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भारत का एक दुर्गम आदिवासी गांव लड़ रहा है मलेरिया से

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ओडिशा  के कंधमाल जिले के एक गांव  बुडुबिराहा में मलेरिया की जांच के लिए रक्त का नमूना इकट्ठा करता एक स्वास्थ्य कर्मचारी। वर्ष 2016 में, भारत के 10 लाख मलेरिया के मामलों में 41 फीसदी हिस्सेदारी ओडिशा  की है।   मलेरिया के खिलाफ भारत की लड़ाई के लिए नए कार्यक्रम की सफलता महत्वपूर्ण है।

 

कोटागढ़, कंधमाल: हाल ही के अगस्त के एक दिन, ओडिशा के आदिवासी बहुल कंधमाल जिले में त्यौहार सा माहौल था। गांव के लोग खुशी से ढोलक की आवाज पर झूमते हुए गांव में आए मेहमान का स्वागत कर रहे थे। ये मेहमान स्वास्थ्य कर्मचारी हैं जो मलेरिया के लिए उनका परीक्षण करेंगे।

 

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नक्सली इलाके में अभेद्य जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ बुडुबिराहा कई आदिवासी गांवों में से एक है जिस पर कुछ साल पहले तक शायद ही कभी राज्य के अधिकारियों का ध्यान गया हो। गांव में कोई पक्की सड़क नहीं। बिजली कनेक्शन या मोबाइल फोन कवरेज भी नहीं है।

 

गांव के स्वास्थ्य स्वयंसेवक सलमान मलिक ने स्थानीय कुई भाषा में सभा को बताया, “जिनका भी परीक्षण सकारात्मक आए, उन्हें बिना विलंब दवा क्रम को पूरा कर लेना चाहिए।”

 

इसके साथ ही, टाटा ट्रस्ट्स और ओडिशा सरकार के संयुक्त कार्यक्रम के तहत टीम ने प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाले दो बड़े स्क्रिनंग में 189 ग्रामीणों को परीक्षण के लिए तैयार किया है। कार्यक्रम का उदेश्य 2021 तक मलेरिया से मौत को 100 फीसदी और मलेरिया की घटनाओं को 40 फीसदी तक कम करना है।

 

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टाटा ट्रस्ट्स और ओडिशा सरकार के एक संयुक्त कार्यक्रम तहत दी गई मच्छरदानी के भीतर आराम करता व्यक्ति। कार्यक्रम का लक्ष्य 2021 तक मलेरिया से होने वाली मृत्यु को 100 फीसदी और मलेरिया की घटनाओं को 40 फीसदी कमी करना है।

 

यह कार्यक्रम स्थानीय स्वयंसेवक के सहयोग से सहज ढंग से न्यूनतम सुविधा रणनीति का इस्तेमाल करता है। जैसे कि रोकथाम के लिए लोगों को जागरूक करना, दो बार सालाना परीक्षण और तेजी से उपचार। वर्ष 2016 में, भारत के 10 लाख मलेरिया के मामलों में 41 फीसदी हिस्सेदारी ओडिशा के होने के साथ  मलेरिया के खिलाफ भारत की लड़ाई के लिए नए कार्यक्रम की सफलता बहुत महत्वपूर्ण है।

 

दूर-दराज का इलाका और संपर्क के साधन नहीं

 

पहली नजर में तो ऐसा लग सकता है कि ये सब पर्याप्त नहीं है, लेकिन बुडुबिराहा में यह स्वास्थ्य कार्यक्रम एक छोटी सी क्रांति से कम नहीं है।

 

नक्सली इलाके में अभेद्य जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ बुडुबिराहा कई आदिवासी गांवों में से एक है जिस पर कुछ साल पहले तक शायद ही कभी राज्य के अधिकारियों का ध्यान गया हो। गांव में कोई पक्की सड़क नहीं। बिजली कनेक्शन या मोबाइल फोन कवरेज भी नहीं है।

 

