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बेंगलुरु के कन्नड़-माध्यम स्कूल में बंगाली भाषी छात्रों की जुबानी, ओझल होते द्वीपों से जलवायु-परिवर्तन शरणार्थियों की कहानी

दिशा शेट्टी,
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बेंगलुरु (कर्नाटक) और मौसुनी (पश्चिम बंगाल): दो साल पहले, जब 43 वर्षीय थियेटर निर्देशक निमी रवींद्रन को एक पब्लिक स्कूल में छात्रों को नाटक सिखाने के लिए अनुदान मिला था तो उन्हें लगा था कि उन बच्चों से संवाद के लिए स्थानीय भाषा कन्नड़ होगी। लेकिन उन्होंने पाया कि बेंगलुरु के मारथाहल्ली इलाके में एक कन्नड़-माध्यम के पब्लिक स्कूल की पांचवी कक्षा में 20 में एक बच्चा बंगाली बोलता है।

 

रवींद्रन कहती हैं, “उनमें से ज्यादातर ने कहा कि वे पश्चिम बंगाल से थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि ये बच्चे घर से इतनी दूर क्या कर रहे हैं। ” जैसे-जैसे उन्होंने हिंदी में कार्यशालाएं शुरू कीं, बच्चे कुछ हद तक परिचित हो गए। वे अपनी कहानियां बताने लगे। रवींद्रन ने याद करते हुए बताया, “उन्होंने अपने घर के पास के पेड़ों, वहां के परिवेश और और स्वच्छ हवाओं के बारे में बताया। वे सब अपने घरों को याद करते थे। ” जहां गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियां बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं, उस मुहाने पर सुंदरबन डेल्टा बना हुआ है। सुंदरबन विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है। डेल्टा बेहद उपजाऊ है, क्योंकि तीनों नदियां अनुमानित 100 करोड़ टन तलछट हर साल जमा करती हैं। सुंदरबन विश्व का सबसे बड़ा मंग्रोव वनस्पति वाला जंगल है, मतलब कि ये जंगल हमेशा दलदल से घिरा रहता है। सुंदरबन का लगभग 40 फीसदी भारत में है, बाकी पड़ोसी बांग्लादेश में है।

 

सुंदरबन यूनेस्को दुनिया में 209 प्राकृतिक धरोहर स्थलों की सूची में शामिल है, जो अपने स्थलीय, समुद्री और जलीय आवासों में जैव विविधता के लिए असाधरण माने जाते हैं।

 

जादवपुर विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ ओशनोग्राफिक स्टडीज की निदेशक सुगाता हाजरा के अनुसार, पिछले 40 वर्षों में, सुंदरबन ने 220 वर्ग किमी (लगभग कोलकाता के आकार का) समुद्र में खो दिया है। बढ़ता समुद्र का स्तर पूरे द्वीप समूह को निगल रहा है। शहरवासी पलायन कर रहे हैं। बांग्लादेश में पड़ने वाले सुंदरबन के हिस्से से और साथ ही भारत के सुंदरबन से भी।

 

 सभी पर्यावरणीय प्रवासी नहीं हैं, लेकिन इस तरह के प्रवास के दस्तावेजीकरण के बिना, संख्याओं का अनुमान लगाना कठिन है। लेकिन प्रवास के इन तरंगों को 2,000 किमी से अधिक दूर दक्षिण-पश्चिम में महसूस किया जा रहा है। इन बच्चों की मदद करने के लिए ब्रीज स्कूल चलाने वाले समृद्धि ट्रस्ट के अनुसार, बेंगलुरु के कुछ कन्नड़-माध्यम सरकारी स्कूलों में 40 फीसदी छात्र बंगाली बोलते हैं।

 

इंडियास्पेंड ने इनमें से कुछ छात्रों को पूर्वी बेंगलुरु के मारथाहल्ली क्षेत्र में कलिहाट झुग्गी में देखा है। अध्ययनों से पता चलता है कि सिर्फ सुंदरबन में ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल में कई जिले जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। 2060 तक, दुनिया भर में लगभग 140 करोड़ लोगों के पर्यावरणीय प्रवासी बन जाने का खतरा होगा। कुछ आंतरिक और अन्य सीमाओं के पार। समुद्र तल में वृद्धि की वार्षिक दर वर्ष 2100 तक तिगुनी होने की उम्मीद है, जिससे कृषि के साथ-साथ निचले इलाकों में रोजमर्रा की जिंदगी भी सुंदरबन जैसे अस्थिर हो जाएगी।

