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बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की लागत में 1.2 लाख करोड़ – 72 राफेल विमान खरीदने के बराबर- की बढ़ोतरी

श्रीहरि पलियथ,
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Irrigation

 

बेंगलुरु: एक दशक से 2017 तक, जब भारत ने पांच बार सूखे की मार झेला था, केंद्र पोषित बड़ी से लेकर मध्यम आकार की सिंचाई परियोजनाओं का केवल एक चौथाई पूरा किया गया है, जो 2,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि के क्षेत्र को कवर करता है। यह जानकारी सरकार के ‘ऐक्सेलरैटिड इरगैशन बेनफिट प्रोग्राम’ (एआईबीपी) की  जनवरी-2019 ऑडिट रिपोर्ट में सामने आई है।

 

केंद्रीय रूप से वित्त पोषित लघु सिंचाई परियोजनाओं में से 64 फीसदी इन 10 वर्षों में पूरे

 

किए गए हैं। एआईबीपी को दो दशक से अधिक समय पहले बड़ी अपूर्ण परियोजनाओं के लिए एक केंद्रीय सहायता कार्यक्रम के रूप में लॉन्च किया गया था, जो राज्यों द्वारा वित्त पोषित नहीं था।

 

कार्यक्रम की विफलता के कारणों में विलंब से भुगतान, धोखाधड़ी और धन का अलग इस्तेमाल शामिल हैं, जैसा कि रिपोर्ट का निष्कर्ष है।

 

भारत में लगभग 60 फीसदी कृषि वर्षा पर निर्भर है और जिस देश में 60 करोड़ लोग खेती पर रहते हैं, वहां कृषि उत्पादकता के लिए कुशल सिंचाई महत्वपूर्ण हो जाती है। कुल कृषि क्षेत्र में कुल सिंचित क्षेत्र का अखिल भारतीय प्रतिशत 34.5 फीसदी है, जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 से पता चलता है।

 

एआईबीपी की शुरुआत 1996-97 में 500 करोड़ रुपये से हुई थी। अगले तीन वर्षों में, एआईबीपी ने 1,440 करोड़ रुपये खर्च किए, जैसा कि  इंडियास्पेंड ने 14 मार्च 2016 की रिपोर्ट में बताया है। इसी अवधि के दौरान, सिंचाई योजनाओं पर एआईबीपी द्वारा वित्त पोषित व्यय नहीं है, वह 700 करोड़ है।

 

2015-16 में, एआईबीपी को प्रधान मंत्री कृषि सिचाई योजना के चार घटकों में से रखा गया था, जिसे 2015 में कृषि जल-उपयोग की दक्षता में सुधार करने, सुनिश्चित सिंचाई के तहत खेती योग्य क्षेत्र का विस्तार करने और टिकाऊ जल संरक्षण प्रथाओं को शुरू करने के लिए शुरू किया गया था।

 

ऑडिट में, 2017 के अंत तक एक दशक के लिए 118 प्रमुख से मध्यम सिंचाई परियोजनाओं का नमूना लिया गया और पाया गया कि उनमें से 84 के लिए लागत 120,772 करोड़ रुपये थी, जो 1,667 करोड़ रुपये की लागत से 72 राफेल फाइटर जेट खरीदने के लिए पर्याप्त था या ग्रामीण नौकरियों के कार्यक्रम के लिए 2019 के अंतरिम बजट का दो गुना है। राफेल की कीमत सरकार के 36 राफेल फाइटर जेट की 60,000 करोड़ रुपये की खरीद पर आधारित है, जैसा कि 15 फरवरी, 2019 को इंडिया टुडे द्वारा रिपोर्ट की गई।

 

सरकार के ऑडिटर ने 335 लघु सिंचाई योजनाओं का भी ऑडिट किया और लगभग 62 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी पाया।

 

2008-17 के बीच, 201 बड़ी परियोजनाओं का केवल 31 फीसदी और 11,291 छोटी योजनाओं का 71 फीसदी पूरा हुआ है। संयुक्त रुप से, एक दशक में, परियोजनाओं की स्वीकृत लागत 239,000 करोड़ रुपये थी।

