Home » Cover Story » “प्रवासन ग्रामीणों के लिए धन लाता है, लेकिन जाति संरचनाओं को कम नहीं करता है…”

“प्रवासन ग्रामीणों के लिए धन लाता है, लेकिन जाति संरचनाओं को कम नहीं करता है…”

चारु बाहरी,
Views
2013

Chinmay Tumbe_620
 

माउंट आबू: अलग-अलग जातियों में बड़े पैमाने पर पलायन ने कुंकरी में जीवन स्तर को ऊपर उठाया है। यह महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र का एक गांव है, जिसे कोंकण भी कहा जाता है। लेकिन प्रवासन के बाद धन में हुई वृद्धि ने गांव में जातिगत संरचनाओं को नहीं मिटाया है, जैसा कि ‘जर्नल ऑफ इंटरडिसिप्लिनरी इकोनॉमिक्स’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चलता है।

 

कुंकरी सिंधुदुर्ग जिले के सावंतवाड़ी शहर से 12 किमी दूर है। कोंकण क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों की तरह, इसने एक शताब्दी से अधिक समय तक प्रवासन देखा है, जिसमें पुणे और मुंबई शीर्ष ठिकाने हैं।

 

1800 के अंत में, प्रमुख मराठा समुदाय से प्रवास की पहली लहर शुरु हुई थी। 1961 और 1987 में भारत की जनगणना द्वारा एकत्र किए गए नृवंशविज्ञान संबंधी आंकड़ों ने 2017 में क्षेत्रों के सर्वेक्षण में यह दर्शाया कि प्रवासन अब भी सभी जातियों में है। 1961 में, चार परिवारों में से एक पलायन करते थे, 2017 में यह बढ़कर पांच में तीन परिवार हो गया है।

 

प्रवासन में अब पुरूषों और महिलाओं के बीच की दूरी कम होती जा रही है।1961 में महिला प्रवासन के आंकड़े शून्य थे। 2017 में कुल प्रवासियों में से  20 फीसदी महिलाए हैं। अध्ययन के सह-लेखक और अहमदाबाद के ‘इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ मैनेजमेंट’ में अर्थशास्त्र के असिसटेंट प्रोफेसर, चिन्मय तुंबे कहते हैं, “प्रवासन ग्रामीण समाजों की सबसे शक्तिशाली परिवर्तनकारी शक्तियों में से एक है, और इसने कुंकरी के लोगों के लिए जीवन को बेहतर बनाया है। हालांकि, हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि गांव में आने वाला धन न किसी भूमि बाजार के विकास को गति नहीं देता है और न ही इसने जाति व्यवस्था की पकड़ को ढीला किया है। “

 

इंडियास्पेंड ने मतदाताओं की अपनी-अपनी जाति और धर्म से राजनीतिक नेताओं के लिए मतदान में वरीयता, अंतर-जातीय विवाह के लिए प्रतिरोध, और जातियों के बीच आय और धन की निरंतर असमानता पर रिपोर्ट किया है।

 

तुंबे एक दशक से प्रवास के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। 2016 में, वह ‘मिनस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अरबन पोवर्टी अलीवीऐशन’ के लिए एक कार्य समूह का सदस्य थे। तुंबे बैंगलोर के ‘इंडियन इंस्ट्टयूट ऑफ मैनेजमेंट’, और ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस’ के छात्र रहे हैं।उनसे बातचीत के अंश-

 

आपके अध्ययन से पता चलता है कि 1961 में, कुंकरी में डाक मनी ऑर्डर के माध्यम से 44 परिवारों को 18,749 रुपये मिले थे। 2015-16 में, अम्बेगांव और कुंकेरी के गांवों को एक साथ डाकघर के माध्यम से 255,000 रुपये और बैंक हस्तांतरण या नकद हस्तांतरण के माध्यम से अतिरिक्त राशि प्राप्त हुई। इन प्रेषणों ने कुंकरी में ग्रामीणों के जीवन को कैसे प्रभावित किया है?
 
