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भारतीय महिलाएं, मातृत्व और पेनल्टी

नमिता भंडारे,
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दिल्ली / गुड़गांव: गुड़गांव के एक होटल के कॉन्फ्रेंस रूम में दो विशाल झूमर के नीचे, खूबसूरत कपड़े पहने हुई 250  महिलाएं जोर से ड्रम बजा रही हैं। तेज, धीमी गति से, जोर से, और फिर विराम। यह देखने से आसान सा लगता है। ईशारा मिलने पर एक साथ सीटी बजाते और एकजुट होकर बोलते हुए वे सब पसीने-पसीने हैं।

 

“ इस 45 मिनट के अभ्यास का लक्ष्य सहयोग की शक्ति का प्रदर्शन करना है।” ‘टीम बिल्डिंग कंपनी’ ड्रेरेन के ब्लेसन जोसेफ कहते हैं, “यदि आप एक साथ आते हैं, तो आप बहुत कुछ बदल सकती हैं।”

 

 

वार्ताओं, प्रतियोगिताओं, पिचों और यहां तक कि ड्रमिंग पर केंद्रित एक दिन के इस आयोजन की रूपरेखा GurgaonMoms की है, जिसका लक्ष्य यह है कि महिलाओं का एक ऐसा नेटवर्क बने, जहां वे एक-दूसरे की मदद कर सकें।

 

डिजिटल मार्केटिंग में एमबीए की डिग्री वाली नीला कौशिक ने वर्ष 2011 में माताओं के लिए एक ऑनलाइन समर्थन समूह के रूप में GurgaonMoms लॉन्च किया है। यहां आपको ढेर सारे सवालों के जवाब मिलेंगे…जैसे कि एक अच्छा स्कूल कौन सा है, एक उचित दंत चिकित्सक कहां मिलेंगे,  योग टीचर कैसे मिले और इससे आगे भी बहुत कुछ। यहां तक कि राजनीति पर चर्चा भी। अब तक इस ग्रुप में 25,000 सदस्य हैं। जो मां, इस मंच के सदस्य हैं उनमें से अधिकतर पेशेवर रूप से योग्य हैं और कुछ नए अवसरों की तलाश में हैं।

 

पूजा सरदाना,अहमदाबाद के इंडियम इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से एमबीए हैं।वह दो बच्चों की मां हैं । एक सात वर्ष की लड़की और चार वर्ष का एक लड़का । 2014 में, अपने बेटे के जन्म के बाद पूजा ने नौकरी छोड़ी। इससे पहले वह 14 वर्षों तक यूनिलीवर और जीएसके समेत कई विभिन्न कंपनियों में काम कर चुकी थीं।

 

वह बताती हैं, “मुझे यह जानने के लिए समय चाहिए था कि मैं क्या करना चाहती हूं।” कुछ दिनों तक उन्होंने अपने यात्रा ब्लॉग पर कुछ आलेख साझा किया और इस साल के अंत तक, वह बच्चों के जूते का एक ब्रांड लॉन्च करने की योजना बना रही हैं।

 

अगस्त 2006 में अपने बेटे के जन्म के दो साल बाद तक शगुन सिंह मुंबई के एक पांच सितारा होटल में अपनी सेल्स की नौकरी करती रही। फिर अचानक जब उसके पति को को दिल्ली में नौकरी मिली  तो उसने भी अपना ट्रांसफर करवा लिया, लेकिन दिल्ली ऑफिस में लचीले काम के घंटे नहीं थे। वह बताती हैं, “वर्क कल्चर से सपोर्ट नहीं मिला और मैंने अपने समय का एक मां और पेशेवर के रूप में बेहतर उपयोग करने के विकल्पों की खोज शुरू कर दी।”

 

 

शगुन सिंह के पिता का अपना व्यवसाय था। वह सुरक्षा और हाउसकीपिंग सेवाएं प्रदान करते थे। शगुन कहती हैं, “मुझे एहसास हुआ कि पेशेवर हाउसकीपिंग सेवाओं की मांग है, इसलिए मैंने अपनी खुद की फर्म, HomeWork लॉन्च की। इसमें मेरे पास समय को लेकर सुविधाएं हैं।