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ओडिशा के कंधमाल जिले के बुडुबिराहा आदिवासी गांव में नए संयुक्त कार्यक्रम के तहत मलेरिया की जांच के लिए काफी संख्या में ग्रामीण इकट्ठा हुए हैं। ज्यादातर ग्रामीण कंध जनजाति के हैं और अनिवार्य रूप से खेती करते हैं। वन भूमि साफ करते हैं और धान और अन्य फसल उगाते हैं।

 

भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में संपर्क का पहला बिंदु ‘स्वास्थ्य उप-केंद्र’ यहां से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। पिछले साल पंचायत की सीमा रेखा को नए सिरे से व्यवस्थित करने के कारण बुडुबिराहा को एक अलग पंचायत में रखा गया है और इसके बाद से यहां मान्यताप्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ‘आशा’ की नियुक्ति नहीं की गई है। एक अन्य आशा कार्यकर्ता के नाम गांव को जरूर आबंटित किया गया है, जो एक महीने में एक बार दौरा करती है।गांव में अधिकांश आबादी कंध जनजाति की है। वे अनिवार्य रूप से खेती करते हैं। वन भूमि साफ करते हैं और धान और अन्य फसल उगाते हैं।

 

धान के खेतों, घने जंगलों और धीमी गति से चलने वाली धाराएं ‘अनाफीलु फ्लुआतिलिस’ मच्छर के प्रजनन को प्रोत्साहित करती हैं, और घातक ‘फाल्सीपेरम मलेरिया’ व्यापक रुप से फैलता है। कंधमाल जिले ( जिसका यह गांव हिस्सा है ) में एनुअल पारासाइट  इन्सडन्स 38.5 का है,  जिसका मतलब हुआ कि हर 1,000 परजीवी परीक्षण में 38 लोगों का परिणाम सकारात्मक है, हालांकि परजीवी से ग्रसित सभी लोग मलेरिया से पीड़ित नहीं हैं। गुणवत्ता वाले स्वास्थ्य सुविधाओं तक बद्तर पहुंच के साथ, अधिकांश रोगियों को इलाज के लिए स्थानीय बैद्य और पारंपरिक बाबाओं के पास जाते हैं।

 

मलेरिया का देर से या गलत इलाज का परिणाम बहुत खतरनाक भी हो सकता है।

 

टाटा ट्रस्ट के स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रबंधक जयेइता चौधरी ने इंडियास्पेंड को बताया कि एफब्रिले मलेरिया या बुखार के बिना मलेरिया का पता आसानी से चल पाता है।,जो बड़े पैमाने पर मौसमी जांच को महत्वपूर्ण बनाता है।

 

इसी तरह 3 वर्षीय ऋषि वर्धाजी में मलेरिया का पता चला था, हालांकि उनमें मलेरिया के कोई लक्षण नहीं दिखे थे।

 

कुपोषित बच्चों में बद्तर प्रतिरक्षा के कारण मलेरिया संक्रमण अधिक खतरा होता है। यदि समय रहते इसका पता न चले तो मलेरिया शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली को और कम कर देता है । कुपोषण और बढ़ जाता है और एक समय के बाध बच्चों में  स्टंटिंग शुरु हो जाती है।

 

जब यह संवाददाता गांव में थी, मलेरिया के लिए किए गए 10 में चार बच्चे का परिक्षण सकारात्मक आया था।

 

ओडिशा के आदिवासियों के लिए मुश्किलें सबसे ज्यादा

 

बुडुबिराहा गांव जैसी आदिवासी जनसंख्या, भारत की आबादी का 8 फीसदी बनाते हैं, और भारत की मलेरिया की घटनाओं में इस आबादी का  46 फीसदी और मलेरिया की मौत का कारण में 47 फीसदी की हिस्सेदारी है। राज्यों में बसे जनजातीय आबादियों द्वारा एक साथ  80  फीसदी मलेरिया की घटनाओं की रिपोर्ट की गई है। इनमें ओडिशा  के लिए आंकड़े 41 फीसदी, छत्तीसगढ़ के लिए 14 फीसदी,, झारखंड के लिए 13 फीसदी और मध्य प्रदेश के लिए 6 फीसदी हैं।