 

दुनिया के सबसे बड़े मंग्रोव वन सुंदरबन को ग्लोबल वार्मिंग की वजह से, समुद्र के बढ़ते स्तर से खतरा है।

 

इस ग्रह पर निचले इलाकों में रहने वाले 10 में से एक व्यक्ति भारत से है। चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ, भारत में सबसे अधिक आबादी है, जो बढ़ते समुद्र स्तर के कारण होने वाले बाढ़ और चरम मौसम की घटनाओं से प्रभावित होगी, जैसा कि 2015 के एक अध्ययन में कहा गया है।

 

जलवायु परिवर्तन से संबंधित विज्ञान के आकलन के लिए विश्व निकाय, ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (आईपीसीसी) की सितंबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, मानव गतिविधियां पहले से ही 1 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग की वजह हैं। 195 देशों की सरकारें इस पैनल में शामिल हैं। रिसर्च साइंटिस्ट और आईपीसीसी की पांचवीं मूल्यांकन रिपोर्ट में समुद्र के स्तर में वृद्धि के अध्याय के प्रमुख लेखकों में से एक डॉन चर्च कहते हैं, “जलवायु प्रणाली में गर्मी का 90 फीसदी से अधिक वास्तव में महासागरों में होता है। जैसे ही महासागर गर्म होते हैं, थर्मामीटर में तरल की तरह, यह फैलता है और समुद्र का स्तर बढ़ जाता है। ” हिमालय की तरह गैर-ध्रुवीय बर्फ का पिघलना, गर्म होने पर महासागरों का थर्मल विस्तार, ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में बर्फ की चादरों का पिघलना वैश्विक समुद्री स्तरों को बढ़ा रहा है। चर्च कहते हैं, “असम्बद्ध उत्सर्जन के साथ समुद्र का स्तर वर्ष 2100 तक एक मीटर तक हो सकता है।” यदि ग्रीनलैंड के ऊपर पूरी बर्फ की चादर को पिघलाया जाता है, तो अकेले वैश्विक समुद्र का स्तर सात मीटर तक बढ़ जाएगा। यदि अंटार्कटिका में सभी बर्फ की चादरें पिघल जाती हैं, तो यह 55 मीटर तक के स्तर को बढ़ा सकता है।

 

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) द्वारा एक वीडियो, जिसमें बताया गया है कि समुद्र के स्तर में वृद्धि में किसका योगदान है।

 

समुद्र का स्तर न केवल इस सदी तक ,बल्कि पिछले 2100 तक भी बढ़ता रहेगा। इसका मतलब है, कम से कम छोटे द्वीपों, कम-तटीय इलाकों और डेल्टा पर रहने वाले लोगों के लिए उनके खेतों में, समुद्र से अधिक खारा पानी समान रूप से प्रवेश करेगा। कृषि के लिए अनुपयुक्त मिट्टी, बाढ़ में वृद्धि, लगातार चक्रवात और बुनियादी ढांचे की क्षति होगी। और ज्यादा से ज्यादा का मतलब है कि वे जिस जमीन को घर कहते हैं, वह जमीन पानी के नीचे होगी।

 
भारत के हिस्से वाले सुंदरबन में शोध की जरूरत

 

कोलकाता में ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एनवॉयरमेंटल स्टडीज एंड वेटलैंड मैनेजमेंट’ (आईइएसड्ब्ल्यूएम) के समुद्र विज्ञानी सेल्विन पितचानी के अनुसार, सुंदरबन के बांग्लादेश वाले हिस्से में बदलती जलवायु पर अच्छी तरह से डेटा है, लेकिन भारतीय पक्ष के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

 