 

सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि  2.30 बजे तक मैं घर पर होती हूं, और यह वह समय है जब मेरा 11 वर्ष का बेटा स्कूल से घर आता है। यह मेरे लिए जरूरी ह कि जब वह स्कूल से घर आए तो मैं उसके आस-पास रहूं।”

 

स्मिति पुरी ने न्यूयॉर्क के सिटी यूनिवर्सिटी से एमबीए की डिग्री ले और वहीं न्यूयॉर्क में एक बैंक में नौकरी शुरु की। जब उसने दिल्ली के बिजिनसमैन से शादी की, तो वह जॉब ट्रांसफर पर वापस भारत आई। वह कहती हैं, “”यहां का वर्क कल्चर पूरी तरह से अलग था।” कुछ दिनों के लिए उसने एक इंटरनेट इनक्यूबेटर के लिए काम किया। तब वह गर्भवती हो गई।

 

“यही वह वक्त था जब मैंने अपने पति के शॉल, कालीन और कपड़ों के ऑनलाइन पारिवारिक व्यवसाय की मदद करने का फैसला किया। लेकिन जब मेरा दूसरा बच्चा पैदा हुआ, तो परेशानी बढ़ गई”, पुरी बताती हैं।

 

वह कहती हैं, ” 20 घंटे का काम और असंभव समय सीमाएं इतनी चुनौतीपूर्ण नहीं थी, जितना बच्चों का लालन-पालन  शारीरिक और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण रही ।” अब पुरी घर पर रहती हैं। अपने चार और दो साल के बेटे को बड़ा होते देखकर काफी खुश हैं। नौकरी में वापस जाने की कोई योजना नहीं है।

 

कॉर्पोरेट भारत में मातृत्व से चोट

 

कॉर्पोरेट भारत में मातृत्व से चोट दिख रही है। अप्रैल 2018 के एक अध्ययन में कहा गया है, “महिलाओं के लिए कुछ ही प्रवेश बिंदु हैं, जबकि बाहर निकलने के कई द्वार हैं जैसे, गर्भावस्था, बाल देखभाल, बुजुर्ग देखभाल, पारिवारिक सहायता की कमी, और असंगत कार्य वातावरण आदि।”

 

प्रिडिकमन्ट ऑफ रिटर्निंग मदर्स शीर्षक का यह अध्ययन अशोक विश्वविद्यालय और जेनेपैक्ट सेंटर फॉर विमेन लीडरशिप द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया है।

 

मार्च 2017 में मैत्रेय बोर्डिया दास और इवा जुम्ब्यटे द्वारा लिखित, विश्व बैंक नीति पत्र, मदरहुड पेनैल्टी एंड फीमेल इम्प्लॉयमेंट इन अर्बन इंडिया में पाया गया कि, “घर में एक छोटा बच्चा होने से माताओं के रोजगार में कमी आती है। रोजगार से एक मां के रिश्तों में समय के साथ तेजी आई है।”

 

2018 आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत की निम्न महिला कार्यबल भागीदारी दर 24 फीसदी है, जो दक्षिण एशिया में सबसे खराब है। वर्ष 2004 और 2011 के बीच, पिछली जनगणना के वर्ष में लगभग 20 मिलियन महिलाएं श्रम मानचित्र से गिर गईं, और इस गिरावट को रोकने के कोई लक्षण नहीं दिख रहे हैं।

 

रोजगार में महिलाओं की यह घटती भागीदारी कुछ हद तक पेचीदा है।क्योंकि यह शैक्षिक प्राप्ति में वृद्धि,  प्रजनन क्षमता और आर्थिक विकास के ह्रास में समय आता है। विरोधाभासी रूप से, जैसा कि हमारी सितंबर 2017 के आलेख से पता चला है कि भारत में ऐसी शिक्षित महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है, जो नौकरियां छोड़ रही हैं।

 

