश्चर्य की बात नहीं है। मतदाताओं को किसी विकास के मुद्दों पर लुभाने की बजाय हिंदूत्व के मुद्दे पर एक करना आसान है।

 

बुंदेलखंड फैक्टशीट

  • जनसंख्या (यूपी + एमपी): 1.83 करोड़ (यूपी + एमपी); 79.1 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, और इन क्षेत्रों में एक तिहाई से अधिक घरों को गरीबी रेखा से नीचे माना जाता है। अनुसूचित जातियां 23.5 फीसदी हैं।
  • साक्षरता दर (यूपी): 69.3 फीसदी (भारत के 74 फीसदी और यूपी के 67.7 फीसदी की तुलना में)
  • प्रति व्यक्ति आय सूचकांक (यूपी): 0.280 (भारत के 0.522 और यूपी ‘0.149 की तुलना में) (क्षेत्र में वर्ष में किसी व्यक्ति की औसत आय की गणना, कुल जनसंख्या द्वारा क्षेत्र की कुल आय को विभाजित करके पहुंची)
  • शहरीकरण (यूपी): 22.4 फीसदी (भारत के 31 फीसदी की तुलना में)। 2001-2011 के बीच, बुंदेलखंड में शहरीकरण 22 फीसदी से बढ़कर केवल 22.4 फीसदी हो गया
  • लिंगानुपात (यूपी + एमपी): प्रति 1,000 पुरुषों पर 885 महिलाएं (भारत औसत: 943)
  • बाल लिंगानुपात (यूपी + एमपी): 899, 2001 में 914 से घट गया
  • कृषि में प्रति व्यक्ति आय (दोनों राज्य): रु। 7,173–13.4 फीसदी राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय (2010-11); यूपी-बुंदेलखंड में, कृषि के लिए 7,658 रुपये। )

Source: Bundelkhand Human Development Report 2012, NITI Aayog
Note: UP + MP refers to data for the combined Bundelkhand region, including districts from both Uttar Pradesh and Madhya Pradesh.

 

इस क्षेत्र के अल्प-विकास के इतिहास में विरल वर्षा और सिकुड़ते जल स्रोत का बड़ा रिश्ता है आंकड़ों में देखें तो तस्वीर साफ होती है। यह सूखा प्रभावित क्षेत्र है और खराब बारिश से प्रभावित है और समय के साथ भूजल का तेजी से कम हो रहा है। वर्षा की कमी अधिक रही, जैसा कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के आंकड़ों से पता चलता है।

 

वर्षा की कमी – बुंदेलखंड, उत्तर प्रदेश

 

 

लोगों के पास पीने के लिए पानी नहीं है या उनके खेतों में पानी नहीं है। भूमिगत जल दूषित हो रहा है।  ग्रामीण भारत की 85 फीसदी पेयजल आपूर्ति भूजल से होती है, जैसा कि भारत में भूजल की स्थिति पर ‘जर्नल एडवांस इन वाटर रिसोर्सेज’ में प्रकाशित 2016 के एक अध्ययन में बताया गया है। 60 फीसदी से अधिक तक पहुंच ‘अतिरिक्त लवणता या आर्सेनिक’ द्वारा प्रतिबंधित है।  ‘संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम’ द्वारा प्रकाशित इस 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, यहां के 71 फीसदी श्रमबल, किसान सालाना औसतन 7,658 रुपये कमाते हैं। जो कि 638 रुपये प्रति माह या 20 रुपये प्रतिदिन है। अलग से ली गई किसानों की आय, कुल आय से बहुत कम है, जो बुंदेलखंड के एक औसत व्यक्ति की कमाई है, जो कि एक अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, सालाना 26,805 रुपये है-कृषि आय का लगभग चार गुना।

 

यहां मतदाताओं ने कहा कि वास्तव में कोई सीवेज या कचरा निपटान नहीं है। कोई भी रोजगार नहीं है। कृषि क्षेत्र न केवल सूखे से पीड़ित हैं, बल्कि सरकारों की उदासीनता भी है।

 

मूलभूत सुविधाओं के अभाव के बाद लोगों में क्रोध और असंतोष

 

पटेल ने सरकारी योजनाओं को सूचीबद्ध करके बताया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने क्या-क्या किया है। लेकिन लोगों का गुस्सा और ऊब पूरे प्रदर्शन पर था। पटेल ने मोदी को बड़ा मजबूत बरगद का पेड़ बताया जिसके तहत वे सभी इकट्ठा हुए थे। अगले दिन, बांदा जिले के तिंदवाड़ा गांव में उसी बरगद के पेड़ के नीचे, ग्रामीणों ने कहा कि उनलोगों ने भाषण पर ध्यान नहीं दिया।