 2017 में सुंदरबन में बदलते मौसम के पैटर्न पर अपना डेटा प्रकाशित करने वाली पितचीनी ने पाया कि जमीन में लगातार नमक घुल रहा है। चक्रवाती तूफान अक्सर आ रहे हैं। वर्षा के पैटर्न पहले से ही बदल गए हैं, जिससे किसानों के लिए पारंपरिक खेती मुश्किल हो गई है।शोध की आवश्कता पर बल देते हुए वह कहते हैं, “  किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए, हमें न्यूनतम 20-25 वर्षों के लिए डेटा की आवश्यकता है। क्षेत्र में मौसम केंद्रों को फंडिंग की भी आवश्यकता है।”

 
प्रवासन के बाद  बच्चे माता-पिता के बिना होते हैं बड़े, बुजुर्गों की देखभाल के लिए कम लोग
 

 कोलकाता से सुंदरबन कार से चार घंटे में पहुंचा जा सकता है। एक बार यहां पहुंचने के बाद कार का इस्तेमाल नहीं होता है। मौसुनी द्वीप तक जमीन के छोटे हिस्सों को पार करने के लिए बैट्री से चलने वाले रिक्शे और धाराओं को पार करने के लिए छोटी नौकाओं का सहारा लेना पड़ता है।एक साल पहले ही डेल्टा के बड़े द्वीपों में से एक और 25,000 से अधिक की आबादी वाले मौसुनी तक  बिजली पहुंच चुकी है।

 

सुंदरबन डेल्टा में 25,000 से अधिक निवासियों की आबादी वाला मौसुनी एक द्वीप है। लगातार बाढ़ और बढ़ते समुद्र के स्तर ने कई लोगों को मौसुनी से पलायन करने के लिए मजबूर किया है।

 

27 साल के शेख सूफी मौसुनी में बड़े हुए। उनका घर बंगाल की खाड़ी के तट पर है। तीन साल के बेटे अब्दुल रहमान को अपने कंधे पर बैठाते हुए सूफी कहते हैं, “हम चावल और मिर्च उगाते थे, लेकिन एक दशक पहले भीषण बाढ़ आई थी। उसके बाद फसलें नहीं उगीं। ” एक बार जब उनकी जमीन खारे पानी की वजह से बंजर हो गई तो उन्होंने मछली पकड़ना सीख लिया। लेकिन अब, साल में छह महीने सूफी 2,000 किमी से अधिक की यात्रा कर वह केरल पहुंचते हैं और एक निर्माण श्रमिक के रूप में काम करते हैं । वे प्रति दिन 300 रुपये कमाते हैं। सूफी की तरह, पर्यावरण  की वजह से प्रवासी बनने वाले लगभग 96 फीसीदी भारत के दूसरे क्षेत्रों में जाते है, जैसा कि क्षेत्र के 1,315 घरों के एक अध्ययन से पता चलता है। यह अध्ययन डेल्टास, वल्नरबिलिटी एंड क्लाइमेट चेंज: माइग्रेशन एंड अडैपटेश्न (DECCMA) द्वारा आयोजित किया गया था, जो ब्रिटेन, घाना, बांग्लादेश और भारत के विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं का एक संगठन है।

 

इन प्रवासियों में से 83 फीसदी पुरुष और 17 फीसदी महिलाएं हैं। अधिकांश युवा हैं;  जिनकी उम्र 21 से 30 वर्ष के बीच है । अध्ययन में शामिल लोगों ने कहा कि वे रोजगार के अवसरों के लिए आगे बढ़ रहे थे, क्योंकि कृषि का कोई भरोसा नहीं था। महिलाएं या तो शादी के बाद अपने पति से मिलने के लिए या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहने के लिए घर को छोड़ रही थीं।

 

पीछे रह जाते हैं बुजुर्ग, बच्चे और ज्यादातर महिलाएं।

 

कोलकाता में बसंती देवी महाविद्यालय में प्राचार्य और पर्यावरण अर्थशास्त्र की शोधकर्ता इंद्रिला गुहा कहती हैं, “दो प्रकार के पलायन हैं – एक अग्रसक्रिय, जो पहले ही तट से अपने पीछे हटने की योजना बनाते हैं। दूसरा है  प्रतिक्रियाशील, जो केवल तभी जगह छोड़ते हैं जब कोई अन्य विकल्प नहीं बचा हो। सुंदरबन में हम अभी भी प्रतिक्रियात्मक प्रवासन देख रहे हैं।”