 

हालांकि, भारत ने वर्ष 2016 में 10 लाख मलेरिया के मामलों की जानकारी दी है। वर्ष 2000 से 2015 तक आंकड़ो में 45 फीसदी गिरावट के साथ, पूरे भारत में मलेरिया के मामलों में कमी हुई है।

 

हालांकि, ओडिशा में मलेरिया के खिलाफ लड़ाई धीमी हुई है। 2016 में राज्य में मलेरिया से सबसे ज्यादा मौतें (77) दर्ज की गई हैं।

 

इसका कारण यह है कि वर्ष 2016 में ओडिशा के मलेरिया मामलों में 86 फीसदी प्लास्मोडम फॉल्सीपारम के थे, जो भारत में पाए जाने वाले मलेरिया परजीवी के दो प्रमुख प्रकारों के में से एक हैं। दूसरा है प्लास्मोडियम विवएक्स। प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम रक्त में तेजी से फैलता है, जिससे गंभीर एनीमिया हो जाता है और छोटे रक्त वाहिकाओं को रोकता, जो आगे सेरेब्रल मलेरिया में बदल जाता है, जो अक्सर घातक होता है।

 

राज्य अनुसार मलेरिया, 2016

Source: National Vector-Borne Disease Control Programme

 

मलेरिया को खत्म करना

 

टाटा ट्रस्ट्स और ओडिशा राज्य सरकार के बीच साझेदारी का उद्देश्य वर्ष 2021 तक  वार्षिक परजीवी घटना को 1000 जनसंख्या में 1 से कम करना, मृत्यु को 100 फीसदी समाप्त करना है और मलेरिया की घटनाओं को 40 फीसदी कम करना है।

 

टाटा ट्रस्ट टेक्नोलॉजी इस साझेदारी में  मानव संसाधन, सैन्य सहायता और जागरूकता प्रदान करते हैं, जबकि राज्य सरकार ने दवाओं और नैदानिक ​​समर्थन का योगदान दिया है।

 

रायगढ़, कालाहांडी और कंधमाल राज्य के तीन दक्षिणी जिलों में सबसे दुर्गम गांवों में से 623 का लक्ष्यीकरण करते हुए कार्यक्रम तीन सरल कदमों – रोकथाम, समय पर पता लगाने, और तेजी से उपचार पर निर्भर करता है।

 

बुडुबिराहा गांव का अनुभव जानने लायक है। टाटा ट्रस्ट्स के एक सहयोगी संगठन ‘ लिवोलिंक फाउंडेशन’ ने ग्रामवासियों के साथ मिलकर काम किया, ताकि उन्हें गांव के स्वास्थ्य स्वयंसेवक नामित करने के लिए मनाया जा सके। ग्रामीणों ने 25 वर्षीय सलमान मलिक को चुना, जिन्होंने दसवीं तक पढ़ाई की है।

 

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मलेरिया विरोधी दवाओं के साथ 25 वर्षीय स्वास्थ्य स्वयंसेवक सलमान मलिक । सलमान  को प्रोत्साहन राशि के रूप में महीने में 1,000 रुपये मिलते हैं। सलमान साप्ताहिक बैठकों के लिए समुदाय को मलेरिया के लक्षण, रोकथाम और उपचार के बारे में शिक्षित करने के काम भी करते हैं। सलमान कहते हैं, ” अपने गांव को आदर्श बनाना ही मेरा सपना है।”

 

मलेरिया और कुपोषण का पता लगाने और उपचार में प्रशिक्षण के साथ राष्ट्रीय वेक्टर बोर्न डिसीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) द्वारा डेटा प्रबंधन में स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद सलमान एक प्रमाणित ‘बुखार उपचार डिपो’ धारक बन गए हैं।

 

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एक त्वरित निदान किट के साथ एक लड़के का मलेरिया का परिक्षण करता स्वास्थ्य कर्मचारी। रक्त की एक छोटी बूंद एक स्ट्रिप पर एकत्र की जाती है, जो डिवाइस में डाली जाती है। नतीजा मिलने में आमतौर पर 15-30 मिनट लगते हैं।