हमारी राष्ट्रव्यापी जांच  में पाया गया है कि महिलाएं विभिन्न कारणों से श्रम मानचित्र से गिर रही हैं, जिसमें उनके परिवार की औओर से काम करने की अनुमति का न होना, महिलाओं के लिए काम के बारे में सामाजिक दृष्टिकोण, अवैतनिक देखभाल कार्य, सुरक्षा मुद्दों और सस्ती और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन जैसे बुनियादी ढांचे की कमी सबसे प्रमुख हैं। इस श्रृंखला के अन्य आलेखों के लिंक इस आलेख के अंत में दिए गए हैं।

 

माताओं पर एक मूक, लेकिन तीखा प्रभाव

 

दुनिया भर की अधिकांश संस्कृतियों में, मां अपने बच्चों की प्राथमिक देखभाल करने वाली होती हैं। लेकिन भारत में, मातृत्व को ऊंचा दर्जा दिया गया है। 2017 विश्व बैंक पेपर के लेखक दास कहती हैं, “सामाजिक रूप से, माताओं से उम्मीद है कि वे अपने बच्चों की जरूरतों को अन्य सभी से ऊपर रखें, और निश्चित रूप से अपने आप से ऊपर हैं।” उन्होंने कहा कि एक महिला जो घरेलू नौकरों या डेकेयर में छोटे बच्चों को आगे बढ़ाकर अपने करियर को प्राथमिकता देती है, अक्सर घर के अंदर और बाहर दोनों जगह पर स्पष्ट रूप से निंदा की शिकार बनती हैं।”

 

जब महिलाएं गर्भवती होती हैं, तो पहले से ही कार्यस्थल पर जिन बाधाओं का सामना कर रही ती हैं, उसका विस्तार ही होता है, जैसा कि शेरियस के संस्थापक और सीईओ साईं चहल कहते हैं। शेरियस, खुद 20 लाख से अधिक महिला सदस्यों के साथ उनके लिए एक समुदाय मंच के रूप में खुद को देखता है।

 

चहल ने कहा, “माताओं के लिए, रसद-डेकेयर का प्रबंधन, भरोसेमंद घरेलू सहायता, एक समर्थन प्रणाली-समस्याग्रस्त हो सकती है। परिणामस्वरूप रोजगार के लिए प्रोत्साहन नाटकीय रूप से घटता है। माताओं पर एक मूक, लेकिन तीखा प्रभाव है।”

 

महिला श्रम-शक्ति भागिदारी और मातृत्व पेनैल्टी

 

जैसे-जैसे संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, बच्चों के लालन-पालन का बोझ बढ़ रहा है। दास कहती हैं, ” जब तक कि औपचारिक या अनौपचारिक संस्थानों के साथ-साथ पिता और पति, महिलाएं और महिला मजदूरी के साथ देखभाल जिम्मेदारियों को साझा करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाते हैं और महिलाओं को मिलने वाला मानदेय बच्चों की देखभाल की मौद्रिक और गैर-मौद्रिक लागत की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तब तक मातृत्व लगभग सभी काम करने वाली महिलाओं पर एक दंड की तरह है।”

 

वह कहती हैं, “हमारे अपने अध्ययनों से पता चला है कि युवा बच्चों के होने से महिलाओं के रोजगार में बाधा आती है, जबकि एक बुजुर्ग महिला रिश्तेदार जैसे कि एक सास के होने से रोजगार की संभावनाएं बढ़ती हैं।”

 

वैश्विक स्तर पर 47.6 फीसदी की दर पर पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मां की न्यूनतम रोजगार दर है, जबकि पिताओं के लिए यह आंकड़े 87.9 फीसदी है और बिना बच्चों की महिलाओं के लिए आंकड़े 54.4 फीसदी हैं, जैसा कि इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (आईएलओ), केयर वर्क एंड केयर जॉब्स फॉर का फ्यूचर ऑफ डिसेंट वर्क के लिए 90 देशों के लिए जून 2018 के एक अध्ययन में पाया गया है।

 

Source: International Labour Organisation, Care Work and Care Jobs for the Future of Decent Work, June 2018.)