 

सिंचित क्षेत्र में से 20 फीसदी बढ़ोतरी,  कृषि भूजल पर निर्भर

 

2014-15 तक 14 वर्षों में,  भारत में शुद्ध सिंचित क्षेत्र 20 फीसदी बढ़कर 68.4 मिलियन हेक्टेयर या जर्मनी के भूमि क्षेत्र से दोगुना हो गया, जैसा कि सिंचाई पर 2018 के सरकार के आंकड़ों से पता चलता है। (इस डेटा में, 2014-15 के आंकड़े प्रोविजनल हैं।)

 

इस बीच, पिछले 18 सालों में से 13 में सामान्य से कम बारिश हुई और सात सूखे साल देखे गए – 2002, 2004, 2009, 2014, 2015, 2016 और 2017, जैसा कि ‘डाउन टू अर्थ’ ने 1 अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

भारत में एक सदी और डेढ़ सदी में सूखे और अकाल पर जनवरी 2019 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि “मिट्टी में नमी की कमी से भारत में फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है, खासकर जब सिंचाई का अभाव हो।”

 

रिपोर्ट में अनुसार भारत में अकाल के उन्मूलन के लिए प्राथमिक कारण बेहतर खाद्य वितरण, बफर फूड स्टॉक की उपलब्धता, ग्रामीण रोजगार सृजन, परिवहन और भूजल आधारित सिंचाई है, लेकिन उत्तरी भारत में भूजल की कमी खाद्य और ताजे पानी की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।

 

1991 से अब तक नहर सिंचित क्षेत्रों में 30 लाख हेक्टेयर की कमी

 

भारत की लगभग 60 फीसदी सिंचाई भूजल पर निर्भर है। भारत भूजल का दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो कि दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश चीन की तुलना में दोगुना है, जैसा कि  इंडियास्पेंड ने 7 मई, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। भारत ने 2010 में 250 क्यूबिक किलोमीटर भूजल निकाला ( जिंबाब्वे में दुनिया के सबसे बड़े बांध– करिबा की क्षमता का 1.2 गुना ) जिसका 89 फीसदी सिंचाई के लिए उपयोग किया गया था।

 

एआईबीपी में बड़े पैमाने पर निवेश के बावजूद, भारत में नहर से सिंचाई कम हो रही है।1991 से अब तक नहर सिंचित क्षेत्रों में 30 लाख हेक्टेयर की कमी और यह देश को सूखे से बचाने के लिए अच्छा नहीं है, जैसा कि‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ‘ने 12 सितंबर, 2009 की रिपोर्ट में बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, “हमारी सतह के भंडारण के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि भूजल बैंकिंग के लिए अपने उपयोग को अधिकतम करने के लिए पानी को अधिक से अधिक क्षेत्र में फैलाना होगा।”

 

2014-15 तक 14 वर्षों में भारत में शुद्ध सिंचित क्षेत्र

 

 

अर्थशास्त्री और सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ, तुषार शाह ने मई, 2018 में एक साक्षात्कार में इंडियास्पेंड को बताया, “नहर प्रबंधन में सुधार की जरूरत है। कई राज्यों ने लगभग तीन दशकों में सिंचाई इंजीनियरों को काम पर नहीं रखा है। बांधों और नहरों के प्रबंधन के लिए संसाधन आवंटित किए जाने चाहिए। पंजाब और गुजरात में बडी सिंचाई प्रणालियां इस तरह के उपायों के बिना चल रही हैं।”

 

सिंचाई की संभावना,निर्माण, उपयोग और चूक गए लक्ष्य

 

एक दशक के दौरान, सिंचाई क्षमता का सृजन ( कुल क्षेत्रफल जो कि एक पूरी तरह से उपयोग की गई परियोजना द्वारा सिंचित किया जा सकता है ) लगभग 5.8 मिलियन हेक्टेयर था, जो लक्ष्य से 2.7 मिलियन हेक्टेयर या 32 फीसदी तक कम रहा।

 

115 बड़ी से लेकरल मध्यम आकार की परियोजनाओं के लिए समग्र लक्ष्य 8.5 मिलियन हेक्टेयर भूमि की सिंचाई थी, जो संयुक्त अरब अमीरात के आकार के बराबर है।