 

एक किसान ने स्थानीय लहजे में गुस्से में कहा,“ये लोग केहते हैं धर्म की लड़ाई है। कोई धर्म की लडाई नहीं है। सब खोखली बातें हैं।”

 

70 वर्षीय किसान सीता राम ने कई चुनावों को आते-जाते देखे हैं। वह बताते हैं, “यहां कुछ भी नहीं बदला है।”

 एक तीसरे किसान ने कश्मीर में मारे गए 40 केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के सदस्यों के लिए मोदी द्वारा वायु सेना को समर्थन देने और प्रतिशोध में पाकिस्तान पर हमला करने के लिए समर्थन और शक्ति प्रदान करने के बारे में सुना था।उन्होंने सवाल किया,’ मैडम, मोदी जो बोल रहे हैं कि 340 जवान मारे गए हैं, वे पाकिस्तानी … कुछ बताओ इसके बारे में, क्या हुआ?

 

बदले में जब पूछा गया कि उन्हें क्या लगता है, तो उन्होंने बताया, “किस पे विस्वास करीं…खूद पे विस्वास नहीं हो रहा है, तो बताओ।”

 

सबसे अधिक गुस्से में महिलाएं थीं, जिन्हें अपने सिर पर पानी का बरतन लेकर कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था, क्योंकि उस गांव में ट्यूबवेल नहीं थे।

 

बुंदेलखंड, उत्तर प्रदेश में ऑपरेशनल ट्यूबवेल

 

Source: Irrigation & Water Resources Department, Government of Uttar Pradesh

 

वहीं गोमती खड़ी थी, गुस्से से भरी हुई। उन्होंने समझाया कि जिस जगह पर पटेल बता रहे थे योजनाओं के बारे में और दावा कर रहे थे कि बुंदेलखंड की पानी की समस्या जल्द ही अतीत की बात हो जाएगी क्योंकि केंद्र ने 9,000 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दे दी, वहां एक हैंड पंप है, जहां महिलाएं सार्वजनिक रूप से स्नान करने के लिए मजबूर हैं।

 

 

करीब बीस साल की एक युवा लड़की वहां नीले सलवार कमीज में स्नान कर रही थी, क्योंकि लोग आ-जा रहे थे। गोमती ने गुस्से से भरी आवाज में कहा,”टिंडवाड़ा में एक लड़की होना ऐसा ही है। कोई बाथरूम और कोई बुनियादी सुविधा नहीं। गरिमा की तो बात ही न करें।”

 

मतदाता और नेता-चुनावों के प्रति वफादारी की अदला-बदली

 

 

गोमती का निराशावाद, क्षेत्र के अनुभव में मतदाताओं के समग्र डिस्कनेक्ट के मैट्रिक्स का हिस्सा है और यह तथ्य कि भाजपा के उम्मीदवार, पटेल  ने पिछले एक दशक में चार बार पार्टियां बदलीं हैं। पटेल ने 1980 में एक छात्र के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस- बीजेपी के वैचारिक मूल समूह) में शामिल होकर शुरुआत की। लेकिन उन्होंने एक दशक बाद एक ऐसी पार्टी के साथ चुनावी राजनीति में कदम रखा, जो खुद को भाजपा के राजनीतिक विरोधी के रूप में परिभाषित करती है – बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) । एक चुनाव हारने के बाद, फिर बसपा के टिकट पर अगला चुनाव जीतते हुए, पटेल 2007 में समाजवादी पार्टी (सपा) में गए। वह सपा के टिकट पर एक चुनाव हार गए और फिर अगले चुनाव में जीत हासिल की। और जब 2014 में आखिरी संसदीय चुनाव हुआ, जब सपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया, तो वे वापस बसपा में चले गए और हार गए। इसके तुरंत बाद, वह भाजपा में शामिल हो गए और भाजपा के टिकट पर 2017 का राज्य चुनाव लड़ा और जीत गए।

 

राजनीति के इस उथल-पुथल से घिरे पटेल खुद का बचाव कुछ इस तरह करते हैं, “कांशीराम ने जो विचारी धारा शुरु की, आज मोदी जी उसी विचारधारा बढ़ा रहे हैं।”

 