 

रिपोर्ट यह पुष्टि करती है कि मातृत्व निश्चित रूप से और महिलाओं की रोजगार संभावनाओं पर नकारात्मक रूप से प्रभाव डालती है। लेकिन क्या महिलाओं को रोजगार से दूर रखने का यह अकेला कारण है?

 

महिलाओं का काम परिभाषित हो…

 

पूरी दुनिया में, ऐसी महिलाएं हैं जो न सिर्फ बाल देखभाल बल्कि घर के चारों ओर अन्य काम जैसे कि खाना पकाने, सफाई करने, बुजुर्गों और विकलांगों की देखभाल करने, जलावन के लिए लकड़ी इकट्ठा करने,  चारा और पानी लाने के लिए भी अधिकतर बोझ सहन करती हैं।

 

किसी भी देश में पुरुष और महिलाएं समान रूप से अवैतनिक देखभाल कार्य साझा नहीं करते हैं। महिलाएं ही हैं जो अवैतनिक देखभाल कार्य की कुल वैश्विक राशि के तीन-चौथाई से अधिक कर रही हैं।

 

कहने की जरुरत नहीं है कि इस काम के लिए उन्हें भुगतान नहीं किया जाता है।

 

बेशक, यह एक कीमत पर आता है। घरेलू काम में लिंग असमानता श्रम बाजार में परिलक्षित होती है। बस, जितना अधिक आप घर में काम करते हैं (अवैतनिक), उनता कम समय आपको बाजार में काम करने ( भुगतान के साथ ) के लिए मिलता है।

 

2018 में, लौरा अडाती और अन्य लोगों द्वारा लिखित आईएलओ रिपोर्ट में पाया गया, कि दुनिया भर में काम करने वाली उम्र की 606 मिलियन महिलाएं, अवैतनिक देखभाल कार्य के कारण, रोजगार परिदृश्य से दूर हो गईं।, जबकि इसी कारण से केवल 41 मिलियन पुरुष निष्क्रिय थे।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि अवैतनिक देखभाल कार्य ‘श्रम बाजारों में महिलाओं की भागीदारी में मुख्य बाधा’ है।

 

Source: International Labour Organisation, Care Work and Care Jobs for the Future of Decent Work, June 2018.
Note: ‘Personal’ means education, sickness or disability. ‘Reasons related to labour market’ includes awaiting recall to work, believing no work available and lacking required qualifications. All numbers in percentage.

 

रिपोर्ट के मुख्य लेखक और जिनेवा, आईएलओ की प्रसूति संरक्षण और कार्य-परिवार विशेषज्ञ, लौरा अडाती कहती हैं, ” देखभाल के लिए एक बेहतर रास्ते का तात्पर्य, श्रम बाजारों और घरों में लिंग समानता प्राप्त करना है और इस प्रकार मातृत्व पैनैल्टी को संबोधित करना है। “

 

उन्होंने एक ईमेल प्रतिक्रिया में कहा, “चूंकि देखभाल एक आम बात है, रिपोर्ट में पांच मुख्य नीति क्षेत्रों में परिवर्तनकारी नीतियों को अपनाने के लिए राज्य से समग्र और प्राथमिक जिम्मेदारी की मांग की गई है: देखभाल, माइक्रो इकॉनॉमिक, सामाजिक सुरक्षा, श्रम और प्रवासन नीतियां,” भारतीय सांख्यिकी संस्थान के एक सहयोगी प्रोफेसर फरजाना अफरीदी इस बात पर सहमत हैं, “यह मातृत्व की बजाय शादी है,  जो महिलाओं की श्रमबल भागीदारी में पहला ठोकर दे रहा है।”

 

उदाहरण के लिए, 2011 में, 15-60 आयु वर्ग में सभी अविवाहित महिलाओं में से आधे श्रम बल में थीं, जबकि विवाहित महिलाओं के लिए तुलनात्मक दर 20 फीसदी थी- एक आंकड़ा जो तीन दशकों तक इससे थोड़ा कम या ज्यादा पर स्थिर रहा है।
 