 

इनमें से केवल 23 फीसदी ने पूर्ण सिंचाई क्षमता हासिल की। 85 चालू परियोजनाओं के बीच, केवल 63 फीसदी ने अपनी पूर्ण सिंचाई क्षमता हासिल की।

 

पूर्ण एमएमएम प्रोजेक्ट में से आधे ने सिंचाई क्षमता हासिल किया है।

Source: Comptroller And Auditor General Of India (Report No 22, 2018)

 

छोटी योजनाओं में, 0.15 मिलियन हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले 39 फीसदी सिंचाई क्षमता प्राप्त की गई थी। रिपोर्ट में, लक्ष्य चूकने के कारणों के लिए “कार्य के निष्पादन में देरी, परियोजनाओं के कार्यक्षेत्र और डिजाइन में बाद में बदलाव, भूमि अधिग्रहण जैसे आवश्यक पूर्व-आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित किए बिना काम शुरू करने, मंजूरी मिलने में देरी और पुनर्वास के प्रावधान में देरी का हवाला दिया गया है।”

 

‘विलंबित भुगतान, धोखाधड़ी और धन का अलग इस्तेमाल’

 

एआईबीपी के तहत कवर परियोजनाओं में नौ राज्यों की 75 फीसदी हिस्सेदारी है – महाराष्ट्र (48); मध्य प्रदेश (19); कर्नाटक (17); तेलंगाना (13); जम्मू और कश्मीर (13); आंध्र प्रदेश (12); ओडिशा (11); उत्तर प्रदेश (नौ) और झारखंड (आठ)।

 

हालांकि, इस अवधि के दौरान कार्यक्रम के लिए राज्यों को केंद्रीय सहायता 41,143 करोड़ रुपये (2016-17 में नाबार्ड से ऋण के रूप में 2,421 करोड़ रुपये सहित) प्रदान की गई थी, लेकिन 2008-09 से 2016-17 के बीच राज्यों को केंद्रीय सहायता जारी करने में देरी हुई थी, जैसा कि  रिपोर्ट में बताया गया है।

 

मंत्रालय ने 16 राज्यों में 53 बड़ी परियोजनाओं के लिए 5,717.23 करोड़ रुपये जारी किए। इन परियोजनाओं के लिए कुल धनराशि का 30 फीसदी, ‘वित्त वर्ष के अंत में, अर्थात् मार्च के महीने में’ जारी किए गए, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है। इसके अलावा, 2008-09 और 2009-10 से संबंधित 11 उदाहरणों में, वित्त वर्ष की समाप्ति के बाद 1,030.41 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई थी।

 

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि, मंत्रालय ने स्वीकार किया कि देरी से धनराशि जारी होने का कारण देर से प्रस्ताव प्रस्तुत करना और राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावों में दोष होना था।

 

रिपोर्ट के मुताबिक, धनराशि को कहीं और भी मोड़ा गया था। यह राशि 13 राज्यों में लगभग 1,579 करोड़ रुपये है। ऑडिट रिपोर्ट कहती है कि, ‘यह अपर्याप्त वित्तीय अनुशासन, वेतन और लेखा अधिकारियों द्वारा व्यय पर नियंत्रण और निगरानी’ की संकेत देता है। चार राज्यों – असम, कर्नाटक, नागालैंड, उत्तर प्रदेश में 7.6 करोड़ रुपये राशि के धोखाधड़ी और संदिग्ध धोखाधड़ी के मामले हैं।

 

सात राज्यों में 18 बड़ी से लेकर मध्यम आकार की सिंचाई परियोजनाओं और दो राज्यों में छोटी योजनाओं में लगभग 1,113 करोड़ रुपये अलग-अलग बैंक खातों और व्यक्तिगत जमा खातों में रखे गए थे, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है। इससे परियोजना के खर्च में वृद्धि हुई और धन की गति कम हुई।

 

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( पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 25 फरवरी, 19 को Indiaspend.com पर प्रकाशिच हुआ है।

 

 

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