 

कुंकरी की अर्थव्यवस्था को बनाए रखने में विप्रेषित धन ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लगभग सभी 60 फीसदी परिवार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में विप्रेषित धन पर निर्भर हैं।

 

 

विप्रेषित धन ने लोगों को भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने और उनके जीवन स्तर को बढ़ाने में मदद की है। उदाहरण के लिए, 1961 में, केवल दो मराठा परिवारों के पास साइकिल थी, जबकि किसी के पास रेडियो सेट नहीं था। 2017 तक, टेलीविजन सेट, दोपहिया, गैस स्टोव और पंखे सबसे पीछे की जातियों में भी सामान्य बात हो गए थे। यह सब पैसा आने के साथ हुआ। हमें यह भी उम्मीद थी कि भूमि बाजार कुछ हद तक विकसित होगा। इसके विपरीत, हमने जातियों में भूमि स्वामित्व के वितरण में व्यावहारिक रूप से कोई बदलाव नहीं पाया। ब्राह्मण और मराठा परंपरागत रूप से गांव जाति पदानुक्रम में सबसे ऊपर रहे हैं और महार सबसे नीचे रहे हैं। 1987 और 2017 में, मराठाओं के पास कुंकेरी में लगभग 90 फीसदी भूमि थी, जबकि उन्होंने गांव की आबादी का लगभग 80 फीसदी बनाया था। महारों के पास भूमि की संख्या 1987 में दो से बढ़कर 2017 में चार हो गई है, लेकिन वे सामूहिक रूप से 1 फीसदी से भी कम भूमि के मालिक हैं, जबकि गांव में उनकी आबादी का 7 फीसदी है। बढ़ती संपन्नता के बावजूद, हमने जाति द्वारा गांव के संगठन में कोई बदलाव नहीं पाया है। महारों और अधिसूचित जनजातियां अपने स्वयं के वाडि़यों (हैमलेट्स)तक सीमित हैं, मराठे भी अपने समूहों तक सीमित हैं। कुछ समूहों में मराठों और अन्य पिछड़ी जातियों का मिश्रण है। जाति-अलगाव कायम है।

 

हालांकि, हमने नीचे के महार जाति द्वारा खुद को मुखर करने का प्रयास पाया है। 2017 में, उन्होंने हरिजनवाडी नामक एक वाडी का नाम बदलकर माता रमई नगर करने के लिए एक लिखित आवेदन किया। संयोग से, क्लस्टर को 1987 में महरबाडी से हरिजनवाड़ी नाम दिया गया था।

 

मुंबई के ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ से डॉक्टरेट उम्मीदवार, कल्याणी वर्तक द्वारा कोंकण इलाके के एक गांव, कुंकेरी में 2017 में सर्वेक्षण के बाद डेटा सामने आए, जिसमें ‘मास माइग्रेशन रुरल इंडिया: ए रिस्टडी ऑफ कुंकेरी विलेज इन कोंकण, महाराष्ट्र 1961-1987-2017’ नामक पेपर के लिए विश्लेषण किया गया है।

 

लगातार फैलने के बाद भी कोंकण को ​​अभी भी पिछड़े रूप में क्यों देखा जाता है? सिंधुदुर्ग और रत्नागिरि वर्ष 2012 की महाराष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट में मानव विकास सूचकांक पर बहुत उच्चऔर उच्चस्थान पर रहे। दोनों ने शिक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2015-16 (NFHS-4) के अनुसार, वहां 12-23 महीने के बच्चों और महिलाओं में एनीमिया का कम प्रसार और बेहतर टीकाकरण कवरेज है।

 

 यदि किसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पलायन जारी है, तो आप मानेंगे कि उस जगह के साथ कुछ गलत है। चूंकि सिंधुदुर्ग और रत्नागिरि के मामले में ऐसा नहीं है, यह हमें एक झलक देता है कि क्षेत्र के लोग जीवन में आगे बढ़ने के लिए एक सुरक्षित रणनीति के रूप में प्रवासन को कितना महत्व देते हैं और इसके विपरीत, वे कितने जागरूक हैं कि कृषि पर्याप्त रूप से सम्मानजनक नहीं है। सामान्य तौर पर, महाराष्ट्र के पालघर से गोवा तक तटीय पट्टी सुंदर, समृद्ध और अच्छी तरह से शिक्षित लेकिन घनी आबादी वाली है। हमारे पास कोंकण में काम करने वाले बिहार और झारखंड के कुछ छात्र थे। वे आश्चर्य चकित थे कि कोई जगह क्यों छोड़ना चाहेगा। लेकिन आस-पास पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं, और प्रवासन की संसकृति बहुत मजबूत है। 18 वीं शताब्दी में, मराठा साम्राज्य के शासकों ने पुणे में सेवा करने के लिए कोंकण के लोगों को काम पर रखा था। उस दौरान बड़ी संख्या में ब्राह्मण स्थायी रूप से पलायन कर गए थे।