वैवाहिक स्थिति अनुसार अनिवार्य देखभाल कार्य (प्रति दिन मिनट) पर, भारत में महिलाओं और पुरुषों द्वारा समय व्यय

 

अफरीदी कहती हैं, “ज्यादातर महिलाओं के लिए श्रम बल में शामिल होने के लिए एक बहुत संकीर्ण खिड़की होती है । जब वे अपनी शिक्षा पूरी करते हैं और जब वे शादी करते हैं। मातृत्व के साथ, सशुल्क रोजगार में शेष संभावना भी खत्म हो जाती है।”

 

अफरीदी ने कहा कि टाइम-यूज डेटा यह भी दिखाता है कि एक महिला के पास एक बच्चा हो या तीन है, अवैतनिक देखभाल कार्य पर खर्च समय उतना ही रहता है। यह मुद्दा बच्चे होना नहीं ,है यह मुद्दा अवैतनिक देखभाल कार्य है। वह कहती हैं, “आप बिना किसी भुगतान किए जाने वाले अवैतनिक देखभाल कार्य की राशि को संबोधित किए बिना महिलाओं की कार्यबल भागीदारी को संबोधित नहीं कर सकते हैं।” “मातृत्व एक जुर्माना है, लेकिन इसके अलावा और भी दंड हैं।”

 

लागत असर

 

भुगतान मातृत्व अवकाश एक स्पष्ट हस्तक्षेप है, जो कि सरकारें कर सकती हैं, भले ही भारत में यह केवल 5 फीसदी महिलाओं को प्रभावित करता है, जो संगठित क्षेत्र में काम करती हैं।

 

फिर भी,  ‘ह्यूमन रिसोर्स सर्विस कंपनी’ TeamLease द्वारा हालिया एक अध्ययन में पाया गया, मार्च 2017 के मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम के परिणामस्वरूप मातृत्व अवकाश 12 से 26 सप्ताह तक बढ़ तो गया है, लेकिनइससे 12 मीलियन महिलाएं संभावित रूप से 2018 में सभी क्षेत्रों में नौकरियों को खो सकती हैं,।रिपोर्ट में कहा गया है कि नौकरी की कमी आम तौर पर छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों में होती है

 

हालांकि, “बड़ी, व्यावसायिक रूप से प्रबंधित कंपनियां ( निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्र ) और मध्यम आकार की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां सक्रिय रूप से संशोधन वापस कर देगी और इससे अधिक महिलाओं को काम पर रखने की अधिक संभावना है।”

 

आईबीएम इंडिया में विविधता और समावेशन का प्रबंधन करने वाली रुपा विल्सन कहती हैं, “कॉर्पोरेट के लिए विविधता एक स्वागत योग्य विचार नहीं है, बहुत हद तक यहां एक धुंधली स्थिति है, लेकिन एक बेहतर विषम समूह के साथ हमेशा कुछ नया होने की संभावना होती है और इससे बेहतर व्यवसाय भावना बनाता है।”

 

वर्जीनिया एम. रोमेटी, आईबीएम चेयरमैन, अध्यक्ष और सीईओ का हवाला देते हुए विल्सन कहती हैं, “आईबीएम विविधता के बारे में सोचता है। जिस तरह से हम नवाचार के बारे में सोचते हैं। दोनों हमारे व्यापार की सफलता के लिए आवश्यक हैं। जब हम अपने व्यापार में विविधता को शामिल करते हैं, तो हम बेहतर नवाचार और परिणाम पाते हैं। “

 

विल्सन ने कहती हैं,“आईबीएम के पास कई कार्यक्रम हैं, जो विशेष रूप से माताओं को श्रमबल में वापस लाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, जैसे कि अतिरिक्त छह महीने की अवैतनिक छुट्टी प्रदान करने से लेकर अनिवार्य छह महीने की प्रसूति छुट्टी, ऑनलाइन प्रशिक्षण पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए छुट्टी जिससे कर्मचारी, विशेष रूप से लंबी छुट्टी पर गई महिलाएं पीछे न रह जाएं। अनावश्यक न हों। ”