 

गुहा के अनुसार, माता-पिता के बिना बड़े होते हैं बच्चे, बुजुर्गों की देखभाल के लिए कम लोग होते हैं, और गरीब महिलाएं जो ट्रैफिकर्स के लिए आसान लक्ष्य बन सकती हैं, इस स्थिति के कुछ संभावित खतरे हैं।

 

जो लोग अपने परिवार के साथ जाते हैं, उनके लिए जीवन कठिन बना रहता है।  बेंगलुरु के ब्रिज स्कूलों के बच्चे शहर में जीवन को समायोजित करने के लिए संघर्ष करते हैं। भाषा अवरोध उनके संघर्ष को बढ़ा देता है। माता-पिता अक्सर नौकरियों की तलाश में आगे बढ़ते हैं और इस दौरान सबसे पहले प्रभावित होने वाली चीजों में से एक है, बच्चों की शिक्षा।

 

ब्रिटेन, घाना, बांग्लादेश और भारत के विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं का एक संघ, डेल्टास, वल्नरबिलिटी एंड क्लाइमेट चेंज: माइग्रेशन एंड अडैपटेश्न (DECCMA) भारत में डेल्टा नदियों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन कर रहा है। Source: http://generic.wordpress.soton.ac.uk/deccma/

 
निवासी खुद को अनुकूल बनाने के लिए सक्रिय
 

 जैसे-जैसे समुद्र का आक्रमण जारी रहा, सूफी का घर मलबे में सिमटता गया। उच्च ज्वार के दौरान, समुद्र की लहरों ने उनके घर को टुकड़ों में कर डाला।

 

सूफी, उसकी पत्नी और उनका जवान बेटा सब, अब पड़ोसी के साथ रहते है। वह कहते है “हमारे पास दूसरा घर बनाने के लिए पैसे नहीं हैं। हम कहां जा सकते हैं?”

 

मौसुनी में अपने नष्ट हुए घर के सामने 27 वर्षीय शेख सूफी। सूफी अपने घर से 2,000 किमी दूर केरल में वर्ष में छह महीने के लिए एक निर्माण श्रमिक के रूप में काम करते हैं।

 

जादवपुर विश्वविद्यालय के हाजरा ने कहा, “हमारी कोई नीतियां नहीं हैं, जो समुद्र के स्तर में वृद्धि और तटीय क्षरण के कारण अपनी भूमि खो चुके लोगों के पुनर्वास के लिए कुछ कर पाए।”

 

 आमतौर पर भारी वर्षा होती है। गंभीर चक्रवाती तूफान आते हैं। 801-1,500 मिमी भारतीय औसत की तुलना में इस क्षेत्र में 1,501-2,500 मिमी बारिश होती है।

 

जिन लोगों ने पलायन नहीं किया है, वे खुद को अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं। 27 साल के शब्बीर शेख और 25 साल की खुशबू ऊंचाई पर अपने और अपने तीन बच्चों के लिए एक नया घर बना रही हैं।

 

खुशबु ने कहा, “बाढ़ के दौरान चूल्हा गीला हो जाता है और इसलिए हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि नया घर ऊंचाई पर हो, जिससे बाढ़ का पानी उस तक न पहुंचे।” यहां ज्यादातर महिलाएं मिट्टी के चूल्हे और जंगल की लकड़ी की आंच पर खुले में खाना बनाती हैं। ऐसे में बाढ़ के दौरान खाना बनाना असंभव हो जाता है।

 

शबीर शेख और उनकी पत्नी खुशबू बीबी बाढ़ के पानी से बचने के लिए अब अपना नया घर ऊंचाई पर बना रहे हैं।

 

सरकार बाढ़ के पानी को रोकने के लिए तट के किनारे तटबंधों का निर्माण और बाढ़ से प्रभावित लोगों को समायोजित करने के लिए बाढ़ आश्रयों की मदद कर रही है। निवासियों को स्थानांतरित करने और पुनर्वास में मदद करने के लिए दीर्घकालिक नीतियां नहीं हैं।

 

जलवायु परिवर्तन के साथ सुंदरबन डेल्टा का अनुकूलन

 