एक अभियान में, बांदा से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार आर.के पटेल। पटेल बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के माध्यम से चुनावी राजनीति में आए, लेकिन उन्होंने कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी।

 

बांदा जिले के उनके सह-प्रचारक और अधिक रंगीन नेता, विधायक द्वेदी, ने कहा: “अगर विपक्षी कोई कल्पित कल्पना पर कोई ख्वाब देख रहे हों, तो मैं बता दूं कि वो कपड़ा फाड़कर, ग्यारह बजे ही भागेंगे।”

 

बांदा जिले से भारतीय जनता पार्टी के विधायक प्रकाश द्विवेदी,  पार्टी के लोकसभा उम्मीदवार आर.के पटेल के लिए एक अभियान के दौरान।

 

लेकिन यूपी में बुंदेलखंड की राजनीति कुछ भी हो, निराश मतदाता और भाजपा के ध्रुवीकरण के बीच एक सीधी रेखा है। उनकी उदासीनता और गहरी निराशा के बावजूद, सभी चार लोकसभा सीटों के मतदाताओं ने पिछले आम चुनाव में भाजपा को वोट दिया और राज्य के चुनावों में वे भाजपा के मतदाता रहे हैं।

 

 जहां भाजपा के रवि शर्मा ने 2012 और 2017 में झांसी से राज्य विधानसभा का चुनाव जीता था, बांदा ने 2017 में द्विवेदी को वोट देने से पहले 2012 में कांग्रेस के विवेक कुमार सिंह को वोट दिया।

 

2014 के लोकसभा चुनाव में बुंदेलखंड निर्वाचन क्षेत्र

 

Source: Trivedi Centre for Political Data, Ashoka University

 

इस बार, बांदा निर्वाचन क्षेत्र के टिंडवाड़ा गांव के लोग असमंजस में थे। “ये तो अभी नहीं बता सकते, किसको वोट देंगे,” सबका एक मानक जवाब था।

 

 जब आगे बातचीत की गई, तो कुछ ने कहा कि जब वे भाजपा से परेशान थे, तो उन्हें किसी भी राजनीतिक विकल्प पर ज्यादा भरोसा नहीं था। “तो यह सिर्फ धर्म या जाति के लिए मतदान के बीच एक विकल्प के लिए नीचे आ सकता है”, कुछ ने कहा। हिंदूओं को उस पार्टी के लिए देखा जा सकता है, जिसे लोग हिंदूत्व वाली की पार्टी समझते हैं – भाजपा।

 

कुछ जातियों और धर्म के लोग,उन पार्टियों को वोट दे सकते हैं जिन्हें वे अपने समुदायों के रक्षक के रूप में देखते हैं – सपा या बसपा।

 

लेकिन तस्वीर और अधिक जटिल हो जाती है, जब बांदा जिले में अभियान को अधिक शहरी, झांसी के थोड़े कम आर्थिक रूप से वंचित जिले के साथ जोड़ा जाता है।

 

झांसी का फॉर्मूला: झांसी = वेलोर = मोदी

 

झांसी की वीरता और राजनीतिक इतिहास को भाजपा और अन्य सभी पार्टियां अपने-अपने ढंग से देखती हैं। यह शहर 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के अपने सबसे प्रसिद्ध नेता की मूर्तियों से सुसज्जित है- झांसी की रानी। अब भाजपा के अभियानों में मतदाताओं को यह बताने का प्रयास किया गया है कि उनका बहादुरी का इतिहास रहा है, इसलिए उन्हें हाल ही में सरकार की बहादुरी पर मतदान करना चाहिए – जब देश के सैनिकों पर हमला किया गया था तो, सरकार की कार्रवाही पर… दूसरे शब्दों में, झाँसी वीरता पर्याय है और वीरता मोदी का पर्याय है। भाजपा की फायर-ब्रांड नेता, जो पार्टी के अयोध्या अभियान की प्रमुख चेहरा थीं, उमा भारती ने 2014 में पार्टी के लिए यह सीट जीती थी। वहां तब केवल मोदी लहर ही नहीं थी। अयोध्या में भगवान राम के लिए एक मंदिर के निर्माण की राजनीति उनका उदभव काल माना जाता है। 1992 में मस्जिद के ध्वंस के बाद भारती राजनीति के केंद्र में पहुंच गई थीं। हालांकि, इस बार वह चुनाव नहीं लड़ रही हैं, लेकिन पार्टी के उम्मीदवार अनुराग शर्मा के लिए प्रचार कर रही हैं।

 