 

इसके अलावा, उन्होंने कहा, कंपनी भारत भर के लगभग सभी स्थानों में बाल देखभाल केंद्र प्रदान करती है और यहां तक ​​कि एक बड़े देखभाल कार्यक्रम भी हैं जो बच्चों के माता-पिता और इनके भी माता-पिता के लिए डिज़ाइन किया गया है । जैसे कि मेडिकल रिपोर्ट लाना, नर्स भेजना आदि ।

 

इन चरणों के बावजूद, विल्सन ने कहा, पिछले साल कंपनी को एहसास हुआ कि उसने महिलाओं और उनकी इच्छाओं पर पूरी तरह से काम नहीं है।  ” भारत में बालिका की एक मजबूत शैक्षिक पहचान है। विल्सन ने कहा, हम  उन्हें कड़ी मेहनत करने के लिए कहते हैं, डॉक्टर बनने के लिए  कहते हैं। उनमें नौकरी को पहचानने की भावना भी है और पता है कि एक बार जब वे स्नातक हो जाएंगे तो उन्हें नौकरियां मिलेंगी। लेकिन हमें अभी भी हमारी लड़कियों में करियर की पहचाने की भावना का विकास करना है। “

 

सभी प्रवेश स्तर की नौकरियों में से 51 फीसदी तक, महिलाओं द्वारा भरे जाते हैं, और ये महिलाएं केवल अपनी नौकरी के पहले तीन से चार वर्षों के बाद बाधा का सामना करना शुरु कर देती हैं, जैसा कि 2011 के नासकॉम सर्वेक्षण में पाया गया है।

 

विल्सन कहती हैं, “यही वह समय है जब वे विवाहित होती हैं। फिर जहां उनके पति रहते हैं और काम करते हैं, वहां स्थानांतरित होना पड़ता है। जब उनके बच्चे होते हैं, तो वहां एक सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दा होता है। वहां प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। यही चुनौती है, जिसे कार्यस्थलों को देखना है।”

 

लेकिन, साईं चहल ने चेतावनी दी, “कार्यस्थल कमजोर हो रहे हैं और पिछले कुछ वर्षों में ढेर सारे ‘परिवर्तन और आंदोलन’ देखने को मिले हैं। “हमारी अर्थव्यवस्था पर्याप्त नौकरियां नहीं बना रही है। हम एक वर्ष में 1.5 मिलियन कॉर्पोरेट नौकरियां बना रहे हैं, जबकि हमें हर महीने दस लाख नौकरियों की जरूरत है।”

 

इस गंभीर स्थिति में, “एक व्यक्ति के बाहर जाने का मतलब है, एक व्यक्ति का कम हो जाना।” और जो महिलाएं नौकरियों से बाहर निकलने का विकल्प चुनती हैं वे किसी की प्राथमिकता में नहीं होती हैं।

 

बदल रहे हैं पुरुष भी

 

“मैदान में बने रहना जरूरी है,”26 वर्षीय बेटे की मां और सॉफ्टबैंक में सार्वजनिक मामलों की उपाध्यक्ष पारोमा चौधरी कहती हैं, “यह वास्तव में कठिन है और काम पर एक औरत की सबसे बड़ी विशेषता एक ‘मोटी त्वचा’ हो सकती है।”

 

चौधरी ने पत्रकारिता से कॉर्पोरेट संचार में स्विच किया। बेटे के जन्म के बाद उन्होंन तीन महीने की छुट्टी ली और फिर काम पर वापस आ गई। वह कहती हैं, “उदाहरण के लिए, काम पर मां चाहती हैं जब कोई बच्चा बीमार पड़ता है, तो उसके आस-पास सहानुभूति पूर्वक माहौल हो। परामर्श भूमिकाओं में अधिक महिलाएं होने से भी मदद मिलेगी। लेकिन घर पर और काम और अच्छी समर्थन संरचनाओं का मूल्य अनुमानित नहीं है।”