सुंदरबन में पुनर्वास और खराब स्वास्थ्य का दोहरा बोझ

 

वैश्विक स्तर पर, बाढ़ के जोखिम वाले निचले तटीय क्षेत्रों में, अधिकांश अविकसित या विकासशील हैं।

 

 दक्षिण -24 परगना, (मोसुनी इसी जिले में हैं) में पांच साल से कम उम्र के लगभग एक तिहाई बच्चे स्टंड हैं,यानी आयु के अनुसार कम कद है। आधे घरों में अभी भी आधुनिक स्वच्छता सुविधाओं का अभाव है और हर 10 महिलाओं में से छह महिलाएं एनीमिक हैं। फिर भी, जिला अब जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दे रहा है।

 

तटबंध के निर्माण के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री के आधार पर, एक किमी लंबे खंड की लागत 1 करोड़ रुपये हो सकती है। जैसे-जैसे समुद्र बढ़ता है, स्थानीय लोग सरकार से और अधिक दीवारें बनाने की गुहार लगाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि ये जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सिर्फ अल्पकालिक उपाय हैं।

 

जैव विविधता को खतरा

 

पौधों की 200 से अधिक प्रजातियां, 400 प्रजातियों की मछलियां और 300 प्रजातियों के पक्षी, कई फाइटोप्लांकटन, कवक, बैक्टीरिया, ज़ोप्लांकटन, सरीसृप, उभयचर सुंदरबन में रहते हैं।

 

सुंदरबन के भीतर भी, मिट्टी की लवणता के आधार पर प्रजातियों में भिन्नताएं होती हैं। सुंदरबन कई खतरनाक और लुप्तप्राय जानवरों जैसे रॉयल बंगाल टाइगर, एस्टुरीन मगरमच्छ और भारतीय अजगर का घर भी है।

 

कोलकाता विश्वविद्यालय के समुद्री विज्ञान विभाग और कोलकाता में इंडियन इंस्टटूट ऑफ एजुकेशन एंड रिसर्च के जैव विज्ञान विभाग के अध्ययन के अनुसार, पानी के बदलते तापमान और मिट्टी में बढ़ती अम्लता ने इस क्षेत्र की जैव विविधता को पहले ही प्रभावित कर दिया है।

 

जिस तरह से समुद्र का बढ़ता स्तर जैव विविधता को प्रभावित करता है, विशेषज्ञ मानव गतिविधियों को भी दोष देते हैं। ‘वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड’ में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के वरिष्ठ सलाहकार अनुराग डंडा कहते हैं, “यदि, उदाहरण के लिए,  जब प्रमुख नदियों पर कोई रुकावट नहीं थी और प्रवाह को मोड़ नहीं दिया गया था, तो कटी हुई मिट्टी डेल्टा तक पहुंच जाती थी।”उन्होंने समझाया, “टिहरी बांध (उत्तराखंड) और फरक्का बैराज (मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल) के बीच, गंगा में कम से कम 1,000 हस्तक्षेप हैं जो पानी को मोड़ते हैं या पानी को रोकते हैं तो पानी बहुत कम तलछट आगे लेकर जा पाती है ।”

 

वैज्ञानिक कहते हैं कि प्रकृति और मनुष्य की समस्याएं बढ़ती रहेंगी, क्योंकि समुद्र का स्तर बढ़ता जा रहा है। आईपीसीसी की नवीनतम रिपोर्ट के सह-लेखक चर्च कहते हैं, “सवाल यह नहीं कि यह कब होगा, अब सवाल यह है कि यह कितनी जल्दी होगा। ।”

 

समुद्र तट के किनारे रहने वालों के लिए क्या रास्ता है? हाजरा कहते कि सरकार द्वारा सहायता प्राप्त स्थानों पर नियोजित वापसी, मुख्य विकल्प हैं। “यह लोगों को वहां रखने और तटबंधों के पुनर्निर्माण की बजाय समग्र रूप से यह आर्थिक रूप से फायदेमंद होगा।”

 

( दिशा शेट्टी ‘कोलंबिया जर्नलिज्म स्कूल-इंडियास्पेंड’ की रिपोर्टिंग फेलो हैं और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे कवर करती हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 22 दिसंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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