 

ब्रिटिश शासन के दौरान, बॉम्बे प्रवासियों के लिए मुख्य ठिकाने के रूप में उभरा, क्योंकि निर्माण क्षेत्र, डॉकयार्ड, सेना, पुलिस और अन्य सेवाओं में श्रम की आवश्यकता थी। 1881 तक, रत्नागिरी में पैदा हुए 15 फीसदी लोग बॉम्बे में काम कर रहे थे। हालांकि 1800 के दशक में श्रम का आंदोलन मुख्य रूप से मौसमी था। 1889 में रत्नागिरी से 1,00,000 व्यक्ति मुंबई गए, लेकिन धान की बुवाई के समय पर अपने खेतों में लौट आए। समय के साथ केवल त्योहारों या महत्वपूर्ण अवसरों के लिए घर लौटने वाले प्रवासियों के साथ पलायन अर्ध-स्थायी बन गया। प्रवास की यह संस्कृति कायम रही। 1961 में, रत्नागिरी ने महाराष्ट्र राज्य के मुंबई(तब बंबई) में प्रवासियों के 45 फीसदी के लिए जिम्मेदार था, जब राज्य की आबादी में इसका हिस्सा केवल 5 फीसदी था। सफलतापूर्वक प्रवास करने वाले लड़कों को विवाह के बाजार बड़ी मांग होती रही है, जबकि जो असफल होते हैं वे शर्म की भावना का अनुभव करते हैं। इतने दशकों से प्रवास से लाभान्वित होने के बाद, आप कह सकते हैं कि प्रवासन उनके डीएनए में है।

 

कोई भी यह मानेगा कि किसी क्षेत्र में सबसे वंचित लोगों के लिए बाहर निकलना सबसे बड़ा प्रोत्साहन है।लेकिन कोंकण में, उच्च मराठा और मध्य-कुंग कुनबी जातियों का प्रवासन हावी है, और सबसे अधिक विकसित तहसीलों में पलायन की उच्चतम दर देखी गई है। पूर्ववर्ती अछूत महार जाति को पारंपरिक रूप से प्रवासियों के बीच चित्रित किया गया था। उच्च और मध्यम जातियों, जिनके घर में बेहतर संभावनाएं थीं, उन्होंने प्रवास  क्यों किया? और प्रवास में जाति की भूमिका क्यों होनी चाहिए?

 