झांसी जिले के ललितपुर शहर का टाउन स्कावयर, जिसमें झांसी की रानी और उनकी मां के हाथों में एक बच्चे की मूर्ति बनी हुई है। ऊपर एक बोर्ड में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ नारा लिखा हुआ है, जो बालिकाओं के लिए सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम माना जाता है। भाजपा ने रानी का उल्लेख यह कहते हुए किया कि शहर में बहादुरी का इतिहास है, इसलिए उन्हें बहादुरी के रिकॉर्ड वाले एक पार्टी के लिए मतदान करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, झांसी की वीरता और मोदी की वीरता बराबर है।

 

पहली बार राजनेता बने शर्मा आयुर्वेदिक दवाओं के बैद्यनाथ समूह के अध्यक्ष और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ग्रैजुएट हैं। उन्होंने कहा कि उनका एकमात्र लक्ष्य क्षेत्र का विकास है।

 

झांसी में अपने बड़े, हरे रंग के बंगले से बाहर निकलते हुए और अपनी लक्जरी एसयूवी में बैठते हुए, शर्मा ने कहा कि वह बुंदेलखंड क्षेत्र के सबसे बड़े धर्मार्थ ट्रस्टों में से एक का संचालन करते है, जो “पूरी तरह से स्व-वित्त पोषित” है, “इससे उन्हें इलाके के दूर-दूर के हिस्सों में जाने का मौका मिला और अब उन्होंने महसूस किया कि कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने क्या किया है – 60,000 छात्रों को छात्रवृत्ति, बोरवेल का निर्माण, टैंकरों को उन क्षेत्रों में भेजना, जिनमें पानी नहीं था – यह सब समुद्र में सिर्फ एक बूंद के बराबर था। जरूरत थी “बुंदेलखंड के प्रति सरकार की नीति में बदलाव की, जरूरत इस बात की भी थी कि कोई बुंदेलखंड को लेकर सही सवाल उठाए। “उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि “मैंने कभी धार्मिक नारा नहीं लगाया है।”

 

आयुर्वेदिक दवाओं के लिए मशहूर बैद्यनाथ समूह के हार्वर्ड-शिक्षित अध्यक्ष अनुराग शर्मा भारतीय जनता पार्टी की तरफ से झांसी लोकसभा उम्मीदवार हैं। शर्मा कहते हैं कि ” मैंने कभी धार्मिक नारा नहीं लगाया।”

 

जब वह ललितपुर के नगरपालिका शहर में अपनी चुनावी रैली के लिए पहुंचे तो उनका भाषण छोटा और विनम्र था। उन्होंने कहा, “मैं अनुराग हूं। आप में से अधिकांश लोग भैया के नाम से जानते हैं।” उन्होंने अपने धर्मार्थ कार्य को सूचीबद्ध किया और अपना भाषण समाप्त किया।

 

शर्मा ने जो नहीं कहा और उसकी ज़रूरत नहीं थी, वह यह था कि उऩकी ओर से प्रगतिशील अभियान के विलक्षण जोर के बावजूद, झांसी ने इससे पहले दो दशक तक ध्रुवीकरण को देखा है।

 

झांसी में हिंदू आंदोलन
 

 शहर के आरएसएस कार्यालय में, दो वरिष्ठ नेताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बात की कि आरएसएस से लेकर भाजपा तक के संस्थानों का हिंदू अधिकार और इससे जुड़े संगठनों ने क्या किया है? “झांसी में, 1975 में कांग्रेस पार्टी की इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकालीन नियम के बाद हिंदू अभियोजन की प्रक्रिया शुरू हुई। अगला बड़ा मुद्दा 1991-92 के बाबरी मस्जिद विध्वंस था। बुंदेलखंड के सात जिलों में अब 700 शाख या शाखाएं हैं।”

 

और फिर 1991 में दूसरी लहर आई। आरएसएस ने यह सुनिश्चित किया कि दलित या अनुसूचित जाति समूहों को शामिल करने के लिए हिंदू अपनी उच्च जाति के आधार से आगे बढ़ें – क्योंकि बुंदेलखंड में दलितों की आबादी बहुत ज्यादा है ( राज्य औसत के 21.1 फीसदी से 23.5 फीसदी ज्यादा )। उन्होंने समझाया कि “हमने बाल्मीक जयंती (परंपरागत रूप से अनुसूचित जातियों के बीच वाल्मीकियों का त्योहार) को आरएसएस के शरद पूर्णिमा के उत्सव के रूप में मनाया।”

