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फिल्म में एक दुल्हन खुले में शौच का करती है विरोध, आज के समाज की यही है हकीकत

देवानिक साहा,
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अक्षय कुमार की फिल्म टॉयलेटः एक प्रेम कथा 11 अगस्त 2017 को रिलीज हुई है। यह एक युवा दुल्हन की कहानी है, जो अपने ससुराल में एक शौचालय नहीं होने का पता चलने पर अपने विवाह से बाहर निकल जाती है।  फिल्म में व्यंग्य है, जो आज के समाज के शौच की समस्या से जुड़ी है । अक्ष्य कुमार इस फिल्म को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन में एक योगदान मानते हैं।

 

Source: YouTube/Viacom18 Motion Pictures

 

प्रधानमंत्री ने इस फिल्म के लिए अपनी प्रतिक्रिया प्रशंसा के शब्दों से दी है।

 

 

फिल्म में एक युवा महिला का विद्रोह सामाजिक क्रांति का कारण बनता है, लेकिन वास्तविक भारत में, महिलाएं शिक्षित होने के बावजूद इस तरह की स्थिति में नहीं दिखती।

 

ओडिशा के तटीय जिले, पुरी में ‘लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन’ के शोधकर्ताओं द्वारा 2016 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, घरों में शौचालय बनाने को लेकर महिलाओं के पास निर्णय लेने की सीमित शक्ति होती है।  खुले में शौच से जुड़ी समस्याओं से महिलाओं और लड़कियों को सबसे अधिक मुश्किलें होती है।

 

अध्ययन में पाया गया था कि 80 फीसदी घरों में स्वच्छता से जुड़ी सुविधाओं के निर्माण के बारे में निर्णय केवल पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं। 11 फीसदी घरों में पुरुषों ने अपनी पत्नी के साथ बातचीत कर निर्णय लिया और, और केवल 9 फीसदी घरों में निर्णय महिलाओं के द्वारा लिया गया।

 

ये निष्कर्ष प्रासंगिक हैं, क्योंकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 (NFHS-4) के अनुसार, पुरी जिले के केवल 37 फीसदी परिवारों में स्वच्छता की बेहतर सुविधाएं हैं। हालांकि, यह ग्रामीण ओडिशा में परिवारों में शौचालय के 23 फीसदी औसत और राज्य के औसत 29.4 फीसदी से अधिक है।

 

स्वच्छता की बेहतर सुविधाओं में पाइप वाले सीवर सिस्टम तक फ्लश, सेप्टिक टैंक तक फ्लश, पिट लैट्रिन तक फ्लश, वेंटिलेटेड इम्प्रूव्ड पिट /बायोगैस लैट्रन, स्लैब के साथ पिट लैट्रिन और ट्वन पिट/कम्पोस्टिंग शौचालय, जिसे किसी अन्य घर के साथ साझा नहीं किया जाता, जैसी चीजें शामिल हैं।

 

अध्ययन में 475 परिवारों को शामिल किया गया था। इनमें से 217 के पास कोई लैट्रिन की कोई सुविधा नहीं थी, 211 परिवारों के पास एक चालू व्यवस्था थी और 47 परिवारों में वह भी में काम नहीं कर रहा था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण ओडिशा में स्वच्छ भारत अभियान के तहत व्यक्तिगत परिवार लैट्रिन  केवल 42फीसदी घरों में था, जो सभी राज्यों में तीसरी सबसे निचली संख्या है।

 

घरों में लैट्रिन के निर्माण में पुरुषों और महिलाओं द्वारा लिए गए निर्णय

स्रोत: PLOS वन

नोट: आंकड़ों को निकटवर्ती दशमलव तक पूरा किया गया है।

 

बिना शौचालय वाले घरों की तुलना में, चालू शौचालय वाले घरों में अधिक शिक्षित पुरुष और महिलाएं थी, परिवार का बड़ा आकार था और अधिक आमदनी थी।

 

अध्ययन के अनुसार, जिन घरों में शौचालय था उनके पास अपने मालिकाना हक वाली कृषि भूमि (85फीसदी) और ट्यूबवेल (83फीसदी) थे और उनके बटाई पर खेती करने या श्रमिक के तौर पर रोजगार करने की भी कम संभावना थी।

 

महिला साक्षरता से सामाजिक नियम नहीं बदल रहे

 

अध्ययन के दौरान किए गए साक्षात्कारों से पता चला कि परिवार में लैंगिक असमानता स्वच्छता से जुड़े निर्णयों को भी प्रभावित करती है। एक 52 वर्षीय महिला ने कहा, “आखिरकार, पति परिवार का मुखिया है, वह आयु और संबंध में बड़ा है और वह शौचालय पर खर्च करेगा। इस कारण से निर्णय लेने की शक्ति उसके पास रहती है।”

 

घर और गांव तक सीमित रहने वाले महिलाओं के पास अपनी निर्णय लेने की क्षमता को लेकर आत्मविश्वास भी कम होता है। एक 42 वर्षीय महिला ने कहा, ‘हम महिलाओं को कुछ नहीं पता। मेरे घर की सीमा के बाहर सभी चीजें मेरे पति करते हैं, तो वे (पति और अन्य पुरुष) परिवार की भलाई के लिए निर्णय ले सकते हैं, हम नहीं।’

 

यह इस तथ्य के बावजूद है कि ग्रामीण पुरी में, महिलाओं में से 83फीसदी और पुरुषों में से  92फीसदी साक्षर हैं। ये आंकड़े एनएफएचएस-4 NFHS-4 के हैं। यह राज्य के क्रमश: 67.4 फीसदी और 84.3फीसदी के औसत से अधिक है।