 

त्वरित  नैदानिक ​​किट ( डायबिटीज टेस्ट किट की तरह एक पोर्टेबल डिवाइस ) से लैस सलमान मलेरिया के लिए लोगों का परीक्षण करता है और दवाइयों बताता है – फाल्सीपेरम मलेरिया के लिए तीन दिवसीय कोर्स, विवेक्स मलेरिया के लिए 14 दिन का कोर्स और विवॅक्स और फाल्सीपेरम दोनो के लिए 15 दिनों का कोर्स – और इसके परिणाम देखता है। यदि इलाज वाले व्यक्ति दवाई के कोर्स के बाद भी ठीक नहीं हो पाते तो बेहतर नहीं होते हैं, तो वह उन्हें सरकारी स्वास्थ्य उप-केंद्र भेजता है।

 

सलमान  को प्रोत्साहन राशि के रूप में महीने में 1,000 रुपये मिलते हैं। वह समुदाय में मलेरिया के लक्षणों, रोकथाम और उपचार के बारे में शिक्षित करने के लिए दो बार साप्ताहिक बैठक भी करता है।

 

सलमान ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि  “यह मेरा सपना है कि मेरा गांव एक मॉडल गांव बने। कुछ महीने पहले तक ग्रामीण इलाज के लिए कई बंगाली बाबाओं के पास जाते थे और करीब 1,000 से 1500 रुपए का खर्चा भी आता था।  अब उनका इलाज नि: शुल्क होता है  और रोकथाम के बारे में जागरूकता पहले से बेहतर हुई है।

 

रोकथाम कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके लिए 81 वर्षीय नीलसन मलिक जैसे अन्य ग्रामीणों का सहयोग प्राप्त किया गया है। आशा कार्यकर्ता द्वारा बांटे गए और  लंबे समय तक चलने वाली कीटनाशक (एलएलआई) दिखाते हुए उन्होंने बताया कि, “हमने मच्छरदानी के उपयोग के बारे में सुना था, लेकिन कभी नहीं पता था कि वह कैसा दिखता है और हम उसे कहां से प्राप्त कर सकते हैं।” नेल्सन का काम हर रात 8 बजे चर्च की घंटी बजा कर लोगों को मच्छरदानी लगाने की याद दिलाना है।

 

निवासियों को घरों की भीतरी सतहों के लिए कीटनाशक के छिड़काव के लिए भी प्रशिक्षित किया गया है जो आमतौर पर मच्छरों के विश्रामस्थान होते हैं। निवासी प्रत्येक शुक्रवार को ‘ड्राई डे’ मनाते हैं। इसमें वे सभी जल संग्रहण और अन्य संभावित मच्छर प्रजनन स्थलों को साफ करते हैं।

 

राज्य सरकार ने उड़ीसा के 23 जिलों में दुर्गमा ‘अंचलारे मलेरिया निहारन’ नामक एक कार्यक्रम शुरू करने के लिए इस साझेदारी से कुछ सफल रणनीतियों का इस्तेमाल किया है। जुलाई 2017 तक, यह लगभग 80 ब्लॉकों तक पहुंच गया था और 2,000 शिविरों का आयोजन किया गया था, जैसा कि ओडिशा में एनवीबीडीसी के साथ जुड़े स्वास्थ्य सेवा के संयुक्त निदेशक मदन मोहन प्रधान ने इंडियास्पेंड को बताया है।

 

 

 

मलकानगिरी जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के साथ अपने अनुभव को साझा करते हुए प्रधान कहते हैं,  “ जन जांच की रणनीति, अवशिष्ट पर छिड़काव और एलएलआईआई नेट का उपयोग काम कर रहा है। मैंने लक्षणों और खतरनाक मलेरिया में भारी कमी देखी है। जहां पिछले साल हर दिन छह मामले पकड़ में आते थे, वहीं इस साल प्रति दिन दो मामले सामने आ रहे हैं।”

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 16 सितंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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