 

वर्ष 1996 से, उन्होंने सहारिया जनजातियों के साथ भी काम किया, जो ललितपुर और मौरानीपुर के क्षेत्रों में और झांसी जिले में फैले थे।

 

 उन्होंने समझाया, “जिन समुदायों में पिछड़े वर्ग के नेता नहीं थे, हमने उन्हें उमा भारती की तरह नेता बनाया।” इन दो दशकों में, उन्होंने जो सामुदायिक कार्य किया है, उसका भारी लाभ हुआ – जैसे मृतक के लिए अंतिम संस्कार करना – गौ रक्षा और, सबसे बढ़कर, लोगों की पहचान बनाना। इससे हिंदू दक्षिणपंथी राजनीतिक बाहुल्य भाजपा को लगातार जीत में फायदा हुए। इन्हीं सामुदायिक कार्यों के बीच, ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का अपने पारंपरिक अर्थ से पुन: ब्रांडिंग भी शामिल है, क्योंकि कई लोग इसे भारतीय संविधान में समझते हैं।  पसंदीदा मुद्दे पर जाते हुए उन्होंने कहा, “हम उस शब्द पर एक अलग ही समझ रखते हैं। भारत एक हिंदू राष्ट्र है। मुसलमान की टोपी कब से भरतीय हो गई? ”

 

कॉफी और पकोड़ों के साथ, भाजपा के छात्र संगठन, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्य सौरभ मिश्रा की राजनीति की दुनिया में उनके संस्कार की अविश्वसनीय कहानी थी। यह कहानी उनके अपने गांव में पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए एक आत्म-भूख हड़ताल से शुरु हुई थी।

 

25 वर्षीय सौरभ वर्तमान में झांसी में कानून की पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने बुंदेलखंड के एक अत्यंत पिछड़े हिस्से से अपना रास्ता बनाया है। पड़ोसी जिले हमीरपुर के इचोली नामक एक गांव से। मिश्रा कहते हैं, “पीने ​​के लिए पानी नहीं था। हमारे पास इतना खराब पानी था कि वह जानवरों के लिए भी ठीक नहीं था।”

 

इसलिए 2016 में, उसने अपने दोस्तों के साथ भूख हड़ताल पर जाने का फैसला किया। शुरुआत में, गांव के लोगों ने उनका मजाक उड़ाया गया था।

 

निम्बू-पानी (नींबू पानी) पर जीवित रहने के चार दिन बाद, उप-मंडल मजिस्ट्रेट उन्हें रोकने और बातचीत करने के लिए आए। तब तकउनके इस विरोध की खबर फैल गई थी और उसी के बल पर, 8 दिन में, जिला प्रशासन ने उन्हें लिखित में एक आश्वासन दिया कि वे राज्य को पीने के पानी के लिए पाइप बनाने के लिए 7.5 करोड़ रुपये के फंड को मंजूरी देने के लिए कहेंगे ।

 

मिश्रा ने कहा कि 2019 में उन पाइपों को बनाने के लिए 5 करोड़ रुपये का बजट दिया गया है। मिश्रा ने जोर दिया कि यह एबीवीपी में उनका प्रशिक्षण था, जिसने उन्हें दृढ़ता प्रदान की।

 

मुसलमान और पाकिस्तान
 

हिंदू अधिकार के स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर बांदा के बदौसा क्षेत्र में सत्यम तिवारी हैं। वह यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज्य में विकसित सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन, हिंदू युवा वाहिनी के सदस्य हैं।तिवारी अपने मिट्टी के घर में बैठे, अपनी सतर्कता अभियान की कहानियां सुनाते हैं।  लव जिहाद के खिलाफ की कहानियां, जब उन्होंने हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों के साथ जाने से रोका, और गौ रक्षा के लिए मुसलमानों को वध करने से रोका। दो साल पहले, उन्होंने सतर्कता अभियान की इस सूची में एक और उपलब्धि जोड़ दी है- मुसलमानों द्वारा चलाए जा रहे एक स्कूल में प्रवेश करना और उनकी कक्षा की दीवारों पर महात्मा गांधी और प्रधानमंत्री के पोस्टर लगाना। तिवारी को अपने हिंदूत्व पर जबरदस्त भरोसा था और मुस्लिमों की हर बात का विरोध करने की जल्दी थी। जब यह बताया गया कि वह अभिनेत्री कैटरीना कैफ के दो पोस्टरों वाले एक कमरे में बैठे हैं और कैफ मुस्लिम है तो  वह उठे, और ब्लेड लेकर उन पोस्टरों को चीर दिया। जब रिपोर्टर ने कैमरे पर उनसे पूछा “क्या मुसलमान भी इंसान नहीं हैं?”  तो उन्होंने कहा, “हां, वे हैं, लेकिन उनमें मानवता नहीं है।”

