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भारतीय लड़कियों के होते हैं सपने, लेकिन विपरीत परिस्थिति और अवसर के अभाव का करती हैं सामना

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( 19 वर्षीय फरहीन चौधरी, मुंबई के सबसे बड़े मलिन बस्तियों में से एक, गोवंडी में काम करने वाली गैर-लाभकारी संस्था, अपनालया में एक संरक्षक यानी मेंटर के रूप में काम करती है। )

 

मुंबई: 19 वर्षीय फरहीन चौधरी के 21 वर्षीय भाई ने बुला कर कहा, “अब कबड्डी नहीं खेलना है। यह एक अच्छा खेल नहीं है और यह हमारे खानदान [परिवार के सम्मान] के लिए बुरा लगता है।” चार महीने तक, चौधरी ने मुंबई स्थित गैर-लाभकारी अपनाल्या के खुला आस्मान कार्यक्रम में एक संरक्षक के रूप में काम किया था।  इस कार्यक्रम के जरिए मुंबई के सबसे बड़े झुग्गियों में से एक, गोवंडी में रहने वाले युवाओं को कबड्डी खेलने के लिए एक साथ आए और इसके साथ जीवन कौशल प्राप्त किया और लिंग समानता, स्वास्थ्य देखभाल और उनके मौलिक अधिकारों के बारे में सीखा। एक मेंटर के रूप में अपनी भूमिका के माध्यम से, चौधरी ने अपने आत्मविश्वास को बढ़ता देखा और जैसा से उसके माता-पिता ने कभी आपत्ति नहीं की, उसके भाई के शब्दों से उसे झटका लगा और निराशा हुई।

 

जल्द ही उसके माता-पिता उसके भाई से सहमत हो गए, और उसे न खेलने के लिए कहा। अपनाल्या के सामाजिक कार्यकर्ताओं और चौधरी के दोस्तों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने।

 

अंत में, चौधरी ने अपने भाई को समझाने के लिए मेंटरशिप से एक महीने का ब्रेक लिया और आखिरकार काम पर वापस आई।

 

अपनलया के साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता, मालती मैदाथिलेजहैम ने कहा, “यह सिर्फ उनका खेल नहीं है, परिवार यह देखते हैं कि उनकी बेटियां अधिक मुखर हो रही हैं – वे बोल रही हैं और अपनी राय दूसरों के सामने रख रही हैं जिसे सुना जा रहा है। मेंटर को कुछ पैसे भी मिलते हैं, इसलिए इन लड़कियों में आत्मविश्वास की भावना होती है जो पुरुष परिवार के सदस्यों को प्रभावित करती है क्योंकि यह यथास्थिति पर सवाल उठाता है।”

 

विपरीत या प्रतिकूल परिणाम का सामना करना किशोर लड़कियों के लिए असामान्य नहीं है जो एजेंसी को व्यक्त करती हैं या पारंपरिक लिंग मानदंडों की अवहेलना करते हैं, जैसा कि परोपकारी संगठन दसरा द्वारा 6 मार्च, 2019 को जारी एक नई रिपोर्ट में बताया गया है।  ‘एक्शन रिएक्शन: अंडरस्टैंडिंग एंड ओवरकमिंग बैकलैश अगेंस्ट गर्ल्स एक्सर्साइज ऑफ एजेंसी इन इंडिया’ नामक रिपोर्ट किशोरों और युवाओं के साथ काम करने वाले 73 संगठनों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि, 85 फीसदी संगठनों ने कहा कि वे लड़कियों के विपरीत परिस्थिति का सामना करने की कम से कम एक ऐसी घटना से परिचित थे, जिसने एजेंसी प्रदर्शित की या लिंग के पारंपरिक पदानुक्रमित मानदंडों को चुनौती दी है।

 

प्रतिक्रिया देने वाले संगठनों के दो-तिहाई (66 फीसदी) ने विपरीत परिस्थितियों की सूचना दी, जो फील्ड स्टाफ के खिलाफ वास्तविक हिंसा और संपत्ति के विनाश के रूप में हिंसा के खतरों के कार्यक्रमों के संचालन की अनुमति के लिए समुदाय के इनकार से लेकर था।

 

प्रतिक्रिया देने वाले संगठनों (66 फीसदी) के दो तिहाई द्वारा विपरीत परिस्थितियों की सूचना दी गई थी और जिसका परिणाम निष्कासन, जबरन एकांत, स्कूल से निकालने, जबरन शादी और हिंसा के रुप में हुआ।

 

 अधिकांश युवा-सेवारत संगठन ( जिनकी गतिविधियां युवाओं में नेतृत्व और जीवन कौशल के निर्माण पर केंद्रित हैं; किशोरों को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों के बारे में सूचित करना है; और किशोरों के संचार और बातचीत कौशल का निर्माण करना है ) ने विपरीत परिस्थितियों की सूचना दी है।

 