 

“लेकिन पिता भी बदल रहे हैं, और इसे याद रखना महत्वपूर्ण है”, लेखक और मनोचिकित्सक अपर्णा सैमुअल बलसुंदरम, जिन्होंने विप्रो और एक्सेंचर जैसी कंपनियों के साथ कॉर्पोरेट प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए हैं, बताते हैं, “हाल ही में मैंने एक पेरेंटिंग कार्यशाला आयोजित की, जिसमें महिलाओं की तुलना में तीन गुना अधिक पुरुषों में भाग लिया था।”

 

उन्होंने कहा, ” सीधी बात है कि यदि आप एक निश्चित जीवनशैली को सक्षम करने के लिए दो आय वाले परिवार बने रहेंगे, तो पुरुषों को अपनी पत्नियों का समर्थन करना होगा। इसके अलावा, आज के पुरुष बेहतर पिता बनना चाहते हैं।”

 

लेकिन अधिक माताओं को कार्यस्थल में वापस लाने के लिए आवश्यक ‘सांस्कृतिक मानसिक परिवर्तन’ पर काम नहीं हो रहा है। विश्व बैंक की पूर्व सलाहकार और ‘चुप: ब्रेकिंग ऑफ साइलेंस अबाउट इंडियन वुमन’ की लेखिका दीपा नारायण कहती हैं, ” हम अपनी बेटियों को डॉक्टर बनाना चाहती हैं, लेकिन असली लक्ष्य शादी ही है।शादी के बाद नए घर में एडजस्ट हो जाए। हम ऐसे वक्त में बेटियों से एक सम्मानजनक चुप्पी और उनके आज्ञाकारी होने की अपेक्षा करते हैं। ”

 

“कई महिलाओं के लिए चुनौती बाह्य नहीं, आंतरिक हैं। वे हर समय एक अपराध बोध से लड़ती रहती हैं।” सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ कचिना चावला, जिनका पोर्टल ‘घरकमाई’ (जिसे हाल ही में शेरोस द्वारा अधिग्रहित किया गया है) पेशेवर दक्षता वाली महिलाओं को प्रोजेक्ट आधारित कामों से जोड़ती है,  कहती हैं, ” हम इस विश्वास के साथ आए हैं  कि हम दुनिया को बदल सकते हैं, इसलिए घर पर रहने का मतलब है कि हम अपने पक्ष को छोड़ रहे हैं?”

 

भारतीय महिलाएं श्रमबल से बाहर क्यों हो जाती हैं, इसके कारणों पर देश भर में चल रही हमारी पड़ताल का यह 11वां लेख है।

 

पहले के लेख आप यहां पढ़ सकते हैं:-

 

Part 1:क्यों भारतीय कार्यस्थलों में कम हो रही है महिलाओं की संख्या –

 

Part 2:नौकरी पर महिलाएं : हरियाणा की एक फैक्टरी में उम्मीद के साथ परंपरा का टकराव

 

Part 3: घरेलू कामों के दवाब से महिलाओं के लिए बाहर काम करना मुश्किल, मगर अब बदल रही है स्थिति

 

Part 4:भारत की शिक्षित महिलाएं ज्यादा छोड़ रही हैं नौकरियां

 

Part 5:हिमाचल प्रदेश की महिलाएं क्यों करती हैं काम: एक जैम फैक्टरी के पास है इसका जवाब

 

Part 6:भारत में जज से लेकर श्रमिकों तक यौन उत्पीड़न का दंश

 

Part 7: दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों की महिलाओं को कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए परिवहन पर करना पड़ता है ज्यादा खर्च

 

Part 8: थोड़ी सी मदद से ही बिहार की गरीब महिलाएं बदल रही हैं अपनी जिंदगी

 

Part 9 : एकल महिलाएं हर हाल में क्यों करना चाहती हैं काम?

 

(भंडारे  पत्रकार हैंदिल्ली में रहती हैं और अक्सर भारत के लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं।)

 

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 4 अगस्त, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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