 

यह जानते ही कि कटरीना कैफ मुस्लिम हैं, सत्यम तिवारी ने कमरे में लगे उसके पोस्टर को ब्लेड से फाड़ दिया।  वह कहते हैं कि इस तरह की नाटकीयता से उन्हें राजनीतिक ध्यान मिल सकता है।

 

बाद में, कैमरे की नज़र से दूर, उन्होंने कहा कि उनके कई मुस्लिम दोस्त हैं और मुस्लिम अभिनेता सलमान खान के वे प्रशंसक भी हैं, लेकिन, कुछ इस तरह की नाटकीय राजनीति से उन्हें राजनीतिक ध्यान मिल सकता है।

 

तिवारी की सतर्कता हिंदू अधिकार के राजनीतिक स्पेक्ट्रम के कठिन अंत की तरह लगती है। लेकिन गहरे संकट के एक क्षेत्र में, ‘हिंदू’ कारक भाजपा के झांसी के उम्मीदवार अनुराग शर्मा के विचारों को भी रेखांकित करता है, जो मानते हैं कि भारत एक “हिंदू राष्ट्र” है और भाजपा एक ऐसी पार्टी है, जो “हिंदू धर्म की रक्षा” के लिए खड़ी है।

 

शर्मा की रैली में, कम से कम 50,000 लोग थे। वे यह सुनने के लिए नहीं थे कि झांसी के उनके उम्मीदवार का विकास के बारे में क्या कहना है। वे वहां थे, क्योंकि सीएम आदित्यनाथ इस अभियान का नेतृत्व कर रहे थे।

 

जब तक भीड़ ने आदित्यनाथ के आने का इंतजार किया, एक स्थानीय नेता ने भीड़ को उत्साहित रखने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “कमल पर बटन नहीं दबेगा तो पाकिस्तान मजबूत होगा।”

 

जब सीएम का हेलीकॉप्टर उतरा और सभी ने ताली बजाई, तो माहौल की गर्मी बढ़ गई। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कहा कि यह चुनाव भगवान हनुमान की प्रार्थनाओं से धन्य हो गया है। मजबूत, मांसपेशियों वाले भगवान – बजरंग बली। और उनकी तुलना उन्होंने प्रधान मंत्री के मजबूत व्यक्तित्व से की, जिन्होंने ‘पाकिस्तानी आतंदकवादियों पर हमला करने और उन्हें खत्म करने’ के लिए सशस्त्र बलों का नेतृत्व किया… इसके बाद भीड़ घटने लगी।

 

झांसी में भारतीय जनता पार्टी की रैली में 64 वर्षीय किसान हरि राम। वह कहते हैं, “किसी भी पार्टी ने कुछ नहीं किया है। क्या कर सकते है? हमें किसी को वोट देना है। यह वर्तमान शासन भी हो सकता है। ”

 

घिमार जाति ( “पिछड़ा वर्ग” के तहत सरकार द्वारा वर्गीकृत एक समूह ) के 64 वर्षीय किसान, हरि राम चकित दिखाई देते हैं। वह 25 किलोमीटर दूर एक गांव से ट्रैक्टर पर सवार होकर रैली में आए थे। वह कहते हैं, “मुझे क्या लगता है? मेरे तीन बच्चे हैं, दो दिहाड़ी मजदूर हैं। एक विकलांग है। किसी भी पार्टी ने कुछ नहीं किया। लेकिन करें क्या? हमें किसी को वोट देना है। यह वर्तमान शासन भी हो सकता है। ”  यह उत्तर प्रदेश में हिंदू वोट पर छह रिपोर्ट की श्रृंखला में तीसरी रिपोर्ट है। आप पहली रिपोर्ट यहां और दूसरी यहां पढ़ सकते हैं।

 
(लाउल एक स्वतंत्र पत्रकार और फिल्म-निर्माता हैं। वह ‘द एनाटॉमी ऑफ हेट’ के लेखक हैं, जो ‘वेस्टलैंड / कॉन्टेक्स्ट’ द्वारा 2018 के दिसंबर में प्रकाशित हुआ है।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 29 अप्रैल, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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