दसरा की एसोसिएट डायरेक्टर प्रीति प्रभुघाटे ने कहा कि, “फील्ड पर काम करने वाले संगठनों को अक्सर बैकलैश का सामना करना पड़ता था, लेकिन कभी भी इसका व्यवस्थित प्रलेखन नहीं हुआ था। यह रिपोर्ट इस तरह की प्रतिक्रिया की दिशा देती है और बताती है कि इसके चारों ओर प्रत्याशित और काम करने के लिए क्या करने की आवश्यकता है।”

 

प्रतिक्रिया देने वाले आधे से अधिक संगठनों ने कहा कि उन्हें एक लड़की के बारे में पता था, जिसे स्कूल जाते समय एक लड़के ने परेशान किया था और उसे स्कूल जाने से मना कर दिया गया था क्योंकि माता-पिता को डर था कि वह अपनी प्रतिष्ठा खो देगी।

 

कुछ 44 फीसदी संगठनों ने कहा कि वे एक ऐसी घटना से परिचित थे जिसमें एक लड़की को उसके माता-पिता और भाइयों द्वारा अपनी शिक्षा बंद करने के लिए मजबूर किया गया था क्योंकि उसकी दोस्ती किसी लड़के से थी।

 

प्रतिक्रिया देने वाले करीब आधे संगठनों ( 51 फीसदी ) ने एक ऐसी घटना से संबंधित पाया एक लड़की को प्रतिकूल सामुदायिक प्रतिक्रियाओं या लड़कों से संभावित उत्पीड़न के डर से आउटडोर खेलों में भाग लेने से मना कर दिया गया था, या खेल आयोजनों में भाग लेने के लिए फटकार लगाई गई थी।

 

आकांक्षाएं बनाम वास्तविकता

 

कभी-कभी, सशक्तिकरण हस्तक्षेप आकांक्षाओं को खोल देते हैं, लेकिन युवा महिलाओं की वास्तविकता मेल नहीं खा सकती है। 10 से सात किशोर भारतीय लड़कियों ने कहा कि वे अपनी ग्रैजुएशन से नीचे तक की शिक्षा पूरी करना चाहती थीं, चार में से तीन ने कहा कि उनके मन में करियर की राह है, और लगभग तीन ने कहा कि वे 21 साल की उम्र से पहले शादी नहीं करना चाहती हैं, जैसा कि किशोर लड़कियों के साथ काम करने वाली संस्था, नंदी फाउंडेशन द्वारा नन्ही कली सर्वेक्षण के आधार पर इंडियास्पेंड ने अक्टूबर 2018 में रिपोर्ट किया है। हालांकि, लड़कियों को लग सकता है कि समाज और घर में उनकी वर्तमान स्थिति में बहुत बदलाव नहीं आया है और वे “नए कौशल” की सीमा के साथ संघर्ष कर सकती हैं, जैसे कि अकेले यात्रा करना, स्मार्टफोन का उपयोग करना, अंग्रेजी में कंप्यूटर पर एक डॉक्यूमेंट टाइप करना और दिशा-निर्देश पूछना, जैसा कि नन्ही कली सर्वेक्षण से पता चलता है।

 
स्कूल तक साइकिल चलाना: संभावनाओं की दुनिया लेकिन कोई अवसर नहीं

 

2017 में लड़कियों को साइकिल प्राप्त करने वाले अध्ययन से पता चला है कि उनके पास अपनी पढ़ाई पूरी करने का एक उच्च मौका था, लेकिन उन लोगों की तुलना में भुगतान वाली नौकरी में काम करने का कम मौका था जिन्होंने शिक्षा प्राप्त नहीं की थी।

 

इंडियन इंस्टिटयूट ऑफ मैनेजमेंट, बैंगलुरु की शबाना मित्रा और ओस्लो विश्वविद्यालय से काल्ले मोइने ने बिहार सरकार के 2006 के साइकिल कार्यक्रम के दीर्घकालिक प्रभाव का आकलन करने वाले अपने 2017 के पेपर में लिखा, “साइकिल पर एक लड़की सिर्फ स्कूल जाने वाली लड़की नहीं है; वह समाज में नजरिए में बदलाव का प्रतीक है।” बिहार की मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना के तहत, नौवीं कक्षा में दाखिला लेने वाली प्रत्येक लड़की को स्कूल जाने के लिए साइकिल खरीदने के लिए 2,000 रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाता है। विभिन्न अधयननों से पता चलता है कि यह कार्यक्रम लड़कियों के नामांकन में सुधार करने में सफल रहा – पहले वर्ष में, इसमें 30 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई – जबकि लीकेज (पैसा बहाया गया) 5 फीसदी से कम रहा है।

 

कार्यक्रम के शुभारंभ के दस साल बाद, मित्रा और मोइने ने समाज में महिलाओं की भूमिका के प्रति पुरुषों और महिलाओं के दृष्टिकोण में परिवर्तन का अध्ययन किया।

 

उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में 10,000 लड़कियों के डेटा की तुलना करके, शोधकर्ताओं ने पाया कि साइकिल न मिलने वाली लड़कियों की तुलना में जिस लड़की को साइकिल मिली थी, दसवीं पूरा करने की संभावना 30 फीसदी ज्यादा थी और बारवीं पूरा करने की संभावना 25 फीसदी ज्यादा थी।

 

साइकिल प्राप्त करने वाली लड़की के पास कॉलेज पूरा करने की संभावना 5 फीसदी ज्यादा होता है, जो बिहार के संदर्भ में अधिक है।

 

 लेखकों ने यह भी पाया कि जिन लड़कियों को साइकिल मिली थी, उनके कृषि में काम करने की संभावना 4 फीसदी कम थी; 45 फीसदी ने कहा कि वे काम करना चाहते हैं लेकिन उनके परिवारों ने आपत्ति जताई; और 10 फीसदी ने कहा कि कोई उपयुक्त नौकरी उपलब्ध नहीं थी। चूंकि कृषि प्राथमिक व्यवसाय उपलब्ध था, इसलिए लड़कियों ने कम-भुगतान वाली कृषि नौकरियों को नहीं लेने का फैसला किया, लेकिन अधिक “उपयुक्त” नौकरी की प्रतीक्षा की, जैसा कि लेखकों ने पाया है।

 

इसी समय, जिन लड़कियों को साइकिल मिली थी, उनकी शादी में औसतन कम से कम छह महीने की देरी होने की संभावना थी।

 

लेखकों ने लिखा, “लड़कियों को कई तरीकों से सशक्त बनाया गया है, लेकिन उन्हें अब स्वतंत्र होने के लिए साधन दिए जाने की आवश्यकता है। अधिक नौकरियां उत्पन्न करने के लिए राज्य द्वारा और अधिक प्रयासों और नई नीतियों की आवश्यकता। ”

 

शिक्षा के कई अप्रत्यक्ष, दीर्घकालिक लाभ हैं। उदाहरण के लिए, जो लड़कियां 12 वर्ष या उससे अधिक की उम्र तक पढ़ती हैं, 18 वर्ष की आयु तक, गर्भवती होने की संभावना कम होती है, किशोर बच्चों के बीच कम अंतराल होने की संभावना कम होती है, और इस दौरान दो से अधिक बच्चे होने की संभावना कम होती है। 22 जनवरी, 2018 को इंडियास्पेंड ने उनके जीवनकाल के बारे में बताया है।

 

हालांकि, बढ़ी हुई शिक्षा स्वचालित रूप से अधिक श्रम भागीदारी का परिणाम नहीं देती है, जैसा कि मैरीलैंड विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर, सोनलदे देसाई ने द हिंदू में 7 मार्च 2019 को लिखा है। 1993-94 और 2011-12 के बीच, भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में अनपढ़ महिलाओं की कार्यबल की भागीदारी में 11.5 प्रतिशत अंक और शहरी क्षेत्रों में 5 प्रतिशत-अंक की गिरावट देखी गई है। हालांकि, इसी तरह की गिरावट कॉलेज-शिक्षित महिलाओं में भी देखी गई है, जिनकी कार्यबल की भागीदारी ग्रामीण भारत में 8 प्रतिशत अंक और शहरी भारत में 4 प्रतिशत अंक गिर गई, जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2017 में बताया था।

 

देसाई ने द हिंदू में लिखा, “रोजगार के अवसर जो उनकी माताओं के लिए खुले हैं, जिनमें खेत श्रम और निर्माण में गैर-कृषि मैनुअल काम शामिल हैं, सेकेंड्री स्कूल ग्रैजुएट के लिए बहुत कम अपील करते हैं जिन्होंने शिक्षा में अपनी आशाओं का निवेश किया है। हालांकि, सफेद कॉलर वाली नौकरियां या तो उपलब्ध नहीं हैं या लंबे समय कू मांग करती हैं और एक गिग इकॉनमी के इस समय में बहुत कम सुरक्षा प्रदान करती हैं।”

 
 
विपरीत परिस्थिति का मुकाबला कैसे करें 
 

इस तरह के विपरीत परिस्थिति को रोकने या उसका सामना करने के लिए, संगठनों का सुझाव है कि क्षेत्र के कर्मचारियों को समुदाय के भीतर से काम पर रखा जाना चाहिए, ताकि वे माता-पिता के साथ संलग्न हों और अपने कार्यक्रमों की व्याख्या करें, और सकारात्मक भूमिका वाले मॉडल का हवाला देकर अधिकारियों से समर्थन जीतें, जिन्होंने देर से शादी की, गर्भावस्था में देरी की और परिवार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाए बिना अपने जीवन के विकल्प बनाए, जैसा कि दसरा रिपोर्ट कहती है।

 

हालांकि विपरीत परिस्थिति का सामना अक्सर उन अग्रदूतों द्वारा किया जाता है, जो पारंपरिक मानदंडों पर सवाल उठाने में सबसे आगे हैं,  क्योंकि यह महिलाओं के बीच व्यवहार के नए रूपों को समायोजित करता है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। ) 

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 8 मार्च 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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