 

इंडियास्पेंड  ने 13 फरवरी, 2017 को रिपोर्ट दी थी कि विवाह या स्वास्थ्य केंद्र जाने के बारे में निर्णय लेने की महिलाओं की शक्ति पर राज्य के स्तर पर उच्च साक्षरता दर या एक बेहतर लिंग अनुपात का आवश्यक रूप से प्रभाव नहीं पड़ता। इससे पूरे भारत में सामाजिक नियमों की अधिक शक्तिशाली भूमिका का संकेत मिलता है।

 

इंडियन ह्युमन डिवेलपमेंट सर्वे 2012 के आंकड़ों पर आधारित इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया था कि लगभग 80 फीसदी भारतीय महिलाओं को एक स्वास्थ्य केंद्र जाने के लिए परिवार के एक सदस्य से अनुमति लेनी पड़ती है। इन महिलाओं में से, 80 फीसदी ने कहा था कि वे अपने पति से, 79.89 फीसदी परिवार के एक वरिष्ठ पुरुष सदस्य से, और  79.94 फीसदी परिवार की एक वरिष्ठ महिला सदस्य से अनुमति लेती हैं।

 

वर्ष 2012 के आईएचडीएस सर्वेक्षण में 34 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 15 से 81 वर्ष की आयु के बीच की 34,000 से अधिक शहरी और ग्रामीण महिलाओं को शामिल किया गया था। इंडियास्पेंड की दिसंबर 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी ऑफ ओटावा की प्रोफेसर, कैरोल व्लासॉफ की ओर से महाराष्ट्र के गोव में 30 वर्षों से अधिक समय तक किए गए एक अध्ययन में निष्कर्ष दिया गया था, “बेटियों के खिलाफ पक्षपात तभी समाप्त हो सकता है अगर महिलाओं की शिक्षा के साथ सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण भी हो।”

 

घर में शौचालय, महिलाओं के लिए बड़ा निर्णय

 

शौचालय नहीं बनाने या उसे चालू नहीं रखने के कारण के तौर पर अक्सर वित्तीय मुश्किल का हवाला दिया जाता है। ऐसी धारणा थी कि शौचालय बनाना महंगा है, इस कारण से परिवार के बजट पर नियंत्रण करने वाले पुरुष इसका निर्माण नहीं करवाना चाहते। जिनके पास धन है, वे शौचालय बनाने पर उसे खर्च नहीं करना चाहते, क्योंकि उनकी अन्य प्राथमिकताएं हैं।

 

अध्ययन में पाया गया कि महिलाएं शौचालय बनाने को एक ‘बड़े निर्णय’ के रूप में देखती हैं, जो सिर्फ पुरुष ले सकते हैं। छोटी खरीदारियों के लिए भी महिलाएं अपने पति पर निर्भर करती हैं। एक महिला ने बताया, ‘मैं अकेले कोई निर्णय नहीं ले सकती, हम प्रत्येक रुपये के लिए उन (पति) पर निर्भर हैं। स्वयं के लिए चूड़ियां और साड़ी जैसी छोटी चीजों के लिए भी हम उनसे पैसे के लिए कहते हैं।’

 

धन से जुड़े अन्य निर्णयों में भी महिलाओं के पास मोलभाव की सीमित शक्ति है। उदाहरण के लिए,  91 फीसदी घरों में, केवल पुरुष स्वास्थ्य देखभाल पर महिलाओं के लिए खर्च का निर्णय लेते हैं। और उत्तर देने वाली महिलाओं में से 85 फीसदी गृहणियां थी, जिससे संभवत: उनकी मोलभाव की शक्ति सीमित हो जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, पुरी जिले में कार्य में महिलाओं की हिस्सेदारी की दर 7.5% है, ओडिशा के सभी जिलों में तीसरी सबसे निचली है।

 

धन संबंधी निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी

स्रोत:PLOS वन

नोट: आंकड़े निकटवर्ती दशमलव तक पूरे किए गए हैं।

 

शौचालय निर्माण से जुड़ी स्वंयसेवी संस्थाओं के लिए भी पुरुष महत्वपूर्ण

 

अध्ययन में पाया गया कि शौचालय के निर्माण से जुड़ी एनजीओ भी इन असमानताओं पर ध्यान देती हैं। उन्हें शौचालय निर्माण के लिए लक्ष्य दिए जाते हैं और क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता निर्माण की जल्द अनुमति के लिए अधिकतर पुरुषों से संपर्क करते हैं।

 

महिलाओं को इससे शिकायत है। अध्ययन में शामिल एक 65 वर्षीय महिला ने कहा, “एनजीओ के लोग पुरुषों को खोजते हैं। वे उनके (पति और अन्य पुरुष) के साथ मीटिंग करते हैं, और हमें एक गड्डा खोदकर उसे तैयार करने के लिए कहते हैं। एक दिन, वे एक मिस्त्री के साथ आते हैं और शौचालय के निर्माण का काम शुरू कर देते हैं। गांव में शौचालय का निर्माण करने के लिए एकमात्र मिस्त्री है, तो उसके उपलब्ध न होने पर, ढांचा अधूरा रह जाता है।”

 

फोटो साभार: वायाकॉम 18 मोशन पिक्चर्स

 

(साहा, यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स के इंस्टीट्यूट ऑफ डिवेलपमेंट स्टडीज में एमए जेंडर एंड डिवेलपमेंट के छात्र हैं।)

 

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