उत्तर भारत में, जहां पलायन का बेहतर अध्ययन किया गया है, उच्च जातियों को उन शहरों में प्रवास करते देखा गया है, जो उनके पैतृक गांव से दूर हैं और वे अधिक अवधि के लिए, यूं कहें कि, आठ महीने से अधिक समय के लिए जाते हैं, जबकि निचली जातियां निकटवर्ती शहरों में जाती हैं। कम समय के लिए या यूं कहें कि तीन महीने के लिए । इस विसंगति को प्रवास की लागत द्वारा समझाया गया है। एक प्रवासी को अज्ञात गंतव्य के लिए स्थानांतरित करने पर आय अर्जित करने की अनिश्चितता का सामना करने के लिए कई तरह के उपाय की आवश्यकता होती है। यदि आप शहरी भारत की जनसंख्या संरचना का अध्ययन करते हैं तो प्रवास पर लागत का यह प्रभाव स्पष्ट हो जाता है। उच्च जातियां शहरी भारत का लगभग 45-50 फीसदी हिस्सा बनाती हैं, जबकि निचली जातियां 30 फीसदी से कम बनती हैं। इसी कारण से, कुंकेरी में भी, मराठों ने पलायन का नेतृत्व किया। उन्हें बेहतर अवसरों के लिए प्रवास करने के लिए प्रेरित किया गया था। इन वर्षों में, मराठों के साथ महारों ने भी प्रवास को लगभग पकड़ लिया। यह पलायन की रिपोर्टिंग करने वाले परिवारों के बढ़ते प्रतिशत में परिलक्षित होता है, 1961 में 26 फीसदी, 2017 में 60 फीसदी। पहली बार किसी शहर में जाने पर प्रवासियों को उन लोगों के साथ रहना पड़ता है, जिन्हें वे जानते हैं ताकि लागत में कटौती हो सके और यह समझ पाए कि उस जगह कैसे काम करना है। इस तरह के नेटवर्क विशुद्ध रूप से जाति-आधारित होते हैं। एक ही गांव के विभिन्न जातियों के लोग शहर में स्थानांतरित होने के बाद भी मिश्रित नहीं होते हैं। हमने अपने अध्ययन के दौरान यह देखा। हमने पाया कि मुंबई से पलायन करने वाले कुंकरी के महार अपने गांव के प्रवासियों की बैठकों से दूर रहे। वे ऐसे समूहों से अलग-थलग महसूस करते थे।

 
पलायन किसी गांव की जनसांख्यिकी को कैसे प्रभावित करता है?

 

 

डेमोग्राफिक डेटा पर पलायन के सबसे अधिक प्रभाव में से एक लिंग अनुपात है। 1870 में शुरू होने वाले लगभग 130 वर्षों के लिए, जिला रत्नागिरी में प्रति 1,000 पुरुषों पर लगभग 1,100 महिलाओं का लिंग अनुपात था। यह सामूहिक प्रवास के कारण था। उन दिनों में, पुरुष अपनी पत्नी और बुजुर्गों को जमीन की देखभाल करने के लिए छोड़कर वापस चले जाते थे। 1961 में, कुंकेरी का लिंगानुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,074 था, जबकि महारों के बीच यह केवल 967 था, जिससे पता चलता है कि निचली जाति गांव की सामान्य आबादी से कम पलायन कर रही थी। 2017 तक, कुंकेरी का लिंग अनुपात 955 तक गिर गया था, जो प्रवासन के बदलते लिंग आयामों को दर्शाता है। 1961 में, कुंकरी में 83 प्रवासी थे। सभी पुरुषों ने काम के लिए पलायन किया था।  2017 में, हमने 60 महिला प्रवासन का दस्तावेजीकरण किया, उन्होंने कुल आउटमिगेंट्स का 20 फीसदी से अधिक बनाया। महिला प्रवासन का मुख्य कारण शिक्षा और काम था, जो 1960 के दशक से एक बड़ी पारी थी। दिलचस्प बात यह है कि शिक्षा के लिए पलायन को काम के लिए पलायन की ओर एक कदम के रूप में देखा गया। महिला प्रवासन में वृद्धि के साथ, कुंकेरी की आयु संरचना में भी नाटकीय बदलाव आया है। 2017 में, कुंकरी की आबादी में 13 फीसदी 15 से कम आयु के बच्चों की थी, जो 1961 में 44 फीसदी के आंकड़ों से कम है। 2017 में 55 फीसदी लोग 55 वर्ष की आयुसे अधिक वाले हैं। इस संबंध में आंकड़े 1961 के 9 फीसदी से ज्यादा है। आज, कुंकेरी एक गांव है, जिसमें बहुत से बूढ़े लोग हैं, और कुछ बच्चे और वयस्क हैं। कुंकेरी का एक और दिलचस्प जनसांख्यिकीय डेटा बिंदु है, जिसने पिछले 50 वर्षों में 0.5 फीसदी की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर दर्ज की है, जो भारत की 1.5-2 फीसदी विकास दर से नीचे है। आमतौर पर, प्रवासन के कारण, कोंकण क्षेत्र 1921 से 2001 के बीच भारत में सबसे धीमा विकास क्षेत्र रहा है।

 
(बाहरी स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं और राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं।)
 
यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 10 फरवरी, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
“क्या आपको यह लेख पसंद आया ?” Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

code